बंगाल में हुमायूं-ओवैसी रहे बेअसर, असम में अजमल का भी फ्लॉप शो... समझें मुस्लिम वोटिंग पैटर्न

देश के पांच राज्यों के चुनावी तस्वीर साफ हो गई है, लेकिन मुस्लिम आधार वाले दलों के लिए चुनाव नतीजे निराश करने वाले हैं. असम में पिछले दो चुनाव से अहम रोल में रहने वाले बदरुद्दीन अजमल पूरी तरह फ्लाप रहे तो बंगाल में हुमायूं कबीर और असदुद्दीन ओवैसी बेअसर साबित हुए.

Advertisement
बंगाल में हुमायूं कबीर और ओवैसी फेल तो असम में अजमल बेअसर (Photo-ITG) बंगाल में हुमायूं कबीर और ओवैसी फेल तो असम में अजमल बेअसर (Photo-ITG)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 04 मई 2026,
  • अपडेटेड 6:57 PM IST

बंगाल और असम सहित पांच राज्यों के चुनावी नतीजों ने न केवल सत्ता का संतुलन बदला है, बल्कि मुस्लिम राजनीति के 'पुरोधा' कहे जाने वाले चेहरों के वजूद पर भी बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है. मुस्लिम वोटों के सहारे 'किंगमेकर' बनने का सपना लेकर चुनावी पिच पर उतरे हुमायूं कबीर, असदुद्दीन ओवैसी और बदरुद्दीन अजमल की उम्मीदों को तगड़ा झटका लगा. 

Advertisement

देश में भले ही मुस्लिम मुस्लिम आबादी 15 फीसदी हो, लेकिन केरल में 27 फीसदी, असम और पश्चिम बंगाल में 30 से 35 फीसदी के बीच है. इस तरह तीनों ही राज्यों में मुस्लिम वोटर काफी अहम है, जिसके चलते ही मुस्लिम आधार वाले दल अपना सियासी दम दिखाने के लिए उतरे थे, लेकिन मुस्लिम वोटिंग पैटर्न अलग ही नजर आया. 

पश्चिम बंगाल से लेकर केरल और असम तक मुस्लिम मतदाता बीजेपी के खिलाफ एकजुट नजर आए, लेकिन मुस्लिम आधार वाले दलों पर भरोसा नहीं किया. इसी का नतीजा है कि असम में बदरुद्दीन अजमल धराशाही हो गए तो बंगाल में हुमायूं कबीर अपनी सीट के सिवा किसी दूसरी सीट पर कुछ खास नहीं कर सके. असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM का खाता तक नहीं खुल सका. 

हुमायूं कबीर और ओवैसी को सियासी झटका
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में धार्मिक ध्रुवीकरण जबरदस्त तरीके से देखने को मिला. बीजेपी के पक्ष में बहुसंख्यक वर्ग एकजुट रहा तो मुस्लिम मतदाता एकजुट हुए, लेकिन मुसलमानों ने असदुद्दीन ओवैसी,अब्बास पीरजादा सहित कांग्रेस और लेफ्ट गठबंधन के बजाय ममता के पक्ष में वोटिंग करना बेहतर समझा. इसका नतीजा रहा है कि टीएमसी मुस्लिम बहुल वाली ज्यादातर सीटों पर जीत दर्ज करने में कामयाब रही. 

Advertisement

बंगाल में मुस्लिम आबादी 30 फीसदी के करीब हैं.राज्य की 100 से ज्यादा सीट पर मुस्लिम वोटर्स अहम हैं. मुस्लिम वोटों की सियासी ताकत को देखते हुए पहले फुरफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी ने इंडियन सेकुलर फ्रंट से पार्टी बनाई है तो इस बार हुमाऊं कबीर ने बाबर के नाम पर मुर्शिदाबाद में मस्जिद बनाने का ऐलान कर मुस्लिम सियासत का चेहरा बनने का दांव चला. हुमाऊ कबीर ने जनता उन्नयन पार्टी के नाम से अपनी अलग पार्टी बनाकर मैदान में उतरे थे. इसके अलावा असदुद्दीन ओवैसी ने भी मुस्लिम वोटों पर दांव चला था. 

