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एक देश बारह दुनियाः अछूते, अदेखे सच का मार्मिक आख्यान

कुछ किताबें अपने आपमें ऐतिहासिक होती हैं. किसी दस्तावेज सरीखी. ऐसी कि हमारे वर्तमान का चेहरा इतना साफ दिखता है कि हम और हमारा समाज बेनकाब हो जाते हैं. पत्रकार और शोधार्थी शिरीष खरे की किताब 'एक देश बारह दुनिया- हाशिये पर छूटे भारत की तस्वीर' ऐसी ही है.

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एक देश बारह दुनिया' का आवरण एक देश बारह दुनिया' का आवरण

कुछ किताबें अपने आपमें ऐतिहासिक होती हैं. किसी दस्तावेज सरीखी. ऐसी कि हमारे वर्तमान का चेहरा इतना साफ दिखता है कि हम और हमारा समाज बेनकाब हो जाते हैं. पत्रकार और शोधार्थी शिरीष खरे की किताब 'एक देश बारह दुनिया- हाशिये पर छूटे भारत की तस्वीर' ऐसी ही है. इस पुस्तक में खरे की दो दशक की पत्रकारीय यात्रा का कहानी रूप में विवरण दर्ज है. कहानी रूप में विवरण से मेरा आशय यह है कि इसमें पात्र सच हैं, घटनाएं सच हैं, लेकिन शैली कथा की तरह है, जो आपके मन को छू लेती है.

वैसे तो बतौर पत्रकार शिरीष खरे हमेशा से वंचित और पीड़ित समुदायों के पक्ष में ही लिखते रहे हैं. अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं में काम करते हुए उनकी सैकड़ों रिपोर्टों में गांव ही प्रमुखता से छाया रहा हैं. यही वजह थी कि भारतीय गांवों पर अपनी उत्कृष्ट रिपोर्टिंग के लिए वे वर्ष 2013 में 'भारतीय प्रेस परिषद' से सराहे गए. इसी तरह वर्ष 2009, 2013 और 2020 में 'संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष' द्वारा, लैंगिक संवेदनशीलता पर लेखन के लिए 'लाडली मीडिया अवार्ड' सहित सात राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित खरे इससे पहले 'तहक़ीकात' और 'उम्मीद की पाठशाला' पुस्तकों से चर्चित हो चुके हैं. पर

इस पुस्तक में उस भारत का शब्द-चित्र या कहें कि तस्वीर खींची गई है, जिस भारत के बारे में लोग अमूमन बात नहीं करना चाहते. हम उस भारत की बात करते हैं, जो बुलेट ट्रेन पर चलता है, हम उस भारत की बात करते हैं, जो हवाई जहाज पर चलता है, हम उस भारत की बात करते हैं, जो बिलियन डॉलर की बात करता है, लेकिन हम उस भारत की बात नहीं करते हैं, जिसकी बात गांधी करते थे, जो भारत गांवों में बसता है. जो हमारा असली भारत है, जिससे हमारा देश बनता है. खास बात यह कि 'एक देश बारह दुनिया' के बारह रिपोर्ताज उसी भारत की बात करते हैं.

लेखक शिरीष खरे ने अपने पत्रकारिता के दिनों में ही अपने को सामाजिक सरोकारों से जोड़ लिया था और वर्ष 2008 से उन दुर्गम भूखंडों की यात्राएं कीं, जहां सामान्य तौर पर लग्जरी गाड़ियां, बसें नहीं जा पाती हैं. लेखक ने स्थानीय, सस्ते और सार्वजनिक वाहनों का इस्तेमाल किया और दूरदराज के गांवों में ऐसी जगहों पर गए, जहां आम तौर पर कोई भारतीय नहीं जाना चाहता, पत्रकार, नौकरशाह और पुलिस वाला नहीं जाना चाहता. सुविधा के अभाव में दबे-कुचले, पिछड़े और कथित विकास की राह में उजड़ रहे लोगों की बात भला कौन करना चाहता है.

'एक देश बारह दुनिया' के रिपोर्ताज में इतिहास और वर्तमान के बीच उलझी पीढ़ी की बात की गई है. लेखक के मुताबिक उन्होंने यह काम इसलिए किया कि उन्हें देश की जनता के सामने ऐसी तस्वीर खींचनी थी, जिसमें भारत का एकतरफा विकास नजर आ आए. यह किताब पढ़ते हुए यह साफ दिखाई देता है कि हमारे संविधान निर्माता जिस भारत की बात करते हैं, सही मायनों में वह भारत बन नहीं पाया, और उसकी आजादी उन जगहों तक नहीं पहुंच पाई जहां उसे पहुंचना था.

अपने पहले रिपोर्ताज मेलघाट के बारे में लेखक लिखते हैं, ''वह कल मर गया, तीन महीने भी नहीं जिया, एक मां के मुंह से सपाट लहजे में अपने मासूम बच्चे की मौत की खबर सुन मैं भीतर तक हिल गया. अब अपने किए सवाल पर शर्मिंदा हूं, जिसे दोहरा नहीं सकता हूं. वह बार-बार पानी के लिए पूछ रही है और मैं हूं कि खुद 'पानी-पानी' हूं.''

