ग्राउंड रिपोर्ट: 11 साल में सिर्फ खंभे गाड़ पाया प्रशासन, छत्तीसगढ़ के मसपुर गांव में बूंद-बूंद पानी और रोशनी को तरसती जिंदगी

छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के मसपुर गांव में आज भी लोग साफ पीने के पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. पहाड़ी पर बसे इस गांव में महिलाएं और बच्चे रोज खतरनाक रास्तों से होकर झरने से पानी लाते हैं.

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मसपुर में लोग हर रोज पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. (Photo- ITGD) मसपुर में लोग हर रोज पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. (Photo- ITGD)

सुमी राजाप्पन

  • रायपुर,
  • 07 जून 2026,
  • अपडेटेड 12:00 AM IST

हाल ही में देश में चल रही भीषण लू और रिकॉर्ड तोड़ गर्मी को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कैबिनेट मंत्रियों को एक अहम सलाह दी थी. उन्होंने सभी मंत्रियों को काम के दौरान खुद को पूरी तरह हाइड्रेटेड रखने (लगातार पानी पीते रहने) के लिए कहा था.

प्रधानमंत्री का ये संदेश बेहद सरल और आज के समय में बेहद जरूरी था. लेकिन एक तरफ जहां देश का शीर्ष नेतृत्व इस बढ़ते तापमान और भीषण गर्मी से निपटने के तरीकों पर चर्चा कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण भारत में कुछ कोने आज भी ऐसे हैं जहां असली लड़ाई खुद को हाइड्रेटेड रखने की नहीं है.

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ऐसे इलाकों में असली संघर्ष सिर्फ इतना है कि पीने के लिए दो बूंद साफ पानी कहां से लाया जाए. पिछले कुछ हफ्तों में ग्रामीण भारत के अलग-अलग हिस्सों से पानी के संकट की कई परेशान करने वाली तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं.

मीलों चलकर पानी लाते लोग

कहीं महिलाएं अपनी जान जोखिम में डालकर गहरे और खतरनाक कुओं में उतर रही हैं, तो कहीं ग्रामीण खाली बर्तन हाथ में लिए पानी की तलाश में मीलों पैदल चल रहे हैं. कहीं छोटे-छोटे बच्चे हर दिन पढ़ाई छोड़कर घंटों सिर्फ पानी खोजने में बिता रहे हैं. 

ये डरावनी तस्वीरें हम सभी को याद दिलाती हैं कि आज भी देश के करोड़ों नागरिकों के लिए पीने का साफ पानी मिलना कोई सामान्य बात नहीं है, बल्कि रोजमर्रा की जंग है.

ऐसी ही एक दर्दनाक और आंखें खोल देने वाली कहानी छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले से सामने आई है. जिला संवाददाता गौरव श्रीवास्तव ने जब अंतागढ़ ब्लॉक से करीब 20 से 25 किलोमीटर दूर पहाड़ी की चोटी पर बसे एक छोटे से गांव 'मसपुर' के हालातों के बारे में जानकारी दी, तो आजतक की टीम ने खुद वहां जाकर जमीनी हकीकत देखने का फैसला किया.

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वहां पहुंचने के बाद हमें जो दिखा, वो सिर्फ पानी का कोई अस्थाई संकट नहीं था. वो पीढ़ियों से चली आ रही प्रशासनिक उपेक्षा, सरकारी दावों की नाकामी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव की एक बेहद कड़वी और दर्दभरी हकीकत थी.

नक्सलवाद का साया और बुनियादी सुविधाओं से कटी जिंदगी

मसपुर गांव तक पहुंचने का सफर खुद में ही इस पूरे इलाके के पिछड़ेपन की कहानी बयां कर देता है. ये पूरा क्षेत्र पिछले कई दशकों से नक्सली हिंसा और आतंक की चपेट में रहा है. नक्सलवाद के साये के कारण इस इलाके में पक्की सड़कें कभी बन ही नहीं पाईं.

सरकारी अधिकारी और कर्मचारी इस सुदूर पहाड़ी इलाके में आने से हमेशा कतराते रहे. यही वजह रही कि जीवन जीने के लिए जरूरी बहुत ही बुनियादी चीजें भी इस गांव के लोगों तक कभी नहीं पहुंच सकीं.