 मुसलमानों ने मस्लिम आधार वाले दलों को नाकारा
2026 के पश्चिम बंगाल चुनाव में नौशाद सिद्दीकी, हुमाऊं कबीर और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी मैदान में थी. हुमाऊ कबीर बाबरी के बहाने बंगाल में मुस्लिमों का विश्वास जीतने का दांव चला, लेकिन मुसलमानों ने ममता के साथ ही खड़े होना बेहतर समझा. हुमायूं कबीर की पार्टी दो सीटों पर जीत मिल रही है, जिन सीटों पर वो खुद चुनाव लड़ रहे हैं. नौदा और रेजनीनगर सीट पर उन्हें बढ़त है, जो जीत में तब्दील हो सकती है. इसी तरह नौशाद सिद्दीकी को सिर्फ एक सीट पर बढ़ता है, जो SIF के टिकट पर चुनाव लड़ रहे. 

Advertisement

 बंगाल के मुस्लिमों ने एकमुश्त टीएमसी को दिया था. इसी का नतीजा है कि मुस्लिम बहुल सीटों पर मुस्लिम आधार वाले दलों का ही नहीं बल्कि कांग्रेस और लेफ्ट का सफाया हो गया था. ममता बनर्जी के पक्ष में खुलकर मुसलमानों ने वोट दिया है.हुमाऊं कबीर और अब्बास सिद्दीकी के साथ ओवैसी को मुस्लिमों ने पूरी तरह नकारा दिया. ओवैसी की पार्टी को 0.10 फीसदी वोट शेयर मिले तो हुमायूं व अब्बास की पार्टी को भी आधा फीसदी वोट नहीं मिल सका. 

हुमायूं कबीर और अब्बास अपनी सीट ही जीत सके

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद क्षेत्र के कद्दावर नेता हुमायूं कबीर ने चुनाव से ठीक पहले 'आम जनता उन्नयन पार्टी' (AJUP) बनाकर एक बड़ा दांव खेला था. उन्होंने ओवैसी की AIMIM के साथ हाथ मिलाकर यह उम्मीद की थी कि ममता के मुस्लिम वोट बैंक को अपनी ओर खींच लेंगे, लेकिन उनकी उम्मीदों पर पूरी तरह पानी फिर गया. बंगाल की मुस्लिम जनता ने इस बार 'वोट कटवा' की छवि वाले छोटे दलों को नकार दिया. इसके बाद भी बीजेपी को सत्ता में आने से नहीं रोक सके. 

हैदराबाद से आकर बंगाल की राजनीति में 'किंगमेकर' बनने का ओवैसी का सपना एक बार फिर चकनाचूर होता दिख रहा है. 2026 में ओवैसी ने 12 से अधिक रणनीतिक सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन एक भी सीट नहीं मिली. इतना ही नहीं ज्यादातर कैंडिडेटों की जमानत जब्त होती दिख रही है. ओवैसी की 'पहचान की राजनीति' बंगाल के 'बंगाली मुसलमान' को नहीं भा रही है. 

Advertisement

असम में अजमल सियासी खुशबू बेसर
असम में AIUDF के प्रमुख बदरुद्दीन अजमल के लिए यह चुनाव उनके करियर का सबसे बुरा दौर साबित होता नजर आ रहा. मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने जिस तरह 'मिया'राजनीति पर हमला बोला और परिसीमन के जरिए चुनावी गणित बदला, उसने अजमल के गढ़ को हिला दिया. अजमल की पार्टी को दो सीटें मिलती दिख रही हैं, एक सीट पर वो खुद जीत रहे हैं तो दूसरी सीट पर मुजीबुर्रहमान जीत दर्ज किए हैं. 

असम के निचले इलाकों में, जहां अजमल का एकछत्र राज था, वहां भी मुस्लिम युवाओं ने इस बार 'मजहबी नेता' के बजाय ' कांग्रेस के साथ खड़े नजर आए. अजमल की अपनी सीट (बिन्नाकांडी) पर भी कड़ी टक्कर, इस बात का प्रमाण है कि उनका 'वोट बैंक' अब उनसे छिटक रहा है. अजमल की पार्टी को 5.19 फीसदी वोट मिलता दिख रहा है. मुस्लिमों की पहली पसंद असम में कांग्रेस बनी है. 

