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प्यार झुकने की तमीज़ है और उठने का साहसः कविता-विवाद के केंद्र में प्रेमशंकर शुक्ल

बीते कुछ समय से भोपाल के कवि प्रेमशंकर शुक्‍ल की कुछ कविताएं अश्‍लीलता के आरोपों के कारण चर्चा में हैं. सोशल मीडिया पर इन कविताओं के पक्ष विपक्ष में अनेक साहित्‍यिक लोग सक्रिय हैं. क्‍या है यह पूरा प्रसंग और इन कविताओं में ऐसा क्‍या है जो अश्‍लील है, इस मसले पर लेखकों-कवियों की राय तथा शुक्‍ल के कवित्‍व के आयाम पर प्रकाश

प्रेमशंकर शुक्लः चर्चा व विवाद के केंद्र में कविताएं प्रेमशंकर शुक्लः चर्चा व विवाद के केंद्र में कविताएं

बीते कुछ समय से भोपाल स्थित भारत भवन के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी के संग्रह 'शहद लिपि' एवं 'जन्म से जीवित है पृथ्वी' एवं 'पृथ्वी पानी का देश है' की कुछ कविताएं चर्चा में हैं. उन पर साहित्यिकों के एक वर्ग द्वारा अश्लीलता का आरोप लगाया गया है. 'शहद लिपि' प्रेम की समग्रता का संचयन है इसलिए इसमें प्रेम के ऐंद्रिक क्षणों को दर्ज करना, निजता को काव्य कौशल के साथ उद्घाटित करना उचित ही है. कविता की दुनिया में आदि काल से प्रणय क्षण प्रेम कविताओं के लिए कभी भी वर्जित नहीं, बल्कि अर्जित प्रयोजन रहे हैं, इसे अश्लीलता कह कर नकारना हमारे वांग्मयजनों की अल्पज्ञता का प्रमाण है. कविताओं की आड़ लेकर किसी व्यक्ति की अर्थात कवि को जीविका से च्युत करने की धमकी देना, षडयंत्र करना किसी भी दृष्टि से जायज़ नहीं ठहराया जा सकता है बल्‍कि यह कतिपय लोगों द्वारा किए जा रहे कविताओं के कुपाठ को ही प्रकट करता है.
इन कविताओं पर अश्लीलता का सवाल उठाए जाने पर हिंदी के जाने माने आलोचक विजय बहादुर सिंह ने लिखा, ''जिस देश में आचार्य वात्स्यायन ने कामसूत्र की रचना की, कालिदास ने माता पार्वती के पुष्ट यौवन का वर्णन किया, उनसे पहले वाल्मीकि और व्यास ने सीता और द्रौपदी के यौवन को भरपूर अंतर्दृष्टि से निहारा और चित्रित किया, उस देश में जीवन और उसके सौंदर्य को अश्लील कह कर निंदित करने से पहले यह रहस्य भी जान लेना होगा कि सूर ने क्या-क्या कृष्ण को लेकर लिखा है. आश्चर्य होता है यह लेखकों की कौन सी बिरादरी अचानक मौसमी कीट पतंगों जैसी उभर आई है जिन्हें न बच्चन याद रहे, न प्रसाद निराला. न भारती और अन्य.
प्रसाद के आँसू की ये पंक्तियां पढ़िए-
परिरम्भ कुम्भ की मदिरा नि:श्वास मलय के झोंके
मुख चंद्र चांदनी जल से नित उठता था मुँह धो के.
अब कालिदास के मेघदूत की ये पंक्तियां पढ़िए-
संभोगान्ते मम समुचितोहस्तसंवाहनानां
यास्यत्युरू: सरसकदलीस्तम्भगौरश्चलत्वम्. (33वाँ छंद. उत्तर मेघ.)
भारतीय संस्कृति के अपढ़ लेखकों को अपनी दुश्मनी निकालनी है प्रेम शंकर शुक्ल से. इसमें उनका कवि कहां से शामिल है?''
इस बारे में सुपरिचित युवा कवि आशुतोष दुबे प्रेमशंकर शुक्‍ल के संग्रह और आरोपों के मद्देनजर कवि की उन कविताओं के पक्ष में नजर आए तो कथाकार ममता कालिया ने लिखा, ''पिछले कुछ अरसे से प्रेमशंकर अपनी कविताएं स्वयं अपनी वाल पर लगाते रहे हैं तो किसी के अंदर कोई विक्षोभ का बवंडर नहीं उठा. उन्होंने पाया कि शहद लिपि में कोई लिंगगत अवमानना नहीं है. एक भी स्त्री की ओर से ऐसा आक्षेप नहीं आया. उन्होंने कहा कि हमारा देश कवि की अभिव्यक्ति को लेकर सहिष्णु रहा है.''  
इंदौर के एक अखबार में कवि आशुतोष दुबे ने लिखा कि इधर कविता के कोतवाल सामने आ गए हैं जो कविता लिखने के जुर्म में अपनी तरफ से सजा सुना रहे हैं. उन्होंने लिखा कि ''शहद लिपि'' जिसकी कुछ कविताओं को लेकर अश्‍लीलता का आरोप मढ़ा जा रहा है, वह कोई दो सौ से ज्या‍दा प्रेम कविताओं का संग्रह है, जिसमें ऐद्रियप्रेम के साथ दैहिकता की भी एकाधिक कविताएं हैं जिससे कवि प्रेम का पूरा रूपक गढ़ सके. उन्होंने कवि की 'आदि पालथी' कविता को लेकर उस पर लगाए गए धार्मिक आधार पर अपमान व अश्लीलता के आरोप के संदर्भ कहा कि यह कविता शिव के अर्धनारीश्वर रूप को बहुत कलात्मकता और सौंदर्यबोध के साथ चित्रित करती है तथा तमाम बड़े साहित्यकारों ने इसे एक श्रेष्ठ कविता का दर्जा दिया है.