जैसे ही हमारी गाड़ी अंतागढ़ से आगे घने जंगलों और बेहद पथरीले रास्तों की तरफ बढ़ी, वैसे ही इस इलाके का अकेलापन और अलगाव साफ नजर आने लगा. रास्ते में कई किलोमीटर के ऐसे भी पैच आए जहां मोबाइल का नेटवर्क पूरी तरह गायब हो गया. घने पेड़ों के बीच जगह-जगह मिट्टी और फूंस के बने छोटे-छोटे घर बिखरे हुए दिखाई दे रहे थे. आधुनिक विकास या बुनियादी ढांचे का कोई भी नामोनिशान दूर-बहुत दूर तक नजर नहीं आ रहा था.

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सफर के दौरान एक पॉइंट ऐसा भी आया जहां सड़क पूरी तरह खत्म हो गई. वहां से आगे गाड़ी ले जाना नामुमकिन था. इसके बाद का जो सफर था, उसकी कल्पना इस शहरी दुनिया से बाहर का कोई व्यक्ति पानी की एक बूंद के लिए तो कभी नहीं कर सकता. हमने अपनी गाड़ी को वहीं छोड़ दिया. इसके बाद हम एक स्थानीय यूटिलिटी वाहन में सवार हुए. 

अंतागढ़ के अंदरूनी और बेहद संकरे रास्तों से होते हुए वह गाड़ी भी हमें सिर्फ एक निश्चित दूरी तक ही ले जा सकी. इसके बाद हमारे सामने असली और सबसे बड़ी चुनौती खड़ी थी.

गांव तक पहुंचना मुश्किल

गाड़ी का रास्ता खत्म होने के बाद गांव तक पहुंचने के लिए कई किलोमीटर की सीधी और खड़ी चढ़ाई चढ़नी थी. ये चढ़ाई किसी बने-बनाए रास्ते, पगडंडी या सड़क पर नहीं थी. ये एक ऐसा खतरनाक और संकरा रास्ता था जो पूरी तरह से बड़े-बड़े पत्थरों, नुकीली चट्टानों और उबड़-खाबड़ मलबे से भरा हुआ था. जब हमारी टीम ने यह चढ़ाई शुरू की, तो हमें इस बात का बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि आगे का सफर कितना मुश्किल होने वाला है.

इस रास्ते पर चलते हुए हर एक कदम पर पूरा ध्यान देना जरूरी था. एक पल की भी लापरवाही या पैर का फिसलना किसी गंभीर चोट या बड़े हादसे का कारण बन सकता था. ऊपर से बरसती आग, सूरज की तपिश, पहाड़ की ऊंचाई और यह बेरहम रास्ता हर एक किलोमीटर के सफर को कई गुना लंबा और थका देने वाला बना रहा था. 

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पत्रकार होने के नाते हमारी टीम के पास भारी कैमरे, बैटरी, ट्राइपॉड और जरूरी उपकरण थे. इसके साथ ही हमारे पास पीने के पानी की कुछ बोतलें भी थीं. हमें पता था कि गांव पहुंचने के बाद पानी हमारे लिए एक बहुत बड़ी लग्जरी बन जाएगा.

चढ़ाई जैसे-जैसे आगे बढ़ी, हमारी शारीरिक ताकत और स्टेमिना पूरी तरह जवाब देने लगा. जो सफर शुरुआत में आसान लग रहा था, वो अब धीरज और सहनशक्ति की एक कड़ी परीक्षा बन चुका थाय पहाड़ की चढ़ाई बिना रुके लगातार जारी थी और मौसम की मार इस रास्ते को और मुश्किल बना रही थी.

जब अस्पताल न पहुंचने के कारण टूट जाती है सांस

अभी हम आधी चढ़ाई ही पूरी कर पाए थे कि रास्ते में हमारी मुलाकात सुबे सिंह हुसेंडी से हुई. जहां हमारी टीम थकान के कारण हांफ रही थी और सांस लेने के लिए रुकी हुई थी, वहीं सुबे सिंह हमारे सामने बिल्कुल सामान्य खड़े थे. उन पर इस मुश्किल चढ़ाई का कोई खास असर नहीं दिख रहा था. हमने उत्सुकता से उनसे पूछा कि गांव के लोग हर दिन इस बेहद मुश्किल और जानलेवा रास्ते पर कैसे आते-जाते हैं?