मुस्लिमों का अजमल से क्यों मोहभंग
असम में तकरीबन मुस्लिम आबादी 34 फीसदी है, जो राज्य की कुल 126 सीटों में से 32 सीटों पर अहम रोल अदा करते हैं. 2021 में 31 मुस्लिम विधायक जीतकर आए थे, लेकिन परिसीमन में मुस्लिम सीटों का गेम बदल गया है. मुस्लिम मतदाता अब 32 सीटों के बजाय 22 सीटों पर ही निर्णायक रोल में रह गए हैं. 

Advertisement

कांग्रेस और बदरुद्दीन अजमल दोनों की नजर मुस्लिम वोटबैंक पर टिकी हुई थी. मुस्लिम वोटर ही बदरुद्दीन अमजल की ताकत रहे है तो कांग्रेस की नजर भी इसी वोटबैंक पर टिकी हुई थी. 2021 में बदरुद्दीन अजमल और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ी थी, लेकिन इस बार दोनों ही अलग-अलग किस्मत आजमा रही हैं. ऐसे में मुस्लिम वोटर की पहली पसंद कांग्रेस बनी है. कांग्रेस और बीजेपी के बीच असम की सीधी लड़ाई में मुस्लिम वोटर अजमल के बजाय कांग्रेस के साथ गया. ओवैसी का असम जाकर अजमल के पक्ष में प्रचार करना काम नहीं आया. 

असम में अजमल का सियासी ढलान

असम में बदरुद्दीन की सियासी चुनौती असम में मुस्लिम वोटों की राजनीतिक अहमियत को देखते हुए मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने'ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट' (AIUDF) का गठन 2005 में किया. अजमल ने अपनी राजनीति मुस्लिम अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से असमिया भाषी और बंगाली मूल के मुसलमानों के अधिकारों के हिमायती के तौर पर शुरू की और 2009 से 2024 तक धुबरी से सांसद रहे. 

साल 2006 के विधानसभा चुनाव में AIUDF के पास 10 विधायक जीते थे, 2011 में बढ़कर 18 विधायक हो गए.2016 में 13 सीटों पर कामयाबी मिली फिर 2021 में 16 सीटों पर जीत मिली. इस तरह से हर साल, AIUDF का जनाधार बढ़ा और पार्टी मजबूत हुई है,लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में बदरुद्दीन अजमल की राजनीति को गहरा झटका लगा, जब वो अपनी ही सीट हार गए. कांग्रेस दोबारा से मुस्लिम वोटों पर अपनी पकड़ बनाती नजर आई. इसक चलते 2026 के असम चुनाव में सिर्फ दो सीट पर ही सिमट गई. 

Advertisement

मुस्लिम समुदाय ने क्यों किया किनारा?
मुस्लिम मतदाताओं ने महसूस किया कि अलग-अलग धार्मिक पार्टियों को वोट देने से भाजपा के खिलाफ लड़ाई कमजोर होती है. उन्होंने छोटे दलों के बजाय बड़े चेहरों पर दांव लगाया, जैसे बंगाल में टीएमसी का साथ दिया तो असम में कांग्रेस उनकी पसंद बनी. मुसलमानों ने अब 'इमोशनल ब्लैकमेलिंग'से ऊपर उठकर 'सस्टेनेबल पॉलिटिक्स' की ओर बढ़ रहा है. यही इन तीनों नेताओं के पतन की सबसे बड़ी वजह बनी है.

बंगाल में एसआईआरके कारण लाखों नाम वोटर लिस्ट से कटे. इसका सबसे बड़ा असर इन्हीं नेताओं के प्रभाव वाले क्षेत्रों में पड़ा. चुनाव नतीजे इन नेताओं के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि अब सिर्फ मजहब के नाम पर सियासत की दुकान चलाना मुश्किल होगा. अगर हुमायूं कबीर, ओवैसी और अजमल ने अपनी रणनीति नहीं बदली, तो आने वाले वक्त में भारतीय राजनीति के इतिहास के पन्नों में ही सिमट कर रह जाएंगे.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement