USS अब्राहम लिंकन तक कैसे पहुंचा ईरानी शाहेद ड्रोन... क्या चीन के सैटेलाइट की मदद ली?

ईरानी शाहेद-139 ड्रोन 3 फरवरी 2026 को अरब सागर में USS अब्राहम लिंकन कैरियर के काफी करीब पहुंच गया था. अमेरिकी सेना ने इसे आक्रामक माना और F-35C फाइटर जेट से ड्रोन को मार गिराया. ईरान चीन के याओगान और जिलिन सैटेलाइट्स से रियल-टाइम लोकेशन, इमेज और सिग्नल डेटा ले रहा है, जिससे ड्रोन इतना सटीक पहुंच सका.

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एक्सपर्ट कयास लगा रहे हैं कि ईरान ने चीन के सैटेलाइट्स की मदद से अमेरिकी युद्धपोत तक ड्रोन को पहुंचाया. (Photo: Representative/Getty) एक्सपर्ट कयास लगा रहे हैं कि ईरान ने चीन के सैटेलाइट्स की मदद से अमेरिकी युद्धपोत तक ड्रोन को पहुंचाया. (Photo: Representative/Getty)

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 04 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 12:26 PM IST

अरब सागर में अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस अब्राहम लिंकन के करीब पहुंचे ईरानी शाहेद ड्रोन ने दुनिया का ध्यान खींचा है. अमेरिकी सेना ने इसे खतरा मानकर मार गिराया, लेकिन सवाल उठ रहा है कि यह ड्रोन इतना करीब कैसे पहुंच गया? क्या इसके पीछे चीन की सैटेलाइट मदद कर रही है? 

एक नई रिपोर्ट से पता चलता है कि ईरान चीन के उन्नत सैटेलाइट नेटवर्क का इस्तेमाल कर रहा है, जो अमेरिकी नौसेना के जहाजों पर 24 घंटे नजर रखता है. यह सैटेलाइट नेटवर्क हाई-रिजॉल्यूशन इमेज, वीडियो, सिग्नल इंटेलिजेंस (SIGINT) और इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस (ELINT) प्रदान करता है. 

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क्या है यह पूरा मामला?

ईरान के पास खुद का सैटेलाइट नेटवर्क बहुत छोटा है, लेकिन चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) का सैटेलाइट सिस्टम दुनिया का सबसे बड़ा और एडवांस है. यह सैटेलाइट ईरान को अमेरिकी जहाजों की सटीक लोकेशन, इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल और इमेज देने में मदद करते हैं.

इससे ईरान अपने ड्रोन्स और मिसाइलों को रियल-टाइम टारगेटिंग डेटा भेज सकता है. फारस की खाड़ी, ओमान की खाड़ी और अरब सागर जैसे इलाकों में यह किल चेन बनाता है. यानी टारगेट ढूंढने से लेकर हमला करने तक की प्रक्रिया पूरी करता है. 

जैसे- ईरानी ड्रोन यूएसएस अब्राहम लिंकन की जासूसी कर रहे हैं. लेकिन युद्ध में ड्रोन्स को आसानी से मार गिराया जा सकता है. इसलिए, तीन सैटेलाइट या ड्रोन्स का इस्तेमाल करके जहाजों की सटीक लोकेशन निकाली जाती है, और यह जानकारी मिलिसेकंड में मिसाइलों तक पहुंचाई जाती है. चीन के सैटेलाइट इसी काम में ईरान की मदद कर रहे हैं.

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चीन के सैटेलाइट नेटवर्क की बुनियाद

चीन के सैटेलाइट को टूल बॉक्स की तरह समझिए – हर टूल का अलग काम है. ईरान के पास ऐसा बड़ा टूल बॉक्स नहीं है. चीन के सैटेलाइट में इंटेलिजेंस, रेकॉन (जासूसी) और सर्वेलेंस (निगरानी) की क्षमता है. ये सैटेलाइट दिन-रात, हर मौसम में पृथ्वी की तस्वीरें लेते हैं. रेडियो सिग्नल सुनते हैं. जहाजों की लोकेशन बताते हैं. 

मुख्य दो प्रकार के सैटेलाइट हैं जो ईरान की मदद कर रहे हैं: याओगान (Yaogan) और जिलिन (Jilin).

1. याओगान सैटेलाइट: जहाजों पर इलेक्ट्रॉनिक नजर

याओगान का मतलब रिमोट सेंसिंग है. ये पूरी तरह से सैन्य सैटेलाइट हैं. 2 फरवरी 2026 तक, 164 याओगान सैटेलाइट काम कर रहे हैं. इनमें ऑप्टिकल इमेजिंग, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल, इन्फ्रारेड, SAR (रडार जो मौसम से प्रभावित नहीं होता) और SIGINT (सिग्नल इंटेलिजेंस) की क्षमता है. SIGINT का एक हिस्सा ELINT है, जो रेडियो और रडार को ट्रैक करता है.

