एनडीए की केमिस्ट्री, पर्सनैलिटी वॉर और चुनावी दांव... तमिनलाडु में EPS को किन फैक्टर्स से उम्मीदें?

तमिलनाडु के चुनावी रण में एडप्पादी पलानीस्वामी के लिए 2026 की यह जंग उनके राजनीतिक अस्तित्व की सबसे बड़ी परीक्षा साबित होने वाली है. ईपीएस अपनी 'स्ट्रॉन्गमैन' छवि और एनडीए के साथ के भरोसे जयललिता की विरासत को अपने नाम करने की कोशिश कर रहे हैं.

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एनडीए गठबंधन और अपनी सख्त छवि पर दांव खेल रहे हैं एडप्पादी पलानीस्वामी (Photo-PTI) एनडीए गठबंधन और अपनी सख्त छवि पर दांव खेल रहे हैं एडप्पादी पलानीस्वामी (Photo-PTI)

टी एस सुधीर

  • नई दिल्ली,
  • 15 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 2:35 PM IST

एआईएडीएमके (AIADMK) के वॉर रूम के अंदर विजय के प्रति कृतज्ञता का भाव है. ये सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन पार्टी का मानना है कि तमिलगा वेत्री कज़गम (TVK) तमिलनाडु चुनाव में ''थीया शक्ति'' (बुरी शक्ति) की स्पष्ट पहचान करने में सफल रही है.

एआईएडीएमके थिंकटैंक के एक वरिष्ठ सदस्य का कहना है, ''अगले एक हफ्ते में जनता तय कर देगी कि असली हीरो कौन है.'' पार्टी को यह विश्वास है कि वह राजनीतिक हीरो एडप्पादी पलानीस्वामी होंगे.

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क्या पलानीस्वामी और उनकी पार्टी भविष्य के संकेतों को सही ढंग से पढ़ रहे हैं या वे किसी मृगतृष्णा के पीछे भाग रहे हैं? जमीन पर लोगों से बात करें तो आपको बड़ी संख्या में ऐसी महिला मतदाता मिलेंगी, जिन्होंने 2021 में एआईएडीएमके को वोट दिया था, लेकिन वे कहती हैं कि इस बार वे विजय को वोट देंगी. ऐसे प्रमाण भी मिल रहे हैं जो बताते हैं कि एंटी-इंकंबेंसी वोट टीवीके और एआईएडीएमके के बीच बंट रहे हैं, जिसका फायदा सत्ताधारी डीएमके को मिल रहा है. वहीं जमीनी अनुभव यह भी संकेत देते हैं कि जहां टीवीके शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में एक बड़ी ताकत बनकर उभरी है, वहीं AIADMK ग्रामीण इलाकों में मजबूत पकड़ बनाए हुए है. 

लेकिन जिसने भी पलानीस्वामी के राजनीतिक सफ़र को करीब से देखा है, उसके लिए उन्हें नज़रअंदाज करना बेवकूफ़ी होगी. यह एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर उनके कार्यकाल के दौरान एक 'समझौते वाले विकल्प' के रूप में देखा गया, जो हर तरफ़ से सत्ता और रसूख के दूसरे दावेदारों से घिरे हुए थे. उस लिस्ट में पूर्व मुख्यमंत्री ओ. पनीरसेल्वम, वी.के. शशिकला, टी.टी.वी. दिनाकरण और यहां तक कि के.ए. सेंगोट्टायन जैसे दिग्गज शामिल थे. लेकिन EPS, जो जयललिता के आंतरिक तानाशाही वाले ढर्रे में प्रशिक्षित थे, उन्होंने सफलतापूर्वक उन सभी को किनारे लगा दिया और अब NDA के हिस्से के तौर पर केवल दिनाकरन की AMMK के साथ गठबंधन किया है.

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मुख्यमंत्री पद के तीन दावेदार

यह एक सच्चाई है कि तमिलनाडु ने हमेशा उन सख्त नेताओं को पसंद किया है, जो मजबूत विरोधियों का सामना करने में सक्षम हों. तर्क यह दिया जा रहा है कि मुख्यमंत्री पद के तीन दावेदारों पलानीस्वामी, एम.के. स्टालिन और विजय में से ईपीएस एक कड़क नेता के रूप में उभरकर सामने आए हैं. उन्होंने महत्वाकांक्षी भाजपा को केवल 27 सीटों तक सीमित कर दिया. उन्होंने चुनाव से एक साल पहले ही अमित शाह से अपने नाम की घोषणा मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में करवा ली. चाहे ओपीएस को साथ न लेने की बात हो या फिर के. अन्नामलाई की जिन्हें पलानीस्वामी को मनाने के लिए भाजपा को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाना पड़ा. ईपीएस ने हर जगह अपनी बात मनवाई है.

