मारा गया पाकिस्तान का सबसे बड़ा आतंकी मुल्ला रेडियो

अगर पाकिस्तानी मीडिया पर यकीन करें तो पाकिस्तान का पांच करोड़ का इनामी आतंकवादी और स्वात में तहरीक-ए-तालिबान का सबसे बड़ा नेता मौलाना फजलुल्लाह सोमवार रात को अफगानिस्तान में हुए एक ड्रोन हमले में अपने घर के अंदर ही मारा गया.

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मारा गया मुल्ला रेडियो मारा गया मुल्ला रेडियो

सूरज पांडेय

  • नई दिल्ली,
  • 27 जनवरी 2016,
  • अपडेटेड 3:32 PM IST

पाकिस्तान का सबसे बड़ा छलावा, पाकिस्तान का सबसे बड़ा भूत और पाकिस्तान को सबसे ज्यादा खून के आंसू रुलाने वाला तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान का सरगना मुल्ला फजलुल्लाह उर्फ मुल्ला रेडियो शायद मारा गया. शायद इसलिए क्योंकि इससे पहले भी कई बार इस छलावे के मारे जाने की खबर आ चुकी है. मगर पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस बार वो सचमुच ही मारा गया है.

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अगर पाकिस्तानी मीडिया पर यकीन करें तो पाकिस्तान का पांच करोड़ का इनामी आतंकवादी और स्वात में तहरीक-ए-तालिबान का सबसे बड़ा नेता मौलाना फजलुल्लाह सोमवार रात को अफगानिस्तान में हुए एक ड्रोन हमले में अपने घर के अंदर ही मारा गया. रिपोर्ट के मुताबिक उसके घर की पुख्ता जानकारी मिलने के बाद ही हमला किया गया और उस हमले में वो मारा गया. हालांकि मुल्ला की मौत की खबरों को लेकर न तो तहरीक-ए-तालिबान की तरफ से कोई प्रतिक्रिया आई है और न ही पाकिस्तान सरकार अभी इसकी पुष्टि कर रही है. पाकिस्तानी सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि सोमवार रात को तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान चीफ मुल्ला फजलुल्लाह की मौत को लेकर खबर तो आई है. लेकिन अभी हम लोग उसकी मौत से जुड़े सबूतों को ढूंढ रहे हैं.


गौरतलब है कि इससे पहले भी तालिबानी चीफ के मारे जाने की खबरें आती रही हैं, लेकिन वो सभी खबरें झूठी निकलीं. पिछले साल मार्च में खबर आई थी कि खैबर एजेंसी के तिराह घाटी में हुए हवाई हमलों में मारे जाने वालों में फजलुल्लाह भी शामिल है. लेकिन उसके बाद टीटीपी ने इसे अफवाह बताया था और कहा था कि उनका चीफ अभी जिंदा है. ठीक इसी तरह जून 2009 में भी फजलुल्लाह के मारे जाने की खबर आई थी. लेकिन पाक मीडिया की मानें तो इस बार शायद फजलुल्लाह बच नहीं पाया. और इसकी वजह है पेशावर के बाचा खान यूनिवर्सिटी पर तालिबान के हमले के बाद पाक सरकार का सख्त रवैया. हमले के बाद से ही पाक फौज और सुरक्षा एजेंसियां तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के खिलाफ लगातार हमले तेज किए हुए हैं.

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पाकिस्तान में आतंक के सबसे खूंखार चेहरे का नाम है फजलुल्लाह और इसके एक इशारे पर मरने-मारने को उतारु हो जाता है तालिबान. ये वो शख्स है जिसने पाकिस्तान का स्विटजरलैंड कही जाने वाली स्वात घाटी को ना सिर्फ नर्क में तब्दील कर दिया बल्कि उसके नापाक मंसूबों ने कई बार पाकिस्तान को खून के आंसू रुलाया है. पाकिस्तान की स्वात घाटी. बेहद ही खूबसूरत इस इलाके को फजलुल्लाह ने आतंक का गढ़ बना दिया था. रोज-रोज अपने नए फतवों से लोगों के दिलों में खौफ का वो मंजर पैदा कर दिया कि फजल्लुलाह के नाम से भी वो कांपने लगे. यहां हर किसी के चेहरे पर फजल्लुलाह का डर और खौफ का साफ दिखाई देता था. औरते घर से बुर्का डालकर निकलतीं और बच्चे स्कूल जाने से डरते.


