जल्लीकट्टूः परंपरा का 'खूनी खेल', पिछले 20 सालों में 200 लोगों की मौत

जल्लीकट्टू दो लफ्ज़ों से मिलकर बना ये खेल तमिल लोगों के लिए बहुत मायने रखता है. जली यानी सिक्का और कट्टू यानी बांधना. रिवाज के मुताबिक इंसानों और बैलों के बीच होने वाले इस खेल में पहले इन नुकीले सींगों पर सिक्कों की एक छोटी-सी थैली बांधी जाती थी.

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ये परम्परा कई बार कई लोगों की जान भी ले लेती है (फोटो- GettyImages) ये परम्परा कई बार कई लोगों की जान भी ले लेती है (फोटो- GettyImages)

शम्स ताहिर खान / परवेज़ सागर

  • नई दिल्ली,
  • 16 जनवरी 2020,
  • अपडेटेड 8:25 PM IST

आस्था और विश्वास में रहने वाले चमत्कार को नमस्कार करते हैं. इसमें लॉजिक में जाने की ज़रूरत नहीं होती. अगर लॉजिक में गए तो दो बातें होंगी. या तो नास्तिक करार दे दिए जाएंगे या फिर आपकी जान को ही खतरा हो जाएगा. नास्तिक करार दिए गए तो फिर भी गनीमत मानिए. मगर जान को खतरा हुआ तो फिर दो बातें होंगी. या तो आप डर के खामोश हो जाएंगे. या फिर जान हथेली पर ले लेंगे. डर के खामोश हो गए तो ठीक. मगर जान हथेली पर लेने की नौबत आई तो फिर फायदा क्या. जान तो वो भी परंपरा के नाम पर हथेली पे ले रहे हैं, जिन्हें आप गलत कहने की कोशिश कर रहे हैं.

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तमिलों के अहम है जल्लीकट्टू

जल्लीकट्टू दो लफ्ज़ों से मिलकर बना ये खेल तमिल लोगों के लिए बहुत मायने रखता है. जली यानी सिक्का और कट्टू यानी बांधना. रिवाज के मुताबिक इंसानों और बैलों के बीच होने वाले इस खेल में पहले इन नुकीले सींगों पर सिक्कों की एक छोटी-सी थैली बांधी जाती थी. हालांकि अब बैलों को सिर्फ काबू करने वाले को ही जीता हुआ मान लिया जाता है.

मौत का खेल

जल्लीकट्टू दरअसल बैल के साथ मौत के खेल का नाम है. एक ऐसा खेल जहां हर पल जान जाने का खतरा होता है. गुस्से से भरे हुए सैकड़ों बैल, अपनी सींगों को इंसान के पेट में घुसाने के लिए एक दरवाजे के पीछे बंद होते हैं. और दरवाजे के दूसरी तरफ लोगों की भीड़ बैल को अपने पास बुलाने के लिए तरह-तरह के जतन करती है. दरवाजा खुलता है और शुरू हो जाता है ये खेल.

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जल्लीकट्टू के दिवाने हैं लोग

मोटे तौर पर इसे बुल फाइट कहा जा सकता है लेकिन तमिलनाडु की तारीख और परंपरा में इसकी काफी अहमियत है. यूं समझिए की दक्षिण भारत में पोंगल पर मशहूर कई प्रथाओं में से एक है जल्लीकट्टू. तीन दिनों तक खेले जाने वाले इस खेल का आयोजन यूं तो अब कई जगहों पर होता है. लेकिन सबसे बड़े पैमाने पर इसे मदुरै में ही खेला जाता है. कहतें है कि इसकी शुरुआत भी यहीं से हुई थी. अब अगर इस खेल के पीछे लोग दीवाने हुए जा रहे हैं. तो ये जानना ज़रूरी है कि आखिर इसे खेला कैसे जाता है.

तीन बैल एक इंसान और जानलेवा चुनौती

खेल दरअसल ऐसा है कि इसमें बैल इंसान को और इंसान बैल को ललकारता है. पहले एक-एक करके तीन बैलों को छोड़ा जाता है. जो गांव के सबसे बूढ़े बैल होते हैं. इन्हें कोई नहीं पकड़ता क्योंकि ये गांव की शान माने जाते हैं. मगर इसके बाद शुरु होता है जल्लीकट्टू का असली खेल. दरवाज़ा खुलते ही बेकाबू होकर बैल भागना शुरू करते हैं और सैकड़ों की तादाद में लोगों की भीड़ उसके पीछे भागने लगती है.

कोई बैल का सींग पकड़ता है तो कोई बैल का पैर पकड़ता है. एक बैल पर सैकड़ों लोगों की भीड़ कुछ इस तरह टूटती है जैसे ये भीड़ खुद को बैल से ज़्यादा शक्तिशाली साबित करना चाहती हो. और इनमें से जो भी फुर्ती और मुस्तैदी दिखाकर बैल को चंद सेकेंड के लिए भी रोकने में कामयाब हो जाता है. उसे ही सिकंदर मान लेते हैं. ज़ाहिर है अगर ऐसी दीवानगी है तो इसका इनाम भी बड़ा होता है. जीतने वाले का कैश प्राइज़ लाखों रुपए तक पहुंच जाता है.

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पोंगल के दिन होता है जल्लीकट्टू

उत्तर भारत में जब मकर संक्राति मनाई जा रही होती है. तो दक्षिण भारत में उसे पोंगल कहते हैं. और इसी दिन ये खेल खेला जाता है. इस मौके के लिए बैलों को खास तरह की ट्रेनिंग दी जाती है. उनकी सीगों को तेज़ और पैना बनाने के लिए उन्हें जमीन में घिसा जाता है. ताकि फिर खेल के दौरान उनके सामने कोई जियाला ही आ सके.

आगे इंसान, पीछे बैल

बेकाबू बैल जब लोगों के पीछे दौड़ने लगता है. तो कई बार लोगों को अपने सींग से उठाकर फेंक देता है. इस भगदड़ में तो कुछ बैलों के पैरों के नीचे कुचल भी जाते हैं.. मगर ये खेल किसी के लिए नहीं रुकता. माहौल ऐसा बना दिया जाता है कि बैल के पास भागने के अलावा कोई चारा बचता नहीं. और उनका इस तरह बदहवासी में भागना ही इंसान के लिए खेल बन जाता है. इस बात की परवाह किए बिना कि ये भिड़ंत कई बार जानलेवा भी हो जाती है.

मौत के आंकड़े

आंकड़े भी इस बात की गवाही देते हैं कि परंपरा के नाम पर खेला जाने वाला ये खेल कितना खतरनाक है. अगर हम इस परम्परा से जुड़े आंकड़ों पर नजर डालें तो साल 2010 से 2014 के बीच 17 लोगों ने इस खेल के दौरान अपनी जान गवाई. अगर हम पिछले 20 वर्षों की बात करें तो अभी तक इस खेल में 200 लोगों की मौत हो चुकी है. दुख बात ये है कि मरने वालों में कम उम्र के बच्चे भी शामिल हैं.

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रोमांच के नाम पर अत्याचार

सब कुछ जानते भूझते हुए भी लोग न सिर्फ इस खेल को खेल रहे हैं बल्कि इसमें रोमांच भरने के लिए बेजुबानों पर अत्याचार भी किया जाता है. ये तस्वीरें उन बैलों पर अत्याचार की ही हैं. बैल ज्यादा आक्रामक हो और खेल में जोश भरा जा सके इसलिए भीड़ पहले से तैयारी कर लेती है. बेज़ुबानों के नाजुक अंगों पर मिर्च या जहरीली चीज लगाई जाती है. ताकि बैल गुस्से में आए और तेज दौड़ सके. कभी कभी तो बैलों की पीठ पर पटाखा भी लगा दिया जाता है.

बैल के दर्द से खुश होते हैं दर्शक

बैल दर्द से जितना छटपटाता है, लोगों को उतना ही मजा आता है. दर्द से तड़पते बैल की यही बेबसी लोगों के लिए खेल बन जाती है. इनके साथ इंसान भी जानवर से बदतर सलूक करता है. हालांकि इस खेल में जिसका बैल तेज़ दौड़कर लोगों को ज्यादा नुकसान पहुंचाता है. और जिसके बैल को कोई भी काबू नहीं कर पाता है. उसे सबसे ज्यादा नंबर मिलते हैं. जिसका बैल जीतता है गांव में उसका कद बढ़ा हुआ माना जाता है.

जल्लीकट्टू या कहें देसी बुल फाइट के खिलाफ सिर्फ भारत में ही आवाज़ नहीं उठती है. बल्कि बुल फाइटिंग के लिए पूरा इटली और स्पेन भी बदनाम है. मौत के इस खेल को बंद कराने के लिए यहां भी काफी कोशिशें की गईं. लेकिन ये खेल वहां भी परंपरा के नाम पर अभी भी जारी है.

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