ध्यातव्य है कि प्रेम कविताएं परंपरा से भारतीय काव्य का हिस्सा रही हैं. कालिदास, जयदेव, विद्यापति, बिहारी, घनानंद जैसे कवियों से लेकर आज के कवियों में केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर, अशोक वाजपेयी, चंद्रकांत देवताले, लीलाधर जगूडी, ज्ञानेंद्रपति आदि ने प्रेम और गहरे ऐंद्रियबोध की कविताएं लिखी हैं. श्रृंगार को रसराज कहा गया है. संस्कृत हिंदी में इसकी गहरी परंपरा रही है. आदि शंकराचार्य ने 'सौंदर्यलहरी' लिखी लेकिन उसके लिए वे निंदित नहीं हुए. रीतिकाल के कवियों ने तो काम और रति की बहुव्यंजक उद्भावनाएं व्यक्त कीं किन्तु अर्थ की नई उदभावनाओं के लिए आज भी लोग रीतिकाल के कवियों का लोहा मानते हैं. रीतिकाल प्रेम और काम की काव्यात्मक उत्सवता का काल है. राधा-कृष्ण के प्रेम को लेकर कितने सारे काव्य-खंडकाव्य-महाकाव्य लिखे गए हैं. कनुप्रिया में व्यक्त धर्मवीर भारती की अनुरागमयता से भला कौन अपरिचित होगा.
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किन कविताओं को बताया जा रहा अश्लील
यों तो प्रेमशंकर शुक्‍ल पर कटाक्षों का यह अभियान कोई दो साल से चल रहा था, पर वे सारे अभियान फेक आईडी से चलाए गए जो बाद में डिलीट कर दिए गए. पर इस बार पुन: इसकी शुरुआत 11 जुलाई से हुई जब एक स्टेटस पर कहा गया कि यह 'कविता में मस्त राम का प्रवेश' है. इनमें जिन कविताओं को चिह्नित किया गया वे थीं, अंगराग, कहना भी, मीठी पीर, आदि पालथी, अनावरण, रचा पान, केलि और जल चढ़ाता हूं. कितनी विडंबना है कि एक बड़ी रेंज और विषय के कवि को ऐसी गर्हित संज्ञा से उस तबके की ओर से अभिहित किया गया जिनकी साहित्य में कोई हैसियत नहीं है. प्रेमशंकर ने अपने अब तक के पूरे काव्य में अपने समय को गाया है. भोपाल, ताल, झील, भीमबैठका, खजुराहो और भारतीय संस्कृति के मूलगामी प्रतीकों और परंपरा से गाए जा रहे तत्वों का अनुगान किया है. उन्हें ऐसी गर्हित संज्ञा से अभिहित किया जाना यह बताता है कि ऐसे लोगों का न केवल उसकी कविता से बल्कि हिंदी की अपनी कविता परंपरा से भी कोई गहरा परिचय नहीं है. वह संस्कृत काव्य के मर्म को भी नहीं जानते जो हमारे काव्य की आधारभूमि है. यह जोइ सोइ कछु गा कर आपस में पीठ थपथपाने वाला वर्ग है.
आइये देखते हैं अश्लील बताई जा रही कविताओं में ऐसा क्या है जो लोगों को नागवार गुजरा है. अंगराग 'शहद लिपि' की कविता है जिसमें कवि लिखता है-
नाभि पृथ्वी की अंतिम गहराई है
योनि सुख रंध्र
उरोज सबसे ऊंचे पहाड़ जिनके भीतर सांसों के झरने बजते हैं.
यह कविता पृथ्वी का मानवीकरण करते हुए अपने उदात्ता तल पर वहां पहुंचती है, जहां कवि इस कविता का केंद्रीय निहितार्थ यानी प्रयोजन सामने रखता है- 'प्यार ऐसी पूंजी है जिसे मासूमियत से खर्च करने पर ही आत्मा की आय बढ़ती है.' लेकिन इसमें कविता और कविता का प्रयोजन नहीं, हेतु नहीं, केवल शब्द पढ़ने वाले और उसमें अश्लीलता का अपना अवधारण लपेटने वाले न तो कविता के आलोचक हैं, न रसिक, न जीवन और उसकी अभिवृत्तयों के प्रेक्षक. उन्हें नाभि और योनि शब्द दिखा  और अश्लीलता का आरोप मढ़ते हुए कविता पर पिल पड़े. जिस देश में 'पर्वतस्तनमंडले' कह कर विष्णु पत्नी की आराधना की गयी हो वहां पहाड़ को उरोजों से तुलनीय मानना कहां का अतिरेक या वर्जित उपमेय है? यह कविता जब मई 2017 में सोशल मीडिया पर शुक्‍ल द्वारा खुद ही डाली गयी तो हिंदी के जाने माने लेखकों, कवियों सवाई सिंह शेखावत, बाबुषा कोहली, स्वप्निल श्रीवास्तव, तरसेम गुजराल, शरद कोकास व कथाकार मुकेश वर्मा आदि ने सराहना की. मुकेश वर्मा ने लिखा कि यह समय ऐसी ही कविताओं का है. जानी-मानी युवा कवयित्री बाबुषा ने लिखा कि यह देहभाषा से प्रारंभ होकर अपनी सीमाएं पार करती हुई आत्मा की ऊपरी त्वचा स्पर्श करने वाली कोमल कविता है-  और विडंबना देखें कि आज चार वर्ष बाद कवि से संबंध बिगड़ने पर कविता को अश्लील बताया जा रहा है.