अपने ससुर सूफी मुहम्मद के साथ मिलकर फजलुल्लाह ने स्वात घाटी में आतंक की हुकूमत काबिज कर दी. रेडियो तालिबान पर आए दिन अपने फतवों से स्वात घाटी में मजहब के नाम पर घिनौना खेल खेला. कभी महिलाओं को घर से निकलने का फतवा, कभी बच्चों को स्कूल ना भेजने का फरमान तो कभी संगीत सुनने पर मौत की सजा देने का ऐलान. हर फरमान के साथ फजल्लुलाह का चेहरा और भी खतरनाक होता गया. जिस किसी ने फजल्लुलाह के फरमानों की अनदेखी करने की जुर्रत की तो उसे मिली मौत की सजा. तो औरतों को मिली सरेआम कोड़ों की सजा. जिसके बाद तो किसी ने भी फजल्लुलाह के सामने सिर उठाने की हिम्मत नहीं की.

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जिस खूनी गिरोह ने पेशावर के स्कूल में मासूम बच्चों का कत्लेआम किया उसका मुखिया था मौलाना फजलुल्ला उर्फ मुल्ला रेडियो. उसका पैदाइशी नाम फजल हयात था. 1974 में पाकिस्तान के स्वात जिले में पैदा हुआ यह पश्तून उग्रवादी देवबंद सुन्नी इस्लाम का समर्थक था और पाकिस्तान में शरिया कानून लागू करवाना चाहता था. बेहद कट्टर विचारधारा का फजलुल्लाह उसी समुदाय से आता है जिस समुदाय से नोबल प्राइज विजेता मलाला यूसुफजई आती हैं. फजलुल्लाह को पाकिस्तान की सरकार ने 2005 में गिरफ्तार कर लिया था. उसने जेल में ही रहकर तमाम धार्मिक किताबें पढ़ीं. वहां से ही उसके कट्टरवाद की शुरुआत हुई. जेल से छूटने के बाद उसने पाकिस्तान की सरकार और कट्टरपंथियों के बीच समझौता करवाया जिसके एवज में पाक सरकार ने उसे मालकंड जिले में शरिया कानून लागू करने की इजाजत दे दी.


इसी के बाद से मुल्ला धीरे-धीरे स्वात घाटी के इलाके में मजबूत होता चला गया. बाद में उसने खूंखार आतंकी बैतुल्ला महसूद के साथ हाथ मिला लिया. 2007 तक उसने 4500 लड़ाकों की फौज बना ली और स्वात घाटी के 59 गांवों पर अपनी हुकूमत चलाने लगा. 10 जुलाई 2009 को पाकिस्तानी फौज के हमले में वह जख्मी तो हो गया लेकिन बच निकला. फौज ने करोड़ों रुपये की लागत से बने उसके मदरसे को नेस्तनाबूत कर दिया. फौज के हमले के बाद ही वह अफगानिस्तान चला गया और वहीं से ऑपरेशन चलाने लगा. अफगानिस्तान में रहकर ही वो पाकिस्तानी फौजों पर हमले करता था.

