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नौ साल की नववधू की कहानी 'खाता' का मंचन

बीते दिनों 17वें भारत रंग महोत्सव के तहत राजधानी दिल्ली के श्रीराम सेंटर में 'खाता' का नाट्य मंचन हुआ. रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानी पर आधारित इस नाटक का लेखन और निर्देशन राजश्री शिर्के ने किया. जबकि 19वीं शताब्दी की पृष्ठभूमि पर एक नौ साल की नववधू उमा की कहानी ने दर्शकों का मन मोह लिया.

'खाता' का नाट्य मंचन 'खाता' का नाट्य मंचन

बीते दिनों 17वें भारत रंग महोत्सव के तहत राजधानी दिल्ली के श्रीराम सेंटर में 'खाता' का नाट्य मंचन हुआ. रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानी पर आधारित इस नाटक का लेखन और निर्देशन राजश्री शिर्के ने किया. 19वीं शताब्दी की पृष्ठभूमि पर एक नौ साल की नववधू उमा की कहानी ने दर्शकों का मन मोह लिया.

नाटक की कहानी के केंद्र में उमा का चरित्र था. उमा जिसका निजी व्यक्तित्व समाज के रूढ़ि‍बद्ध नियम-कायदों की बलि चढ़ जाता है. उमा लिखना चाहती है, पढ़ना चाहती है. उमा की अभ्यास पुस्तिका से उसके भोलेपन और मासूमियत का पता चलता है. उसकी रचनात्मकता और स्वतंत्रता की कामना भी उसकी पुस्ति‍का का हिस्सा है. कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है उमा संपूर्ण भारतीय स्त्रियों की कामना लगने लगती है.

नाटक का विषय स्त्रियों को उनकी पहचान और आजादी दिए जाने पर जोर देता है. नाट्य के जरिए कलाकारों ने आज के समय में उमा जैसी बच्चि‍यों और उनके जरिए समाज के रीति-रिवाजों, बंधनों और कर्मकांडों पर आघात करने का काम किया. 'खाता' उसी नारीवादी मनोजगत की सुप्त पड़ी चीख है, जो पारंपरिक भारतीय समाज के खोखलेपन को उजागर करती है. कहानी में उमा के पढ़ने-लिखने पर रोक लगा दी जाती है, लेकिन फिर उसके मानसिक भावनाओं का विस्फोट होता है और वह कल्पना के सागर और स्त्रि‍यों के मन को चित्रित करती है.

(अभि‍षेक रंजन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिंदी भाषा अध्ययन केंद्र के छात्र हैं)

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