सुबे सिंह का जवाब बहुत सीधा और सरल था. उन्होंने कहा, 'हमें इसकी आदत हो चुकी है.' उनके लिए ये सब उनकी सामान्य जिंदगी का हिस्सा था, लेकिन हमारी टीम के लिए यह सामान्य से बहुत परे था. इसके तुरंत बाद सुबे सिंह ने एक ऐसी बात कही जिसने पूरी बातचीत का माहौल ही बदलकर रख दिया.

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उन्होंने बेहद शांत आवाज में बताया,' ये रास्ता हमारे लिए तब जानलेवा बन जाता है जब हमें गांव के किसी बीमार मरीज को अपने कंधों या खाट पर उठाकर नीचे ले जाना होता है. पिछले साल, हमारे एक रिश्तेदार की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई थी. हम उन्हें इसी पथरीले रास्ते से अस्पताल ले जाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन अस्पताल पहुंचने की इस जंग में रास्ते में ही उनकी सांसें टूट गईं और उन्होंने दम तोड़ दिया.'

खराब रास्ता, अत्यधिक दूरी और आपातकालीन चिकित्सा सुविधाओं की कमी ने एक सामान्य बीमारी को एक बड़े पारिवारिक हादसे में बदल दिया था. सुबे सिंह ने आगे बताया कि ये रास्ता तब और भी ज्यादा भयानक हो जाता है जब गांव के पुरुषों और महिलाओं को नीचे के बाजार से 35-35 किलो सरकारी राशन की बोरी अपने कंधों पर लादकर ऊपर गांव तक लानी होती है.

सुबे सिंह की आवाज में शासन के खिलाफ कोई गुस्सा या चीख-पुकार नहीं थी. वो बिना किसी ड्रामे के अपनी बात कह रहे थे. उनके चेहरे पर एक अजीब सा ठहराव और उस दुख को स्वीकार कर लेने का भाव था, जिसे इस आधुनिक दुनिया का कोई भी इंसान सोचकर ही कांप जाए.

11 साल में लगे सिर्फ खंभे, बिजली का आज भी इंतजार

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एक लंबी और बेहद थका देने वाली चढ़ाई के बाद हमारी टीम आखिरकार 'मसपुर' गांव पहुंची. गांव पहुंचने पर ऐसा लगा जैसे हम समय के चक्र में कई दशक पीछे चले गए हों. आज के डिजिटल युग में भी मसपुर गांव के लिए बिजली एक बहुत दूर का सपना बनी हुई है.

गांव के लोगों ने बताया कि पहाड़ी पर सिर्फ बिजली के खंभे गाड़ने की प्रक्रिया में ही प्रशासन को पूरे 11 साल का समय लग गया. आज पूरे गांव और पहाड़ी पर बिजली के खंभे और तार तो लगे हुए साफ दिखाई देते हैं, लेकिन वो विकास के एक ऐसे अधूरे प्रतीक की तरह खड़े हैं जो गांव तक आया तो सही पर कभी पूरा नहीं हो सका.

खंभों और तारों के होने के बावजूद आज तक गांव के किसी भी घर में बिजली का एक बल्ब तक नहीं जला है. सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात ये है कि पूरे गांव में किसी भी व्यक्ति को ये नहीं मालूम कि उनके घरों में बिजली की रोशनी आखिरकार कब आएगी.

इस पूरे गांव में एक अजीब सा सन्नाटा और खालीपन पसरा हुआ है. यहां न तो कोई छोटा-मोटा बाजार है, न कोई दुकान है और न ही किसी भी तरह की आर्थिक गतिविधि दिखाई देती है. यहां कुछ भी ऐसा नहीं है जिससे ये लगे कि आधुनिक भारत का विकास इस गांव तक पहुंचा है. यहां की जिंदगी की रफ्तार बेहद धीमी है, और वो पूरी तरह से सिर्फ एक चीज से तय होती है- और वो है पानी.