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शरिया कानून का था हिमायती
फजलुल्लाह शुरू से ही कड़े शरिया कानून का हिमायती था और उन्हें तोड़ने वालों को कड़ी सजा देता था. इनमें गला काट कर मौत की सजा देना तक शामिल था. वह संगीत, टीवी, सिनेमा वगैरह का घोर विरोधी था और ऐसा करने वालों को सजा देता है. उसने स्वात में कंप्यूटर की तमाम दुकानों में आग लगवा दी थी. फजलुल्लाह खास तौर पर मुस्लिम महिलाओं की तालीम और उनके स्कूल जाने के खिलाफ था. उसने लड़कियों के दस स्कूलों को बम से उड़ा दिया था. जबकि करीब 170 स्कूलों को नेस्तनाबूत कर दिया था. मुल्ला फजलुल्लाह के ही कहने पर 2012 में मलाला पर हमला हुआ था. जब फजलुल्लाह के नाम की तूती बोला करती थी तब पुलिस छोड़िए पाक सेना तक उसके गढ़, खास तौर पर उसके हैडक्वार्टर का रुख करने से घबराती थी. ये वही हैडक्वार्टर था जहां से फजलुल्लाह तमाम खतरनाक साजिशें रचता. ये वही अड्डा था जहां फजलुल्लाह अपने कैदियों को बंदी बनाकर उनपर जुल्म ढहा था. ये वही जगह थी जहां बैठ कर वो मुल्ला रेडियो के जरिए तमाम मौत के फरमान जारी करता.

यहीं थी तालिबान की ताकत
स्वात में मौलाना फजलुल्लाह का हेडक्वॉर्टर किसी किले से कम नहीं था. यहां वो सब कुछ था जो किसी सत्ता के केंद्र में होना चाहिए. तालिबानी कमांडर यहीं से आदेश लेते थे और उसी की तालीम करते थे. आखिरी फैसला भी यहीं से सुनाया जाता था. तालिबान का सुप्रीम कोर्ट मुल्ला रेडियो के हेडक्वॉर्टर से ही चलता था. इस कोर्ट का फैसला आखिरी होता था, और वो फैसला सब पर लागू था. चाहे वो कबीलाई जनता हो या फिर तालिबानी लड़ाकू. तालिबान की सबसे बड़ी जेल भी यहीं थी. सजायाफ्ता कैदियों को यहीं रखा जाता था. किसी कैदी पर कोड़े बरसाने हों या फिर बर्बर सजा देनी हो इस जेल में सारे बंदोबस्त थे. कई कैदी तालिबान की ज्यादती के शिकार हुए. कितने मारे गए इसका कोई हिसाब नहीं है. तालिबान का बैंक भी इसी हेडक्वॉर्टर में था. लोगों से वसूले गए पैसों का हिसाब-किताब यहीं रखा जाता था. किसे कितना पैसा देना है किस ऑपरेशन में कितना पैसा जाना है सब-कुछ यहीं तय होता था. पैसों के लेन-देन का फैसला खुद फजलुल्लाह ही करता था.

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स्वात नदी के किनारे था हेडक्वार्टर
इमामडेरी हेडक्वॉर्टर को 2004 में स्वात नदी के किनारे बनाया गया था. इस पर करीब 1 करोड़ रुपए लगे. ये पैसे लोगों ने दान के तौर पर दिए थे. उस वक्त काफी सोच-समझ कर स्वात नदी का इलाका चुना गया था. ये इलाका सुरक्षा के लहाज़ से भी काफी अहम था. यहां से दूर-दूर तक नजर रखी जा सकती थी. प्रशासन के ख्याल से भी इसकी काफी अहमियत थी. यहां से पूरे स्वात के ऑपरेशन का कमान संभाला जा सकता था. सुरक्षा के लिहाज से भी फजलुल्लाह ने इस इलाके को चुना था. क्योंकि ये इलाका चारों ओर से कबायलियों से घिरा है. कबायलियों के बीच तालिबान की अच्छी पैठ थी इसलिए ये ज्यादा महफूज था. इमामडेरी का ये हेडक्वॉर्टर फजलुल्लाह के ससुर सूफी मोहम्मद को भी काफी पसंद था. 2007 में ये सूफी मोहम्मद के कब्जे में था. बाद में पाक आर्मी से समझौते के बाद सरकार ने इसे सूफी को ही सौंप दिया. सूफी मोहम्मद ने इसे फिर अपने दामाद फजलुल्लाह को सौंप दिया.

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