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सामाजिक सरोकारों से भरी राजनीतिक दृष्टि से जागरूक हैं नंद चतुर्वेदी की कविताएं

जिन अर्थों में हिंदी कविता में राजनीतिक कविता की शिनाख्त और पड़ताल होती रही है उन अर्थो से बहुत अलग हैं नंद चतुर्वेदी की कविताएं. वे लोहियावादी समाजवादी विचारों के समर्थक जरूर रहे पर विचारधारा को लेकर किसी तरह के रेजीमेंटेशन के शिकार नहीं हुए.

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नंद चतुर्वेदी की चुनिंदा कविताओं का संकलन 'हम नयी कविताएँ लिखते हैं' नंद चतुर्वेदी की चुनिंदा कविताओं का संकलन 'हम नयी कविताएँ लिखते हैं'

जिन अर्थों में हिंदी कविता में राजनीतिक कविता की शिनाख्त और पड़ताल होती रही है उन अर्थो से बहुत अलग हैं नंद चतुर्वेदी की कविताएं. वे लोहियावादी समाजवादी विचारों के समर्थक जरूर रहे पर विचारधारा को लेकर किसी तरह के रेजीमेंटेशन के शिकार नहीं हुए. हां प्रतिगामी लोकतांत्रिक शक्तियों और सामंती प्रवृत्तियों के प्रति वे लगातार जागरुक रहे. वे 'आशा बलवती है राजन' कह कर राजन्य शक्तियों से संवाद कर सकते थे तो 'गा हमारी जिन्दगी तू गा' कह कर जीवन का जश्न भी मना सकते थे. वे उत्सव के निर्मम समय का आख्यान भी लिखते रहे हैं तो पूंजी से बदलने वाले तंत्र की अधीनता पर भी दृष्टिपात करते थे. पर वे मुखर तौर पर कोई राजनीतिक कवि थे, यह मैं नहीं मानता. उन्होंने किसी तरह की राजनीति को कवि और कविता पर हावी नहीं होने दिया. बल्‍कि वे गहरे अर्थों में नीतिज्ञ कवि थे, कविता के संस्कारों से निमज्जित जहां वे कवि को किसी भी सत्ता के ऊपर समझते थे जैसी कि हमारी कवि परंपरा रही है. 
'हम नयी कविताएं लिखते हैं'- नाम से आए उनके संग्रह में इसीलिए उन अर्थों में राजनीतिक कविताएं नहीं है जिन अर्थों में हम मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, धूमिल, लीलाधर जगूड़ी, ऋतुराज, मनमोहन, विष्णु नागर, गोरख पांडे जैसे कवियों की कविताओं को लेते हैं. वे उस कवि समाज के अगुआ कवियों में रहे हैं जो 'आशा नाम नदी' कह कर घोर राजनीतिक दौर में भी आशा से च्युत होकर बैठ जाने को नहीं कहता. इसलिए वाम चिंतन की मुखरता को उन्होंने कभी अपनी अभिव्यक्तियों में शुमार नहीं किया न उस तरह लाउड ही हुए कि 'ज़मीन में गाड़ दो सरकार को' कहने की जरूरत पड़े. वे विजयदेव नारायण साही की परंपरा के कवि हैं, जिनके यहां कबीर की सी फटकार है और असमानता पर किसी जागरूक कवि की-सी खीझ भी जो उनकी कविताओं में पग-पग पर दिखती है. हां वे लोहिया के विचारों के समर्थक थे. समता के हामी थे. पर जिस तरह यह समतावादी राजनीति भी अंतत: राजनीति का शिकार होती गयी उससे वे दूर भी रहे. राजनीति के ध्वजवाहकों से उनकी कभी पटरी नहीं बैठी. 
लिहाजा उनकी कविताएं न कांग्रेस के शासनकाल में न उसके बाद किसी आरामगाह में सोई खोयी रहीं बल्कि तभी तो वे 'उत्सव का निर्मम समय' कह कर उस दौर के शासन को लांछित कर रहे थे. जाहिर है कि ऐसी तीखी तल्ख अभिव्यक्ति उस दौर के अनेक कवियों की रही. कैलाश वाजपेयी जब 'सिल सी गिरी है स्वतंत्रता और पिचक गया है पूरा देश' कह कर आजादी की व्यर्थता पर प्रहार कर रहे थे और धूमिल आजादी को 'तीन थके हुए रंगों का नाम' दे रहे थे, तब नंद जी उस दौर में भी 'यह समय मामूली नहीं' कहते हुए एक ऐसा सपना देख रहे थे. वह लिख रहे थे-
जमीन इस तरह तो प्यासी नहीं रहेगी... 