'आदि पालथी' कविता कवि के संग्रह 'जन्म से जीवित है पृथ्वी' से है गृहीत है. यह शिव के अर्धनारीश्वर रूप की कवि कल्पना है. इसे कवि ने 11 मार्च, 2021 को अपनी वाल पर लगाया तो प्रशंसकों की भीड़ उमड़ पडी. इसमें शिव की पालथी मु्द्रा में उनकी जांघ पर पार्वती के पांव और पार्वती की जंघा पर शिव के पांवों की कल्पना की गई और आधे-आधे होठों से शिव व पार्वती के मुस्कान की पूर्णता को अर्धनारीश्वर के एकात्म भाव के रूप में व्यंजित किया गया. लेकिन कालिदास वर्णित कुमारसंभव में शिव पार्वती केलि प्रसंग को पचाने वाले समाज को तो नहीं किन्तु कविता को अश्लील बताने वाली टोली को यह कविता इसलिए बुरी लगी कि हाय शिव-पार्वती के प्रेम को भी कवि ने नहीं बख्शा. जिस देश में महान कवि कालिदास इससे भी आगे की काम और फोरप्ले प्रविधि का वर्णन लिख चुके हों, वहां प्रेमशंकर की क्या बिसात? वे तो अपने काव्य में उस दृश्य का पुनरावलोकन भर कर रहे हैं. इस प्रसंग पर संस्कृत के मर्मज्ञ आलोचक पं राधावल्लभ त्रिपाठी ने कहा, 'शिव पार्वती के अर्धनारीश्वर रूप का अदभुत वर्णन राज भोज के समकालीन कवि छित्तप ने किया है. शिव और पार्वती इस दो रूप में एकमेक हो गए हैं फिर भी वे एक दूसरे से प्रेम करते हैं. पर यह कैसा अनोखा प्रेम है कि इसमें मेखला नहीं टूटती, आलिंगन और चुंबन नहीं होता.'' यानी कवि ने एक दूसरे को पूरा करते अर्धनारीश्वर शिव-पार्वती की छवि को मूर्त किया है. अब देखें कि बिना किसी चुंबन-रमण की कवि कल्पना के ही लोगों ने इसे अश्लील करार दिया वह भी उज्जैन,  भोज और कालिदास की नगरी वाले मध्यप्रदेश में कविता के अल्पपाठ पर उतारु कवि समाज ने. जाहिर है पुन: निंदा के केंद्र में कविता नही, कवि है.
इस कविता की भूरि-भूरि सराहना करने वालों में वंदना देव शुक्ल, आनंद गुप्ता, राहुल राजेश, प्रिया वर्मा, प्रो चंद्रकला त्रिपाठी, पंकज चौधरी, स्त्रीवादी कवयित्री श्रुति कुशवाहा व सुशीला पुरी जैसे लोग हैं और जब यही कविता अश्लीलता के आरोपों को खुरचते हुए कवि आशुतोष दुबे ने अपनी वाल पर इस पर एक स्टेटस लिखा तो उस पर 132 टिप्पणियां प्राप्त हुईं. किसी एक ने भी कविता को अश्लील नहीं बताया. संध्‍या नवोदिता ने इसे सुंदर कविता कहा तो प्रशासक कथाकार तरुण भटनागर ने अच्छी कविता माना. शिरीष मौर्य, स्मि‍ता सिन्हा, वीरू सोनकर, बसंत सकरगाए आदि कवियों ने इसकी मुक्त कंठ प्रशंसा की. सकरगाए ने लिखा, कविता के चूके हुए नेत्रहीन चौहानों के दिमाग में ही अश्लीलता भरी हो तो क्या  किया जाए. कवि और कलाविद यतीन्द्र मिश्र ने इसमें शिव और पार्वती का अविमुक्त भाव देखा और इसे एक सहजात संबंध की संज्ञा दी. प्रशासक मनोज श्रीवास्तरव को इसे पढ़ कर ऋग्वेद की एक ऋचा याद हो आई कि जिन्हें पुरुष कहते हैं वे वस्तुत: स्त्री हैं, जिसके आंख है वह इस रहस्य को देखता है, अंधा इसे नहीं समझता. (ऋग्वेद, 3/164/16 ) कथाकार मनीषा कुलश्रेष्ठ ने इसे मोहक कविता माना तो नवीन रांगियाल ने अद्वितीय. ध्रुव गुप्त ने बहुत खूबसूरत, प्रियंकर पालीवाल ने सार्थक, स्तंभकार कवि हरिमृदुल ने पवित्र कविता कहा तो जानी मानी कथाकार ममता कालिया ने लिखा, ''कविता बहुत उदात्त है. कवि प्रेमशंकर शुक्ल ने शिव पार्वती का बिम्ब लेकर उसे स्वीकार्य बना दिया. वही आदि पालथी सामान्य स्त्री पुरुष की होती तो क्रंदन मच गया होता.'' उन्होंने तो अलग से इस पर एक स्टेटस ही लिखा तथा इस कविता को अनूठी कविता बताया. एनडीटीवी पत्रकार एवं कवि कथाकार प्रियदर्शन ने कहा यदि कोई इस कविता पर सवाल उठा रहा है तो यह कविता की उसकी समझ का मामला नहीं, कुछ और है. कोई शातिर आदमी उनके विरुद्ध माहौल बना रहा है. कथाकार जयश्री राय, कवि यतीश कुमार, वरिष्ठ कवि विनोद पदरज, कवि सुंदरचंद ठाकुर, आलोचक व कवि प्रो. अनिल त्रिपाठी ने उनकी इस कविता की सराहना की है. डॉ. अनिल त्रिपाठी ने तो यहां तक कहा कि आधुनिक हिंदी कविता में अर्धनारीश्वर पर शिव शक्ति के परम औदात्य पर लिख गयी कोई दूसरी इतनी सुंदर कविता याद नहीं आती. पत्रकार अजित वडनेकर ने इसमें अश्लीलता को नकारा, मणि मोहन, अरुण देव कृष्णमोहन झा, नवनीत पांडे, विभारानी और अमृता सिन्हा ने सिरे से अश्लीलता के आरोपों को खारिज किया तथा इस कविता को हिंदी जगत को एक उल्लेखनीय अवदान माना है.