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शाम का ढलना और पानी के लिए महिलाओं का नीचे उतरना

गांव में पहुंचने के कुछ ही देर बाद शाम का समय हो गया. ये गांव में पानी इकट्ठा करने का समय था. घरों से महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चियां अपने हाथों में पीतल और स्टील के बर्तन, प्लास्टिक के डिब्बे और बाल्टियां लेकर निकलने लगीं. बिना एक पल भी गंवाए, वे सभी गांव के नीचे की तरफ जाने वाले एक बेहद पथरीले और ढलान वाले रास्ते की ओर बढ़ने लगीं. 

ये रास्ता गांव के पानी के एकमात्र और सबसे भरोसेमंद स्रोत की तरफ जाता था. हमारी टीम भी कैमरों के साथ उनके पीछे-पीछे चल पड़ी. पहाड़ से नीचे उतरने का ये रास्ता भी उतना ही मुश्किल और खतरनाक था, जितनी मुश्किल वो चढ़ाई थी जिससे हम गांव पहुंचे थे. पैरों के नीचे छोटे-छोटे पत्थर लगातार खिसक रहे थेय हर एक कदम फूंक-फूंक कर रखना पड़ रहा था.

कई मिनटों तक उस संकरे और उबड़-खाबड़ रास्ते पर चलने के बाद, हम आखिरकार दो बड़ी चट्टानों के बीच बसे एक छोटे से प्राकृतिक झरने के पास पहुंचे. यही वो जगह थी- पूरे मसपुर गांव की प्यास बुझाने का एकमात्र जरिया.

वहां पहुंचते ही महिलाओं ने बिना समय गंवाए अपने बर्तनों को भरना शुरू कर दिया. पानी भरते-भरते उन्होंने अपनी उस दिनचर्या के बारे में बताना शुरू किया जो पिछले कई दशकों से उनके जीवन को चला रही है. गांव की महिलाओं को पानी के लिए हर दिन दो बार यह खतरनाक सफर तय करना पड़ता है.

उनकी पहली यात्रा सुबह पांच या छह बजे शुरू होती है. इसके बाद, दूसरी यात्रा शाम को करीब चार बजे होती है, ताकि रात के खाने, बर्तन धोने, कपड़े साफ करने और दूसरे घरेलू कामों के लिए पर्याप्त पानी जमा किया जा सके.

मेंढकों के बीच से पानी भरने की खौफनाक हकीकत

उस झरने के पास का नजारा बेहद विचलित और परेशान करने वाला था. चट्टानों के एक समूह के बीच जमीन से थोड़ा सा पानी रिसकर जमा हो रहा था, जो देखने में थोड़ा साफ लग रहा था. कम से कम नग्न आंखों से देखने पर वह पानी पीने लायक प्रतीत हो रहा था. क्या वह पानी विज्ञान की कसौटी पर या किसी लैब की जांच में सुरक्षित साबित होगा? 

ये एक ऐसा सवाल था जिसका जवाब मैं उस वक्त नहीं ढूंढना चाहती थी. कुछ जमीनी सच इतने कड़वे होते हैं कि उन्हें साबित करने के लिए किसी लैब रिपोर्ट की जरूरत नहीं होती. जब महिलाएं बहुत सावधानी से उस गड्ढे से अपने बर्तनों में पानी भर रही थीं, तो उसी पानी के अंदर कुछ मेंढक तैर रहे थे.

पानी के उस छोटे से साफ हिस्से से मात्र कुछ ही फीट की दूरी पर उसी झरने का दूसरा हिस्सा था, जहां का पानी पूरी तरह सड़ चुका था और ठहरा हुआ था. वो पानी गहरा मटमैला था, उसमें पेड़ों की पत्तियां, कचरा और अनगिनत मेंढक तैर रहे थे. साफ और दूषित पानी का यह अंतर अंदर तक डराने वाला था. लेकिन ये पूरा दूषित ढांचा ही उस नाजुक जल तंत्र का हिस्सा था, जिसके भरोसे ये पूरा गांव अपनी जिंदगी काट रहा है.