एआईएडीएमके चाहती है कि उनकी यह सख्त छवि बरकरार रहे. डीएमके भी इस बात को अच्छी तरह जानती है, इसीलिए उसने पलानीस्वामी को ''दिल्ली का गुलाम'' बताने की पुरजोर कोशिश की है. यही कारण है कि सोमवार को एम.के. स्टालिन ने उनपर जयललिता को लेकर कटाक्ष करते हुए कहा था कि ''मम्मी' के निधन के बाद पलानीस्वामी ने एआईएडीएमके को 'डमी' बना दिया है.''

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स्टालिन इस बात की ओर इशारा करना चाहते थे कि अगर जयललिता जीवित होतीं, तो वे परिसीमन (delimitation) के प्रस्तावित स्वरूप का विरोध करतीं, ठीक वैसे ही जैसे वे जीएसटी और नीट (NEET) की आलोचक थीं, जबकि इसके विपरीत पलानीस्वामी अब इस पर चुप हैं. यही कारण है कि उदयनिधि स्टालिन लगभग हर सभा में जनता की तालियां बटोरने के लिए पलानीस्वामी की 2017 वाली वह तस्वीर दिखाते हैं, जिसमें वे शशिकला के पैरों में गिरते हुए नजर आ रहे हैं. और यही वजह है कि पलानीस्वामी भी अपने सबसे आक्रामक अंदाज में स्टालिन परिवार को करारा जवाब दे रहे हैं और तीखे वाकयुद्ध में उलझे हुए हैं. 

200 क्षेत्रों का पलानीस्वामी ने किया दौरा

तमिलनाडु के चुनाव हमेशा काफी हद तक 'प्रेसिडेंशियल' रहे हैं. पहले करुणानिधि बनाम एमजीआर, फिर करुणानिधि बनाम जयललिता और अब 2026 में, यह मुकाबला स्टालिन बनाम पलानीस्वामी बनाम विजय के बीच है. यह सच है कि स्थानीय मुद्दे और उम्मीदवार मायने रखते हैं, लेकिन यह चुनाव मुख्यमंत्री पद के इन तीन दावेदारों के व्यक्तिगत व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द सिमटा है.

ईपीएस (EPS) ने चुनाव कार्यक्रम घोषित होने से पहले ही करीब 200 निर्वाचन क्षेत्रों का दौरा कर लिया था और यह एक ऐसा कारक है जो उन डीएमके-विरोधी मतदाताओं को प्रभावित कर सकता है जो सोच-समझकर फैसला लेना चाहते हैं. स्टालिन के विपरीत, जो एक राजनीतिक विरासत और विशेषाधिकार वाले परिवार से आते हैं, पलानीस्वामी एआईएडीएमके के जमीनी स्तर से ऊपर उठे हैं. ईपीएस अपनी खेती-किसानी की जड़ों को दोहराने का कोई मौका नहीं छोड़ते और स्टालिन पर कटाक्ष करते हैं कि उन्हें कृषि का 'ABCD' भी नहीं पता. वहीं विजय के विपरीत, जो हफ्ते में तीन बार से ज्यादा सार्वजनिक रूप से नहीं दिखते, ईपीएस हर दिन एक अलग जिले में होते हैं और जनता के लिए सुलभ बने रहते हैं.