एक अन्य विवादित कविता 'मीठी पीर' को देखें. यह प्रेमशंकर शुक्ल के संग्रह 'शहद लिपि' की कविता है, जो संपूर्णत: प्रेम श्रृंगार और अनुरागमयता का संचयन है. यह इस संग्रह के उप खंड "धड़कनों की जुगलबंदी बहुत रियाज से ही सध पाती है''  में शामिल है. कवि लिखता है-
'(कंचन) जंघाएं अलसाई पड़ी हैं
योनि जागती है
सुख की तलब में

मथे गए उरोज में
उठ रही है
मीठी पीर... यही अंश शायद नागवार गुजरे हैं. देखने वाले ने इसमें केवल जांघ देखी और उसकी कामातुर तलब देखी. ब्रेकेट में लिखा कंचन न देखा. जो कंचनजंघा की खूबसूरत पहाड़ियों की श्रृंखला है. जंघा को कंचन कहना ही एक पूरी पर्वत श्रृंखला और उपत्यका को मानवीकृत सौंदर्यधायी बोध के साथ देखना है. कवि दृष्टि को आप अपने तरीके से हांक नहीं सकते. कंचन कहते ही एक सच्चा काव्य रसिक पर्वतस्तनमंडले की-सी कवि कल्पना का मुरीद हो उठता है. लेकिन कविता को अवमान की नजर से देखने वालों के लिए प्रेमशंकर ने जैसे पहले से यह कविता लिख रखी है-
तुम्हें कभी कविता ने लिखा नहीं
इसीलिए दिखा नहीं कभी तुम्हारे भीतर प्रेम

प्यार किया नहीं
व्यभिचार को कहते रहे प्यार!

तुम्हारे अंदर के इंलाके में
नदारत ही रही करुणा भी
तुम्हें कभी कविता ने लिखा ही नहीं
कविता लिखने के अभिनय में
तुम अपनी पूरी उम्र पी गए! (शहद लिपि, पृष्ठ 208)

'शहद लिपि' की ही कविता 'अनावरण' पर भी अश्लीलता का आरोप है जिसमें कुछ पंक्तियां यों आती हैं-
नाभि के अंधेरे में
आनंद का अतिरेक छलकता है.
तुम मुझे बरजती हो लाज से
लालित्य से मोह लेती हो
देह के जल से आत्मा भीज जाती है
आत्मा की आंच से देह...

आत्मा और देह का कोरस
सुख के गीत में
नए रस भरता चला जा रहा है.... ऐसा लगता है कि नाभि ही समूची अश्लीलता का नाभिक है. लोगों ने कदाचित शमशेर के यहां बिम्बधर्मी प्रेम कविताएं नहीं पढ़ीं या लीलाधर जगूडी का संग्रह 'जितने लोग उतने प्रेम' नहीं पढ़ा जिसमें सघन प्रेम की तमाम व्यंजनाएं भरी हैं या ज्ञानेंन्द्रपति की काव्य कृति 'मनु को बनाती मनई नहीं' पढ़ी जो संपूर्णत: प्रेम कविताओं का ही संग्रह है जिसमें स्त्री को शुभ्र अंगूरी पेठे से तुलनीय माना गया है तथा लौकिक प्रेम की अपूर्व व्यंजनाएं की गयी हैं. चश्में से लड़ते चश्मे और नासिका से लड़ती नासिका का चित्रण किया है कवि ने. यहां उनकी प्रसिद्ध प्रेम कविता 'ट्राम में एक याद' से आगे की कविताएं हैं. एक अन्य कविता 'रचा-पान' पर आपत्ति जताई गयी हैं जिसमें कहा गया है-
तुम अपनी जीभ मेरे होंठ पर फिराओ और पान की तरह रच जाए हमारा प्यार. यह क्या गार्हस्य प्रेम का ही एक स्वरूप नहीं है. यहां तो ब्याह आदि में स्त्री का जुठारा पान दूल्हे को खिलाने की परंपरा है ताकि दोनों का प्रेम पान-रंगे होठों की तरह लालित्य मय हो जाए. यह तो अश्लील नहीं कहा जाता. फिर कविता में इतनी सी कल्पना क्या प्रेम की प्रगाढ़ता की प्रतीति के लिए की गयी नहीं लगती? इसी संग्रह की कविता 'कहना भी' भी अश्लील बताई जा रही है जिसकी उत्तरदायी पंक्तियां ये हैं- ''तुम्हारी नाभि के अंधेरे में मेरी तर्जनी भींग जाती है. हँसी के उजाले में निगाह. दिए की लौ की लय में कांपती तुम्हारी सांसों से प्रकाशित हो रहा मेरा प्यार...तुम्हारी गंध रस गंगाएं पूर रही हैं मेरी आत्मा का हर घाट.'' क्या मानीखेज पंक्तियां हैं. अंधेरे में तर्जनी और उजाले में निगाह- ध्यान इस पर जाना चाहिए था, पर ध्यान गया नाभि और तर्जनी पर. यानी जाकी रही भावना जैसी. वही तो दिखेगा.  

