मुंबई: रैगिंग के 11 साल बाद 18 आरोपी बरी, दो पीड़‍ित बयान से मुकरे

अभियोजन पक्ष ने जिन 10 जूनियरों से पूछताछ की, उनमें से दो मुकर गए. इस वजह से मामला दर्ज होने के 11 साल बाद 18 सीनियर्स को बरी कर दिया गया. 

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प्रतीकात्मक फोटो प्रतीकात्मक फोटो

विद्या

  • मुंबई ,
  • 13 अगस्त 2021,
  • अपडेटेड 2:49 PM IST

मुंबई के केईएम अस्पताल से जुड़े मेडिकल कॉलेज में अपने जूनियर्स की रैगिंग के आरोप में आरोपी 18 मेडिकल छात्रों को यहां की एक मजिस्ट्रेट अदालत ने बरी कर दिया है. अभियोजन पक्ष ने जिन 10 जूनियरों से पूछताछ की, उनमें से दो मुकर गए. इस वजह से मामला दर्ज होने के 11 साल बाद 18 सीनियर्स को बरी कर दिया गया. 

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मामला केईएम अस्पताल के उप डीन द्वारा दर्ज किया गया था जो प्रशासनिक कर्तव्यों के प्रभारी थे. शिकायत दर्ज कराने वाले के मुताबिक हॉस्टल की पहली मंजिल पर सीनियर्स द्वारा 'अप्राकृतिक रैगिंग' की गई थी. जूनियर्स ने पुलिस को बताया कि उन्हें कब्ज की तरह काम करने के लिए कहा गया, जबकि कुछ लड़कों को महिलाओं के इनरवियर का विज्ञापन करने के लिए कहा गया. कुछ को शर्ट के नीचे कागज के गोले रखकर और कुछ अन्य यौन कृत्यों द्वारा महिला पत्रिकाओं में दर्शाए गए अश्लील तरीके से प्रस्तुत करने के लिए कहा गया था. 

जूनियर लड़कों ने कहा कि सीनियर्स ने जूनियर्स को गालियां और धमकियां दीं, जिन्होंने पहली मंजिल के हॉल से बाहर निकलने की कोशिश की, जहां रैगिंग चल रही थी. जूनियर्स को यह भी धमकी दी गई थी कि अगर उन्होंने बात नहीं मानी तो उन्हें एकेडमिक रिसर्च में गंभीर परिणाम भुगतने होंगे. 

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जब मेडिकल कॉलेज को घटना के बारे में सूचित किया गया तो अधिकारियों ने मामला दर्ज करने का फैसला किया क्योंकि सीनियर्स का बैड कंडक्ट रैगिंग के दायरे में आता है.  20 अक्टूबर 2012 को आरोपी 18 वरिष्ठों के खिलाफ आरोप तय किए गए. 

सुनवाई के दौरान, अदालत ने कहा कि गंभीर प्रकृति का अपराध, जिसमें शिक्षित सीनियर्स को जूनियर छात्रों के खिलाफ दुराचार में लिप्त किया गया था. इसलिए, अधिनियम के विनिर्देश के साथ विशिष्ट भागीदारी को न केवल साबित करने के लिए अभियुक्तों की संलिप्तता रिकॉर्ड पर लाने की आवश्यकता है बल्कि उनके प्रतिबद्ध करने, उकसाने और प्रचार करने का कार्य भी वहां से परिलक्षित होता है.

रैगिंग का दायरा इतना व्यापक है कि इसमें अव्यवस्थित आचरण या ऐसा कार्य शामिल है जो न केवल सामान्य पाठ्यक्रम में भविष्य बिगाड़ने का कारण बनता है, बल्कि शारीरिक और मनोवैज्ञानिक नुकसान की संभावना भी है. रैगिंग का जाल इतना फैला हुआ है कि इसमें आशंका, भय या शर्म या शर्मिंदगी भी शामिल है. रैगिंग में चिढ़ाना, गाली देना, धमकी देना, व्यावहारिक चुटकुले बोलने से लेकर चोट पहुंचाना और  छात्रों को कुछ ऐसा करने के लिए कहना भी शामिल है जो छात्र स्वेच्छा से नहीं करेगा. 

इस मामले में अदालत ने कहा कि जूनियर मेडिकल छात्र, जो अदालत में गवाही देने आया, उसने किसी भी अश्लील कृत्य या रैगिंग जैसे किसी भी तरह के कृत्य के बारे में स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया था. वह अपने बयान से मुकर गया और अभियोजन का समर्थन करने के लिए उसकी जिरह से कुछ भी नहीं निकला. यहां तक ​​कि जिस जूनियर छात्र ने "पुलिस को बुलाया" क्योंकि उसके पिता एक पुलिसकर्मी थे, यहां तक ​​कि अदालत में उसका बयान भी "अस्पष्ट था और इसमें किसी भी आरोपी की लिप्तता या रैगिंग के लिए कोई विशिष्ट कार्य करने के लिए कुछ भी नहीं था. 

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मजिस्ट्रेट प्रवीण पी देशमाने ने पाया कि पूरे मामले में 10 पीड़ित थे, हालांकि जिन पीड़ितों से पूछताछ की गई है, उन्होंने अभियोजन मामले का समर्थन नहीं किया. विशेष रूप से अभियुक्तों की लिप्तता या उनकी किसी भी भूमिका का समर्थन नहीं किया.  इसलिए अपराध में आरोपी के अपराध और लिप्तता को साबित करने के लिए कोई ठोस और पुख्ता सबूत नहीं है. 

अदालत ने यह भी बताया कि जांच अधिकारी ने पहली मंजिल के कमरे से महिलाओं के अंडरगारमेंट, अश्लील तस्वीरें, पेपर बॉल, कंडोम इत्यादि जैसी कोई चीज बरामद नहीं की थी.  अदालत ने खेद व्यक्त किया कि "रैगिंग के कमीशन में इस्तेमाल की गई ये सामग्री" एकत्र की जा सकती थी.  न्यायाधीश ने कहा कि मेरी राय में अभ‍ियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए प्वाइंट्स भी घटना की सत्यता पर संदेह पैदा करते हैं.

 

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