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पलानीस्वामी के अस्तित्व की लड़ाई

इसमें कोई शक नहीं कि यह पलानीस्वामी के राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई है. डीएमके ने उन्हें एक ऐसे राजनेता के रूप में प्रचारित किया है, जिसने 10 चुनावी हार देखी हैं और भविष्यवाणी की है कि 2026 उनकी 11वीं हार होगी. अगर ईपीएस हारते हैं, तो निश्चित रूप से पार्टी के भीतर उनके खिलाफ बगावत के सुर तेज हो जाएंगे. शशिकला ने एक नई पार्टी बनाई है और मुख्य रूप से दक्षिणी तमिलनाडु में एआईएडीएमके को नुकसान पहुंचाने के इरादे से उम्मीदवार उतारे हैं. ओपीएस (OPS) के लिए पलानीस्वामी को अप्रासंगिक होते देखने से बड़ी खुशी और कुछ नहीं होगी. इसके अलावा, सेंगोट्टायन को भी ईपीएस से अपना पुराना हिसाब चुकता करना है.  ईपीएस अच्छी तरह जानते हैं कि हार की स्थिति में एआईएडीएमके पर अपनी पकड़ बनाए रखना उनके लिए बेहद मुश्किल होगा.

AIADMK के पक्ष में जो बात काम कर रही है, वह है NDA के तमिलनाडु के चार बड़े चेहरों पलानीस्वामी, अन्नामलाई, दिनाकरन और अंबुमणि रामदास का एक आश्चर्यजनक रूप से सुनियोजित चुनावी अभियान. यह TVK से बिल्कुल अलग है, जो पूरी तरह से विजय के करिश्मे पर निर्भर है या DMK से भी अलग है, जो चुनावी मोर्चे पर मुख्य ज़िम्मेदारी के लिए स्टालिन और उनके बेटे की जोड़ी पर बहुत ज़्यादा भरोसा करती है. इसमें नरेंद्र मोदी को भी शामिल कर लें, तो NDA की ताकत और भी बढ़ जाती है.

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2021 में पलानीस्वामी को केवल अपने गृह क्षेत्र कोंगु बेल्ट में ही बड़ी सफलता मिली, जिसके परिणामस्वरूप यह धारणा मजबूत हो गई कि पार्टी केवल पलानीस्वामी के 'गौंडर' समुदाय का एक संगठन बनकर रह गई है. पश्चिमी तमिलनाडु की इस बेल्ट की 57 सीटों में से एनडीए ने 41 सीटें जीती थीं और उस स्कोर में एआईएडीएमके की हिस्सेदारी 33 थी. इसके विपरीत, केटीसीसी (कांचीपुरम-तिरुवल्लूर-चेंगलपट्टू-चेन्नई) बेल्ट, कुड्डालोर और डेल्टा क्षेत्रों की 80 से अधिक सीटों में से एआईएडीएमके का स्कोर सिंगल डिजिट तक ही सिमट गया था.

क्या स्टालिन बनाएंगे इतिहास?

इस बार, एआईएडीएमके का मानना है कि 'वन्नियार' वोटों की वापसी और कावेरी डेल्टा के किसानों के बीच पनप रहे असंतोष के दम पर, उत्तर और डेल्टा क्षेत्र उनके लिए 'नया पश्चिम' साबित होंगे. यहां तक कि चेन्नई में भी, जहां पांच साल पहले पार्टी अपना खाता खोलने में भी विफल रही थी, एनडीए चार सीटों पर अपनी जीत की उम्मीद लगाए हुए है. हालांकि, वास्तविकता में उनकी सबसे प्रबल संभावना 'थिरु वि.का. नगर' की सुरक्षित सीट पर दिख रही है, जहां दिवंगत बसपा (BSP) प्रमुख के. आर्मस्ट्रांग की विधवा, पोरकोडी आर्मस्ट्रांग को मैदान में उतारा गया है.

स्टालिन इतिहास रचने की कोशिश में हैं, क्योंकि डीएमके ने आखिरी बार लगातार दो विधानसभा चुनाव 1971 में जीते थे. वहीं विजय 'नियो-एमजीआर' के रूप में उभरने का प्रयास कर रहे हैं और वही करिश्मा दोहराना चाहते हैं जो 'पुरैची थलाइवर' (क्रांतिकारी नेता) एमजीआर ने 1977 में किया था.  2026 पलानीस्वामी के लिए जयललिता की छाया से बाहर निकलने और एआईएडीएमके को अपनी पार्टी के रूप में स्थापित करने का एक बड़ा अवसर है. वह 12 मई को 72 वर्ष के हो जाएंगे और 4 मई को तमिलनाडु की जनता से मिलने वाले जन्मदिन के अग्रिम उपहार से ज्यादा उन्हें और कुछ भी खुशी नहीं देगा.
 

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