इस तरह तो नहीं देखेंगे लोग
ऋतुओं का सर्वनाश
इस गैर मामूली समय में
इतिहास के बाद...किवाड़ खुलेंगे
पूरे के पूरे तालाब में
सहस्रों कमल, तैरते हुए
कहते हुए, फैल जाएंगे.
यह उस कमल का सपना नहीं है जो आज पूरे परिदृश्य  में छाया है- यह उस अरुण कमल का सपना है जिसे कभी एक बड़े कवि ने अपनी कविता का रूपक बनाया था. आज तो जो सांप्रदायिकता का कमल खिल उठा है चहुंतरफ लगता है कवि के इस श्लेष में आज की कमलोन्मुखी राजनीति का रूपक छिपा है. 
तथापि, वे उस अर्थ में राजनीतिक कवि न होते हुए भी समाज की विडंबनाओं के कवि तो हैं ही जो राजनीति-निर्मित समाज की कारगुजारियों की खबर लेते हैं. नंद चतुर्वेदी के अब तक के संग्रहों- वे सोये तो नहीं होंगे, ईमानदार दुनिया के लिए, उत्सव का निर्मम समय, शब्द संसार की यायावरी, गा हमारी जिन्दगी तू गा और आशा बलवती है राजन् -से गुजरते हुए यह तो कहा ही जा सकता है कि वे समता, न्याय, अपरिग्रह, सौहार्द के कवि थे. चतुर्वेदी राजस्थान में अरसे से बस गए थे. इसलिए वहां के इतिहास और अतीत की सामंतवादी स्त्री विरोधी प्रवृत्तियों की आलोचना उनकी कविताओं में झीने झीने ढंग से उतरती रही. एक कवि जैसे अपने समय समाज और व्यवस्था से संवाद करता है वैसा ही उनकी कविताएं भी करती हैं. पर हर कवि अपने टूल्स से राजनीति और समाज को देखता, रचता है. वह किसी राजनीतिक दल का प्रवक्ता नहीं होता, इसलिए देखें कि गैरकांग्रेसवाद के दौर में हर कवि सत्ता  के विपक्ष में था. यह आजादी के मोहभंग की उपज था. साठोत्तर मोहभंग किस कवि में न था? वह नंद में भी था. गो कि तब राजस्थान के कवि हिंदी की मुख्यधारा के कवि न बन सके थे. आज भी नंद बाबू को हिंदी आलोचना हाशिए में डाल कर चलती है. कोई बताए कि आखिर क्यों न वे सातवें दशक के कवि बन सके, न आठवें दशक के कवियों में उनकी गणना हुई? आठवें दशक में भी केवल चार-पांच नाम ही चमकते रहे आलोचनाओं, समीक्षाओं में, अनेक कवि छूटे रहे जिनका अवदान आठवें दशक के किसी कवि से कम नहीं. अभी हाल ही में दिवंगत हुए ओम भारती वामचिंतन के मुखर कवियों में रहे, आठ नौ संग्रह उनके आए हैं, उन्होंने अपने वक्त की बेहतरीन तल्ख राजनीतिक सामाजिक कविताएं लिखी हैं, मध्यप्रदेश की ही कवि परंपरा में वे भगवत रावत, राजेश जोशी, विनय दुबे के बाद की पीढ़ी के तेजस्वी कवि रहे हैं, पर उनकी कोई खास चर्चा नहीं हुई. कुछ ऐसा ही नंद जी के साथ हुआ. लोकतांत्रिक समाजवादी विचारधारा के कवि होते हुए भी नंद बाबू को चर्चा में आने के लिए एक लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ी तथा वे रघुवीर सहाय, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कवि परंपरा के कवि होते हुए भी वह गौरव न पा सके. 
