छत्तीसगढ़ के भिलाई में मां-बेटी के मिलन का एक ऐसा भावुक दृश्य देखने को मिला, जिसने वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम कर दीं. बिहार के भागलपुर की रहने वाली 65 वर्षीय बबीता देवी 11 महीने पहले लापता हो गई थीं. उन्हें तलाशते-तलाशते उनकी 32 वर्षीय बेटी पूजा आखिरकार भिलाई पहुंची और मां को देखते ही फूट-फूटकर रो पड़ी.
फील परमार्थम आश्रम में हुए इस मार्मिक मिलन के दौरान बेटी कभी मां के आंसू पोंछती दिखी, कभी उनका माथा चूमती रही और कभी उनके पैरों में गिरकर बिलखने लगी. यह दृश्य देखकर आश्रम में मौजूद लोग भी भावुक हो गए.
लोगों का कहना था कि अगर बेटी का उदाहरण देना हो तो पूजा जैसी बेटी का नाम लिया जाना चाहिए, जिसने तमाम मुश्किलों के बावजूद अपनी मां की तलाश नहीं छोड़ी.
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पिता के अपहरण के बाद मां ही बनी थीं सहारा
बबीता देवी और उनकी बेटी पूजा की कहानी संघर्ष और त्याग से भरी हुई है. करीब 32 साल पहले जब पूजा अपनी मां के गर्भ में थीं, उसी दौरान उनके पिता पुण्यदेव सिंह का अपहरण हो गया था. पुण्यदेव सिंह सेंट्रल कोल फील्ड्स लिमिटेड में मैनेजर थे और उनका आज तक कोई सुराग नहीं मिल सका.
पति के अचानक गायब हो जाने के बाद बबीता देवी गहरे मानसिक आघात में चली गईं. इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अकेले दम पर अपनी बेटी का पालन-पोषण किया.
पूजा बताती हैं कि उनकी मां ने जिंदगीभर संघर्ष किया, लेकिन कभी दूसरी शादी नहीं की और पूरी जिंदगी बेटी को पालने में लगा दी. दोनों ही एक-दूसरे का सबसे बड़ा सहारा थीं.
11 महीने पहले अचानक लापता हो गई थीं मां
पूजा के मुताबिक, 3 जून 2025 को उनकी मां बबीता देवी अपने मायके जगतपुर, बांका जाने की बात कहकर घर से निकली थीं. उन्होंने कहा था कि 10 दिन में वापस लौट आएंगी, लेकिन उसके बाद उनका कोई पता नहीं चला.
मां के गायब होने के बाद पूजा की जिंदगी जैसे थम गई. उन्होंने भागलपुर, पूर्णिया, कटिहार, नौगछिया और कई अन्य जिलों के वृद्धाश्रमों में जाकर तलाश की. रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और सार्वजनिक स्थानों पर भी मां की खोजबीन की.
पूजा ने खुद पोस्टर छपवाकर दीवारों, बसों और ऑटो पर चिपकाए. वह थानों के चक्कर लगाती रहीं और हर संभव कोशिश करती रहीं कि किसी तरह उनकी मां का पता चल जाए.
रिश्तेदारों ने कहा- मां अब नहीं मिलेगी
पूजा ने बताया कि मां की तलाश के दौरान उन्हें कई लोगों ने हिम्मत हारने की सलाह दी. यहां तक कि कुछ रिश्तेदारों ने उनसे कहा कि उनकी मां अब शायद जीवित नहीं हैं और उन्हें अपनी जिंदगी के बारे में सोचना चाहिए.
लेकिन पूजा ने हार नहीं मानी. उन्होंने कहा कि मां को खोजे बिना वह चैन से नहीं बैठ सकती थीं. इस तलाश के दौरान वह मानसिक तनाव और अवसाद से भी गुजरीं.
उन्होंने वृंदावन तक जाकर प्रार्थना की और मां की सलामती के लिए कई धार्मिक स्थलों पर माथा टेका. बावजूद इसके उन्होंने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा.
भिलाई के आश्रम में मिलीं बबीता देवी
उधर, भिलाई से करीब 15 किलोमीटर दूर कचांदुर मोड़ इलाके में बबीता देवी बेहद अस्थिर मानसिक अवस्था में भटकती हुई मिली थीं. स्थानीय लोगों की सूचना पर फील परमार्थम आश्रम के मुख्य सेवक अमित राज की टीम उन्हें अपने साथ आश्रम ले आई.
आश्रम में रहने के दौरान बबीता देवी बार-बार घर जाने की जिद करती थीं. वह कहती थीं, "मुझे घर जाना है, गेट खोल दो." लेकिन वह अपना पूरा पता और पहचान नहीं बता पा रही थीं.
करीब 11 महीने तक उनकी पहचान रहस्य बनी रही. फिर एक दिन उन्होंने बांका और जगतपुर का नाम लिया, जिसके बाद आश्रम प्रबंधन ने बिहार पुलिस से संपर्क किया.
एक फोन कॉल ने बदल दी जिंदगी
फील परमार्थम आश्रम के अमित राज ने बताया कि जैसे ही महिला से मिली जानकारी के आधार पर बांका थाना पुलिस को सूचना दी गई, पुलिस ने परिवार से संपर्क किया.
अगले ही दिन पूजा के पास फोन पहुंचा कि उनकी मां भिलाई के आश्रम में सुरक्षित हैं. यह खबर सुनते ही पूजा भावुक हो गईं. उन्होंने बताया कि जब कोचिंग संस्थान से छुट्टी नहीं मिली तो उन्होंने साफ कह दिया कि नौकरी उनकी मां से बड़ी नहीं है.
इसके बाद वह बिना आरक्षण के साउथ बिहार एक्सप्रेस की जनरल बोगी में सफर कर भागलपुर से भिलाई पहुंचीं. जैसे ही उन्होंने अपनी मां को देखा, वह खुद को रोक नहीं सकीं और उनसे लिपटकर रोने लगीं.
55 लोगों को परिवारों से मिला चुका है आश्रम
फील परमार्थम आश्रम मानसिक रूप से अस्थिर, बेसहारा और परिवार से बिछड़े लोगों की मदद करने का काम करता है. आश्रम के अनुसार अब तक 200 से अधिक लोगों को यहां आश्रय दिया जा चुका है.
अमित राज ने बताया कि उनकी टीम अब तक 55 लोगों को उनके परिवारों से मिलवा चुकी है. वर्तमान में आश्रम में 96 लोग रह रहे हैं. जिन लोगों की मृत्यु हो जाती है, उनके अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी भी आश्रम के सदस्य निभाते हैं.
समाजसेवियों के सहयोग से संचालित इस केंद्र में रहने वालों को भोजन, इलाज और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं. बबीता देवी और पूजा का मिलन भी इसी प्रयास का एक भावुक और प्रेरणादायक उदाहरण बन गया है.
रघुनंदन पंडा