टूटी-फूटी हिंदी में बात करते हुए गांव की एक बुजुर्ग महिला ने मुझे बताया कि उनका परिवार इस पहाड़ी पर साल 1975 में आकर बसा था. उन्होंने कहा, 'साल 1975 से लेकर आज तक हम और हमारा पूरा परिवार इसी झरने का पानी पी रहे हैं. तब से लेकर आज तक इस गांव में हमारे लिए कुछ भी नहीं बदला है.'

तभी पास में खड़ी एक युवा मां, जिसकी गोद में एक छोटा सा मासूम बच्चा था, हमारी बातचीत में शामिल हुई. उसने बेहद मायूस और दबी आवाज में कहा, 'मैं अपने इस छोटे से बच्चे को भी यही पानी पिलाती हूं. ये पानी पीने की वजह से मेरा बच्चा लगातार बीमार रहता है, उसे हमेशा पेट की बीमारी रहती है.' 

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मानसून में प्लास्टिक की छतों का सहारा

गांव वालों ने बताया कि मानसून के दौरान उनकी परेशानियां कम होने के बजाय कई गुना और ज्यादा बढ़ जाती हैं. उन्होंने समझाया कि जैसे ही तेज बारिश शुरू होती है, पहाड़ी का सारा कचरा बहकर इस झरने में आ जाता है. इसके कारण झरने का वो थोड़ा साफ दिखने वाला पानी भी पूरी तरह से मटमैला, कीचड़युक्त और दूषित हो जाता है. उन महीनों में गांव के लोग इस झरने का पानी बिल्कुल नहीं पी सकते.

ऐसी स्थिति में पूरा गांव पीने के पानी के लिए पूरी तरह से बारिश के पानी पर निर्भर हो जाता है. इसके लिए ग्रामीणों ने मजबूरी में अपना खुद का एक घरेलू सिस्टम तैयार किया है. वो बारिश के दिनों में अपने घरों की छतों और खपरैल पर बड़ी-बड़ी प्लास्टिक की शीट बांध देते हैं. इन शीटों के जरिए बारिश के पानी को चैनलाइज करके नीचे रखे बर्तनों और डिब्बों में इकट्ठा किया जाता है.

इसके बाद उस पानी को जमा करके रखा जाता है और इस्तेमाल करने से पहले अच्छी तरह उबाला जाता है. ये कोई आधुनिक आविष्कार नहीं है, बल्कि जिंदा रहने की मजबूरी से पैदा हुआ एक देसी जुगाड़ है.

जब पत्रकारों को भी पीना पड़ा वही दूषित पानी

इस पूरी रिपोर्टिंग और बातचीत के दौरान हमारी टीम के पास मौजूद पानी का स्टॉक पूरी तरह खत्म हो चुका था. पहाड़ी की चढ़ाई के दौरान हमने पानी की एक-एक बूंद को बहुत बचा-बचाकर पिया था, क्योंकि हम जानते थे कि मसपुर गांव पहुंचने के बाद हमें पीने का साफ पानी कहीं नहीं मिलने वाला है.

लेकिन आखिरकार, मजबूरी ने हमें भी घेर लिया. तेज प्यास और गर्मी के कारण हमारी टीम के सदस्यों को भी विवश होकर उसी झरने का पानी पीना पड़ा, जिसे गांव के लोग पीते हैं. वो पानी पीना हमारे लिए एक बेहद डरावना था. लेकिन हमारे और मसपुर के लोगों के बीच एक बहुत बड़ा अंतर था.

हमारी टीम के पास ये विकल्प था कि हम अपनी रिपोर्टिंग खत्म करके शाम को उस गांव से वापस नीचे आ सकते थे और साफ पानी खरीदकर पी सकते थे. लेकिन मसपुर के निवासियों के पास ऐसा कोई विकल्प नहीं है. उनके लिए वो दूषित पानी कोई मजबूरी का अस्थाई रास्ता नहीं है, बल्कि उनके जीवन का एकमात्र और आखिरी विकल्प है.

नेताओं के झूठे आश्वासन

ग्रामीणों के मुताबिक, उन्होंने अपनी इस समस्या को लेकर पिछले कई वर्षों में शासन और प्रशासन के हर स्तर पर गुहार लगाई है. सरकारी दफ्तरों में अनगिनत आवेदन दिए गए, अधिकारियों से कई बार मिन्नतें की गईं. ग्रामीणों का दावा है कि वो अपनी मांग लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर स्थानीय जनपद पंचायत के अधिकारियों और राजनीतिक प्रतिनिधियों तक जा चुके हैं.