ग्लोबल नेवल ट्रैकिंग: याओगान-9, 13, 17, 21, 31 और 41 सीरीज के सैटेलाइट ELINT के लिए हैं. ये ट्रिपलेट्स (तीन-तीन के ग्रुप) में लॉन्च होते हैं. तीन सैटेलाइट मिलकर जहाजों के इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल को ट्राइएंगुलेशन से सटीक लोकेशन बताते हैं. ये 1100 किलोमीटर की ऊंचाई पर घूमते हैं. दुनिया भर के जहाजों पर नजर रखते हैं.

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रीजनल नेवल ट्रैकिंग: याओगान-30 सीरीज के ट्रिपलेट्स क्षेत्रीय निगरानी के लिए हैं. ये कम ऊंचाई (565-570 किलोमीटर) पर तैनात हैं, इसलिए जल्दी-जल्दी इलाके पर वापस आते हैं. एक ट्रिपलेट का रिविजिट टाइम 95.9 मिनट है. कई ऐसे ग्रुप्स मिलकर फारस की खाड़ी, अरब सागर, लाल सागर और हिंद महासागर पर 24/7 कवरेज देते हैं. 

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ये सैटेलाइट ईरान को अमेरिकी जहाजों की रियल-टाइम लोकेशन देते हैं, जो ड्रोन्स या मिसाइलों के लिए जरूरी है.

2. जिलिन सैटेलाइट: हाई-क्वालिटी इमेज और वीडियो

जिलिन-1 के 117 से ज्यादा सैटेलाइट काम कर रहे हैं. ये क्लस्टर्स (5-10 के ग्रुप) में काम करते हैं.

विशेषताएं...

  • पैंक्रोमैटिक इमेजिंग (50-75 सेमी रिजॉल्यूशन, ग्रे-स्केल तस्वीरें).
  • मल्टीस्पेक्ट्रल (2-3 मीटर रिजॉल्यूशन, कलर इमेज).
  • 4K HD वीडियो (92-120 सेमी रिजॉल्यूशन, 10 फ्रेम्स प्रति सेकंड, 30-120 सेकंड क्लिप्स).
  • हर मौसम में इमेजिंग.

ये 535 किलोमीटर ऊंचाई पर सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट में हैं. ये रात में भी इमेज लेते रहते हैं. क्लस्टर्स को किसी इलाके पर रोजाना कई बार भेजा जा सकता है. ये जहाजों की दिन-रात निगरानी के लिए परफेक्ट हैं.

चीन ईरान को कैसे इंटेल शेयर कर रहा है?

चीन का सैटेलाइट नेटवर्क इतना एडवांस है कि रूस का भी इससे मुकाबला नहीं. रूस के पास लोटोस-एस (4 यूनिट) और पियोन-एनकेएस (2 यूनिट) जैसे सैटेलाइट हैं, लेकिन वे मुख्य रूप से रूस की उत्तरी सीमाओं (आर्कटिक, यूरोप, अमेरिका) पर फोकस करते हैं. मिडिल ईस्ट पर कवरेज नहीं हैं. इसलिए, ईरान चीन पर निर्भर है.

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चीन ईरान को इंटेल शेयर करता है. इससे ईरान अमेरिकी जहाजों की इलेक्ट्रॉनिक फिंगरप्रिंट्स (सिग्नल की पहचान) और इमेज ले सकता है. अमेरिका भी RC-135V जैसे प्लेन से ईरान की डिफेंस सिस्टम को उकसाता है ताकि उनके सिग्नल कैप्चर कर सके. ईरान के ड्रोन्स यूएसएस लिंकन के पास उड़कर यही काम कर रहे हैं.

क्या इसका सबूत है?

यह जानकारी ओपन-सोर्स डेटा (NORAD, N2YO.com, CelesTrak.org) से ली गई है. ईरान के ड्रोन की हालिया घटना में चीनी सैटेलाइट की भूमिका की पुष्टि नहीं हुई है लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह संभव है. चीन और ईरान का सहयोग पुराना है. यह अमेरिका के लिए चिंता का विषय है.

क्या होगा आगे?

यह किल चेन अमेरिकी नौसेना के लिए खतरा है. ईरान के ड्रोन्स और मिसाइलों को चीन के सैटेलाइट से रियल-टाइम मदद मिल रही है. अमेरिका को अपनी डिफेंस मैकेनिज्म मजबूत करनी होगी. ताकि इस तरह के हमलों से बच सके.

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