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पुस्तक समीक्षा- विचार तरंग: साहित्यिक मूल्यों का पुनर्वास

सतत अध्यापन लेखन से प्रेम शंकर त्रिपाठी ने धीरे-धीरे एक बड़ी सी लेखमाला ही गूंथ ली, जिसे विचार सीरीज का नाम देकर प्रकाशित कराया.

जीवन और साहित्य का संस्कारी संग्रह जीवन और साहित्य का संस्कारी संग्रह

साहित्य देवता की देहरी पर जब-जब जाना हुआ है, अत्यंत विनयशील भाव से. सदियों की विचार परंपरा में हमारे आर्षग्रंथों महाभारत, रामायण, उपनिषद, आरण्यक का महत योगदान रहा है. साहित्य क्या है, संवेदना क्या है, शब्द क्या है, अर्थ क्या हैं, भाषा क्या है, इन तमाम प्रश्नों से गुजरते हुए हमने पाया कि साहित्य की विपुल वसुधा में हर चीज का अपना महत्त्व है. बचपन में किसी पुस्तक को छूते ही जो अहसास होता था, उसकी गंध का, उसके स्पर्श का, उसके प्रीतिकर प्रभाव का, वह तो अनिर्वचनीय है. उन अहसासों को पुख्ता करने में हमारे अध्यापकों की भी भूमिका रही है. वे अध्यापक अब न जाने कहां होंगे, जो भीतर साहित्य की लौ जगा कर तिरोहित हो गए. वह लौ आज भी अबाध जल रही है. जो सुख ऐसे अध्यापकों की छत्रछाया में मिलता था, जो प्रसाद, पंत, रसखान, सूर, कबीर को इतने सरलीकृत ढंग से समझाते थे कि मन प्रसन्न हो उठता था. लेखकों का जीवन आदर्श लगता था. कवि मन ऐसी ही कल्पनाओं में रमने का अभ्यस्त हो चुका है. ऐसे ही अध्यापकों साहित्य रसिकों में प्रेमशंकर त्रिपाठी आते हैं जिनके निकट जरा देर बैठिए, तो गीतों की निर्झरिणी बहने लगेगी. पुराने कवियों के कवित्त से लेकर आज के सुधी कवियों के उद्धरण उनके होठों पर तरंगित हो उठते हैं.

सारस्वत प्रज्ञा के धनी
सतत अध्यापन लेखन से उन्होंने धीरे-धीरे एक बड़ी सी लेखमाला ही गूंथ ली जिसे विचार सीरीज का नाम देकर प्रकाशित कराया. उनके निबंध पढ़ते हुए मुझे आचार्य विष्णुकांत शास्त्री याद आते हैं, तो प्रो कल्याणमल लोढ़ा भी. साहित्य की सारस्वत प्रज्ञा जिसे कहते हैं, उसके साकार उदाहरण हैं वे. अभी उनके निबंधों की पुस्त‍क विचार तरंग प्रकाशित होकर आई, तो उसे पढ़ते हुए चित्त दोलायमान हो उठा. हिंदी को लेकर इतने प्राणवान निबंध यहां हैं, बंगाल में हिंदी हो, या स्वदेश और स्वभाषा का मसला हो, युगप्रवर्तक भारतेंदु के काव्य वैशिष्ट्य की बात हो, या पं माखनलाल चतुर्वेदी का कवि संकल्प, फागुन की रसमयता हो, या पंडित जसराज, हनुमान प्रसाद पोद्दार, विष्णुकांत शास्त्री का स्मरण हो या विवेकानंद का स्तवन उन्होंने पूरे प्यार और आवेग के साथ अपने निबंधों को भाषा की बंकिम छवि से मंडित किया है. सारस्वत प्रतिभा के धनी प्रेमशंकर त्रिपाठी का जीवन और साहित्य प्रांरभ से ही कुछ उदात्त जीवन उद्देश्यों को समर्पित रहा है. वे उस मिट्टी की उपज हैं जहां निराला जन्मे‍, जहां साहित्य के दिग्गज डॉ रामविलास शर्मा जैसे आलोचक पैदा हुए; बैसवारे की इस ज़मीन का असर रहा कि प्रेमशंकर के विचारों का वैसा ही पल्लवन हुआ. कोलकाता के साहित्यिक परिदृश्य में उनका होना उस परंपरा का होना है जिसका अब अवसान हो रहा है.

हिंदी के बड़े साहित्यकारों के साहित्यिक मूल्यों का अनुसरण करने वाले त्रिपाठी ने अपने लिए यों तो कविता की नम ज़मीन चुनी थी, गाहे ब गाहे वे सुललित रचनाएं करते रहते हैं किन्तु उनकी प्रतिभा निबंध लेखन में उत्तरोत्तर परवान चढ़ी. नागर पर शोध के कारण उनकी विवेचक प्रज्ञा पर भाषा का ऐसा पानी चढ़ा जिसने निरंतर उनके विचार-विवेक को तरंगित बनाए रखा. विचार उनके लेखन के केंद्र में रहा है, जिसने न केवल उनके लेखक व्यक्तित्त्व को रचा बल्कि उस पथ पर उन्हें निरंतर चलने को अग्रसर किया है जिसे कुंवर नारायण ने वाजश्रवा के बहाने में अकाट्य जीवन विवेक कह कर याद किया है.

विचार विविधा, विचार वीथिका, विचार विहग और अब विचार तरंग के माध्यम से उन्होंने अपने समय के लेखकों, कवियों और प्रवृत्तियों पर जो कुछ लिखा है, वह जीवन और साहित्य का एक संस्कारी लेखन है जो अब विरल ही देखने को मिलता है. मुझे तो उनकी गति, मति और प्रज्ञा को देखकर यही लगता है कि जो काव्य के प्रयोजन मम्मट ने बताए हैं, वहीं प्रयोजन उनके लेखन के हैं. कहना न होगा कि 'विचार तरंग' के निबंध जीवन और समाज से लुप्त होते जा रहे साहित्यिक मूल्यों का पुनर्वास हैं.

बंगाल की हिंदी पर विशेष रोशनी
आइये इस पुस्तक के निबंधों की कुछ बानगी देखें कि वे किन विचार तरंगों में बहते हैं जब किसी विषय या किसी व्यक्तित्त्व पर लिख रहे होते हैं. बंगाल में हिंदी पर उनका लगभग एकाधिकार है. वे उत्तर प्रदेश से कोलकाता आकर बसे तो यहीं के होकर रह गए. उन्हें बांग्ला बोलते देख कोई शायद ही कह सके कि वे उन्नाव के बैसवारा इलाके के हैं जिनका पश्चिमी अवधी पर भी एकाधिकार है. वे 30 मई, 1826 को कोलकाता से निकले और युगल किशोर शुक्ल के द्वारा संपादित हिंदी के पहले साप्ताहिक समाचार पत्र 'उदंत मार्तण्ड' पर लिखते हैं तो उसका पूरा इतिहास उकेर देते हैं. यह जानना सुखद है कि जिस युग में अंग्रेजी, फारसी व बांग्ला में ही अखबार छपा करते रहे हों, वहां हिंदी में अखबार पढ़ने को मिले तो हिंदी भाषियों को कितनी प्रसन्नता हुई होगी. इससे पहले माना जाता था कि हिंदी का पहला अखबार काशी से प्रकाशित 'बनारस अखबार' है. पर बाद में शोध से ज्ञात हुआ कि 'उदंत मार्तण्ड' देश का पहला हिंदी समाचार पत्र है जो अहिंदीभाषी इलाके से निकला.

बंगाल में हिंदी का विहंगावलोकन करते हुए वे फोर्ट विलियम कालेज के अवदान को सराहे बिना नहीं रहते जहां कभी लल्लू लाल, सदल मिश्र, सदासुखलाल 'नियाज' व इंशा अल्ला खां ने हिंदी के पठन पाठन, पुस्तकों के प्रकाशन से हिंदी भाषा व साहित्य के पठन पाठन का पथ प्रशस्त किया. त्रिपाठी बताते हैं कि कोलकाता में ही 1901 में स्थापित श्री विशुद्धानंद सरस्वती विद्यालय को पूर्वी भारत का प्रथम हिंदी भाषी विद्यालय माना जाता है. इसी के साथ उत्तरोत्तर कलकत्ता में स्थापित हिंदी शिक्षण संस्थाओं का विधिवत परिचय देते हुए उन्होंने सीताराम सेकसरिया, घनश्यामदास बिड़ला, भागीरथ कानोड़िया, रामकुमार गोयनका, हरिकृष्ण झांझड़िया, अभिमन्यु भुवालका व सरदारमल कांकरिया आदि मनीषियों के अवदान की चर्चा की है. उन्होंने यह  भी बताया है कि 1919 में सर आशुतोष मुखोपाध्याय के प्रयासों से कलकत्ता विश्वविद्यालय में सर्वप्रथम स्नातकोत्तर स्तर पर हिंदी अध्यापन की शुरुआत हुई तथा ललिताप्रसाद सुकुल व प्रो कल्याणमल लोढ़ा तथा तदनंतर आचार्य विष्णुकांत शास्त्री के प्रयासों से इस विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग ने नई ऊंचाइयां प्राप्त कीं. इस तरह बंगाल में हिंदी विषयक इस निबंध श्रृंखला की अनेक कड़ियां यहां पिरोई हैं उन्होंने- हिंदी निष्ठ संस्थाएं तथा समर्पित साहित्य साधक;  ज्योत्सना की काव्य सुरभि; पश्चिम बंगाल में हिंदी भाषी समाज व श्री बड़ाबाजार कुमारसभा पुस्तकालय के सौ वर्ष के बारे में लिख कर उन्होंने कोलकाता में हिंदी के अतीत और वर्तमान की यात्रा की एक समेकित झांकी ही यहां दे दी है. हिंदी के बारे में उनके विचार अनेक निबंधों में बिखरे हैं. हिंदी व राष्ट्रभाषा के अनेक साधकों भारतेंदु हरिश्चंद्र, माखन लाल चतुर्वेदी, हनुमान प्रसाद पोद्दार, विष्णुकांत शास्त्री व न्यायमूर्ति प्रेमशंकर गुप्त पर विरल जानकारियां प्रस्तुत की हैं.

निबंधों की खासियत
इन निबंधों की खास बात यह कि ये निबंध भारतीय संस्कृति के परम अध्येता व हिंदी के अनन्य समर्थक द्वारा लिखे गए हैं. त्रिपाठी कोलकाता या अन्यत्र जहां भी बोलते हैं, अपनी भाषा व सुललित तर्क से मन मोह लेते हैं. कोलकता के वयोवृद्ध हिंदी लेखक कृष्ण बिहारी मिश्र के बाद यदि आपको कोलकता में कहीं लालित्यपूर्ण हिंदी मिलेगी तो वह प्रेमशंकर त्रिपाठी से सुनने को मिलेगी. बंगाल में रहते हुए वे बांग्ला  व हिंदी के बीच कोई विभेद नहीं करते. एक पुल बनाते हैं. हिंदी व बांग्ला दोनों भाषा के अकिंचन प्रेमियों की भाषाएं हैं. औपनिवेशिक मूल्यों से संघर्ष करने वाली भाषाएं हैं.  वे हिंदी काव्य के इतने सुपठित अध्येता हैं कि आप उनसे रीतिकाल, छायावाद, ओज और उदात्त के कवियों का जिक्र भर छेड़ दें तो आपके सम्मुख वे पद्माकर, बिहारी, रसखान, जायसी, रहीम, रसलीन, फाग, बेहतरीन सवैये, घनाक्षरी और बरवै की झड़ी लगा देंगे और दुष्यंत कुमार, अदम गोंडवी और शिवओम अंबर भी होठों पर खेलते हुए मिलेंगे. कहना यह कि पोर पोर साहित्य और साहित्यचर्या के रस से ओतप्रोत ऐसे व्यक्ति आपको पूरे हिंदुस्तान में कुछ विरल ही मिलेंगे. आप कहीं बोलने वाले हैं, किसी परीक्षा में बैठना है, साहित्यकारों की संगत में हैं, ये निबंध से आपकी मदद करेंगे और साहित्य की सदानीरा में अपने साथ बहा ले जाएंगे.

विचार तरंग के इस निबंधकार के बारे में अधिक क्या! मारीशस में आयोजित विश्‍व हिंदी सम्‍मेलन से विश्‍व हिंदी सम्‍मान प्राप्‍त कर लौटने पर उन पर लिखे मेरे ये कवित्त उनकी महिमा का साकार परिचायक हैं:

प्रेमसुधा रस भीनी लगै जिन प्रेम त्रिपाठी की कोमल बानी
कोलकाता की धरा पे विभूषित विश्व में भव्य छटा फहरानी
धन्य हुई बैसवारे की माटी जहां मगरायर क्षेत्र लासानी
राजपुरा का गढ़ेवा है गांव जहां कितने हुए ज्ञानी और ध्यानी

जन्मे वहीं हैं निराला कभी, वाजपेयी अशोक का गांव वही है
भाषा के पंडितों के गुण ग्राहक साहित्य का चारो धाम वहीं है
जन्मे हैं राम विलास जहां शिवमंगल सुमन की ठांव वही है
छलकी जहां रस छंद की गागर प्रेम त्रिपाठी का गांव वही है

गीत के आशिक छंद के आशिक प्रेम त्रिपाठी की लीला है न्यारी
आइ बसे बंगाल की उर्वर भूमि में फैलि गयी उजियारी
देते रहे संस्कारों की सीख बनाते रहे शिष्यों को आभारी
मोह लिया मिलते ही सभी को सभी के हिये में खिली फुलवारी.

ऐसे काव्यप्रेमी, ललित निबंधों के सर्जक, सुललित वार्ताओं के रसिक डॉ प्रेमशंकर त्रिपाठी के धीर ललित निबंधों की यह पुस्तक अपने वैविध्यपूर्ण ताने बाने के कारण विद्वानों व साहित्य रसिकों के मध्य सराही जाएगी, ऐसा विश्वास है.
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पुस्तक: विचार तरंग
लेखक: डॉ प्रेमशंकर त्रिपाठी
विधाः निबंध/लेख
भाषाः हिंदी
प्रकाशक: श्री बड़ाबाजार कुमारसभा पुस्तकालय, कोलकाता
पृष्ठः 157
मूल्यः 300 रुपए

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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. आपकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. आप हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, मेल dromnishchal@gmail.com

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