'जल चढ़ाता हूँ' कविता कवि के संग्रह 'पृथ्वी पानी का देश है' में शामिल है जो 2011 में प्रकाशित हुआ था. अब एक दशक बाद कवि के आंखों से खटकने पर उसकी कविता भी खटकने लगी. उसे उसी के औजार से मात देने की दुरभिसंधि ने इस कविता को भी अश्लील करार दिया. कवि लिखता है-
बांसवन की सरसराहट सीने में तेरे सुन रहा
लौटती है लहर जैसे रंग ले तट का
रंगत तुम्हारी भर हृदय में.
वैसे ही मैं हूँ लौटता
उमड़ आयी सांस में मेरी तुम्हारी सांस का बल है.
मैं तुम्हारी नाभि-तल में जल चढ़ाता हूँ...
पूरी कविता कहां और किस पिच से उठायी गयी है उसे नहीं देख ध्यान केवल अंतिम पंक्तियों पर है जहां कवि नाभितल को जलाभिषेक करना चाहता है. अरे भाई, नाभि और योनि तथा शिवलिंग को जलाभिषेक तो आम जनमानस करता है, स्त्रियां करती हैं. शिवलिंग हमारी मानव सर्जना के प्रतीक हैं. ये कहां से अश्लील हो गए जब तक हमारी दृष्टि मलिन और अश्लील न हो. देखने वालों ने प्रेमशंकर शुक्ल के संग्रह 'जन्म से जीवित है पृथ्वी‍' के आखिरी उप खंड रति प्रिया, रतिप्रिया तन्मय शीर्षक से खजुराहो पर लिखी 21 कविताएं नहीं देखीं जो खजुराहो का दिव्य भाष्य हैं. कोई संस्कृति व पर्यटन विभाग अपनी ही भाव संपदा और ऐतिहासिक कामकला अंकन का इतना खूबसूरत भाष्य लाखों रूपये खर्च करके नहीं लिखवा सकता जिसे प्रेमशंकर शुक्ल ने सहज ही संभव कर दिया है. ऐसा किस देश की काम मूर्तियों या चित्रांकनों को आधार बना कर किस कवि ने ऐसी सघन व्यंजनाएं की हैं मुझे नहीं पता. पर देखें कि रतिप्रिया, रतिछंद, आलोकित, स्पर्श सुख, आवरण, सुख संपूर्ति, भाव प्रवण, रति सर्वस्वि, उष्ण‍ सांस, संग अभंग, कलापिनी, शिल्पपद्य, परस, रतिवर्षा, सुख संबंध, सुख विनिमय और विवस्त्र वासना जैसी कविताएं लिख कर कवि ने खजुराहो के प्रेम अनुराग काम व रति के दृश्यों को अपनी भाषा में साकार कर दिया है. एक खजुराहो उसने अपनी कविताओं में उकेर दिया है. और केवल प्रेम रति काम ही क्यों- भीमबैठका एकांत की कविता है, की  कविताएं लिखते हुए वह कितने दिनों रातों भीमबैठका की गुफाओं में वास करता रहा है जैसे वह गुहावासी पूर्वजों का सखा हो. पत्थरों की दुनिया में पत्थरों के मानवीय मनोभावों का ऐसा चित्रण हिंदी में अन्य किस कवि ने किया है मुझे नहीं मालूम.

