ओडिशा की विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा आज से शुरू हो रही है. रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा सभी अपने-अपने रथ पर सवार होते हैं और श्रद्धालु उनकी रस्सी खींचते हुए उन्हें देवी गुंडिचा के मंदिर तक ले जाते हैं. रथों को भले ही भक्तों-श्रद्धालुओं द्वारा खींचा जाता है, लेकिन चूंकि यह रथ हैं इसलिए इसमें घोड़े भी जुते हैं. खास बात है कि यह घोड़े सिर्फ नाममात्र के नहीं होते हैं , बल्कि इनके नाम भी होते हैं.
जगन्नाथ प्रभु के घोड़े उनके ही नाम के पर्याय
भगवान जगन्नाथ के रथ को प्रतीक तौर पर चार घोड़े जुड़े होते हैं. ये चारों घोड़े सफेद रंग हैं. इनके नाम हैं शंख, बालाहक, श्वेत और हरिदाश्व हैं. पहले घोड़े को शंख नाम भगवान के पांचजन्य शंख से मिला है. यह घोड़ा शुरुआत का प्रतीक है और इसे पॉजिटिवटी लाने वाला माना जाता है. बालाहक तेज दौड़ने वाला घोड़ा है.
श्वेत, सौम्यता का प्रतीक है और हरिदाश्व संकट को दूर करने वाला है. इनके चारों को ये नाम भगवान के खुद के अपने चार गुणों से लिए गए हैं. जिनमें वह सत्य, व्रत, सौम्य और ऊर्जा को न सिर्फ नियंत्रित करके रखते हैं, बल्कि जीवन को भी इसी के आधार पर सुचारु रूप से चलाते हैं. ये चारों घोड़े भगवान के नंदीघोष रथ में जुते होते हैं.
बलभद्र के रथ में भी हैं चार घोड़ों
भगवान के बड़े भाई बलभद्र के रथ में भी चार घोड़े हैं. उनके नाम हैं तीव्र, घोर, दिघ्श्रमा और स्वमनवा. तीव्र घोड़ा समय की तीव्रता का प्रतीक है. घोर नाम का घोड़ा बदलाव लेकर आने वाला है. दिघ्श्रमा श्रम का महत्व बताता है और स्वमनवा 'सेल्फ कंट्रोल' की बात करता है.
देवी सुभद्रा के रथ के घोड़े भी हैं खास
देवी सुभद्रा के रथ में भी चार घोड़े हैं, लेकिन चूंकि देवी सुभद्रा नारी जाति और स्त्री शक्ति का स्वरूप हैं और स्वयं योगमाया हैं तो उनके रथ में जुते घोड़े भी स्त्री शक्ति का ही प्रतीक हैं. ये उनके नाम में भी स्पष्ट है. शायद ये घोड़े नहीं बल्कि घोड़ियां हैं. पहली घोड़ी का नाम है, रोचिका. रोचिका जीवन की रोचकता का प्रतीक है. दूसरी है मोचिका, जो इस जीवन से परे मोक्ष का प्रतीक है. तीसरी है जीता, जो विजय का प्रतीक है और चौथी है अपराजिता, जो कभी हार न मानने वाली शक्ति का प्रतीक है. तीनों ही रथ में जुते हुए घोड़े हमें जीवन से जोड़ते हैं और इसकी परिभाषा को सामने रखते हैं.
विकास पोरवाल