यूपी की 'मोगली गर्ल' का 18 साल की उम्र में निधन, खून में फैल गया था इंफेक्शन, जंगल में पले क्यों बाहरी दुनिया नहीं झेल पाते

भारत की मोगली गर्ल एहसास, जो 2017 में जंगल से मिली थी, 18 वर्ष की उम्र में लखनऊ में उसका निधन हो गया. एहसास का निधन लंग्स से शरीर में फैले ब्लड इंफेक्शन के कारण हुआ. इस इंफेक्शन के बारे में प्रोफेसर डॉ. कुलदीप कुमार ने बताया है.

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मोगली गर्ल एहसास ( File Photo) मोगली गर्ल एहसास ( File Photo)

अभिषेक पांचाल

  • लखनऊ,
  • 19 जून 2026,
  • अपडेटेड 6:06 PM IST

भारत की "मोगली गर्ल" का 18 साल की उम्र में लखनऊ में निधन हो गया. वह पहली बार साल 2017 में चर्चा में आई थी. तब उसे उत्तर प्रदेश के बहराइच ज़िले के कतर्नियाघाट वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी में भटकते हुए देखा गया था. तब उसको वहां से बहराइच की चाइल्ड वेलफेयर समिति ने निकाला और उसका रिहैबिलिटेशन शुरू किया. वहां उसका नाम पूजा रखा गया था. वहां से फिर उसको लखनऊ के निर्वाण बालगृह में शिफ्ट कर दिया था. जहां उसका नाम एहसास रखा गया. 

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जब साल 2017 में उसको जंगलों से लोगों के बीच लाया गया था तब वह सामान्य बच्चे की तरह नहीं चलती थी. वह हाथ और पैर दोनों की मदद से चलती थी, लेकिन सालों के मेडिकल इलाज, देखभाल और रिहैबिलिटेशन (पुनर्वास) से एहसास धीरे-धीरे लोगों के बीच रहने की आदी हो गई. समय के साथ, उसने कपड़े पहनना, देखभाल करने वालों को पहचानना और प्यार-दुलार पर प्रतिक्रिया देना सीख लिया था. जो महिला उसकी देखभाल करती थी वह उसको अम्मा कहती थी.

बीते कुछ दिनों से बिगड़ रही थी तबीयत

बीते कुछ दिनों से एहसास क तबीयत खराब हो रही थी. 15 जून को उसकी तबीयत बिगड़ गई. उसे तुरंत राम मनोहर लोहिया अस्पताल ले जाया गया, लेकिन अस्पताल पहुंचने से पहले ही वह दम तोड़ चुकी है. आरएमएल हॉस्पिटल की जनसंपर्क अधिकारी ने आजतक. इन से बातचीत में बताया कि एहसास को अस्तपताल के इमरजेंसी विभाग में लाया गया था. जब जांच की गई तो पता चला कि उसका निधन हो चुका है.  पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के मुताबिक, उसकी मौत की वजह फेफड़ों की बीमारी के कारण हुआ सेप्टिसीमिया (खून में संक्रमण) था. एक्सपर्ट्स कहते हैं कि खून में इंफेक्शन होना एक खतरनाक स्थिति है. सेप्टिसीमिया तब होता है जब फेफड़ों का बैक्टीरिया खून में चला जाता है. यह स्थिति मौत का कारण भी बन सकती है. 

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इस घटना के बाद एक सवाल यह भी उठता है कि क्या जंगल में रहने वालों का आबादी में रहना मुश्किल होता है. इसका सेहत से क्या संबंध है. इस बारे में एक्सपर्ट से जानते हैं. 

जंगल में रहने वालों को आबादी के बीच बीमारियों का खतरा 

दिल्ली के जीटीबी हॉस्पिटल में मेडिसिन विभाग में  प्रोफेसर डॉ. कुलदीप कुमार बताते हैं कि जो लोग कई सालों से जंगलों में रहते हैं, उनका शरीर वहां के वातावरण के हिसाब से ही ढल चुका होता है. उसको लोगों के बीच रहने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है. आबादी वाले इलाकों में कई तरह के इंफेक्शन का रिस्क होता है. जंगलों में रहने वालों का खानपान भी अलग होता है. उनके शरीर का पाचन सिस्टम भी उसी तरह से ही रहता है. शहरों में प्रदूषण भी होता है. जहरीला धुआं, धूल उनके फेफड़ों को नुकसान करता है. इससे फेफड़ों की कई बीमारी होने का रिस्क रहता है. 

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फेफड़ों की बीमारी कितनी खतरनाक

डॉ. कुलदीप बताते हैं कि लंग्स में कई तरह की बीमारियां होती हैं. कुछ ऐसी होती हैं जिनमें लंग्स में खतरनाक बैक्टीरिया पनपने लगते हैं. अगर ये लंग्स से सीधे ब्लड में चले जाएं तो इससे सेप्टिसीमिया हो जाता है. सेप्टिसीमिया एक खतरनाक स्थिति होती है. इसमें शरीर के किसी हिस्से में फैला खतरनाक बैक्टीरिया सीधे खून में चला जाता है. इसमें अगर समय पर लक्षणों की पहचान और इलाज न हो तो ये मौत का कारण बन सकती है. इसमें इंफेक्शन खून में चला जाता है और वह पूरे शरीर में फैलने लगता है. इससे हार्ट, लिवर और किडनी जैसे अंगों पर असर पड़ता है और इन अंगों के फेल होने का रिस्क रहता है. जो मौत का कारण बन सकता है. ऐसे मामलों में समय पर अस्पताल जाना जरूरी होता है. 

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