प्रेमशंकर शुक्ल श्रृंखलाबद्ध कविताएं लिखने व विषयगत काव्याभिव्यक्तियों के अनन्य कवि हैं. ऐसा काम नए कवियों में प्रेमरंजन अनिमेष ने किया है. सुस्थिर और संपूर्ण काव्य‍ की अभिव्यंजना- आज के कवि का महाकाव्यत्व यही है जिसे त्रिलोचन में सीरीजबद्ध सानेट लिख कर संभव किया और बिना महाकाव्य लिखे महाकवि कहलाए. प्रेमशंकर शुक्ल उसी कोटि के पुण्यप्रभ कवि हैं जिनमें धरती, जल, वायु, अग्नि, जड़ चेतन और राष्ट्र की संपदा के प्रति अथाह प्रेम है. मध्य प्रदेश की कला, पुरातत्व, संगीत संपदा का जितना गहन गान इस कवि ने किया है, कोई अन्य भला क्या करेगा. अपने प्रदेश से प्रीति करने वाला ऐसा कवि बहुत मुश्किल से मिलते हैं. उसकी यह आसक्ति यदि किसी कवि से मिलती है तो वह अकेले ज्ञानेंन्द्रपति हैं जिन्होंने गांगेय संस्कृति के लिए अपने को निछावर कर दिया और गंगातट और गंगाबीती जैसे अनूठे संग्रह दिए और प्रेम की अभिव्‍यक्‍ति के लिए प्रेम कविताएं भी लिखीं. कहना न होगा कि 'शहद लिपि' पर लिखते हुए प्रसिद्ध कवि अरुण कमल ने कहा, "यह संग्रह समकालीन भारतीय कविता के मानचित्र में एक नया रंग भरता है- प्रेम प्रणय और देह राग का रंग और इसके लिए एक सर्वथा नयी लिपि, शहद लिपि का आविष्कार कवि ने किया है.''  जिस प्रदेश ने अपने आंचल में खजुराहो का कला वैभव व देह-राग समेट रखा हो उसकी छवि प्रेम शंकर शुक्ल  के नाभि, आर्द्र अंधेरे, उरोज से उठती मीठी पीर, सुख की तलब जैसे कुछ शाब्दिक प्रयोगों से न तो खंडित होती है न ही हिंदी कविता का प्रतिबिम्ब चटखने वाला है.  
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इरोटिक कविता की परंपरा
हिंदी कविता में प्रेम श्रृंगार रति, काम सभी भावों की कविताएं लिखी गयी हैं. कोई प्रेमशंकर अकेले नहीं हैं. वह भी प्रेमशंकर शुक्ल का संग्रह 'शहद लिपि' तो प्रेम की कविताओं पर ही एकाग्र हैं जिसमें उन्होंने प्रेम की सारी अभिवृत्तियां बहुत उदात्त  भाव से विरचित की हैं. वे किसी लंपट कवि का काव्य नहीं हैं. कोई भी कविता प्रेम रति या काम पर है भी तो वह हमारी मानवीय ताकत और सृजन के सरोकारों से जुड़ी है. वह आत्मा की अतल गहराइयों से जुड़ी है. केदारनाथ अग्रवाल ने दाम्पत्य जीवन की अनेक कविताएं ऐसी लिखी हैं जो देखने पर अश्लील लगेंगी पर हैं नहीं क्योंकि वे गृहस्‍थ जीवन का एक कोमल संबंध सामने रखती हैं. वे तो कहते थे, 'प्रेम ने छुआ/ जानवर से आदमी हुआ/ पथराया दिल कुमुद हुआ (प्रेम ने छुआ)', 'याद आई'  में कवि सहवास को अस्ति का उल्लास और प्राणवंत प्रकाश  कहता है. स्त्री के लिए केदार जी ने लिखा, 'केलि कला में पगी पुरुष को देती तृप्ति अपरिमित'. (केश पाश में बँधे), 'वे पत्नी के लिए कहते हैं, तुम एक सदेह सौंदर्य का समारोह हो. (तुम एक), वे लिखते हैं, ''तुम्हारे उरोजों का सोना कठोर ही नहीं दूध की धार से भरा कोमल भी है. (तुम्हारे उरोजों का सोना), वे प्रेयसी से कहते हैं कि ''जवानी का झूला अकेले न झूलो. मुझे साथ ले लो दुकेले में झूलो (जवानी का झूला), 'सांस में समाओ और शक्ति से उबार लो/ बार बार चूमो ओर बार प्यार दो' (आंख से उठाओ), यह काम की ही शक्ति है कि कृष्णा सोबती एक जगह वैद से बातचीत में कहती हैं, 'सेक्स जीवन का महोत्सव है'. (सोबती वैद संवाद), केदार जी तो मानते ही हैं कि 'उसने मेरी सेज सजाई, सेज सजाकर संग सुलाया/ संग सुलाकर अंग मिलाया/ ओठों को रसपान कराया.' (उसके अंगों के छूने की) ये सारी कविताएं उनकी प्रेम कविताओं के चयन 'माझी न बजाओ वंशी' में सम्मिलित हैं. देखें कि उन्हें कभी कामी कवि नहीं कहा गया बल्कि उनके स्वकीया प्रेम को सराहा गया. दूसरी तरफ देखिए हमारे समय के बड़े कवि सर्वेश्व‍रदयाल सक्सेना की एक कविता देह का संगीत-1 और 2 उनकी प्रेम कविताओं के संग्रह 'क्या कह कर पुकारुँ' में संग्रहीत है. देखें क्या कहते हैं वे-
मुझे चूमो और फूल बना दो
मुझे चूमो और फल बना दो
मुझे चूमो और बीज बना दो
मुझे चूमो और वृक्ष बना दो
फिर मेरी छांह में बैठ रोम रोम जुडा़ओ. (क्या कह कर पुकारुं, पृष्ठ 96)

दूसरी कविता देखें-

मैं चूमता हूँ तुम्हारा मस्तक, तुम्हारी भौंहें, तुम्हारी आंखें
तुम्हारे कपोल, तुम्हारे अधर, तुम्हारी चिबुक
तुम्हारा कंठ, तुम्हारा वक्ष, तुम्हारे उरोज, तुम्हारी नाभि
तुम्हारा प्रजनन पुष्प, तुम्हारी जंघाएं
तुम्हारी पिंडलियां, तुम्हारे पैर, तुम्हारी उंगलियां
तुम्हारे तलुए, हथेलियां और सितार की तरह
तुम्हें कस लेने के बाद खुद बजने लगता हूँ. (वही पृष्ठ 98)

यह न सोंचें कि सर्वेश्वर लोकतंत्रवादी समाजवादी विचारणा के कवि हैं तो जीवन के अनिवार्य पक्षों से अनजान हैं. इस संग्रह में प्रेम का संपूर्ण भाव विभाव अनुभाव व्यंजित है. ऐसा होता तो ओज और उदात्त के कवि दिनकर 'उर्वशी' न लिखते जिस पर एक लंबा विवाद ही खड़ा किया गया कि कवि जैसे उर्वशी के शयनगृह से रिपोर्टिंग कर रहा है. इतना उत्तप्त प्रेम और श्रृंगार का उदात्त पक्ष जो पुरुषार्थ चतुष्टय का एक स्तंभ है- काम- उसके वे एक बड़े कवि ठहरते हैं और किसी कुरुक्षेत्र, या परशुराम की प्रतीक्षा पर नहीं, उर्वशी पर उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला. सर्वेश्वर और केदारनाथ अग्रवाल साहित्य अकादेमी पुरस्कार से नवाजे गए. अश्लील गालियों से भरे 'काशी का अस्सी' के लेखक काशीनाथ सिंह को साहित्य अकादेमी पुरस्कार से नवाजा गया और इस कृति को हिंदी में एक विशेष कथा रिपोर्ताज की गरिमा मिली. प्रेम और काम के अनेक कूट शब्दों के रचयिता और प्रेम के अनन्य कवि मान लिए गए अशोक वाजपेयी के यहां भी योनि को प्रजनन पुष्प न कहा गया होगा जिसे सर्वेश्वर ने सहज ही कह दिया. देखिए कितना समादृत शब्द अनायास ही सर्वेश्वर ने हिंदी कविता को दिया. क्या यह प्रेम नहीं है जिसे उदय प्रकाश कहते हैं कि 'तुम मिसरी की डली बन जाओ/ मैं दूध बन जाता हूँ/ तुम मुझमें/ घुल जाओ' (अबूतर कबूतर पृष्ठ 11) यह घुलना क्या है. क्या देह में घुल जाना नहीं है, देह से एकाकार होना नहीं है? चंद्रकांत देवताले की क्या उस कविता को हम भूल सकते हैं जिसमें उन्होंने कहा है कि ''उसकी बगल में लेट कर ही मैं भाप और फूलों के बारे में सोच पाता हूँ/ और मुझे लगता है मृत्यु मेरा कुछ भी बिगाड़ नहीं सकती. (आग हर चीज में बताई गयी थी, पृष्ठ 11) उनकी भी एक ऐसी ही प्यारी प्रेम कविताओं का चयन हिंदी कवि शिरीष कुमार मौर्य ने किया है. वेणु गोपाल को अत्यंत क्रांतिकारी कवि थे. वे जो हाथ होते हैं, चटटानों के जलगीत के रचयिता. वे कहा करते थे, प्यार के बाद हमारे जिस्म और ज्यादा ताकतवर हो जाते हैं (चट्टानों का जलगीत पृष्ठ 64). क्या हम भूल जाएं कि प्रेम अनुराग और काम-रति के ऐसे अनेक प्रसंग अशोक वाजपेयी की कविताओं में भी आए हैं जिन्हें हम रतिसुख के लिए आतुर आख्यान कह सकते हैं पर उनकी भाषा शालीनता के बंध नहीं तोड़ती; हां वह इरोटिक काव्य का उदाहरण अवश्य बनती है. वे लिखते हैं: ''क्या उस गहरे आर्द्र कुसुम ने वही कहा जो उसके नेत्रों ने? क्या तुम्हारे पास बेधता चीरता भरता मथता उत्तर है?'' यही नहीं, वह दिगंबरा आकाश की शैया पर, प्रणय निवेदन, पत्थ‍र से केलि करता है पत्थ‍र, सुख ने अपनी जगह बदली, चटक विलसित आदि तमाम ऐसी कविताएं हैं जिसमें अशोक जी ने प्रेम के निजत्व को जैसे कविताओं में जिया है. ऐसे प्रेम और अनुराग को बड़ी अर्थ परिधि में व्यंजित करने वाला एक कवि अपने कुछ शब्दों के लिए लांछित किया जा रहा है जो जीवन के, सृजन के, देह के ऐश्वर्य और उसके निजत्व के भी पर्याय हैं, यह हिंदी पट्टी के लिए एक अचरज का विषय है.

जिस हिंदी कविता में कभी अकविता का बोलबाला था जो वाकई स्त्री विरोधी कविता थी, वहां भी किसी एक व्यक्ति को लांछित नहीं किया गया बल्कि पूरे आंदोलन की असामाजिकता पर सवाल उठाए गए. हां आलोचकों ने इस आंदोलन को भरपूर नकारा तथा इन कविताओं को अस्वीकृत किया. पर वे कविताएं वाकई स्‍त्री विरोधी थीं जहां जगदीश चतुर्वेदी कहते थे- ''मुझे किसी स्तन को निरवसन कर ओठों से छूना या जुगाली की मुद्रा में चबाना हास्यास्पक लगता है/ टेबुल पर तुम्हें पोर्ट्रेट की तरह सजाकर मैं निरवसन अंगों को मात्र देखता रहूँगा, छुऊंगा नहीं.'' यह यौनकुंठा है. अश्लीलता यहां है इसलिए अकविता पूरी तरह असामाजिक कविता आंदोलन रहा है. प्रेम की कविता नितांत सामाजिक है. वह अपने देश-प्रदेश, झील, नाव, ताल तलैया, ऐतिहासिक स्थलों, पुरातात्विक महत्व की कलाकृतियों व संगीत कला के लक्षित अलक्षित प्रत्ययों की रससिक्त कविता है. शब्द से शब्द का बोध, शब्द  के जरा से विचलन से नए अर्थ का उन्मे्ष---ऐसा लगता है प्रेमशंकर की कविताएं पदार्थ से होकर पदार्थ से परे आत्मा  की अनुभूति के गंतव्य तक पहुंचती हैं. वे स्थानीयता को अपना काव्य विषय बनाते हुए नए नए अर्थ का संधान करते हैं. सूखते ताल के साथ पानी से आकंठ भरे लहलहाते ताल तक के लिए सौंदर्यधायी चित्रण प्रेम के यहां मौजूद हैं.

पृथ्वी पानी का देश है- में जाग रहा है जल, नदी एक गीत है, पानी बहुत उदास है, एक लोटा प्यास, पानी के पोर्ट्रेट, पानी बोलता है, असाढ़ गरजा, बूँद वृत्त, पानी को दुख है, लहर में गिरती है आंख, पृथ्वी पानी का देश है; झील एक नाव है- में झील से शहर है, वक्त की झील, जैसे काया में मन, सूख चली थी झील, झील की माटी अब खुश है, संस्कृति का परिसर, सुंदरता का आलाप, पानी बचेगा तो जीवन बचेगा, आकाश एक ताल है; जन्म से जीवित है पृथ्वी- में पखावज, दुख पात्र, शब्दावास-आकाश, ताई किशोरी अमोणकर, आदि पालथी, भाषा दुख, प्यार की पांडुलिपि, नृत्य लिपि, लोना लोई, नर्मदानुरागी, तानपुरा, ध्रुपद बंधु, खेत कटाई, बोल बनाव, महाकवि व्यास, चांदी का चंद्रमा, खजुराहों पर केंद्रित इक्कीस कविताएं; शहद लिपि में- कवि आंख, शहद लिपि, खेतिहर स्त्री की हंसी, अंगराग, खयाल चीनी, जनक फुलवारी, रचा पान, पंक्ति पंक्ति- पानी, धूप की धूल, सावन के विरह में, प्रेम द्वैत का अद्वैत है, हमारी आदिवासी देह, शिवा-शिव, प्यार-स्याही, साथ-पानी, बूँद वृंद, सुख श्लेष, सिंगार सार, उम्र नदी, सोना घाटी, सुख सप्तक, चुंबन, नेह ठाट, गीत गोविंद पढ़ते हुए, पंक्ति पद्य नामक अनूठी कविताएं हैं. कवि प्रेम और रति के भी वर्जित संवेदन में प्रवेश करने का साहस करता है यह किसी कवि के लिए कम चुनौती नहीं है. कालिदास 'कुमार संभव' में शिव-पार्वती के केलि प्रसंगों की चर्चा से गर्हित नहीं हुए क्योंकि वे जीवन का सृजन लिख रहे थे, अश्लीलता का रूपक नहीं. वे रघुवंशम्, विक्रमोर्वशीय, मेघदूत और अभिज्ञान शाकुंतल के कवि-नाटककार थे. विराट का संधान उन्होंने किया इसलिए वे सदियों बाद आज भी जीवित हैं. कवि वही जो अज्ञेय के शब्दों में 'गाता है, अनघ सनातन जयी.'  प्रेमशंकर शुक्ल चाहते तो सम सामयिक मुद्र्दों पर सतही राजनीतिक कविताएं लिख कर यथार्थवादी कवि होने का तमगा उगाह लेते. पर वे राजनीतिक विषयों और लेखक संगठनों से दूर रहे और कविता के अनूठे अर्थ की उदभावनाएं रचते रहे. वे अपनी भाषा की दुरूहता में सहज जीवनबोध का अर्थ तलाशते रहे.
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सांस्‍कृतिक कलात्‍मक बोध के कवि हैं प्रेमशंकर
कहना यह कि प्रेमशंकर शुक्ल प्रारंभ से ही प्रकृति, पंचतत्व, कला, संस्कृति एवं पर्यावरण के कवि रहे हैं. यानी 2001 में आए पहले संग्रह 'कुछ आकाश में ही आग' कविता के जरिए उस स्‍त्री की कर्मठता की बात की है जिसने पहली बार आग जला कर अपनी गृहस्थी बसाई होगी तथा उस आग सने ताप से उसके जीवन में खुशबू भर गयी होगी. धीरे-धीरे उनमें कलात्मक अभिवृत्ति बढ़ती गयी, खेती-किसानी और कुदरत के बिम्बों के प्रति आकृष्ट होते गए और वे कविता में एक अलग पहचान बनाने के लिए थीमेटिक यानी विषयगत कविताओं की ओर झुके तथा अनेक सीरीजबद्ध कविताएं लिखीं. 'कुछ आकाश', 'झील एक नाव है' तथा 'पृथ्वी पानी का देश है' ऐसी ही काव्यकृतियां हैं. इन कविताओं के नेपथ्य में उनका समृद्ध प्राच्य बोध और सांस्कृतिक बोध नजर आता है. वे काव्य परंपराओं के गहरे जानकार लगते हैं. खेती किसानी में रमे हुए लगते हैं. विंध्य के होने के नाते गांव कस्बों के लोक और उसके श्रम के पसीने तक की महक को कविता में उतारने का जतन करते हैं. वे न तो निजी जीवन में अश्लील हैं न कविता में. किसी काव्य प्रयोजन के तईं कविता में योनि, सुख की तलब, उरोज और जीभ या चुंबन के उल्लेख के जरिए नए अभिप्रायों या प्रेम की नई प्रतीतियों को आयत्त करना एक कवि की अपनी सीमा या सामर्थ्य है जो कि शहद लिपि के सुविस्तृत आयतन में जीवन के सारे स्नेहिल आयामों को छूने का जतन है. यदि वह काव्य मूल्यों का अपसरण नहीं करता तो केवल अश्लीलता का आरोप चस्पां कर कवि के यश को धूमिल या मलिन नहीं किया जा सकता. हमें कवि की कविताओं को पढ़ते हुए उसके प्रयोगों की जटिलता, वर्जित प्रदेशों में जाने के साहस और अर्थ के अनेकायामी स्तरों को उद्घाटित करने के कवि सामर्थ्य को ध्यान में रखना चाहिए तब अश्लीलता नहीं, काव्य मूल्य और सदियों से चले आ रहे काव्य सिद्धांत ही कवि विवेक के कसौटी होंगे. जहां सदियों से कवियों ने प्रेम की प्रतिष्ठा गाई हो, आदि शंकराचार्य ने सौंदर्य लहरी लिख कर जीवन के सौंदर्यबोध को जगाया हो, वहां 'शहद लिपि' या 'जन्‍म से जीवित है पृथ्‍वी' जैसी अनूठी राग रंजित व्यंजनाओं को कविता के हित में एक बड़ा कदम माना जाना चाहिए.

इस अर्थ में प्रेमशंकर शुक्ल एक अग्रणी कवि ठहरते हैं तथा उनकी कुछ कविताओं पर अश्लीलता के आरोप निस्सार प्रतीत होते हैं. इन कविताओं से न उनकी कविता की, न उनकी ही कवि-गरिमा किंचित कमतर होती है. इस कथन को भला कौन नकार सकता है कि प्यार झुकने की तमीज है और उठने का साहस; प्यार ग्यारह का पहाड़ा नहीं है.
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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. आपकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. आप हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, फोन: 9810042770, मेल: dromnishchal@gmail.com

 

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