जब कोई कपल IVF कराता है तो कई प्रेगनेंसी में जुड़वा बच्चे पैदा होते हैं, लेकिन अब एक रिसर्च में दावा किया गया है कि
अब एक साथ जुड़वा या तीन बच्चों के जन्म का खतरा काफी कम हो सकता है. यह रिसर्च ऑस्ट्रेलिया के सात फर्टिलिटी क्लीनिकों में 18,396 महिलाओं पर की गई. इसमें 2012 से 2021 के बीच पहली बार IVF कराने वाली महिलाओं के इलाज का विश्लेषण किया गया. रिसर्च में पता चला कि ब्लास्टोसिस्ट और विट्रिफिकेशन तकनीक का आईवीएफ में यूज फायदेमंद है. इन तकनीक से आईलवीएफ करने से जुड़वा या तीन बच्चों के होने का रिस्क कम किया जा सकता है.
रिसर्च में बताया गया है कि इन आधुनिक तकनीकों के साथ तीन IVF के भीतर लगभग 68% महिलाओं को सफलतापूर्वक बच्चा हुआ. वहीं, एक से अधिक बच्चों के जन्म की दर सिर्फ 2.9% रही. यह आंकड़े बताते हैं कि इन तकनीक से आईवीएफ कराने में जुड़वा बच्चे होने का रिस्क काफी कम है.
इन तकनीक से IVF कैसे होता है?
रिसर्च में कहा गया है कि कुछ साल पहले IVF में सफलता की दर कम थी. डॉक्टर गर्भधारण की संभावना बढ़ाने के लिए अधिकतर मामलों में एक साथ दो या उससे अधिक भ्रूण गर्भाशय में ट्रांसफर कर देते थे. इसक कारण कई मामलों में महिला को जुड़वा बच्चे पैदा होते . ऐसी गर्भावस्था में समय से पहले डिलीवरी से लेकर कम वजन वाले बच्चे की समस्या हो जाती थी. कुछ मामलों में गर्भावस्था से जुड़ी कई प्रकार की स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है. लेकिन ब्लास्टोसिस्ट और विट्रिफिकेशन तकनीक से जुड़वा बच्चों के रिस्क को कम किया जा सकता है. अगर आईवीएफ केंद्र इन तकनीकों का बड़े पैमाने पर यूज करें तो सफलता मिल सकती है.
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ब्लास्टोसिस्ट और विट्रिफिकेशन तकनीक क्या हैं
ऑस्ट्रेलिया में हुई रिसर्च में ब्लास्टोसिस्ट और विट्रिफिकेशन तकनीक का यूज किया गया है. इसमें लैब में भ्रूण को बेहतर तरीके से विकसित किया जाता है.पहले शुरुआत में ही भ्रूण को ट्रांसफर कर दिया जाता था, लेकिन अब ब्लास्टोसिस्ट तकनीक की मदद से उसे 5 से 6 दिन तक विकसित करके ट्रांसफर किया जाता है..इसके अलावा विट्रिफिकेशन नाम की तकनीक का भी यूज किया जाता है. यह एक प्रकार की आधुनिक फ्रीजिंग तकनीक है जिससे भ्रूण को सुरक्षित रखा जाता है. इन तकनीकों को फायदा यह है कि गर्भ में एक ही भ्रूण को ट्रांसफर किया जाता है.
मिली बेहतर सफलता
नई स्टडी की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब लगभग 95 प्रतिशत मामलों में केवल एक ही भ्रूण ट्रांसफर किया गया. इसके बावजूद सफलता की दर पहले से बेहतर रही. इस रिसर्च से यह साफ हुआ कि महिलाओं को आईवीएफ कराने और बेहतर परिणाम के लिए दो भ्रूण ट्रांसफर कराने की जरूरत नहीं पड़ती. इससे जुड़वा बच्चों की संभावना भी काफी कम हो जाती है.
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क्या कहते हैं एक्सपर्ट
गाजियाबाद के यशोदा मेडिसिटी हॉस्पिटल में आईवीएफ और इनफर्टिलिटी विभाग में कंसल्टेंट डॉ. स्नेहा मिश्रा ने इन तकनीक के बारे में बताया है. वह बताती हैं कि इन तकनीक से जुड़वा बच्चों के होने की संभावना कम होती है. यह तकनीक है तो पुरानी और भारत में भी इसका यूज किया जाता है, लेकिन यहां अधिकतर कपल चाहते हैं कि उनको आईवीएफ से दो बच्चे हों, इसलिए कपल के कहने पर आईवीएफ की सामान्य प्रक्रिया यूज की जाती है. जो कपल एक बच्चा चाहता है उसके लिए ब्लास्टोसिस्ट और विट्रिफिकेशन तकनीक का यूज किया जाता है. यह आईवीएफ से एक बच्चा करने के लिए काफी फायदेमंद तकनीक है.
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