पोलियो से हारकर सुसाइड की कोशिश करने वाली गीता ने जीती 115 किलोमीटर की रेस

हमने आजतक कई ऐसे लोगों की कहानी सुनी होगी जिससे हमे जिंदगी जीने की प्रेरणा मिलती है. लेकिन यहां हम आपको एक ऐसे शख्स की कहानी सुनाने जा रहे हैं जिन्होंने दिव्यांग होने के बावजूद एक मिसाल कायम की और आज वो खुद के लिए प्रेरणा हैं.

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गीता एस राव गीता एस राव

स्वाति गुप्ता

  • नई दिल्ली,
  • 16 सितंबर 2016,
  • अपडेटेड 4:14 PM IST

हमने आजतक कई ऐसे लोगों की कहानी सुनी होगी जिससे हमे जिंदगी जीने की प्रेरणा मिलती है. लेकिन यहां हम आपको एक ऐसे शख्स की कहानी सुनाने जा रहे हैं जिन्होंने दिव्यांग होने के बावजूद एक मिसाल कायम की और आज वो हमारे साथ-साथ खुद के लिए भी एक प्रेरणा हैं.

जी हां, ये कहानी है गीता एस राव की जिन्होंने शारीरिक रूप से असमर्थ लोगों के लिए एक ऐसा उदाहरण पेश किया है जिससे उन्हें जिंदगी को फिर से जीने की एक प्रेरणा मिलेगी.

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महज तीन साल की उम्र में गीता पोलियो का शिकार हो गई थीं और तब से वह कभी चल नहीं पाईं. उनके माता पिता ही उन्हें स्कूल लेकर जाया करते थे. लेकिन गीता ने जिंदगी की जंग लड़ते हुए 115 किलोमीटर की साइकिल रेस जीती. आइए हम आपको बताते हैं गीता की पूरी कहानी...

जब गीता 3 साल की थीं उस दौरान उन्हें एक बार तेज बुखार चढ़ा. उनके उन्हें अस्पताल ले गए जहां डॉक्टर ने उन्हें इंजेक्शन दिया. घर लौटने के बाद गीता कुछ घंटे सोईं. जब जागीं तो उठ नहीं पा रही थीं. तभी पता चला कि पोलियो का इंफेक्शन उनके पूरे शरीर में फैल चुका है और अब वह न कभी खड़ी हो पाएंगी, न चल पाएंगी.

अपनी वजह से माता-पिता को परेशानी में देखकर गीता इतनी दुखी थीं कि उन्होंने एक बार आत्महत्या करने की भी कोशिश की थी. लेकिन बाद में उन्होंने फैसला किया कि अब वो दूसरों पर निर्भर नहीं रहेंगी. इसी फैसले के साथ उन्होंने रोजाना एक्सरसाइज और फिजियोथेरिपी शुरू की. महज एक से डेढ़ साल के भीतर ही उनकी ये मेहनत काम आई क्योंकि अब गीता खड़ी भी हो सकती थीं और बैसाखी के सहारे चल भी सकती थीं.

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इतना ही नहीं, गीता से बीएसई और ह्यूमन रिसोर्स एंड कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन में पीजीडीएम का कोर्स भी कर चुकी हैं. खास बात ये है कि वह आईटी इंजीनियर के तौर पर एक कंपनी में काम भी कर चुकी हैं लेकिन उनका सपना था पूरी दुनिया घूमने का, जिसके चलते उन्होंने नौकरी छोड़ दी.

इसके बाद भाई के साथ मिलकर उन्होंने होटल का बिजनेस शुरू किया. बता दें कि गीता का बायां पैर अभी भी काम नहीं करता लेकिन कुछ ही महीनों पहले उनके परिवार ने उन्हें एक साइकिल गिफ्ट की जिसके बाद उन्होंने इसे चलाना शुरू कर दिया.

हाल ही में गीता ने 115 किलोमीटर की रेस में हिस्सा लिया, जो कि सामान्य लोगों के लिए भी एक कठिन रेस है. गीता न सिर्फ रेस का हिस्सा बनी बल्कि इसके लिए उन्होंने स्पेशल प्राइज भी जीता.

अब आलम कुछ ऐसा है कि गीता हर दूसरे दिन 50-70 किलोमीटर साइकिल चलाती हैं. सिर्फ साइकिलिंग ही नहीं, गीता बंजी जंपिग भी करती हैं. ये कहना गलत न होगा कि गीता जैसे लोग देश की शान हैं. की कोशिश से लेकर साइकिल रेस तक की कहानी वाकई हर उस शख्स के लिए एक मिसाल है जो जिंदगी में आ रही परेशानियों को जिंदगी का अंत मान लेते हैं.

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