कांग्रेस के लिए अग्निपरीक्षा कर्नाटक चुनाव, सिद्धारमैया पर पूरा दारोमदार

बेखौफ और बेलाग अंदाज वाले सिद्धारमैया के सहारे कांग्रेस कर्नाटक में सत्ता को बरकरार रखने की कोशिश में लगी है. कांग्रेस चुनाव जीतती है तो इसका श्रेय उन्हीं को जाएगा और हारती है तो भी उन्हीं सिर ठीकरा फूंटेगा. यही वजह है कि कर्नाटक में वे किसी तरह कोई कोरकसर नहीं छोड़ रहे हैं.

Advertisement
कर्नाटक के CM सिद्धारमैया कर्नाटक के CM सिद्धारमैया

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 12 मई 2018,
  • अपडेटेड 2:02 PM IST

कर्नाटक में कांग्रेस का चेहरा राहुल गांधी नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया है. यही वजह है कि राज्य में पार्टी की जीत का सारा दारोमदार उन्हीं के कंधे पर है. 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस पहली बार बीजेपी को सीधे तौर पर कड़ी टक्कर देती हुई नजर आ रही है. सिद्धारमैया पिछले पांच सालों के अपने कामकाज और विकास मॉडल की वजह से कांग्रेस का सबसे बड़ा चेहरा बनने में सफल रहे हैं. इसीलिए पार्टी ने उन्हें कर्नाटक में फ्रीहैंड दे रखा है.

Advertisement

बेखौफ और बेलाग अंदाज वाले में सत्ता को बरकरार रखने की कोशिश में लगी है. कांग्रेस चुनाव जीतती है तो इसका श्रेय उन्हीं को जाएगा और हारती है तो भी ठीकरा उन्हीं के सिर फूटेगा. यही वजह है कि कर्नाटक में वे किसी तरह की कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं. इस बार वे दो विधानसभा सीटों से चुनाव मैदान में हैं. चामुंडेश्वरी और बादामी विधानसभा सीट से प्रत्याशी हैं.

मैसूर जिले के सिद्धारमनहुंडी गांव में एक गरीब किसान परिवार में 12 अगस्त, 1948 को सिद्धारमैया का जन्म हुआ था. उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय से स्नातक किया. यहीं से उन्होंने वकालत की डिग्री भी हासिल की और कुछ समय तक वकालत भी की.

डॉ. राम मनोहर लोहिया के समाजवादी विचारों से प्रभावित और ‘जनता परिवार’ के सदस्य रहे सिद्धारमैया ने वकालत के पेशे को छोड़कर राजनीति अपनायी थी. उन्होंने साल 1983 में पहली बार लोक दल के टिकट पर चामुंडेश्वरी विधानसभा सीट से जीत दर्ज की और बाद में जनता पार्टी में शामिल हो गए.

Advertisement

राज्य की आधिकारिक भाषा के रूप में कन्नड़ के उपयोग की निगरानी के लिए राम कृष्ण हेगड़े के मुख्यमंत्रित्व काल में बनी निगरानी समिति ‘कन्नड़ कवालू समिति’ के वह पहले अध्यक्ष थे. दो साल बाद हुए मध्यावधि चुनाव में उन्होंने दोबारा जीत हासिल की और हेगड़े की सरकार में पशुपालन एवं पशु चिकित्सा मंत्री बने.

सिद्धारमैया खुद को दलितों के नेता के तौर पर स्थापित करने के लिए तीन बार 'अहिंदा' (अल्पसंख्यक, पिछड़ों और दलितों को परिभाषित करने वाला कन्नड़ शब्द) सम्मेलन का आयोजन किया. हालांकि साल 2005 में में आकर सिद्धारमैया को पार्टी से बाहर कर दिया था. जेडीएस का ये कदम देवगौड़ा की सियासत के लिए मुसीबत का सबब बन गया.

इसके बाद साल 2006 में सिद्धारमैया अपने समर्थकों के साथ कांग्रेस से जुड़ गए. दिसंबर 2007 में मैसूर में चामुंडेश्वरी के उपचुनाव में उन्होंने एक बार फिर से जीत दर्ज की. वर्ष 2008 में हुए चुनाव में वह कांग्रेस की प्रचार समिति के अध्यक्ष बने. इसके बाद वे वरुणा विधानसभा सीट से चुनाव लड़े और विधायक बने.

सिद्धारमैया 2013 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के दिग्गज नेता के तौर पर अपने आपको स्थापित करने में सफल रहे. 2013 में कांग्रेस की उनके नेतृत्व में वापसी हुई. सिद्धारमैया पार्टी विधायकों पर बहुत अच्छी पकड़ के चलते वरिष्ठ कांग्रेस नेता और लोकसभा में कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को पछाड़ सीएम बने थे.

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement