scorecardresearch
 

मंज़ूर एहतेशाम की याद और उनकी कहानीः तमाशा

मुस्लिम समाज और उसके बहाने भारतीय जनजीवन के अनेक देखे-अनदेखे पहलुओं के चितेरे कथाकार मंज़ूर एहतेशाम भी कोरोना में चले गए. पर 'सूखा बरगद' जैसे क्लासिक उपन्यास से हिंदी के पाठकों के बीच वह हमेशा याद किए जाएंगे. उनकी याद को समर्पित उनकी एक बेहतरीन कहानी

मंज़ूर एहतेशामः मध्यवर्गीय मुस्लिम समाज की धड़कन का चितेरा मंज़ूर एहतेशामः मध्यवर्गीय मुस्लिम समाज की धड़कन का चितेरा

भारतीय साहित्य को 'सूखा बरगद' जैसा कालजयी उपन्यास उपलब्ध कराने वाले मशहूर कथाकार मंज़ूर एहतेशाम नहीं रहे. उनका जाना हिंदी साहित्य जगत की एक बड़ी क्षति है. 3 अप्रैल, 1948 को भोपाल में जन्मे मंज़ूर एहतेशाम हमारे समय के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथाकार थे. उनकी रचनाओं में हमारा दौर और उसमें पल रहे मुस्लिम समाज की बानगी इतनी साफ झलकती है कि उससे बेअसर नहीं रहा जा सकता. एहतेशाम के घर वाले चाहते थे कि वे इंजीनियर बनें, पर उन्हें बनना था लेखक. सो इंजीनियरिंग की पढ़ाई अधूरी छूट गई. पहले दवा बेचने का काम किया और फिर फ़र्नीचर बेचने लगे. बाद में इंटीरियर डेकोर का काम भी किया. पर लेखन हर दौर में जारी रहा. उनकी पहली कहानी 'रमज़ान में मौत' साल 1973 में छपी. पहला उपन्यास 'कुछ दिन और' साल 1976 में प्रकाशित हुआ. लेखन के लिए श्रीकांत वर्मा स्मृति सम्मान, वागीश्वरी पुरस्कार, पहल सम्मान, वीर सिंह देव पुरस्कार और पद्मश्री से अलंकृत हो चुके एहतेशाम के लेखन की खासियत यह थी कि उनकी रचनाएं किसी चमत्कार के लिए व्यग्र नहीं थीं, बल्कि अनेक अन्तर्विरोधों और त्रासदियों के बावजूद 'चमत्कार की तरह बचे जीवन' का आख्यान रचती रहीं.

सही मायने में कहें तो मंजूर एहतेशाम मध्यवर्गीय भारतीय समाज के द्वन्द्वात्मक यथार्थ को उल्लेखनीय शिल्प में अभिव्यक्त करने वाले कथाकार थे. वह परिचित यथार्थ के अदेखे कोनों-अंतरों को अपनी रचनाशीलता से अदूभुत कथानक में बदल देने में माहिर थे. शायद यही वजह थी कि हमारे देश का मध्यवर्गीय मुस्लिम समाज उनकी कहानियों में पूरी शिद्दत से समूची चिंता, चेतना और प्रमाणिकता के साथ प्रकट होता रहा. स्थानीयता उनके कथानक का मूल स्वभाव रहा, तो व्यापक मनुष्यता उनका निष्कर्ष. यही वजह है कि 'दास्तान-ए-लापता', 'कुछ दिन और', 'सूखा बरगद', 'बशारत मंजिल', 'पहर ढलते' जैसे चर्चित उपन्यासों और कथा संकलन 'तसबीह', 'तमाशा तथा अन्य कहानियां' से वह हमारे समाज का बेहतर चित्र खींचते हैं. कथाकार सत्येन कुमार के साथ मिलकर उन्होंने 'एक था बादशाह' नाटक भी लिखा. राजकमल प्रकाशन समूह के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी, जिनके यहां से एहतेशाम की सबसे चर्चित कृति 'सूखा बरगद' सहित तमाम दूसरी पुस्तकें छपी थीं ने मंज़ूर एहतेशाम के निधन को साहित्य जगत की अपूरणीय क्षति बताते हुए कहा कि एहतेशाम हिंदी के उन चुनिंदा रचनाकारों में से थे, जिन्होंने अपने लेखन के जरिये मुस्लिम समाज और उसके बहाने भारतीय जनजीवन के अनेक देखे-अनदेखे पहलुओं को सामने रखा. उनका जाना साहित्य जगत, हमारे समाज और हमारे समूह की व्यक्तिगत क्षति है.

हिंदी साहित्य के इस मशहूर कलमकार को नमन करते हुए राजकमल प्रकाशन से ही वर्ष 2019 में छपी 'मंजूर एहतेशाम की संपूर्ण कहानियां' संकलन में शामिल यह कहानी.

कहानीः तमाशा

(दिनेश जुगरान के लिए)

याद करता हूं तो कोई क़िस्सा-कहानी लगता है: ख़ुद से बहुत दूर और अविश्वसनीय-सा. यह कमाल वक़्त के पास है कि असलियत को क़िस्से-कहानी में तब्दील कर दे. ख़ुद सकीना आपा भी तो अपनी आंखें मटकाकर ऐसा ही कुछ कहा करती थीं कि सब तमाशा है, लेकिन उनकी तमाशे की परिभाषा, अपने वक़्त और ज़माने के लिहाज़ से, क्या रही होगी, अन्दाज़ा लगाना मुश्किल है.
ख़ुद मैंने सकीना आपा को जब देखा था, वह उनकी अधेड़ उम्र थी जिसमें अच्छे-ख़ासे तमाशों में नायक-नायिका की भूमिका निभानेवाले भी सहायक पात्र बनने पर मजबूर हो जाते हैं. वह थीं, और उनकी पांच औलादें-चार लड़कियां और एक लड़का, और संकरी गली में मस्जिद के पिछवाड़े बनी सात कोठरियों में से एक कोठरी जिसके आगे छोटा-सा दालान और कुछ खुला सेहन था. दालान और सेहन को दूसरी कोठरियों से अलहदा करने के लिए लकड़ी के फ़र्रे ठोंककर पार्टीशन किया गया था. उस छोटे-से दालान में ही एक कोने में घर का चूल्हा जलता था और तंग सेहन में ही फ़र्रों को ठोंककर पाख़ाने-ग़ुसलख़ाने की आड़ थी. उस कोठरी से पहले सकीना आपा, मय अपनी आल-औलाद के, दुनिया में कहां थीं, यह मुझे नहीं मालूम. बातें सुनने में आतीं थीं कि उनके शोहर उन्हें छोड़ गए थे, इसी दुनिया में कहीं, लेकिन कहां, यह कम-से-कम सकीना आपा को नहीं मालूम था. वह अकेली औलाद की परवरिश करने को रह गई थीं. यह भी मैं ठीक-ठाक नहीं जानता था कि वह मेरी और हमारे ख़ानदान की कितनी क़रीबी रिश्तेदार थीं, लेकिन थीं ख़ासी क़रीबी, यह एहसास ज़रूर है. उनसे हमारा रिश्ता अब्बा की ओर से भी था, यह भी मालूम है. उस ज़माने में जब की मैं बात कर रहा हूं ऐसा नहीं कि सकीना आपा की मुफ़लिसी कोई अनोखी बात हो. हमारे मोहल्ले में लोगों की बड़ी तादाद उसी तरह सुबहो-शाम करने पर मजबूर थी. हमें, उनकी निस्बत, खुशहाल कहा जा सकता था तो इसीलिए कि हमारा अपना खुद का घर था और अब्बा की मेहनत इतना कमा लेती थी कि हम बिना तंगदस्ती के इज़्ज़त के साथ जी सकें. फिर शहर में हमारे रिश्तेदार भी जो हमसे भी अधिक खुशहाल थे. उनके पास खेती की ज़मीनें, मोटरें, और ज्य़ादा बड़े और ख़ूबसूरत मकान थे. शहर छोटा था और इसमें ज़िन्दगी की रफ़तार धीमी. उस धीमी रफ़्तारवाले, छोटे शहर में सकीना आपा अपनी ज़िन्दगी बसर कर रही थीं और ज़िन्दगी की मिसाल अगर संगीत से दी जाए और बात को ज्य़ादा साफ़ किया जाए तो संगीत के सात सुरों में से वह ख़ुद-मय पांच औलादों के, कुल जमा छ:, उस सातवें सुर की दुहाई की तस्वीर थीं, जो उन्हें अकेला छोड़कर खो गया था: रिश्तेदारों के, क़रीबी और दूर के, रहमो-करम पर जीने को.
ज़ेहन पर ज़ोर डालता हूं तो याद आता है सकीना आपा से बड़े, उनके एक सगे भाई असग़र भी थे. फिर सुनी हुई बातों के सहारे ही, मैं याद करता हूं कि सकीना और असग़र के मां-बाप, उन्हें बहुत छोटा छोड़कर, किसी ऐसी बीमारी में ख़त्म हो गए थे जैसी एक ज़माने में, आमतौर पर, समय-समय पर, फैलकर गांव के गांव और शहर के शहर साफ़ कर जाती थी. इस तरह सकीना आपा और असग़र भाई जिन्हें बहुत बाद में मैनें कभी यूं ही, सरसरी तौर पर देखा, की परवरिश, शादी-ब्याह और शादी के बाद औलादों सहित सकीना आपा की वापसी, हमारे ख़ानदान के आसरे ही हुई थी. यह, कि पति से अलेहदगी के बाद वह कुछ साल हमारे घर में ही रही थीं. मुझे इसलिए भी याद नहीं कि तब मैं बहुत छोटा रहा होऊंगा, यह अन्दाज़ा लगाना इसलिए मुश्किल नहीं कि सकीना आपा की सबसे छोटी सन्तान, बेटी जैऩब और मैं, लगभग एक ही उम्र के थे.
आज मैं अगर सुननेवाले की हमदर्दी खो देने का जोख़िम उठाते हुए भी साफ़-साफ़ कहने की हिम्मत करूं तो यह बिलकुल सच है कि सकीना आपा और उनके परिवार से अधिक भुला दिए जाने लायक मैंने शायद ही कोई परिवार देखा या जाना हो. यह उसके बावजूद कि ज़िन्दगी को किस्तवार विपदा के रूप में जीते हुए सकीना आपा ने हैरान कर देनेवाली ख़ुद पर हंस सकने की महारत हासिल कर ली थी. मेरी याद में उनकी हंसी और हंसते-हंसते आंखों के आंसू पोंछने की मुद्रा यूं सुरक्षित है जैसे वह पच्चीस-तीस साल नहीं बल्कि अभी पलक झपकने से पहले मेरे सामने रही हैं. जाने वह अपने रोने पर हंसती थीं या हंसी की निरर्थकता का एहसास आंखों में आंसू भर जाता था, मौक़े-बेमौक़े. अपनी किसी ज़रूरत से या वैसे ही घरवालों के हाल-अहवाल मालूम करने, वह अपना उड़े हुए काले रंग का टोपीवाला बुर्का पहने घर में आती-जाती रहती थीं और उनकी त्वचा और हाथ-पांव में कुछ इस तरह की फूलन होती थी जैसे वह देर तक पानी में डूबे रहे हों. उनके नाक-नक़्श, वैसे भी बेहद मामूली थे और जिस्म में पेट निकला हुआ और छातियां ढलकी हुईं, आंखें इस मामले में भला क्यों पीछे रहतीं, इसलिए वह भी गंदला गई थीं और तब ही नज़र में आती थीं, जब सकीना आपा आंसू पोंछ रही होतीं. मैं कह ही चुका हूं कि सकीना आपा का क़द-बुत, हड्डी-काठी सब ऐसे थे जिन्हें भुलाने में कोई दुश्वारी हो ही नहीं सकती थी, और आवाज़ तो उनकी और भी, गले से ऐसे फंसी-फंसी निकलती जैसे उनकी मंशा और मर्ज़ी के ख़िलाफ़ कोई काम कर रही हो. एक ठंसी हुई, ऊंच-नीच से ख़ाली अभिव्यक्ति जिसे किसी दूसरे इनसान के साथ जोड़ा ही नहीं जा सकता था, तो भी सकीना आपा अगर कुछ पल को भी घर में आतीं तो लोगों को हंसाना शुरू कर देतीं और यह हंसी उनके वापस जाने के बाद काफ़ी देर तक घर में खनकती रहती.
जिस इलाक़े में हमारा मोहल्ला था वह भी शहर और देहात के बीच की कोई चीज़ था और फसीलों के शहर से बाहर आबाद था, यहां अभी भी हरे कछवाड़े और खुले मैदान थे और, जब अब्बा ज़ुमे की नमाज़ पढ़ने, हफ़्ते में, एक बार जामा मस्जिद जाते, और उस बीच कोई उनको पूछता हुआ घर आ निकलता तो अम्मा या परिवार का कोई दूसरा बुज़ुर्ग यह कहला भेजता कि वह शहर गए हैं. अब्बा, आमतौर पर, जब ज़ुमे की नमाज़ पढ़कर लौटते, और उनके साथ घर के पुराने ख़ादिम और अब्बा के अर्दली, कालेख़ान भी होते, तो घरवालों के लिए फल बेचनेवालों से लेकर हलवाई के यहां तक से, जो कुछ भी कालेख़ान, या कभी-कभी एक तांगे पर लादा जा सकता था, वह साथ लेकर आते. एक बार ऐसा हुआ कि अब्बा की वापसी खाली हाथ और ख़ासे ग़ुस्से मे हुई. कालेख़ान के भी होश उड़े हुए थे, फिर बच्चों और कम उम्रों को दफ़्तर-बाहर का हुक्म दे दिया गया और सकीना आपा की तलबी हुई. अब्बा उन्हें देर तक किसी बात पर डांटते रहे थे, यह अन्दाज़ा घर के अलग-अलग हिस्सों में उनकी बार-बार ऊंची होती आवाज़ के पहुंचने से लगाया जा सकता था. फिर हमने सकीना आपा को लौटते और लौटते हुए रुककर, अम्मा से पान छालिया और ज़र्दा लेते, और मुस्कुराते, आंसू पोंछते देखा था. बात आई-गई हो गई थी लेकिन अब्बा की उस दोपहर नाराज़गी का सबब कुछ बाद में पता चला था. असल में शहर में उन्हें लोगों ने बताया था कि सकीना आपा के बड़े भाई, असग़र, किसी क़व्वाली गाने वाले की शागिर्दी में पेटी बजाने और ख़ुद भी क़व्वाली गाने लगे थे. अव्वल ही अपनी मरजी से किसी से शादी करके उन्होंने बुज़ुर्गों को नाराज़ कर रखा था और अब, क़व्वाली एक ऐसा ज़ुर्म था कि अब्बा सकीना आपा के ज़रिए उन तक ख़ानदान से सम्बन्धों के ख़ात्मे की ख़बर पहुंचाना चाहते थे. जिस घर में कभी चूड़ी का बाजा तक न बजा हो, उसका कोई सदस्य, कितना ही दूर-दराज़ का क्यों न हो, ख़ुद गाए-बजाए, वह क़व्वाली ही सही, यह माफ़ नहीं किया जा सकता था.
-तुमने तो कभी सुना नहीं- बहुत बाद में आपा ने हंसते हुए कहा था- असग़र भाई वैसे तो हकले थे, लेकिन जब गाते थे तो बहुत रवानी से. आवाज़ अच्छी नहीं थी, नाक से गिनगिनाते थे, मगर यूं डूबकर पढ़ते थे कि बुरा नहीं लगता था. उनके पोते के अक़ीके में हमारी बहुत फ़रमाइश पर अपने घर में ही गाकर सुनाया था, यह कहते हुए कि वैसे अब मैं गाने से तौबा कर चुका हूं, बस, तुम्हारी फ़रमाइश पूरी कर रहा हूं.
असग़र भाई की अपनी कोई कहानी होगी, साधारण-से-साधारण कहानी भी हो तो दिलचस्प सकती है. ख़ुद मैं जो कहानी कह रहा हूं, सकीना आपा की, उससे अधिक साधारण कहानी भला और क्या हो सकती है! एक अधेड़, मुफ़लिस औरत जो पति के होते हुए भी विधवाओं की तरह जीने और अपने बच्चों की परवरिश करने पर मजबूर थी, और बच्चे? कैसे बच्चे! जो मामूलीपन में अपनी मां को बहुत पीछे छोडऩे पर तुले थे! धरती और आकाश, यह माना कि चक्की के दो पाट हैं जो आख़िरकार हर एक को पीसकर छोड़ेंगे. मेरा दिल कभी दु:ख से भर उठता है: कौन हाथ हैं जो चक्की को चला रहे हैं! कोई तर्क है, चक्की, हाथों, पिसने, मरने और जीने को क़बूल करने का! फिर ख़ात्मा हर जगह, अस्वीकार्य भी नहीं लगता: कहीं-कहीं लगता है वह आगे कुछ होने की ही एक कड़ी है. फिर बेचारी सकीना आपा? उनका बेटा आलम? बेटियां जमीला, शकीला, कनीज़ा और जैऩब? और वह सारा-का-सारा, हमारा पुराना मोहल्ला जो बदल ज़रूर गया है लेकिन ज्य़ादा बदसूरत हो गया है? वह अत्तू मियां, नवाब, शहंशाह, सिकन्दर? वह ऊंची छत का स्लॉटर हाउस और दरख़्तों, मकानों की खपरैलों पर बैठे गिद्ध और आसमान में काएं-काएं करते, उड़ते कौवे- क्या यह सब भी कुछ होने की ही कड़ी है?
संक्षेप में, सकीना आपा की सबसे बड़ी औलाद, बेटा आलम था. हमारे मोहल्ले के आस-पास बड़ा बदलाव यह आ रहा था कि कछवाड़े दिन-ब-दिन ग़ायब होते जा रहे थे और उनकी जगह आरा-मशीनें और लकड़ी के पीठे लेते जा रहे थे. यह स्वाभाविक ही था कि आलम भाई, जो असल में तो मेरे भांजे थे, लेकिन कुछ उनके उम्र में बड़े होने के कारण, और कुछ शायद ख़ुद को वक़्त से पहले बूढ़ा महसूस करने और मामू कहलाने से बचने के लिए, मैं आलम भाई से कहता था, कुछ कमाने का ख्य़ाल दिमाग़ में आते ही, घर के सबसे पास वाली आरा-मशीन पर जाना शुरू कर दें. इस सिलसिले की अगली कड़ी भी, बहुत स्वाभाविक, यही थी कि आरा-मशीन के मिस्त्री, अत्तू मियां से उनके सम्बन्ध हों, जो ख़ुद एक सुन्दर व्यक्तित्व और भले परिवार की जाहिल और नाराज़ औलाद थे. सचमुच, वह कंजी आंखों और सुर्ख़-सफ़ेद चमड़ी के एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें अलग से आरा-मशीन की मिस्त्रीगिरी से जोड़कर नहीं सोचा जा सकता था. फिर ऐसा हुआ कि आलम के साथ अत्तू मियां सकीना आपा के घर भी गए जहां लड़कियों में, जो भी थोड़ी बड़ी होती थी, गोद में बीड़ी बनाने का सूपड़ा लेकर बैठ जाती थी, और घर का ख़र्चा चलाने में, इस तरह जो भी सम्भव हो सके, मदद करने लगती थी. सबसे बड़ी जमीला आपा थीं, उम्र थी, पल का जादू था! अत्तू और जमीला, हज़ार जान से एक-दूसरे पर फ़िदा हो गए. इसका एक अलग से फ़ायदा यह हुआ कि अत्तू मियां की आलम के प्रति तवज्जोह बढ़ गई, और कुछ ही समय में तरक़्की की जाने कितनी मंज़िलें तय करके आलम अत्तू मियां का हेल्पर हो गया. मालिक मशीन ने ऐतराज़ करना चाहा तो अत्तू मियां ने नौकरी छोड़ने की धमकी दे दी. आलम हेल्पर अत्तू मियां का था, मालिक को सीधे वैसे भी क्या लेना-देना, सो उसने हथियार डालकर आलम का हेल्पर होना क़बूल कर लिया. नतीजा: आलम की कुछ पगार बढ़ी और जमीला के दिल में अत्तू मियां के लिए बहुत-सी जगह. ज्य़ादा समय नहीं लगा- साल-भर के अन्दर ही जमीला और अताउल्ला ख़ान उर्फ अत्तू की सारे ख़ानदान के विभिन्न प्रकार के सहयोग और योगदान के साथ, शादी-ख़ानाआबादी हो गई.
शादी, बहुत सादगी से, हमारे ही घर से हुई, और सचमुच, रिश्तेदारों ने बिना यह सोचे कि अभी सकीना की तीन बेटियां और हैं, जिससे जितना बन पाया, दहेज और शादी के ख़र्चे में हिस्सेदारी की. जमीला की रुख़्सत के बाद जो सकीना आपा के चहेरे का भाव था, सब कुछ बखूबी हो जाने के कारण शायद, वह ऐसा था जैसे उन्हें बेटी के घर से जाने का बहुत सदमा हो. वह हंसतीं, आंसू पोंछतीं, 'तमाशा है सब' कहतीं. दूसरी सांस में अल्लाह और अपने रिश्तेदारों का शुक्रिया अदा करने लगतीं- ऐ अल्लाह, मैं तेरी हमेशा-हमेशा की शुक्रगुज़ार हूं, मैं बाक़ी सारी उम्र भी अपने बुज़ुर्गों की ख़िदमत में बिता दूं तो क्या मेरी एहसानमन्दी का इज़हार हो पाएगा! ऐ अल्लाह, शुक्र-शुक्र-शुक्र तेरा!
वैसे सकीना आपा की अल्लाह मियां से तमाम रिश्तेदारी उसका ज़बानी शुक्र अदा करने तक ही सीमित थी, न वह कभी नमाज़ पढ़तीं नज़र आती थीं न कुरान, और शायद रमज़ान के रोज़ों के मामले में भी चोर थीं. अम्मा ने कई बार, ख़ासतौर पर उन्हें नमाज़ पढ़ने की तम्बीह की थी मगर वह टाल गई थीं. फिर, आख़िरकार जब उन्होंने सकीना आपा से जवाब ही तलब किया था तो उन्होंने राजगीरे के लड्डू की तरह टूटती, अपनी फुसफुसी आवाज़ में कहा था- क्या करूं, दुल्हन चची, जैसे ही नमाज़ की नीयत बांधती हूं, दिमाग़ इसी गुन्तारे में लग जाता है कि मैं क्या कर रही हूं, क्यों कर रही हूं और हंसी है कि अपने आप ही आने लगती है! सब गड़बड़ा जाता है, मैं बहुत तौबा करती हूं, अल्लाह मियां से माफ़ी मांगती हूं, मगर यह शैतान! मैं क्या करूं?
अम्मा बेचारी सकीना आपा को क्या बतातीं कि वह क्या करें!
