US-Iran Deal Inside Story: ट्रंप ने खाड़ी देशों के साथ कर दिया खेल, अब 19 जून को ईरान से समझौते को लेकर क्या होगा?

अमेरिका और ईरान के बीच अंतिम सहमति से पहले आर्थिक पैकेज को लेकर मामला फंसता नजर आ रहा है. ईरान को 300 बिलियन डॉलर के संभावित रिकंस्ट्रक्शन फंड को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छिड़ गई है.

Advertisement
ईरान को कौन मुआवजा देगा, अमेरिका या खाड़ी देश? (Photo: AI Generated) ईरान को कौन मुआवजा देगा, अमेरिका या खाड़ी देश? (Photo: AI Generated)

आजतक बिजनेस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 17 जून 2026,
  • अपडेटेड 3:58 PM IST

अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध खत्म करने को लेकर आधिकारिक तौर पर 19 जून 2026 को मोहर लगने वाली है. इससे पहले दोनों देशों के बीच 14 जून को वर्चुअली सहमति बनी थी. इस सहमति के साथ कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट देखी जा रही है, अंतरराष्ट्रीय मार्केट में ब्रेंट क्रूड 80 डॉलर प्रति बैरल से नीचे फिसल गया है. 

Advertisement

दरअसल, फरवरी में जब दोनों के बीच संघर्ष शुरू हुआ, तो ईरान ने वैश्विक व्यापार के सबसे महत्वपूर्ण रास्ते होर्मुज को ब्लॉक कर दिया था, जिससे दुनिया के तमाम देशों को आर्थिक तौर पर भारी नुकसान हुआ है. लेकिन अब इसी शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में दोनों देश युद्ध खत्म करने के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करेंगे. 

समझौते के मुख्य शर्तें कुछ इस प्रकार हैं-
सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाइयों को तुरंत और स्थायी रूप से रोकने पर सहमति बनी है. वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी राहत यह है कि ईरान ने होर्मुज रूट को सभी देशों के लिए खोल दिया है. 

लेकिन दोनों देशों के बीच अंतिम सहमति से पहले आर्थिक पैकेज को लेकर मामला फंसता नजर आ रहा है. ईरान को 300 बिलियन डॉलर के संभावित रिकंस्ट्रक्शन फंड को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छिड़ गई है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भले ही सार्वजनिक रूप से यह कह रहे हैं कि अमेरिका ईरान को एक डॉलर भी नहीं देने वाला, लेकिन अंदरखाने चल रही चर्चाओं से संकेत मिल रहे हैं कि वॉशिंगटन एक नई रणनीति पर काम कर रहा है. इस रणनीति के तहत ईरान को आर्थिक राहत तो दी जाएगी, लेकिन उसका पूरा बोझ खाड़ी देशों के सिर पर डाला जा सकता है.

Advertisement

लपेटे में खाड़ी देश

दरअसल, ईरान को 300 बिलियन डॉलर का फंड दिए जाने की खबर को ट्रंप ने फेक करार दिया है. लेकिन अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance ने साफ संकेत दिया है कि अगर ऐसा कोई फंड बनता है, तो उसका पैसा अमेरिकी टैक्सपेयर्स नहीं, बल्कि खाड़ी देशों से आएगा.

जानकार बता रहे हैं कि इसके पीछे भी ट्रंप की अपनी चाल है. अमेरिका एक तरफ खुद को शांति दूत के तौर पेश कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ आर्थिक जिम्मेदारी अपने ऊपर लेने से बचना चाहता है. अमेरिका की कोशिश यह दिखाने की है कि अगर खाड़ी देशों को क्षेत्रीय स्थिरता चाहिए, तेल व्यापार के लिए होर्मुज को खुला रखना है, तो कीमत उन्हें इसकी कीमत चुकानी होगी. 

विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका को इस रणनीति में कई फायदे दिख रहे हैं. पहला- अगर खाड़ी देशों से पैसा आता है, तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा. दूसरा-  अमेरिका खुद को मध्य पूर्व में शांति स्थापित करने वाले देश के रूप में पेश कर सकेगा. तीसरा- इंफ्रा डेवलप करने के रास्ते अमेरिकी और पश्चिमी कंपनियों को ईरान के बाजार में प्रवेश का मौका मिल सकता है. 

जानकार बता रहे हैं कि 300 बिलियन डॉलर का फंड सीधे ईरानी सरकार को कैश के रूप में नहीं दिया जाएगा, बल्कि infrastructure, energy, ports, transport और industrial rebuilding projects में निवेश के तौर पर इस्तेमाल हो सकता है. यानी तकनीकी रूप से अमेरिका यह कह सकेगा कि उसने ईरान को मुआवजा नहीं दिया, बल्कि प्राइवेट इंवेस्टमेंट के जरिये इंफ्रा को तैयार किया गया. 

Advertisement

अमेरिकी राजनीति में मुआवजे को लेकर बहस
हालांकि इस पूरी योजना को लेकर अमेरिकी राजनीति में भी सवाल उठ रहे हैं. कई रिपब्लिकन नेताओं ने पूछा है कि आखिर ईरान को इतनी बड़ी आर्थिक राहत क्यों दी जाए, जबकि उसी ईरान पर वर्षों से प्रतिबंध लगाए गए थे. दूसरी तरफ खाड़ी देशों में भी चिंता है कि कहीं यह फंड उनके ऊपर नई आर्थिक जिम्मेदारी न बन जाए. 

फिलहाल स्थिति पूरी तरह साफ नहीं है, क्योंकि अंतिम समझौते का आधिकारिक दस्तावेज अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है. लेकिन इतना तय माना जा रहा है कि ट्रंप प्रशासन ऐसा रास्ता तलाश रहा है, जिसमें अमेरिका को राजनीतिक फायदा मिले, मध्य पूर्व में तनाव कम हो और आर्थिक बोझ किसी और के हिस्से में चला जाए. हालांकि इस समझौते के बाद युद्ध भले ही थमता दिख रहा हो, लेकिन लेबनान फ्रंट को लेकर अभी भी तनाव है. 

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »