अमेरिका ताइवान को हथियार बेचने की प्रक्रिया को ईरान के साथ चल रहे युद्ध से अलग रख रहा है. एक विश्वसनीय सूत्र ने स्पष्ट किया है कि ताइवान को हथियारों की बिक्री का मामला कई सालों से चल रहा है और यह ईरान युद्ध से बिल्कुल जुड़ा नहीं है.
हाल ही में अमेरिका के एक वरिष्ठ अधिकारी ने सुझाव दिया था कि ताइवान को हथियार बेचने में देरी हो रही है क्योंकि अमेरिका को ईरान के खिलाफ ऑपरेशन एपिक फ्यूरी में पर्याप्त गोला-बारूद की जरूरत है. लेकिन अब सूत्रों ने इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया है.
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हथियारों की बिक्री की प्रक्रिया में कई साल लग जाते हैं. उन्होंने जोर देकर कहा कि ये बिक्री ईरान युद्ध से जुड़ी नहीं है. अमेरिकी सेना के पास राष्ट्रपति ट्रंप के सभी रणनीतिक लक्ष्यों को पूरा करने के लिए पर्याप्त गोला-बारूद, हथियार और स्टॉक उपलब्ध है.
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात के बाद ताइवान को हथियार बेचने के पैकेज पर फैसला लेने में अनिश्चितता जताई थी. उन्होंने कहा था कि वह इस मामले पर अभी फैसला नहीं ले पाए हैं. इस बयान से ताइवान में काफी चिंता पैदा हो गई.
ताइवान को कितना बड़ा पैकेज?
ताइवान लंबे समय से अमेरिका से 14 अरब डॉलर तक के हथियारों के पैकेज का इंतजार कर रहा है. चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है. अमेरिका की इस हथियार बिक्री का पुरजोर विरोध करता रहा है. अमेरिका 1979 के ताइवान रिलेशंस एक्ट के तहत ताइवान को खुद को बचाने के लिए जरूरी हथियार और सहायता मुहैया कराने के लिए बाध्य है. अमेरिकी सरकार ने कहा है कि ताइवान नीति में कोई बदलाव नहीं आया है.
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ताइवान सरकार ने शुक्रवार को कहा कि उसे अमेरिका से हथियार बिक्री में किसी प्रकार की देरी की कोई आधिकारिक जानकारी नहीं मिली है. चीन लगातार अमेरिका से मांग कर रहा है कि वह ताइवान को हथियार बेचना बंद करे. चीन ताइवान पर अपना दावा मजबूती से करता है, जबकि ताइवान कहता है कि ताइवान के लोग ही अपने भविष्य का फैसला करेंगे.
यह पूरा विवाद दिखाता है कि अमेरिका-चीन के बीच ताइवान मुद्दा कितना संवेदनशील है. एक तरफ अमेरिका ताइवान की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है, वहीं दूसरी तरफ ईरान युद्ध और चीन के साथ संबंधों के कारण स्थिति जटिल बनी हुई है. ट्रंप जल्द ही ताइवान हथियार पैकेज पर फैसला ले सकते हैं.
ऋचीक मिश्रा