ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब पाकिस्तान ने भारत को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की तो भारत की जमीन पर तैनात रूस के मिसाइल डिफेंस S-400 ने पाकिस्तानी अटैक की धज्जियां उड़ा दीं. पाकिस्तान की सारी मिसाइलों को S-400 ने आसमान में ही नेस्तानाबूद कर दिया, पाकिस्तान का एक वार भी भारत की धरती को छू नहीं सका. इस कामयाबी के लिए रूसी तकनीक और S-400 की खूब तारीफ हुई.
भारतीय सेना और वायुसेना के लिए यह सिस्टम एक ऐसे सुरक्षा कवच की तरह साबित हुआ जिसने दुश्मन के ड्रोन, मिसाइल और हवाई खतरों के खिलाफ मजबूत ढाल का काम किया. लेकिन इसी S-400 को खरीदने वाला नाटो सदस्य तुर्की अब उससे छुटकारा पाने के रास्ते तलाश रहा है. इसकी सबसे बड़ी वजह अमेरिका और विशेष रूप से डोनाल्ड ट्रंप की वापसी के बाद बदलता रणनीतिक माहौल माना जा रहा है.
तुर्की ने 2017 में रूस से लगभग 2.5 अरब डॉलर की लागत पर S-400 प्रणाली खरीदने का समझौता किया था. 2019 में इसकी डिलीवरी शुरू हुई, उस समय राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोआन ने इसे तुर्की की संप्रभु सुरक्षा जरूरत बताते हुए अमेरिकी दबाव को खारिज कर दिया था. लेकिन इस फैसले की कीमत भी चुकानी पड़ी.
S-400 और F-35 साथ-साथ नहीं
अमेरिका का तर्क था कि S-400 और अमेरिकी F-35 स्टेल्थ लड़ाकू विमान एक साथ नहीं चल सकते. वाशिंगटन को डर था कि रूसी प्रणाली F-35 की संवेदनशील तकनीकी जानकारी हासिल कर सकती है. नतीजा यह हुआ कि अमेरिका ने तुर्की को F-35 कार्यक्रम से बाहर कर दिया और CAATSA (Countering America's Adversaries Through Sanctions Act) के तहत प्रतिबंध भी लगाए.
अब हालात बदल रहे हैं. पश्चिम एशिया, यूक्रेन युद्ध और नाटो की नई सुरक्षा चुनौतियों के बीच तुर्की फिर से अमेरिका के साथ रिश्तों को सामान्य बनाना चाहता है. ट्रंप प्रशासन के दौर में अटके कई रक्षा समझौतों को आगे बढ़ाने की उम्मीद भी एर्दोआन सरकार को है. विशेष रूप से F-35 को तुर्की लालच भरी निगाहों से देख रहा है. हालांकि इसके पीछे उसकी भू-रणनीतिक जरूरतें हैं. इसलिए आधुनिक अमेरिकी हथियारों तक पहुंच तुर्की की प्राथमिकता बन गई है.
हाल ही में ट्रंप जब तुर्की के दौरे पर गए तो इस दौरान दोनों राष्ट्राध्यक्षों के बीच चर्चा का मुख्य मुद्दा S-400 का समाधान और F-35 प्रोग्राम में तुर्की की वापसी थी.
अब 2026 में ट्रंप प्रशासन तुर्की को NATO का मजबूत सहयोगी मानते हुए प्रतिबंध हटाने और F-35 देने की तैयारी कर रहा है, लेकिन शर्त साफ है, तुर्की को S-400 को छोड़ना होगा.
तुर्की के मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अब अंकारा S-400 सिस्टम को खाड़ी देशों को बेच सकता है. इसमें UAE और कतर का नाम आगे चल रहा है.
रॉयटर्स के अनुसार रूस ने भी इसकी पुष्टि की है.
शुक्रवार को रूसी राष्ट्रपति के ऑफिस क्रेमलिन ने कहा कि रूस तुर्की के पास मौजूद S-400 मिसाइल सिस्टम के भविष्य को लेकर तुर्की के संपर्क में है.
तुर्की के न्यूज़ आउटलेट 'हुर्रियत' ने शुक्रवार को रिपोर्ट दी थी कि रूस S-400 मिसाइलों को खाड़ी के किसी देश को फिर से बेचेगा, ताकि अमेरिका को तुर्की पर लगे प्रतिबंध हटाने के लिए मनाया जा सके.
शुक्रवार को मीडिया रिपोर्ट और इस बारे में पूछे जाने पर कि क्या तुर्की ने कथित डील को आगे बढ़ाने के लिए रूस से मंज़ूरी मांगी थी. क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा, "मैं यहां एक बात कह सकता हूं, यह बहुत संवेदनशील मामला है. हालांकि हम इस मामले पर तुर्की पक्ष के संपर्क में रहे हैं, और हम इस मुद्दे पर उनके साथ संपर्क बनाए रखेंगे."
दबाव डालकर काम करवाने की ट्रंप की रणनीति
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप दबाव डालकर अपना काम करवाने की रणनीति के लिए जाने जाते हैं. वे इसे 'अमेरिका फर्स्ट' का नाम देते हैं. NATO सम्मेलनों में सहयोगियों पर डिफेंस खर्च बढ़ाने के लिए, चीन पर व्यापार युद्ध, ईरान-तुर्की पर सैंक्शन और F-35 मुद्दे पर एर्दोआन के साथ सौदेबाजी. वे हर जगह ट्रंप खुलकर दबाव बनाते हैं.
ट्रंप ने तुर्की को F-35 स्टील्थ फाइटर जेट्स बेचने पर सहमति जताई है. अपने हर प्रोडक्ट को बेस्ट बताने वाले ट्रंप ने इसे 'अबतक का सबसे अच्छा जेट' बताया है. लेकिन वे इसके लिए तुर्की को रूसी डिफेंस सर्किल से पूरी तरह बाहर निकालना चाहते हैं.
ट्रंप ने NATO सम्मेलन के दौरान तुर्की के राष्ट्रपति के साथ मुलाकात में कहा, “हम दोस्तों पर प्रतिबंध नहीं लगाना चाहते.” यह बयान तुर्की के लिए राहत भरा है, क्योंकि F-35 न केवल आधुनिक स्टेल्थ टेक्नोलॉजी देगा, बल्कि तुर्की की क्षेत्रीय ताकत को बढ़ाएगा. इजरायल और ग्रीस जैसे देश इसका विरोध कर रहे हैं, लेकिन ट्रंप की प्राथमिकता अपना मार्केट है, वे अमेरिकी हितों के पोषण के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं इसलिए वह तुर्की की रूस पर निर्भरता कम करना चाहते हैं.
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