राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले का एक छोटा सा गांव है खरवाड़ा, जहां पानी आज लोगों के लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन चुका है. यहां रहने वाले करीब 15 आदिवासी परिवारों की सुबह पानी की तलाश से शुरू होती है, दिन का एक बड़ा हिस्सा इसी जुगाड़ में निकल जाता है. नौबत यह है कि लोगों को 3 से 5 किलोमीटर दूर पहाड़ियों से पानी लाना पड़ रहा है. कई परिवार गधों की पीठ पर बर्तन लादकर पानी ढोते हैं, तो महिलाएं और बच्चे सिर पर मटके रखकर मुश्किल रास्तों को पार करने को मजबूर हैं.
गांव की बुजुर्ग महिला ककूड़ी मीणा बताती हैं कि पिछले करीब 40 साल से वह गधों के सहारे पहाड़ियों के बीच से पानी ला रही हैं. उनके मुताबिक, रोज 3 से 4 किलोमीटर दूर जाकर पानी खोजना पड़ता है. ककूड़ी कहती हैं कि 'हम दुखी हो चुके हैं. बच्चे भी परेशान हैं, आसपास के लोग भी दुखी हैं. मोदी जी कुछ करो, अब आप ही हमारा काम करवा दो'.
सरकार एक तरफ हर घर नल से जल पहुंचाने का बड़ा-बड़ा दावा करती है, वहीं खरवाड़ा गांव के लोगों की जिंदगी आज भी पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रही है. केंद्र सरकार के जल जीवन मिशन का फायदा इस आदिवासी बस्ती तक अब तक नहीं पहुंच पाया है. पीपलखूंट उपखंड के इस इलाके में गर्मी की दस्तक के साथ ही ग्रामीणों की मुश्किलें कई गुना ज्यादा बढ़ चुकी हैं.
असल में गांव में पीने के पानी का इकलौता सहारा यहां लगा हैंडपंप था, जो वाटर लेवल नीचे जाने के कारण पूरी तरह सूख चुका है. इसके अलावा आसपास न तो कोई नदी है, न ही कोई स्थायी तालाब बचा है. नौबत यह है कि लोगों की हर सुबह सिर्फ पानी की खोज के साथ शुरू होती है, उनका आधा से ज्यादा दिन सिर्फ प्यास बुझाने के इंतजाम में ही बीत जाता है.
पानी के लिए रोज पहाड़ चढ़ रहे लोग
गांव के लोग बताते हैं कि सूरज निकलने से पहले ही परिवार के लोग पानी लेने निकल पड़ते हैं. कई बार ऊंची-नीची पहाड़ियों और पथरीले रास्तों से होकर गड्ढों में जमा पानी तक पहुंचना पड़ता है. वहां से बर्तन भरकर पानी गधों पर लादा जाता है और फिर गांव तक लाया जाता है. महिलाएं-बच्चे भी इस काम में बराबर जुटे रहते हैं.
सोना मीणा बताती हैं कि शादी के बाद से उन्होंने यही संघर्ष देखा है. उनके मुताबिक, कई बार 2 से 3 किलोमीटर दूर जाकर पानी खोजना पड़ता है. टैंकर आता भी है तो कभी एक दिन छोड़कर, और उससे सिर्फ कुछ घड़े पानी ही मिल पाता है. घर, बच्चों और मवेशियों के लिए यह पानी काफी नहीं पड़ता.
पढ़ाई छोड़ पहले पानी लाना पड़ता है
इस जल संकट का असर बच्चों की पढ़ाई पर भी पड़ रहा है. गांव की 12वीं में पढ़ने वाली प्रियंका मीणा कहती हैं कि सुबह पहले पानी लाना पड़ता है, फिर स्कूल जाना होता है. कई बार पानी भरने में इतना समय लग जाता है कि स्कूल देर से पहुंचना पड़ता है. उनका कहना है कि पानी की चिंता पढ़ाई पर सीधा असर डाल रही है.
ग्रामीणों का आरोप है कि आसपास के कई गांवों को जल जीवन मिशन से जोड़ दिया गया, लेकिन खरवाड़ा गांव के इन परिवारों तक अब तक योजना का लाभ नहीं पहुंचा. गांव के पास पानी की टंकी बनी है, लेकिन वहां से बस्ती तक पाइपलाइन नहीं बिछाई गई. इससे ग्रामीणों में नाराजगी है.
प्रशासन बोला- जल्द होगा समाधान
उपखंड अधिकारी निलेश कलाल का कहना है कि गांव की समस्या की जानकारी मिलने के बाद निरीक्षण किया गया था. उनके मुताबिक, जल जीवन मिशन का काम फॉरेस्ट क्लीयरेंस के कारण अटका हुआ है. फिलहाल टैंकर से पानी सप्लाई की व्यवस्था की गई है और स्थायी समाधान के लिए भी कोशिशें चल रही हैं.
एसडीएम ने दावा किया कि अगर इसके बाद भी समस्या बनी रहती है, तो वह जिला कलेक्टर और फॉरेस्ट विभाग से बात कर मामले का स्थायी समाधान निकालेंगे. उनका कहना है कि एक महीने के भीतर इस समस्या को दूर करने की कोशिश की जाएगी ताकि इन परिवारों को राहत मिल सके.
हालांकि, गांव के लोगों का कहना है कि उन्हें अब वादों से ज्यादा पानी चाहिए. उनका साफ कहना है कि जब तक गांव तक पाइपलाइन नहीं पहुंचेगी और नियमित पानी नहीं मिलेगा, तब तक उनकी मुश्किलें कम नहीं होंगी.
संजय जैन