अमेरिका से जंग में चोरी-छिपे मदद... पाकिस्तान ने ईरान का 55 साल पुराना कर्ज उतार दिया

1971 के युद्ध में ईरान ने पाकिस्तान को शरण दी थी. अब पाकिस्तान पर ईरानी विमानों को नूर खान एयरबेस पर छिपाने का आरोप लगा है. यह घटना पुराने एहसान को चुकाने की कोशिश लग रही है.

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पाकिस्तान के नूर खान एयरबेस पर ईरानी विमान खड़ा करने का आरोप लगाया जा रहा है. (File Photo: Reuters/AFP) पाकिस्तान के नूर खान एयरबेस पर ईरानी विमान खड़ा करने का आरोप लगाया जा रहा है. (File Photo: Reuters/AFP)

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 13 मई 2026,
  • अपडेटेड 11:19 AM IST

पाकिस्तान पर ईरानी मिलिट्री एयरक्राफ्ट को अपने एयरबेस पर शरण देने का आरोप लग रहा है. 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान ईरान ने पाकिस्तान की मदद की थी. अब पाकिस्तान ईरान को उसी का बदला चुकाने की कोशिश कर रहा है. अमेरिका ईरान पर सैन्य दबाव बना रहा है, ऐसे में पाकिस्तान पर सवाल उठ रहे हैं.
 
1971 के युद्ध के समय ईरान के शाह मोहम्मद रजा पहलवी पाकिस्तान के सबसे मजबूत समर्थकों में थे. ईरान ने पाकिस्तान को हेलीकॉप्टर, ईंधन, गोला-बारूद और स्पेयर पार्ट्स मुहैया कराए. कुछ पाकिस्तानी विमान ईरानी एयरबेस पर शरण लेने गए थे. उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन प्रशासन ने चुपचाप ईरान को पाकिस्तान की मदद करने के लिए प्रोत्साहित किया था. 

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अमेरिका-चीन दोनों ही पाकिस्तान के टूटने नहीं देना चाहते थे. उस समय ईरान-पाकिस्तान दोनों ही CENTO नामक एंटी-सोवियत गठबंधन के सदस्य थे. निक्सन दोनों देशों को सोवियत संघ के खिलाफ रणनीतिक आधार मानते थे. 

आरोप और पाकिस्तान का इनकार

CBS न्यूज की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान के नूर खान एयरबेस पर ईरानी विमान मौजूद हैं. पाकिस्तानी अधिकारियों ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है. उन्होंने कहा कि नूर खान एयरबेस शहर के बीचों-बीच है. यहां बड़ी संख्या में विमान छिपाना असंभव है.

अमेरिकी प्रशासन ने भी अभी तक पाकिस्तान पर सीधा आरोप नहीं लगाया है. ईरान ने अपने कुछ विमानों को अफगानिस्तान में भी शिफ्ट किया था. अफगानिस्तान में महान एयर का एक विमान काबुल आया था और बाद में हेरात ले जाया गया.

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पाकिस्तान की नाजुक स्थिति

आज की जियो-पॉलिटिक्स 1971 से बिल्कुल अलग है. ईरान अब अमेरिका का सबसे बड़ा विरोधी है, जबकि पाकिस्तान चीन का सबसे करीबी सुरक्षा साझेदार है. चीन ने पाकिस्तान की ईरान-अमेरिका के बीच मध्यस्थता की भूमिका की सराहना भी की है.

पाकिस्तान 2020-2024 के बीच अपने 80 प्रतिशत बड़े हथियार चीन से खरीद रहा है, लेकिन साथ ही अमेरिका से पुराने सैन्य और खुफिया संबंध सुधारने की कोशिश भी कर रहा है. पाकिस्तान खुद को क्षेत्रीय शांति का मध्यस्थ बताता है और कहता है कि वह अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत करा रहा है.

अमेरिका में पाकिस्तान पर अविश्वास

अमेरिकी सुरक्षा संस्थाओं में पाकिस्तान की विश्वसनीयता पर गहरा संदेह है. ओसामा बिन लादेन की छाया अब भी अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों पर मंडरा रही है. कई अमेरिकी सांसद और अधिकारी पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों पर आतंकवादी समूहों से संबंध रखने का आरोप लगाते रहते हैं. 

ट्रंप प्रशासन हाल में पाकिस्तान के प्रति नरम रुख दिखा रहा था, लेकिन नवीनतम आरोपों ने फिर विवाद खड़ा कर दिया है. सीनेटर लिंडसी ग्राहम ने चेतावनी दी कि अगर आरोप सही साबित हुए तो पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका पर पूरी तरह पुनर्विचार करना पड़ेगा.

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1971 में ईरान ने पाकिस्तान की मदद की थी. अब पाकिस्तान ईरान को शरण देकर पुराना एहसान चुकाने की कोशिश कर रहा है. हालांकि पाकिस्तान इनकार कर रहा है, लेकिन यह घटना दर्शाती है कि पाकिस्तान की विदेश नीति कितनी जटिल और संतुलन वाली है. पाकिस्तान चीन के साथ गहरे संबंध रखते हुए अमेरिका और ईरान दोनों के साथ काम करने की कोशिश कर रहा है. लेकिन अमेरिका में पाकिस्तान पर भरोसा कम होता जा रहा है.

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