खाली हो गया जगन्नाथपुरी का रत्न भंडार! दर-दर भटके थे बलभद्र और श्रीकृष्ण

पुरी के भगवान जगन्नाथ मंदिर के रत्न भंडार का 48 साल बाद डॉक्टूमेंटेशन शुरू हुआ है, जिससे मंदिर के सोना-चांदी समेत कीमती रत्नों का पता चलेगा. लोककथा के अनुसार, एक बार रत्न भंडार पूरी तरह खाली हो गया था, जब देवी लक्ष्मी ने मंदिर छोड़ दिया था.

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जगन्नाथ मंदिर के खजाने की गिनती जारी है जगन्नाथ मंदिर के खजाने की गिनती जारी है

विकास पोरवाल

  • नई दिल्ली,
  • 26 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 3:41 PM IST

ओडिशा के पुरी में मौजूद भगवान जगन्नाथ मंदिर का खजाना चर्चा में है. इसे रत्न भंडार के नाम से जाना जाता है. रत्न भंडार में मौजूद संपत्ति का डॉक्टूमेंटेशन किया जा रहा है, जिससे तकरीबन 48 साल बाद ये सामने आएगा कि रत्न भंडार में कितना सोना-चांदी है. इस तरह पुरी के इस प्रसिद्ध मंदिर के खजाने को लेकर दिलचस्पी बढ़ गई है. बुधवार को दोपहर 12 बजे के बाद से शुभ मुहूर्त में रत्न भंडार में क्या-क्या और कितना है इसकी जांच शुरू की गई है. 

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लेकिन क्या आप जानते हैं कि जगन्नाथ पुरी का खजाना एक बार पूरी तरह खाली हो गया था. रत्न भंडार से सारे रत्न गायब हो गए थे यहां तक की श्रीमंदिर से सारा अनाज और वैभव भी लुट गया था. जगन्नाथ धाम में रत्न भंडार से जुड़ी यह लोककथा बहुत प्रसिद्ध है. 

क्या है रत्न भंडार की कहानी?
कहानी है कि, पुरी में निम्न जाति की महिला श्रिया रहती थी. एक बार उसने अष्टलक्ष्मी व्रत करना चाहा, पर उसे व्रत की विधि नहीं पता थी. उसने एक पुजारी से व्रत की विधि पूछी तो उन्होंने श्रिया को तुरंत मना कर दिया. इस तरह श्रिया जहां भी व्रत विधि पूछती थी, लोग उसे दुत्कार देते थे. एक दिन भूख-प्यास की मारी श्रिया व्रत की विधि पूछने के लिए भटक रही थी और इसी बीच वह चक्कर खाकर गिर पड़ी और उसके सिर से खून निकल आया. 

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भक्त के दुख में दुखी हुए भगवान
अपने भक्त की सच्ची श्रद्धा और दुख देखकर जगन्नाथ इतने दुखी हुए की उनकी भी प्रतिमा से खून निकल आया. पंडे-पुजारियों और सेवायतों ने ये देखा तो घबरा गए और पूरी पुरी में हड़कंप मच गया. ये बात राजा तक भी पहुंची तो वह समझ गया कि जरूर कहीं घोर पाप हुआ है और भगवान श्रीमंदिर छोड़कर चले गए हैं. ऐसे में राजा ने तुरंत सिंहासन त्याग दिया और उस पाप की खोज में चल पड़ा, जिसके कारण श्रीमंदिर से भगवान चले गए.

माता लक्ष्मी भरे घर के भंडार
भगवान के आदेश पर नारद मुनि ने संत का वेश बनाया और श्रिया के घर जाकर उसे व्रत की विधि समझा दी. श्रिया ने उसी विधि से व्रत किया.  शाम को वह जब आरती कर रही थी तो एक महिला घूंघट की हुई उसके घर पहुंची. लोगों की भीड़ के बीच उसने श्रिया को प्रसाद चढ़ाने के लिए एक पोटली दी. श्रिया ने उस महिला को खीर का प्रसाद दिया.

खीर खाने के दौरान महिला के चेहरे से घूंघट हट गया और जब श्रिया की नजरें उस पर पड़ीं तो वह सुध-बुध खो बैठी. श्रिया को जब सुधि आई तब तक सभी लोग जा चुके थे. उसने महिला द्वारा दी गई पोटली खोलकर देखी तो उसमें रत्न, हीरे, सोना-चांदी निकले. श्रिया समझ गई कि मां लक्ष्मी ने उस पर कृपा कर दी है, लेकिन भगवान जगन्नाथ को तो अभी ये खेल कुछ और लंबा खेलना था.