अब जब उनकी राजनीतिक कविताओं की एक तालिका हमारे सम्‍मुख है तथा हिमांशु पंड्या ने मेहनत कर ऐसी कविताओं का चयन हमारे सम्‍मुख रखा है, हमें नंद चतुर्वेदी को विचारधारा और राजनीति के पहलुओं में जाकर उनकी ऐसी कविताओं की मीमांसा करनी चाहिए. नंदजी समाजवादी विचारधारा के कवियों में हैं. कोटा, राजस्थान में पढ़ाई करते हुए ही वे समाजवादियों के संपर्क में आ गए थे. जयप्रकाश नारायण और डॉ राममनोहर लोहिया जैसे विचारकों के चिंतन से वे अत्यधिक प्रभावित थे. आजादी के तत्काल बाद देश में खासा राजनीतिक गहमागहमी थी. देश में नए आार्थिक परिदृश्य के निर्माण के स्वप्न देखे जा रहे थे. नंद जी जैसे समाजवादियों का यह मानना था कि देश का नया आार्थिक इतिहास गांवों के किसान ही लिख सकते हैं. वे ही देश के निर्बलों और वंचितों का भाग्य बदल सकते हैं. लिहाजा उनकी रचनाओं में समाजवादी विचारधारा की अनुगूंज भी सुनाई देने लगी. समाजवादियों के मुखपत्र जयहिंद में उनकी रचनाएं स्थान पाने लगी थीं. गाँधी जी भी आखिरी आदमी के उद्धार की बात करते थे. समाजवादियों का लक्ष्य भी यही था. जीवन के यथार्थ की अपनी भाषा होती है. नंद जी की उन्हीं दिनों की एक रचना हैः
मधु के प्यालों में पलते हो वैभव के मादक दीवानों, 
जननी के भामाशाहों जननी की कसकें पहचानो. 
नंद चतुर्वेदी उन समाजवादियों के हमख्याल थे जिनका सपना केवल नए औद्योगिक भारत के निर्माण का नहीं, बल्कि शोषण मुक़्त व आत्मनिर्भर समाज की रचना का था. यह और बात है कि समाजवादियों की इस पीढ़ी को देश के नव निर्माण के अपने मॉडल को लागू करने का न तो वक़्त मिला, न संसाधन. लिहाजा समता और सप्तक्रांति के आदर्श लोहिया और जयप्रकाश नारायण के बाद निष्प्रभ पड़ गए. नंद चतुर्वेदी हिंदी के उन कुछ विरल लोगों में हैं, जिनके भीतर समाजवादी आस्था की चिनगारियां मृत्युपर्यंत जीवित रहीं वे - जो है उससे बेहतर चाहिए - का मुक्तिबोधीय स्वप्न देखते रहे. 
अपनी संस्मरणात्मक पुस्तक 'अतीत राग' में नंद जी ने लिखा हैः नेहरू बहुत से मोरचों पर क्रांतिकारी संकल्पों को रूपाकार नहीं दे सके, लेकिन उनकी स्वीकॄति से एक प्रबल और कठोर नौकरशाही का पुनर्स्थापित होना सबसे चिंताजनक था. वे कहते हैं कि यदि वे बार-बार और लगातार फिसलते नहीं तो यह देश आज की निराशा और अकर्म की कठिन यातनाओं के बीच से न गुजरता. आज न उनके समय के राजनीतिक मूल्य बचे हैं, न मानवीय मूल्य. चौतरफा भौतिकतावाद और बाजारवाद का बोलबाला है. मनुष्य के जीवन और कर्म में फासला लगातार बढ़ता गया है. किन्तु फिर भी नंद जी उन थोड़े से आशावादी कवियों में रहे हैं जिनके भीतर नई दुनिया को लेकर एक नया विश्वास रहा, जिसके बलबूते वे कह सके: आशा बलवती है राजन! 
हम नयी कविताएं लिखते हैं- उनके राजनीतिक सामाजिक सरोकारों की बानगी देने वाला चयन है. इनमें कितनी राजनीति है, कितनी नीति, कितना समाज और कितना समाजवाद यह पड़ताल का विषय है. किन्तु इतना तो तय है कि जब-जब सामाजिक सरोकारों की बात होगी, नंद जी की कविताएं सिर उठा कर खड़ी मिलेंगी. 
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पुस्तक: हम नयी कविताएं लिखते हैं
रचनाकार: नंद चतुर्वेदी
विधाः कविता
भाषाः हिंदी
प्रकाशक: वाग्देवी प्रकाशन
पृष्ठ संख्याः 150
मूल्य: 199 रुपए

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