उन्होंने क्षेत्र के कद्दावर बीजेपी नेता और वर्तमान सांसद विक्रम उसेंडी तक भी अपनी बात पहुंचाई है, जो पिछले 25 सालों से इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं.

एक ग्रामीण ने गहरी निराशा में कहा, 'अधिकारियों और नेताओं के पास से हमें आज तक सिर्फ और सिर्फ कोरा आश्वासन ही मिला है, जमीन पर कभी कोई काम नहीं हुआ.'

मैंने सुबे सिंह हुसेंडी से पूछा कि जब यहां इतनी मुश्किलें हैं, तो ये परिवार इन बेहद मुश्किल परिस्थितियों में इस पहाड़ पर क्यों रह रहे हैं? उन्होंने जो जवाब दिया, वो देश के नीति निर्माताओं और बड़े-बड़े कमरों में बैठकर योजनाएं बनाने वाले अधिकारियों की आंखें खोलने के लिए काफी है.

सुबे सिंह ने पूछा, 'हम ये गांव छोड़कर आखिर कहां जाएं? हमारे पुरखों के खेत यहीं हैं. हमारी रोजी-रोटी और पूरी आजीविका इसी जमीन और जंगल से जुड़ी है. हर पांच साल में जब चुनाव आते हैं, तो बड़े-बड़े नेता हाथ जोड़कर वोट मांगने इस पहाड़ पर आते हैं. उस समय उन्हें मसपुर का ये मुश्किल रास्ता बहुत अच्छी तरह से याद रहता है. लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म होते हैं और वो जीत जाते हैं, वो इस पहाड़ी का रास्ता क्यों भूल जाते हैं?'

एक कड़वा और कभी न भूलने वाला सफर

गांव वालों से काफी बातचीत करने और वहां के हालातों को कैमरे में कैद करने के बाद, हमारी टीम ने वापस नीचे उतरना शुरू किया. पहाड़ी से नीचे आने में हमें करीब एक घंटे का समय लगा. हम हर हाल में सूरज डूबने से पहले उस जगह पहुंचना चाहते थे जहां हमारी गाड़ी खड़ी थी, क्योंकि अंधेरा होने के बाद उस पथरीले रास्ते पर उतरना जानलेवा हो सकता था.

नीचे पहुंचने के बाद, गांव की जो महिला हमारे साथ गाड़ी तक आई थी, उसने गाड़ी में रखी साफ पानी की कई बोतलें एक सांस में खाली कर दीं. उसे इतनी उत्सुकता से साफ पानी पीते हुए देखकर, मैं उस वक्त सिर्फ उन लोगों के बारे में सोच रही थी जिन्हें हम ऊपर उस पहाड़ी पर छोड़ आए थे. उन लोगों के लिए जीवन की सबसे बुनियादी जरूरत—यानी साफ पीने का पानी, आज भी एक बहुत बड़ा सपना और रोज का संघर्ष है.

अंतागढ़ के मसपुर गांव का वो मंजर हमारे जहन में आज भी पूरी तरह ताजा है. इस ग्राउंड रिपोर्ट ने हमें यह सबक सिखाया कि जिन चीजों को हम शहरों में बहुत आम और साधारण समझते हैं, देश के कुछ हिस्सों में लोग उनके लिए अपनी जान की बाजी लगा रहे हैं.

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अपने पत्रकारिता के करियर में मैंने जितनी भी रिपोर्टिंग की है, ये उनमें से सबसे मुश्किल और दिल को झकझोर देने वाली रिपोर्ट थी. ये मेरे जीवन के सबसे चुनौती भरे सफरों में से एक था. लेकिन इन सब से बढ़कर, ये सफर मसपुर के लोगों के धैर्य, उनकी गरिमा और उस कड़वी हकीकत का एक जीता-जागता दस्तावेज था, जो आज भी हमारे देश के सबसे सुदूर कोनों में इंसानी जिंदगी को आकार दे रही है.

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