आगे भी, घटनाक्रम, अगर स्वाभाविक रूप ही से चलता तो होना यह चाहिए था कि जमीला की शादी के बाद सकीना आपा की जिम्मेदारियों में कमी आ जाती. ऐसा हुआ नहीं और इसके दो कारण थे, ससुराल के जिस घर से शादी हुई उसी के किसी सदस्य की आरा-मशीन पर वह मिस्त्री थे, यह जानकारी अत्तू मियां जैसे अच्छे परिवार के नाराज़ व्यक्ति के फंडामेंटल्स गड़बड़ाने के लिए काफ़ी थी. वह जिन लोगों के नौकर थे, वह उनके ससुराली रिश्तेदार थे और रिश्ते में छोटे, भांजे अर्थात भतीजे, इस सच को अत्तू मियां ने अपने दिमाग़ में गांठ-सा बांध लिया और बीवी और सास से शिकायत शुरू कर दी कि उनको तो इतनी तमीज़ और तौफीक़ भी नहीं कि अपने से बड़ों को सलाम करें. सकीना आपा, जो एक लम्बी ज़िन्दगी इन्हीं रिश्ते के खेलों को, बग़ैर समझने की कोशिश किए, देखती रही थीं, अत्तू मियां को क्या समझातीं कि रिश्तेदार दूसरी दुनिया में अपनी मगफ़िरत की उम्मीद में, ख़ैरात तो दे सकते हैं, लेकिन इज़्ज़त क्या सिर्फ़ किसी के कहे से दे देंगे! और जिस तरह का नाराज़गी-भरा स्वभाव ख़ुद अत्तू मियां का था, ऐसा हो नहीं सकता था कि इस सच को उन्होंने भी अपने रिश्तेदारों में, अपनी तरह न जाना हो. हो सकता है इसी वजह से, उनका ग़ुस्सा, कम होने के बजाय और बढ़ गया हो. जो भी रहा हो, शादी के कुछ समय बाद ही उन्होंने अपने और जमीला के बीच कड़वाहट की बुनियाद खोज निकाली थी. यही नहीं, वह सकीना आपा और जमीला को, अक्सर तैश में, उनके रिश्तेदारों की आरा-मशीन छोड़ देने की धमकी भी देते, यह कहते हुए कि दामाद मिल सकता है मगर आरा-मशीनी का अच्छा मिस्त्री कहां मिलता है! कहना बेजा होगा कि उनकी इन बातों में आलम भी चढ़-चढ़कर हां-में-हां मिलाता था. यह सूरतेहाल कुछ समय- तब तक रही जब तक कि जमीला एक बेटी की मां न बन गई और अत्तू मियां आरा-मशीन की आरी टूटने में घायल न हो गए. फिर न जाने क्या हुआ कि अत्तू मियां और मशीन की आरियों में ठन-सी गई. रह-रहकर दुर्घटना होती थी और अत्तू मियां कभी मामूली, कभी गम्भीर रूप से ज़ख्मी हो जाते थे. देखते-देखते उनका चेहरा इस लड़ाई की निशानियों से पट गया था, उन्होंने एक आंख गंवा दी थी ओर दाहिने हाथ का अंगूठा खो दिया था. शादी के दस साल के अन्दर ही वह अपाहिज, तीन बेटियों के बाप, जमीला को फिर से बीड़ी का सूपड़ा थामने और छोटे बच्चों को क़ुरान पढ़ाकर गुज़ारा करने पर मजबूर छोड़कर, दुनिया से रुख़्सत हो गए थे. जमीला ने अपनी औलादों को किस तरह पाला-पोसा, उनकी शादियां की, वह एक और दिलचस्पी से ख़ाली और हमारी कहानी से ही जन्म लेनेवाली, दरअसल एक दूसरी कहानी है जिसकी तफ़सील में जाना यहां असंगत और अनावश्यक होगा, लेकिन अत्तू मियां के दु:खदायी अन्त तक, उन दस सालों में, ख़ुद सकीना आपा की ज़िन्दगी ठहरी नहीं रही. सुस्त रफ़्तारी या तेज़ी से उनके आस-पास, कुछ-न-कुछ होता रहा.
एक निराशा जो दिन-ब-दिन पुख़्ता होती गई, वह आलम को लेकर थी, समय के साथ-साथ यह पक्का होता गया था कि वह बड़ी हद एक निकम्मा और उससे भी ज़्यादा ख़ुदग़र्ज, व्यक्ति था. अगर कोई आरा-मशीन की सबसे लम्बी हेल्परी जैसा रिकॉर्ड होता तो नि:सन्देह आलम के नाम लिखा जाता. इसी पर बस नहीं, वह अपनी कमाई सकीना आपा से छिपकर जोड़ता था. पगार और ओवर-टाइम मिलाकर सौ रुपए बनते तो सकीना आपा को तीस रुपए थमाता और कहता, इतने ही बने हैं. अच्छे ख़ानदान से सम्बन्ध के कीटाणु उसके भी बहुत अंदर घर कर गए थे, इसलिए किसी की भी ऊंची आवाज़ में बात बर्दाश्त नहीं थी. नतीजा यह कि उसे आए दिन अपने काम के ठीये बदलने पड़ते और ठीये बदलने का भी अगर कोई रिकॉर्ड होता तो शायद आलम के नाम ही दर्ज होता! मिस्त्री तक़ खैर, वह कभी बन ही नहीं पाया, मगर अत्तू मियां की मेहरबानी से सदा-सदा का हेल्पर ज़रूर बन गया.
जिन सात कोठरियों में से एक में सकीना आपा रहती थीं, उनके आगे और स्लॉटर-हाउस के पीछे जहां गली कुछ अन्धे मोड़ मुड़ती थी, यह सीलन खाया, अंधेरा, बड़ा-सा मकान था जिसके प्रवेश-द्वार से ही सटी हुई घर की बेपर्दा संडास थी जिसके सामने बिखरी राख पर आमतौर पर दो-तीन कुत्ते लोटते रहते थे. यह दारोग़ाजी का मकान कहलाता था. दारोग़ाजी कौन और कब के, यह तो पता नहीं लेकिन उस घर में नवाब और शहंशाह, उनकी बहन बेगम और बूढ़ी मां जिन्हें सारा मोहल्ला अम्मा कहता था, रहते थे और उनके अलावा कुछ किरायेदार भी. कुछ नाम बच्चों के साथ भौंडा, मज़ाक साबित होते हैं, और नवाब, शहंशाह और बेगम के साथ बिलकुल यही था. नवाब होश और दीवानगी के बीच इधर-से-उधर, सफ़र करता रहता था और उसकी चमड़ी ऐसी स्याह थी कि उसमें दांत और आंखों की सफ़ेदी हाथीदांत के काम-सी चमकती थी, उस पर दौरे पड़ते थे, अलग-अलग चीज़ों के, नमाज़ पढऩे का दौरा, नमाज़ न पढऩे का दौरा. मेहनत का दौरा, हाथ-पर-हाथ धरे बैठे रहने का दौरा, लोगों की मदद करने का दौरा, लोगों से झगडऩे का दौरा, इत्यादि. शहंशाह सफ़ाई का दीवाना था और हर मौसम में, हर वक़्त सफ़ेद कलफ़दार कपड़े और सिर पर सुहरवर्दी कैप पहनकर घर के बाहर निकलता था. उसे बिना टोपी पहने किसी ने नहीं देखा था, हालांकि उसकी तबीयत में मज़हब की ओर झुकाव कहने को भी नहीं था. असल में यह टोपी वह एक तरह से विग की तरह पहनता था, अपने सिर के मुक़म्मल गंजेपन को छिपाने के लिए. उसे मुर्गे और पतंग लड़ाने का शौक़ था. जब भी उसकी पतंग कटती या मुर्गा पिटता, वह दिल की भड़ास मोहल्ले में किसी-न-किसी से झगड़कर निकालता. बची बेग़म, तो उसके पहले नक़्श याद करने पर दिमाग़ में गद्दर जामुन जैसी कोई चीज़ उभरती है. नवाब की तरह कोयला-स्याह नहीं बल्कि तह में कहीं दमकता, गहरी नीली रोशनाई-सा रंग. बेर-सी नाक और बटन-सी गोल-गोल आंखें, हड्डी-काठी का सही अन्दाज़ा इसलिए नहीं होता था कि क़द बहुत छोटा था और आवाज़ ऐसी बारीक और धारदार कि बिना जख़्मी हुए सुनी नहीं जा सकती थी. ज़मीन-आसमान के बीच जाने क्या-क्या साजिशें होती हैं जिनके बहकावे में आकर इनसान कुछ भी क़दम उठा लेता है. आलम का बेगम पर आशिक़ होना मुझे आज भी इसी श्रृंखला की एक कड़ी लगता है. न सिर्फ़ आशिक़ होना बल्कि अपने इश्क़ को व्याह-मंडप तक ले जाने के लिए उन तमाम शर्तों को मंजूर करना जो अन्तत: आलम ने कीं, जिसमें छोटी बहन कनीज़ा की, जो मानसिक रूप से बड़ी हद तक कमज़ोर थी, शादी शहंशाह के साथ करना भी शामिल था.
दरअसल जमीला के फौरन बाद शादी के लायक तो घर में शकीला थी, लेकिन उस ज़माने में उस पर अल्लाह मियां की गाय बनने और कहलाने का भूत सवार था. एक छोटी-सी कोठरी में भी उससे जितना बन सकता, वह पर्दा भी करती और इबादत भी. उसके सिर से दुपट्टा, सोते-जागते, इस तरह बंधा रहता जैसे आमतौर पर औरतें नमाज़ पढ़ते वक़्त कसकर बांधती हैं. सूरत-शक्ल में वह सकीना आपा से भी मामूली लेकिन बहरहाल कनीज़ा से बेहतर थी. कनीज़ा तो बिना बोटी का हड्डी-चमड़ा थी जो सारे समय, गोद में बीड़ी का सूपड़ा रखे, दुनिया को आंखें फाड़-फाड़कर देखने की कोशिश किया करती थी. ऊपर से सितम कि वह अपने मामू की ही तरह बल्कि उससे भी ज्य़ादा बोलते समय हकलाती थी. दिमाग़ की कमज़ोरी की वजह से उसे अपने कुर्ते-दुपट्टे का भी सही-सी होश नहीं रहता था. यह सोच पाना मुश्किल है कि उस दिन शहंशाह के कितने पेंच कटे होंगे, या कितने मुर्गे लड़ते हुए मारे गए होंगे, जब उसने कनीज़ा को ब्याहने का सोचा. एक ही कारण समझ में आता है- शहंशाह की ढलती उम्र. जिस समय यह रिश्ता हुआ, शहंशाह साठ साल के इर्द-गिर्द का रहा होगा जबकि कनीज़ा उससे पैंतीस-चालीस साल छोटी होगी. सकीना आपा की मंशा आसानी से समझी जा सकती थी. बेटियों की शादी उनके लिए कोई तक़रीब न होकर महज़ एक पूरी की जाने वाली जिम्मेदारी रह गई थी. एक जमीला की शादी की तो थी तक़रीबन समझकर सो वही अब दु:ख दे रही थी. जमीला आए दिन अत्तू मियां की शिकायतों के साथ, कभी रोती-पीटती घर लौटती रहती और वह उसे वापस उसके घर की ओर धकेलती रहतीं. सो वह पल बड़े ही सुकून का था जब उन्होंने कनीज़ा को दारोग़ाजी के घर रुख़्सत किया और वहां से आलम के लिए बेगम को ब्याह कर लाईं. इन दोनों शादियों में सकीना आपा के ख़ानदान, यानी मेरे घरवालों की शिरकत वैसी नहीं थी जैसी जमीला की शादी में रही थी, किसी से कुछ हो सका तो कर दिया वरना दिल को यह इत्मिनान काफ़ी था कि पहली शादी में फर्ज अदा किया जा चुका है. सक़ीना आपा को शिकायत कभी अल्लाह से न हुई तो अपने रिश्तेदारों से क्या होती, वह उसी पाबन्दी और अपनाईयत से, तमाम घरो में आती-जाती रहीं. यह वह ज़माना था जब उनके पैरों की फूली-फूली उंगलियां स्पंज की चप्पलों में उलझी रहतीं, और मुझे याद है, उनके दो पैरों की चप्पलें, कभी एक जैसी नहीं होती थीं. पट्टे का रंग अलग-अलग होना आम बात थी, लेकिन अक्सर दोनों का नम्बर भी एक नहीं होता था.
आलम ने अपनी दुल्हन के लिए सात कोठरियों से एक कोठरी किसी किरायेदार को उसकी मुंहमांगी रकम देकर, खाली करा ली थी. उसके कहे अनुसार, आरा-मशीन के मालिक से एडवांस लेकर. यह असलियत सकीना आपा से अधिक समय तक छिपी न रह सकी कि दरअसल आलम उनसे अलग रहना चाहता था, और बहुत पहले से उसने, अपनी तरह इसकी तैयारी भी शुरू कर दी थी. सकीना आपा का रवैया, यह जानकर बिलकुल ऐसा था जैसे इत्मिनान हो कि एक जिम्मेदारी यूं भी पूरी हुई. अब बचीं दो और, शकीला और ज़ैनब, देखते हैं यह सिर का बोझ कब और किस तरह हल्का होता है.
सकीना आपा ने जमीला के मामले में सीधी दख़लअन्दाज़ी से तो इनकार कर दिया, मगर ज़रूरत के वक़्त वह उसकी हौसलाअफज़ाई या हिम्मत बंधाने की कोशिश जरूर किया करती थीं, -यहां से गई हो, वह समझाती- तुम्हारा घर है, जब चाहो यहां आ सकती हो, मगर बेहतर यही हो कि अच्छा-बुरा, जैसा भी हो, अपने घर ही जियो, न ज़मीन मेरी, न आसमान पर कोई दावा. वह आंख का आंसू पोंछते हुए, सजीदा रोते-रोते हंस देतीं- बस, मौत पड़ी, यह कुछ सांसें हैं, जो जब तक भी चल रही हैं, चल रही हैं, इनके भरोसे मैं कोई ठेकेदारी थोड़ी कर सकती हूं! तमाशा है सब, यह समझ लो!
आलम और बेगम तो, दोनों, एक-एक दिन करके जीने, लडऩे-झगड़ने, औलादें पैदा करने, और ज़ेहन से ओझल और दुनिया से बेनामो-निशान होने की व्यस्तताओं में खो गए, और कुछ समय बाद, जब कनीज़ा और शहंशाह दुनिया में नहीं रहे, तो कोठरी छोड़कर दारोग़ाजी के घर में रहने लगे. लेकिन मेरा जो याद पीछा करती है वह उन दिनों की है जब कनीज़ा गर्भ से थी. यह सही-सही कह पाना तो सम्भव नहीं कि उस जैसे कमज़ोर दिमाग़ की लड़की की समझ में शादी और औरत-मर्द के रिश्ते का मतलब क्या रहा होगा, लेकिन शादी के बाद मैंने उसे जब भी देखा, किसी ख़ौफ़ में मुब्तिला, ख़ुद को कपड़ों में बांधते-समेटते ही देखा. वह बड़ा बदलाव था, उस लड़की में. जिसे कुछ दिन पहले तक अपने ओढऩी-दुपट्टे का ख्य़ाल तक नहीं रहता था. मैंने बिना किसी ऊपरी वजह के उसे कई बार अकेले में रोते और ख़ुद से बातें करने की कोशिश करते देखा था, ज्यों-ज्यों उसकी गर्भावस्था बढ़ती गई और उसके बाक़ी शरीर से असंगत, पेट गोल होकर बाहर निकलता गया. उसके चेहरे पर बेबसी का भाव तीव्र होकर फैलता गया. वैसे भी उसे देखने पर दिमाग़ में किसी मजबूर परिन्दे का ख्य़ाल आता था, अब लगता वह परिन्दा अपनी रिहाई की आस छोड़कर बाक़ी ज़िन्दगी क़ैद समझकर काट रहा है. मैंने महिलाओं को मां बनने की प्रक्रिया से गुज़रते और उस ख़ास घड़ी का इन्तज़ार करते देखा है जब उनके वज़ूद में पली कोंपल, किसी दरख़्त की शाख़ की तरह अलग होकर, ख़ुद में मुख़्तार, एक इकाई बनती है. वहां चेहरों पर निकलते दिन की रोशनी और छंटता अंधेरा होता है. कनीज़ा के चेहरे से रोशनी दिनों-दिन रुख़्सत हो रही थी और रात पड़ाव डालने को थी. अपनी याददाश्त में अगर मुझे सकीना आपा इतनी परेशान याद हैं तो इसीलिए कि जैसे इस तमाशे को भूलकर वह उसका पात्र बन गई हों. वह भी शायद कनीज़ा के मां बनने को लेकर ही. दारोग़ाजी के मकान और मस्जिद की सात कोठरियों में ज्य़ादा फ़ासला तो था नहीं, इसलिए रोज़ ही या तो शहंशाह उसे मां के पास छोड़ जाता, या सकीना आपा ख़ुद जाकर कनीज़ा को अपने साथ ले आतीं. कोठरी पर पहुंचते ही वह अपनी टाट की बिछात खोजती, बीड़ी बनाने का सूपड़ा मांगकर गोद में रखकर, तेन्दू के पत्ते फैलाकर उन पर तम्बाकू की तह जमाती और पत्तों को गोल करके उनका मुंह खीसकर, बीड़ी बनाने में लग जाती. यह सब सकीना आपा और दो बहनों के समझाने के बाद भी कि अब तुम्हारा घर अलग है और तुम्हें बीड़ी बनाने की कोई ज़रूरत या मजबूरी नहीं. देर-देर तक ख़ामोश रहने के बाद वह अपनी कमज़ोर आवाज़ में रो देती और हकलाते हुए अपने रोज़-ब-रोज़ बढ़ते पेट की ओर इशारा करके सकीना आपा से कहती -बिया, अब हमारा क्या होगा?
सकीना आपा ने उसे भी दिलासे दिए होंगे, जैसे कि सारी उम्र अपनी औलाद ही नहीं, दुनिया-जहान में उन्हें जो भी ज़रूरतमन्द लगा, उसे दिए, और कनीज़ा तो उनकी वह सन्तान थी, जिससे ख़ुद सकीना आपा के कहे अनुसार, उनकी बिना बोले भी बातचीत हो जाती थी. वैसे दुनिया को समझने-समझाने का, सकीना आपा का, ख़ुद अपना एक अन्दाज़ था. एक बार जैऩब हुज्ज़त करने लगी कि यह ज़मीन-आसमान सात-सात ही क्यों होते हैं? सात से कम या ज्य़ादा क्यों नहीं! देर तक उन्होंने जैऩब के सवालों को टालने की कोशिश की, मगर जब वह नहीं मानी तो सकीना आपा ने अपनी ठंसी आवाज़ में चुटकी भरी थी -केसी कमअक़्ल लड़की है! इसे यह भी समझ में नहीं आता कि हम सात कोठरियों में रहते हैं! हमारी मस्जिद की सात कोठरियां हैं और हर कोठरी एक ज़मीन-एक आसमान के बराबर है! बेवकूफ़ कहीं की!
समझी तो जैऩब क्या होगी -समझ भी क्या सकती है, मगर सकीना आपा का वह लहजा उसे उस पल चुप कर देने को काफ़ी था,
हुआ बहरहाल वही जिसका डर था और कनीज़ा बच्चे की पैदाइश में गुज़र गई थी. बेटा सही-सलामत पैदा हुआ था, लेकिन यह जाने कैसा क्रान्तिकारी परिवर्तन था कि शहंशाह ने अपने बेटे की शक्ल देखने से भी इनकार कर दिया था. जाने वह कनीज़ा की बेवक़्त मौत का सदमा था या किसी ऐसी बात का पछतावा जिसे बाक़ी दुनिया नहीं जान सकती थी, मगर देखते-ही-देखते शहंशाह के सफ़ेद कपड़ों की कलफ़ ढीली पड़ी और फिर वह मैले-कुचैले, धुलने को भी मोहताज होते गए. उधर उसके मुर्गे दाने को तरसते. दारोग़ाजी के मकान की खपरैलों पर चढ़-चढ़कर बांगें देने और मोहल्ले की मुर्गियों के पीछे भागने पर मजबूर होते गए. इधर शहंशाह खाट पकड़ता, समय-समय पर ख़ुद से ही पेंच लड़ानेवालों की तरह गाली बककर कहने लगा -वह काटा! वह काटा! वह अनहोनी भी हुई कि मोहल्लेवालों ने उसे बगैर टोपी के, गंजे सिर गलियों में बेमकसद भटकते देखा. फिर एक दिन बड़े भाई, नवाब से उसकी कुछ कहा-सुनी हुई और नवाब ने चिढ़कर पीठ पर इतने कसकर मुक्का मारा कि शहंशाह अपने पलंग पर जाकर लेट गया, और जो लेटा तो फिर ख़ुद नहीं उठा.
सकीना आपा यह सब आंखों के सामने होता देख रही थीं और कनीज़ा और शहंशाह के बेटे बिलाल को पालने-पोसने में लगी हुई थीं. उन्हें इस बात का आख़िर तक अफ़सोस रहा कि बिलाल का अक़ीक़ा सही-सही मजहबी रस्तों के अनुसार नहीं हो पाया. बस आलम ने उसके कान में अज़ान दे दी, और बाद में कुछ लोगों ने मिलकर नाम बिलाल तय कर दिया. वैसे शायद यह भी उनके लिए कोई नई बात नहीं थी, और ख़ुद उनकी तीन औलादों के अक़ीक़े, तुफेलिया अक़ीक़े थे, यानी ख़ानदान में किसी के बच्चे का अक़ीक़ा हो रहा था, उसी के साथ उनके सिर पर भी उस्तरा फिरा दिया गया.
जल्दी ही बिलाल का ज़िम्मा सकीना आपा से, अल्लाह मियां की गाय, शकीला ने ले लिया था, कुछ था शकीला में ऐसा जैसे वह बच्चे पालने को ही बनी हो, पैदा करने को नहीं. शादी-ब्याह में उसकी दिलचस्पी भी नहीं थी, लेकिन क्या किया जाता, सकीना आपा का! वह तो उसकी और ज़ैनब की शादी को अपनी दो आख़िरी ज़िम्मेदारियां मानकर चल रही थीं, जिन्हें किसी तरह उनकी ज़िन्दगी में पूरा किया जाना था.
बहाव में जब मैं सकीना आपा की बात करता हूं तो इसका यह मतलब नहीं कि इस दौरान बाक़ी दुनिया की गर्दिश रुक गई थी. बदलाव हर जगह था, चाहे वह छोटी इकाई, हमारा ख़ानदान हो या फिर इसके आगे हमारा मोहल्ला या बाक़ी की दुनिया हो. घर में अनेक भाई-बहन शिक्षा के बाद, शादी करके रोज़गार का पीछा करते, मोहल्ले और शहर ही नहीं, मुल्क़ से भी बाहर जा चुके थे. एक इकाई टूटकर अनेक में बंट रही थी. कोई ख़ुश था, कोई संघर्ष में लगा था, तो कुछ का हौसला टूटा भी था. यह बदलाव समझ में आ सकने वाले स्वाभाविक जीवन के सहज पड़ाव थे. जो दो दिन ख़ुश था उसे तीसरे दिन मुश्किल का सामना और फिर उसका हल तलाश करना. सब जिस तरह आमतौर पर होता है, वह हो रहा था, इसमें मौतें भी थीं, बच्चों का जन्म भी, शादी और प्यार-मोहब्बत भी, धोखाधड़ी भी, पुराने मकानों का ढाया जाना भी और उनकी जगह नयों का बनना भी. मोहल्ले की गलियों में अजनबी चेहरे आकर बस रहे थे. पुरानी ख़ानदानी दादारिगी की जगह छुटपुट गुंडागर्दी लेती जा रही थी. शहर के आसार चारों दिशाओं में दूर-दूर तक फैल गए थे, हमारा घर विभाजन और नव-निर्माण की प्रक्रिया से गुज़रते कई पुरानी शिनाख़्तें खो चुका था, खोता जा रहा था. बस, असाधारण विपदाओं में घिरे होने के बावजूद एक सकीना आपा थीं, जो इस अनेक टुकड़ियों में बंट रहे परिवार की हर टुकड़ी को अपने में पूरा और ख़ुद अपना ख़ानदान समझती थीं. उनको ख़ानदानवालों के आपसी झगड़ों से कोई सरोकार नहीं था और सबके यहां, उसी पुरानी अपनाइयत के साथ आना-जाना था.
ज़ैनब, मुझे यूं भी याद है कि हम दोनों लगभग एक ही उम्र के थे और छुटपन में जब मैं मछली पकड़ने की मंशा से ज़मीन खोदकर केंचुए निकालता था तो देखकर वह बड़ी हाय-तौबा करती थी. मगर फिर झिरिया तक, जो स्लॉटर-हाउस के पीछे ही थी, साथ भी जाती थी. जब मैं बलिए पर केंचुए चढ़ा रहा होता था तब वह अपनी दोनों हथेलियों से कान यूं बन्द कर लेती थी जैसे क़ेंचुए का रोना-चिल्लाना नहीं सुनना चाहती हो. उस पल उसकी आंखों मे डर परछाई की तरह कांपता नज़र आता. मैं उसे छेड़ते हुए ताना देता कि घर के पास रोज़ इतने भैंसे और बकरे काटे जाते हैं, उससे तो डरती नहीं, क़ेंचुए से डरती है. वह चिमटी बहुत कसकर काटती थी और ला-जवाब होने के बाद यही उसका बदला होता था : ख़ुद ही चिमटी काटती थी, इससे पहले कि सामनेवाला तकलीफ़ से चीखे-कराहे, ख़ुद ही मोटे-मोटे आंसुओं से भैं करके रोने लगती थी. याद नहीं कि मैंने उस झिरिया से कभी मछली पकड़ी हो लेकिन उन दिनों लम्बे समय तक, पानी में अपनी छोटी-सी बंसी डालकर बैठे रहने का अपना सुख था, थोड़े फ़ासले पर केवड़े के झुंड थे जो फूलते तो दूर-दूर तक तीखी ख़ूशबू महकती रहती. इसके अलावा छोटे-बड़े जंगली खजूर के दरख़्त थे जिनकी ड्राइंग, मैं वापस घर लौटकर काग़ज-पेंसिल से करने की कोशिश करता. ज़ैनब उस ख़ुशबू और दृश्य के साथ ही दिमाग़ में बची रह गई, उसी तरह जैसे बचपन की अनेक चीज़ें जिन्हें हम याद नहीं रखते भुलाने में असमर्थ होते हैं.
धीरे-धीरे मेरा उन गलियों में जाना बन्द हुआ और फिर एक दिन वह मोहल्ला छोड़कर मैं शहर के दूसरे हिस्से में रहने लगा. दुनिया ने उम्र के साथ समझ या अनुभव के तौर पर मुझे जो दिया उसमें किसी आस या उम्मीद का पहलू कम था. मैं ख़ुद के बारे में सोच-सोचकर इसी नतीजे पर पहुंचा था कि एक कीड़ा, जो कुछ सोच-समझ भी सकता है: इससे ज्य़ादा हर्गिज़ कुछ नहीं, जिस दिन सही मायने में कुछ समझ में आ जाए, इस उबाऊ सिलसिले को ही ख़त्म कर देना चाहिए. मैंने शादी न करने का फैसला किया था, बहुत पहले जब अम्मा और अब्बा जीवित थे, और अपने फैसले से उन्हें आगाह भी कर दिया था. अब्बा-अम्मा को अच्छा नहीं लगा था, तो उनके लिए तो कई ऐसी औलादें भी, पूरी निराशा के रूप में सामने आ चुकी थीं, जिन्होंने कहे पे बहुत ख़ुश होकर शादियां की थीं, और, ख़ुशी-नाख़ुशी अपनी जगह, मां-बाप रहते कितने दिन हैं!
मेरे हाईस्कूल पास करने वाले साल ही, सकीना आपा बिलाल, अपनी आख़िरी जिम्मेदारी, ज़ैनब की शादी से भी फ़ारिग हो गई थीं, उससे पहले शकीला के फ़र्ज़ से वह हल्की हो ही चुकी थीं, सात कोठरियों में कोई आकर बसा था जो चढ़ी उम्र का रंडवा था. काम भी कोई तारीफ़ जैसा तो नहीं, स्लॉटर-हाउस में काटे गए जानवरों की आंतों को ठेके पर लेता था और उनकी सफ़ाई करके, सुखा के, जितने में ख़रीदता था, उससे कहीं ज्य़ादा में किसी और को बेच देता था. दिन की मेहनत के बाद शाम को नहा-धोकर, साफ़ कपड़े पहनकर घर से निकलता तो कोई सोच भी नहीं सकता थाकि वह आंतोंवाला ठेकेदार है. रंडवा था, पहली शादी से कोई औलाद या उससे हटकर कोई क़रीबी रिश्तेदार थे नहीं. सबसे बड़ी बात यह कि शकीला के साथ बिलाल का जिम्मा उठाने को तैयार था, और ख़ुद अल्लाह मियां की गाय, शकीला को पसन्द था. यह शादी ख़ामोशी से हुई थी और आगे शकीला की इससे कोई औलाद भी नहीं हुई थी.
ज़ैनब की शादी पर ख़ानदानवालों ने फिर तवज्जोह दी थी, यह सोचकर कि सकीना की आख़िरी लड़की की शादी है. सकीना ख़ुद बेचारी क्या-क्या करेगी. बेटा अव्वल दर्जे का नालायक़ और बड़े दामाद, जब तक ज़िन्दा भी थे तो किस काम के थे. अब तो चलो ख़ैर दुनिया में हैं ही नहीं. ज़ैनब का दूल्हा, सिकन्दर अच्छी सूरत-शक़्ल और लगभग मेरी ही उम्र का एक ख़ुशमिज़ाज कार्पेंटर था, अच्छे परिवार से था. शादी के बाद इस दामाद ने सकीना आपा को उस तरह की इज़्ज़त दी और उनका ख्य़ाल किया कि उनके दिल से दुआएं भी निकली होंगी और ज़ैनब के भविष्य की ओर से कुछ चिन्ता भी मिटी होगी.
कुछ लम्बे ही समय तीन-चार साल की अनुपस्थिति के बाद मैं शहर लौटा था. एक सुबह, घंटी की आवाज़ पर दरवाज़ा खोजने पर देखा, बाहर पसीने में डूबी सकीना आपा खड़ी हैं : पहले से भी अधिक धुंधली और बूढ़ी सकीना आपा! लिफ्ट की सहूलियत को अनदेखा कर. पता चला, वह चार मंजिल की सीढ़ियां ही चढ़कर आ गई थीं. सलाम के जवाब में दुआएं दीं, बलाएं लीं. आंख का आंसू पोंछा. अन्दर आकर बैठ गईं. कहा- हम तो समझते थे पहचानोगे भी नहीं, मैं किसी ज़रूरत से नहीं, सिर्फ़ तुम्हें देखने आई हूं. ज़माना हो गया, कभी ख़ुद भी थोड़ा-सा वक़्त निकालकर आओ मियां, अब हमारा तो ख़ुद का कभी का बुलावा लग चुका है. आगे आपस में जानोगे-पहचानोगे नहीं तो कैसे सिलसिला चलेगा. वैसे सब अपने-अपने घर हैं, बस इस मौत- पड़ी ज़ैनब की समझ में नहीं आता, अपना घर छोड़कर दो औलादों के साथ हमारी कोठरी पर पड़ी है. मियां ने एक और कर ली है, अब यह कि बाई, ज़माने के साथ तू अपनी औलाद को ऐसा बना कि वह लड़कर अपना हक़ ले सके. तुझे तो वज़ीफे और गंडे-तावीज़ के सिवा आता क्या है! और सिकन्दर में शराफ़त है, कितनी बार मनाने आ चुका है. कोई और होता तो मौके का फ़ायदा उठाकर दूसरी को ही घर ला बिठाता.
सकीना आपा ने घूम-फिरकर मुआयना किया था, बताया था कि उस ख़ूबसूरत घर में सिर्फ़ मेरी दुल्हन की कमी थी.
- क्या मिलता है, सकीना आपा. मैंने हंसकर बात टालने को कहा था -नालायक़ और बेमुरव्वत औलाद जो जब तक साथ रहती है तो दु:ख देती है और फिर अपनी मर्जी से जीने को अकेला छोड़कर चली जाती है.
- इससे वह पराई थोड़ी हो जाती है, मेरी बात से सकीना आपा पल-भर को भी सहमत नहीं थीं. -यही तो ज़िन्दगी की असल इबादत है मियां, और इसी में बख़्शिश और मग़फिरत है. यही आज़माइश है और यही उसका सिला है. यह हमारी जैसी छोटी अक़्ल से सोचे तो! या यह शायद हमारी उम्र बोल रही हो! इनसान सठिया भी तो जाता है, कि लगता है अन्दर होने और न होने के बीच लगातार छीना-झपटी चलती रही है. जब से भी होश संभाल के दुनिया को देखा है, आल-औलाद, घर-ख़ानदान, बुनियादी जिम्मेदारियां -मैं सकीना आपा से कहना चाहता था कि आप या आपकी आल-औलाद में होना है कहां? सब न होने ही न होना है! मगर चुप रहा था. वह मेरा पता आपा से लेकर महज़ मुझसे मिलने पन्द्रह किलोमीटर की दूरी बस में तय करके आई थीं और घर, ख़ानदान, औलाद के बारे में अपनी ज़बान में अपने ख्य़ाल बता रही थीं. यानी उन तमाम चीज़ों के बारे में जो उन्हें प्यारी थीं,
-चलिए, मैंने हंसकर कहा- ढूंढिए आप कोई लड़की जो मुझसे शादी करने पर राज़ी हो. मैं न करूं तो नाम बदल दीजिएगा.
वह लौट गई थीं. मैं ख़ुद गली के नुक्कड़ तक उन्हें कार में छोड़कर आया था. वह दुआएं देती रही थीं और मैं जल्दी ही आने की यक़ीनदहानी करता हुआ वापस आ गया था. मैंने कुछ पैसे देना चाहे थे तो उन्होंने साफ़ कह दिया था- कुछ देना हो तो घर ही आकर देना.
कुछ समय बाद सिकन्दर ज़ैनब को मनाकर वापस ले जाने में कामयाब हो गया था, फिर एक सिलसिला शुरू हो गया था. सिकन्दर और ज़ैनब के बीच लड़ने-झगड़ने, रूठने-मनाने का. मेरा यह ख्य़ाल पुख़्ता हुआ था कि सकीना आपा और उनकी औलाद की ज़िन्दगी से ज्य़ादा बेमतलब और नीरस शायद ही कोई सिलसिला हो.
वक़्त रफ़्तार पकड़ लेता है और आस-पास के बदलाब और सरगर्मियां तेज़ हो जाते हैं. आपा फ़ोन पर बताती हैं कि सकीना आपा मुझे याद कर रही हैं, उनकी तबियत कुछ गम्भीर रूप से ख़राब है. मुद्दतों बाद मैं फिर उस गली और कोठरी में जाता हूं. एक दूसरी ही सकीना आपा, साफ़-सुथरी और हल्की-फुल्की, प्याजी रंग के कपड़ों में तकिए से टिककर बैठ जाती हैं. आवाज़ बमुश्क़िल निकलती है, मेरे कान में कहती हैं- लड़की नहीं ढूँढ़ पाई! ज़रा ठीक हो जाऊं.
सकीना आपा, ऊपरी तौर पर देखा जाए, तो एक लम्बी ज़िन्दगी जीने के बाद दुनिया से रुख़्सत हो जाती हैं.कड़वाहट के लम्हों में मैं ख़ुद से सवाल करता हूं- इनसानों की तक़दीर कौन लिखता है? अगर सकीना आपा निरर्थक ही जीं तो मरते समय उनके चेहरे पर सुकून और इत्मिनान क्यों था? उनका जीवन बेमक़सद ही था तो मुझे इतनी तफ़सील से क्यों याद रह गया? मैं याद करता हूं स्लॉटर-हाडस के क़रीबो-दूर, दरख़्तों और मकानों की खपरैलों पर बसेरा करते बुड्ढ़े गिद्धों को: शायद उनके पास मेरे सवालों का कोई जवाब हो! आसमान में भेड़ों के रेवड़-से हांकते, सफ़ेद बादलों के गुच्छों को देखता मैं अपने आप से दोहराता हूं- इनसानों की तक़दीर कौन लिखता है?
बादल हवा में तैरते-गुज़रते रहते हैं, गिद्धों की उम्र बहुत लम्बी होती है, और मैं उम्र की संकरी गलियां तय करता इतनी ज़िन्दगी गुज़ार चुका हूं कि जो कुछ बीत चुका है, उसके गवाह कम ही रह गए हैं.
ज़ैनब अपने पति को कोसती, उससे लड़ती-झगड़ती, तीन बेटियों की शादी कर चुकी है और उसका इकलौता बेटा, डिप्लोमा करने के बाद पिछले कई वर्ष से मिडिल ईस्ट में काम कर रहा है. सिकन्दर रहा जितनी भी दूसरी औरतों के साथ हो, बिलआख़िर अब ज़ैनब और उसकी औलाद के साथ है.
बेटे के बाहर जाने से उनके ज़ाहिरी हालात में भी सुधार हुआ है. इन दिनों ज़ैनब बेटे के लिए लड़की ढूंढ़ रही है. ख़ुद में आए बदलाव पर पर्दा डालने या उस बदलाव को और उजागर करने की मंशा से वह लापरवाही से ख़ानदान के एक-एक ऐसे घर में जा रही है जहां लड़कियां हैं: यह कहते हुए कि यह रिश्ता आपस में ही हो जाए तो अच्छा है. वह उन रिश्तेदारों के घर ख़ासतौर पर जा रही है जो कल तक उसे पहचानने से इनकार करते थे या उसके आने को कुछ मांगने की भूमिका समझकर अपने-अपने ग़ैरज़रूरी कामों में व्यस्त हो जाते थे. आज वह उससे मुस्कुराकर मिलने पर मजबूर हैं. मैं एक दूर का तमाशाई, स्लॉटर-हाउस के उन गिद्धों जैसा ही, ऊंचान से सब कुछ देख रहा हूं और सोच रहा हूं कि चीजें क्या यूं भी बदलती और बेमतलब से बामतलब होने लगती हैं? इस कहानी, या सकीना आपा का ही शब्द इस्तेमाल किया जाए तो 'तमाशा' में, उनके न रहने के इतने समय बाद किसी क्लाइमेक्स की उम्मीद कैसी?
ख़ानदानवालों में नाराज़गी है, ज़ैनब के रवैए में आए बदलाव के साथ-ही-साथ इस बात से कि उनके 'हां' या 'ना' का इन्तज़ार किए बिना ही उसने बेटे की मंगनी एक दूसरे परिवार में कर दी है. लोग, दबे अल्फाज़ में उन अहसानों को भी गिनाने से बाज नहीं आ रहे हैं जो बीते समय में कभी उन्होंने या उनके बुज़ुर्गों ने सकीना आपा ओर उनके परिवार पर किए थे. लड़के का रिश्ता एक उम्मीद से भी बेहतर परिवार में हुआ है, इससे उन गिनती के लोगों को भी ईर्ष्या है जो कल तक ज़ैनब की वकालत में दो शब्द बोल दिया करते थे.
ज़ैनब का बेटा आएगा, शादी के दावतनामे बंटेंगे, निक़ाह होगा, फिर बारात और बाद वलीमा.
और उसके बाद? उसके बाद क्या होगा? क्या दूल्हा-दुल्हन, ख़ुशो-ख़ुर्रम, हमेशा-हमेशा के लिए साथ रहने लगेंगे?
ऐसा हुआ तो मुझे ख़ुशी होगी लेकिन सकीना आपा और उनकी औलादों के साथ बीते समय में जो हुआ है, वह मुझे तरह-तरह के अन्देशों में डालता है और सोचने पर मजबूर करता है कि यहां भी सब बिगड़ सकता है! बावजूद सकीना आपा के ज़िन्दगी को ही इबादत और इबादत का फल मानने के यक़ीन से क्या कहा जा सकता है, इसी को सकीना आपा ने 'होने' और 'न होने' के बीच छीना-झपटी कहा था जिसमें उनकी औलाद के हिस्से, अभी तक तो 'न होना' ही आया था.
मेरे अन्देशों से बेख़बर, ज़ैनब के यहां शादी की तैयारियां ज़ोरों से चल रही हैं. उसका बेटा शहर आ चुका है और शादी से पहले अपना ख़ुद का मकान बनवाने में व्यस्त है. मुझे नहीं मालूम, मेरे अन्देशे अगर निराधार साबित हुए तो अपने नए मकान में पत्नी के साथ ज़िन्दगी की नई शुरुआत करते हुए उसे कभी मस्जिद की वह सात कोठरियां याद आएंगी या नहीं जहां उसकी नानी ने अपनी आधी उम्र और मां ने बचपन और नौजवानी बिताई थी, शायद नहीं आएंगी.
शायद यह याद न आना ही वह बिन्दु है जहां ज़िन्दगी फिर एक नई शुरुआत की ओर लौटती है.
- क्या सचमुच, ज़िन्दगी एक नई शुरुआत की ओर लौट सकेगी...
अपने आप में अकेला छूटा रह गया मैं जब ख़ुद से यह सवाल पूछता हूं तो सकीना आपा, आलम, जमीला, अत्तू मियां, शकीला, कनीज़ा, शहंशाह, नवाब और वह स्लॉटर-हाउस, तंग गलियां, सड़ी नालियां, सब-के-सब उस तरह जीवित हो उठते हैं जैसा कभी मैंने उन्हें देखा था, और देखते हुए कभी नहीं सोचा था कि वह मुझे इस तरह याद रह जाएंगे, जो आज भी तेज़ रफ़्तार ज़िन्दगी की निगाहों से ओझल अपनी जगह ज्यों-की-त्यों मौजूद हैं, और कुछ दूसरे नाम और चेहरे, वहां अपनी ज़िन्दगी काट रहे हैं.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें