ईरान के साथ हुए युद्ध में अमेरिका की सेना ने बहुत महंगे और उन्नत हथियारों का भारी इस्तेमाल किया है. इससे अमेरिका के हथियारों के भंडार काफी कम हो गए हैं. युद्ध की लागत भी बहुत बढ़ गई है. न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, इस संघर्ष ने अमेरिकी सेना की तैयारी पर सवाल खड़े कर दिए हैं. अब अमेरिका को चीन और रूस जैसे बड़े दुश्मनों से निपटने की क्षमता पर चिंता हो रही है.
ईरान युद्ध में हथियारों का भारी इस्तेमाल
ईरान युद्ध शुरू होने के बाद अमेरिका ने बहुत ज्यादा एडवांस मिसाइलें दागीं. रिपोर्ट बताती है कि अमेरिका ने 1100 से ज्यादा लंबी दूरी की स्टील्थ क्रूज मिसाइलें इस्तेमाल कीं. ये मिसाइलें मुख्य रूप से चीन जैसे मजबूत दुश्मन के खिलाफ रखी जाती हैं.
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इसके अलावा अमेरिका ने 1000 से ज्यादा टोमाहॉक क्रूज मिसाइलें फायर कीं. यह संख्या हर साल खरीदी जाने वाली टोमाहॉक मिसाइलों से 10 गुना ज्यादा है. टोमाहॉक मिसाइलें बहुत महंगी होती हैं. सैकड़ों किलोमीटर दूर के लक्ष्य को सटीक निशाना बना सकती हैं.
सबसे ज्यादा खर्च पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइलों पर हुआ. अमेरिका ने 1200 से ज्यादा पैट्रियट मिसाइलें दागीं. हर पैट्रियट मिसाइल की कीमत 4 मिलियन डॉलर (33 करोड़ रुपये) से ज्यादा है. ये मिसाइलें दुश्मन की मिसाइलों या विमानों को बीच में ही रोकने के लिए इस्तेमाल होती हैं.
हथियारों के भंडार तेजी से खत्म हो रहे हैं
इस युद्ध ने अमेरिका के महत्वपूर्ण हथियारों के स्टॉक को काफी कम कर दिया है. कई तरह की मिसाइलों की संख्या अब बहुत कम बची है. समस्या यह है कि अमेरिका ने एशिया और यूरोप से भी हथियार निकालकर मिडिल ईस्ट भेजे. इससे उन इलाकों में अमेरिका की तैयारियां कमजोर हो गई हैं.
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विशेषज्ञों को चिंता है कि अगर चीन या रूस के साथ कोई नया संघर्ष हुआ तो अमेरिका के पास पर्याप्त हथियार नहीं रहेंगे. पैट्रियट, टोमाहॉक और अन्य प्रिसीजन मिसाइलों के भंडार अब खतरनाक स्तर पर कम हो चुके हैं.
युद्ध की लागत आसमान छू रही है
ईरान युद्ध की कुल लागत 28 से 35 बिलियन डॉलर (2.3 लाख करोड़ से 2.9 लाख करोड़ रुपये) तक बताई जा रही है. युद्ध के दौरान रोजाना औसतन लगभग 8300 करोड़ रुपये खर्च हो रहे थे.
पहले दो दिनों में ही लगभग 46,500 करोड़ रुपये के गोले-बारूद इस्तेमाल हो गए. इतनी बड़ी रकम सिर्फ हथियारों पर खर्च हुई. कुल मिलाकर यह युद्ध अमेरिका के लिए बहुत महंगा साबित हुआ है.
नए हथियार बनाने में बड़ी चुनौतियां
अब पुराने स्टॉक को फिर से भरने में कई साल लग सकते हैं. वर्तमान उत्पादन दर बहुत धीमी है. पेंटागन कांग्रेस से अतिरिक्त फंडिंग की मांग कर रहा है. कई फैक्टरियों में उत्पादन बढ़ाने की योजना बनी है, लेकिन अभी पूरी तरह लागू नहीं हुई है. पैट्रियट मिसाइलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए बड़े कॉन्ट्रैक्ट दिए गए हैं, लेकिन इसमें समय लगेगा. इतनी तेजी से हथियार खर्च होने के बाद स्टॉक को सामान्य स्तर पर लाने में सालों लग सकते हैं.
रणनीतिक नुकसान और समझौते
अमेरिका की सेना अब कई इलाकों में फैली हुई है, लेकिन संसाधन सीमित हैं. मिडिल ईस्ट में इतना खर्च करने से इंडो-पैसिफिक (एशिया-प्रशांत) और यूरोप में अमेरिका की रोकथाम की क्षमता कम हो गई है. महंगे हथियारों पर ज्यादा निर्भरता भी एक बड़ी समस्या है. भविष्य में लंबे युद्ध लड़ने की क्षमता पर सवाल उठ रहे हैं. अगर एक साथ कई मोर्चों पर लड़ाई हुई तो अमेरिका को मुश्किल हो सकती है.
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यह युद्ध एक महत्वपूर्ण सच्चाई सामने लाया है. दुनिया की सबसे ताकतवर सेना होने के बावजूद अमेरिका को संसाधनों, लागत और लंबे समय तक युद्ध चलाने की सीमा का सामना करना पड़ रहा है. लंबे समय तक स्टॉक न भर पाने से रणनीतिक कमजोरियां पैदा हो सकती हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि अब सस्ते और ज्यादा मात्रा में बनने वाले हथियारों (जैसे ड्रोन) पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है. ईरान युद्ध ने साबित कर दिया कि महंगे हथियारों से छोटे-छोटे लक्ष्यों को मारना महंगा और असंतुलित साबित हो सकता है. अमेरिका को अब अपनी रक्षा नीति और उत्पादन क्षमता को फिर से सोचना होगा.
ऋचीक मिश्रा