LIC ने 62 साल में आम आदमी का जो भरोसा कमाया, क्या अब डगमगा जाएगा वो?

भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) एक ऐसा नाम है, जिस पर देश के 25 करोड़ से भी ज्यादा लोग भरोसा करते हैं. बीमा कारोबार में कई कंपनियां काम करती हैं, लेक‍िन 62 साल बाद भी सारी स्पर्धाओं के बावजूद LIC बीमा पॉलिसी देने के मामले में नंबर वन बनी हुई है.

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प्रतीकात्मक तस्वीर प्रतीकात्मक तस्वीर

विकास जोशी

  • नई दिल्ली,
  • 28 जून 2018,
  • अपडेटेड 6:10 PM IST

भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) एक ऐसा नाम है, जिस पर देश के 25 करोड़ से भी ज्यादा लोग भरोसा करते हैं. बीमा कारोबार में कई कंपनियां काम करती हैं, लेक‍िन 62 साल बाद भी सारी स्पर्धाओं के बावजूद LIC बीमा कारोबार में नंबर वन बनी हुई है. अब एलआईसी के कर्ज में डूबे आईडीबीआई बैंक को खरीदने की चर्चा चल रही है. इस चर्चा से आम आदमी के भी कान खड़े हो गए हैं और ऐसा होने की वजह भी है.

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भारतीय संसद ने 1956 में लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन एक्ट पास किया. इस एक्ट के पास होने के बाद 1 सितंबर 1956 को भारतीय जीवन बीमा निगम नाम से बीमा कंपनी खड़ी हुई. 1956 से देश की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ बीमा के क्षेत्र में भी कई चीजें बदली हैं. इस क्षेत्र में कई नये प्लेयर्स शामिल हुए हैं, लेक‍िन स्पर्धा के इस माहौल में भी एलआईसी सबसे आगे बनी हुई है.

बीमा कारोबार में कई बड़ी निजी कंपनियां भी उतरी हुई हैं, लेकिन उसका असर एलआईसी पर दूर-दूर तक होता नहीं दिख रहा है. पूरे बीमा कारोबार में एलआईसी अभी भी 69 फीसदी की भागीदारी रखती है. वित्त वर्ष 2017-18 में एलआईसी ने नये कारोबार में 8 फीसदी की ग्रोथ हासिल की है.

एलआईसी की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक कंपनी के देशभर में 2048  शाखाएं हैं. 113 डिविजनल ऑफ‍िस हैं, 8 जोनल कार्यालय हैं. 1381 सैटेलाइट ऑफ‍िस और कॉरपोरेट ऑफ‍िस हैं. देशभर में फैले अपने इस नेटवर्क के जरिये एलआईसी हर तरह का बीमा देश के आम नागरिक को मुहैया कराती है.

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एक आम आदमी जब भी पैसे बचाने या फिर बीमा खरीदने की सोचता है, तो उसके दिमाग में सबसे पहले एलआईसी का नाम आता है. दरअसल लोगों को भरोसा है कि एलआईसी में लगाया उनका पैसा कभी डूबेगा नहीं. इसलिए देश का आम आदमी दूसरी बीमा कंपनियों के पास जाने की बजाय एलआईसी का रुख करना सबसे ज्यादा पसंद करता है.

एलआईसी आम आदमी के लिए एक भरोसेमंद बीमा कंपनी ही नहीं है, बल्क‍ि यह उनके रोजगार का भी एक अवसर है. लोगों का भरोसा इस पर और भी इसलिए बढ़ जाता है, क्योंकि यह एजेंटों की भर्ती करने के मामले में भी पीछे नहीं रहती. 2008 में आई मंदी के दौर की ही बात करें, तो इस समय जहां ज्यादातर कंपनियां अपने कर्मचारियों को नौकरी से निकाल रही थीं. वहीं, एलआईसी लगातार एजेंटों की भर्ती करने पर लगा हुई थी. 2008 से 2010 के बीच जहां निजी कंपनियों के पास 9.5 लाख एजेंट्स थे. एलआईसी के पास इस दौरान 11.31 लाख एजेंट थे.

भारतीय जीवन बीमा निगम के आईडीबीआई बैंक को खरीदने की चर्चा चल रही है. इस डील से चिंता इसलिए जताई जा रही है क्योंकि इस बैंक का एनपीए अथवा गैर-निष्पादित संपत्त‍ि सरकारी बैंकों में सबसे ज्यादा है. ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि कहीं इसका असर एलआईसी के कारोबार पर न पड़े. क्योंकि अगर ऐसा होता है, तो इसका थोड़ा बहुत असर एलआईसी के पॉलिसीधारकों पर भी हो सकता है.

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अब देखना होगा कि कर्ज में डूबे बैंक को एलआईसी की तरफ से खरीदा जाना आईडीबीआई बैंक के लिए कितना फायदेमंद साबित होता है और निगम के पॉलिसीधारकों पर इसका कितना और कैसा असर देखने को मिलता है.

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