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अब जब देवी लक्ष्मी श्रिया के घर से लौटीं और श्रीमंदिर में प्रवेश करने लगीं तो बलभद्र नाराज हो गए. उन्होंने कहा कि लक्ष्मी ने एक छोटी जाति वाली के घर जाकर श्रीमंदिर का अपमान किया है. उसने वहां का प्रसाद भी खाया और अब वह प्रसाद हमें खिलाकर हमें भी भ्रष्ट करना चाहती है. बलभद्र ने जगन्नाथ जी को आदेश दिया कि लक्ष्मी से रत्न भंडार की चाबी ले लें और उन्हें श्रीमंदिर से निकाल दिया जाए.

क्यों नाराज हो गईं देवी लक्ष्मी
उधर, जब देवी लक्ष्मी ने यह सब सुना तो वह क्रोधित हो गईं और कहा कि ठीक है, अब मैं यहां नहीं रहूंगी, लेकिन आप दोनों को शाप देती हूं कि जब तक आप किसी निम्न के हाथ से भोजन नहीं कर लेते आपका भी भरण-पोषण नहीं होगा. लक्ष्मी के जाते ही श्रीमंदिर श्रीहीन हो गया. रत्न भंडार खाली हो गया. महल की चौखटों-दरवाजों और पलंग में दीमक लग गई. अनाज सड़ गया. कपड़े फट गए और यहां तक की मंदिर व्यवस्था ही चौपट हो गई. अब जगन्नाथ और बलभद्र खाने को तरसे. जब बलभद्र को भूख सताने लगी तो वे दोनों वेश बदलकर भीख मांगने लगे. 

अब दोनों भाई, जहां भी भीख मांगने जाते तो वहां सब गड़बड़ हो जाता था. बना हुआ भोजन खराब हो जाता. दाल में पानी गिर जाता. भात जल जाता. कहीं पर जाते तो चूल्हा ही नहीं जल पाता और कहीं-कहीं तो कोई द्वार ही नहीं खोलता था. इस तरह भूखे-प्यासे भटकते हुए दोनों भाइयों ने 12 वर्ष गुजार दिया, लेकिन न उन्हें जल मिला और न अन्न.

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कैसे श्रीमंदिर का लौटा वैभव
इसी तरह भटकते-भटकते वह एक बार समुद्र तट पर पहुंचे. उन्हें वहां एक भवन में वैदिक मंत्र सुनाई दिए. बलभद्र ने एक सेविका से पूछा कि, क्या यहां कोई यज्ञ हुआ है. क्या अब प्रसाद-भोजन भी मिलेगा. भिक्षा भी अच्छी मिलेगी ना? बलभद्र के इतने सवाल सुनकर सेविका ने कहा कि, आज हमारी स्वामिनी की 12 वर्षों से चली आ रही तपस्या के पूरे होने के दिन हैं. इसके बाद वह जरूर आपको भंडारा खिलाएंगी, लेकिन हमारी स्वामिनी तो नीच कुल की हैं, क्या अब भी आप भोजन करेंगे?

इस पर बलभद्र ने कहा कि नहीं हम अछूतों का नहीं खाते हैं. अच्छा सुनो, अपनी मालकिन से कह दो कि हमें सामग्री मंगवा दें हम खुद बना लेंगे. स्वामिनी जो कि खुद लक्ष्मी ही थीं, उन्होंने सामग्री तो भेज दी, लेकिन अग्नि देव को आदेश दिया कि वह चूल्हा न जलने दें, सिर्फ धुआं ही करते रहें.

अब बलभद्र जो कि सोच के बैठे थे कि आग जलाएंगे, खिचड़ी बनाएंगे और गरम-गरम खाएंगे, वह चूल्हा न जल पाने से इतना झल्लाए कि चूल्हा-मटकी, सभी कुछ फोड़ दिया और जगन्नाथजी से कहा कि, 'जगन, भोजन में क्या छोटा, क्या बड़ा. मैं तो कहता हूं कि भोजन कर लेते हैं. ऐसे तो मैं भूखा मारा जाऊंगा.' इसके बाद जगन्नाथ और बलभद्र लक्ष्मी के घर पहुंचे और वहां उन्होंने भोजन करते हुए पहचान लिया कि यह लक्ष्मी ही हैं. वह लक्ष्मी को सम्मान सहित श्रीमंदिर ले आए और इस तरह पुरी से भेदभाव भी मिटा दिया. लक्ष्मी के आने श्रीमंदिर का वैभव लौट आया और रत्न भंडार फिर से भर गए. 
 

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