रूस-चीन क्यों जा रहे हैं आर्कटिक की ओर... अमेरिका-NATO के लिए परेशानी का सबब

रूस-चीन लगातार अपनी सेनाओं के जरिए आर्कटिक के ठंडे इलाके में पेट्रोलिंग कर रहे हैं. जिससे अमेरिका और नाटो परेशान हैं. लेकिन दिक्कत है वहां का मौसम. ऐसे मौसम अनमैन्ड ड्रोन और UUV की जरूरत होगी. अनक्रूड सिस्टम लगातार निगरानी, इंटेलिजेंस और केबल सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं. ये खतरे और संघर्ष से निपटने में मदद करेंगे.

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ग्रीनलैंड के नुक के पास आर्कटिक सागर में डैनिस नेवी शिप पेट्रोलिंग करती हुई. (Photo: AP) ग्रीनलैंड के नुक के पास आर्कटिक सागर में डैनिस नेवी शिप पेट्रोलिंग करती हुई. (Photo: AP)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 27 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 5:23 PM IST

आर्कटिक क्षेत्र अब तेजी से विवादित हो रहा है, जहां रूस और चीन के जहाजों की बढ़ती घुसपैठ से नाटो (NATO) पर दबाव बढ़ रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि कठोर मौसम में लंबे समय तक काम करने वाले अनमैन्ड व्हीकल्स जैसे ड्रोन और यूयूवी (UUV - Unmanned Underwater Vehicles) नाटो के लिए जरूरी हैं. इससे नाटो-अमेरिका मिलकर रूस-चीन से आगे रहेंगे. 

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यह बात सेंटर फॉर यूरोपियन पॉलिसी एनालिसिस (CEPA) के विशेषज्ञों ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कही. बताया गया कि आर्कटिक में रूस-चीन की गतिविधियां जानबूझकर नाटो पर दबाव डाल रही हैं.

आर्कटिक क्यों हो रहा है हॉटस्पॉट?

जलवायु परिवर्तन से बर्फ पिघल रही है, जिससे नए समुद्री रास्ते और संसाधन (तेल, गैस, खनिज) के मार्ग खुल रहे हैं. रूस ने आर्कटिक में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई है. चीन भी जहाज और रिसर्च वेसल भेज रहा है. पिछले सालों में चीनी जहाजों की घुसपैठ पर अमेरिकी कोस्ट गार्ड को जवाब देना पड़ा.

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बाल्टिक सागर में अंडरवाटर केबल्स की तोड़फोड़ जैसी घटनाएं नाटो के लिए खतरा हैं – रूस को इनमें संदेह है. डैनिश मिलिट्री अधिकारी मानते हैं कि हाई नॉर्थ (आर्कटिक) में खुला संघर्ष हो सकता है.

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अनमैन्ड सिस्टम क्यों जरूरी?

CEPA के सीनियर फेलो जान कल्बर्ग ने कहा कि जमीन पर सैनिक रखना मुश्किल है क्योंकि मौसम बहुत खतरनाक है. लेकिन समुद्री खतरा बड़ा है – खासकर केबल्स और इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचाना.

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अंडरवाटर ड्रोन केबल्स की निगरानी और सुरक्षा कर सकते हैं. समुद्री ड्रोन से बड़े क्षेत्र में सर्विलांस कर सकते हैं, जहां इंसान लगातार नहीं रह सकते. मेजर जनरल गॉर्डन डेविस ने कहा कि अनक्रूड सिस्टम हाई नॉर्थ में इसलिए मायने रखते हैं क्योंकि वे लगातार मौजूदगी देते हैं, जहां इंसानों का रहना मुश्किल है. 

ये सिस्टम इंटेलिजेंस इकट्ठा करते हैं. डेटा देते हैं और हमले की दिशा बताते हैं. CEPA की हालिया रिपोर्ट High Stakes in the High North में भी अनक्रूड सिस्टम को आर्कटिक डिफेंस के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है.

चुनौतियां क्या हैं?

आर्कटिक का मौसम बहुत रफ है – ठंड, तूफान, बर्फ – जो इन सिस्टम्स की टेस्टिंग करता है. लेकिन यही उनकी ताकत है – वे इंसानों से ज्यादा समय तक टिक सकते हैं. नाटो को अभी आर्कटिक-रेडी ड्रोन की संख्या कम है, लेकिन सहयोगी देश (नॉर्वे, डेनमार्क, अमेरिका) इसे बढ़ा रहे हैं.

हालिया घटनाएं

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पिछले साल अमेरिकी एयर फोर्स और नॉर्वे ने B-2 स्टील्थ बॉम्बर के साथ संयुक्त अभ्यास किया, जिसमें समुद्री जहाज पर हमले का सिमुलेशन था. रूस-चीन के संयुक्त पेट्रोल बढ़ रहे हैं, जो नाटो के लिए चिंता का विषय है. आर्कटिक में हाइब्रिड खतरा (जैसे केबल तोड़ना) या बड़ा युद्ध – दोनों संभव हैं.

अनमैन्ड सिस्टम से नाटो निगरानी बढ़ा सकता है. इंफ्रास्ट्रक्चर बचा सकता है. क्षेत्र में अपनी मौजूदगी मजबूत कर सकता है. यह क्षेत्र अब सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि वैश्विक सुरक्षा का बड़ा मुद्दा बन गया है. नाटो को जल्दी कार्रवाई करनी होगी.

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