इस घटना के माध्यम से वह चिखलदरा नाम के कस्बे से कोई सौ सवा सौ किलोमीटर दूर मेलघाट पहाड़ी अंचल के एक घर के बारे में बता रहे होते हैं. वहां पहाड़ियों के पीछे बसे गांव में भूख से बच्चों की मौत की खबर बड़ी खबर की तरह नहीं मानी जा रही थी, लेकिन एक संस्थान में काम करते हुए भी लेखक ने मेलघाट से संबंधित इसी तरह की कई घटनाओं को दर्ज किया है.

उन्होंने कहानी की शक्ल में अपनी बात कही है और कोहा, कुंड तथा बोरी गांवों के उजड़ने की बात लिखी है, जहां के बाशिंदे लेखक के वहां आने से सात साल पहले उजड़ गए थे. अंत में कभी न मिल सके उन लोगों के लिए वह एक कविता लिखते हैं:

जो तिनका-तिनका जोड़कर
जिंदगी बुनते थे
वो बिखर गए.
गांव-गांव टूट-टूटकर
ठांव-ठांव हो गए.
अब उम्मीद से उम्र और
छांव-छांव से पता
पूछना बेकार हैं.

इसी तरह, मुंबई के कमाठीपुरा रेड लाइट एरिया में 'पिंजरेनुमा कोठरियों में जिंदगी' की बात करें तो यह शीर्षक अपने आप यह बता देता है कि कमाठीपुरा में रहने वाली और देह धंधे में शामिल महिलाएं, जिन्हें हम वेश्याएं कहते हैं, कैसी जिंदगी जी रही हैं. कमाठीपुरा की यह मंडी एशिया की सबसे बड़ी देह मंडियों में से एक हैं, वहां नेपाल से लेकर बंगाल और दूसरी जगहों से लायी गईं लड़कियों की बेबसी, चौदह-चौदह साल की लड़कियां किस तरह से देह धंधे के दलदल में फंसी हुई हैं और किस तरह से दलाल तथा ग्राहक उनके साथ बर्ताव करते हैं, उनकी बातों को गहराई के साथ मार्मिक ढंग से तारीख वार लिखा गया है.

यह पुस्तक इसी तरह इसी देश में बारह जगहों को इस रूप में रखती है, जिसमें कहीं धान, कहीं गन्ने के खेत और मजदूर हैं, चीनी मिलों में काम करने वाले कर्मचारी हैं, बस्तर का हिंसाग्रस्त क्षेत्र है, सूरत जैसे शहर से विस्थापित लोगों का दर्द है, नदियों को मैदान बनाने के पीछे की लंबी सच्चाइयां हैं, जल विद्युत परियोजनाओं के नाम पर जंगलों का उजाड़ने की घटनाएं साफ-साफ बेहद निर्भयता से दर्ज हैं.

कई जगहों पर कविताएं भी लिखी गई हैं. जैसे, एक कविता जो उन्होंने मंडला से जबलपुर के रास्ते में लिखी है, का जिक्र करना यहां जरूरी है:
काम से लौटी
थकी, एक गोंडनी मां
अपने चौथे बच्चे को
बेधड़क दूध पिला रही है.
देवदूत, परियां और
उनके किस्से
श्लोक, आयतें और आश्वासन
सब झूठे हैं
स्तनों से बहा
खून का स्वाद
चोखा है.

'तीस रुपैया'
दिहाड़ी के साथ मिली
ठेकेदार की
अश्लील फब्तियों से
अनजान है बच्चा.

नींद में उसकी मुस्कान
नदी की रेत पर
चांदनी सी पसरी है.

धरती पर बैठी
देखती मां
बेहताशा चूमती है
उसके सारे दुख और
सपने!

इसी तरह, राजस्थान से महिला अनाचार विषय पर रिपोर्टिंग है. इसमें वे सामंतवादी समाज में वहां के हाशिये पर जा पहुंचे समुदाय के जनजीवन की बात करते हैं. 'खंडहरों में एक गाइड की तलाश' मदकूद्वीप, छत्तीसगढ़ से ऐतिहासिक धरोहरों की उपेक्षा की झलक मिलती है. वहीं, जांजगीर सहित छत्तीसगढ़ के अन्य जिलों से छोटे किसान व खेतिहर मजदूरों को लेकर भी एक बेहद मार्मिक और विचारोत्तेजक रिपोतार्ज 'धान के कटोरे में राहत का धोखा' नाम से लिखा गया है.

इस तरह शिरीष खरे एक देश की बारह दुनियाओं के भीतर जाति, धर्म, क्षेत्र, विकास और आधुनिकता के नारों से परे सिर्फ जीवन की जद्दोजहद में जूझ रहे लोगों की कथा दर्ज करते हैं. यह दास्तान इतनी मार्मिक है कि इसके बारे में वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी लिखते हैं, 'ये वे किस्से हैं जहां जिंदगिया गतिहीन हो गई हैं, दुनिया स्थिर हो गई है. ऐसे समय जब हम बुलेट ट्रेन की बातें कर रहे हैं, ये बातें आंखें खेल देने वाली हैं.'

'एक देश बारह दुनिया' पुस्तक में आपको असली भारत की तस्वीर दिखेगी, जो भारत यह चाहता है कि आजादी की रोशनी उस तक भी पहुंचे. इस पुस्तक को पढ़कर आप निराश नहीं होंगे. इसकी शैली बहुत अच्छी है, शिल्प बहुत अच्छा है, भाषा बहुत सहज और सरल है, और सबसे बड़ी बात कि यह हमें उस सच से रूबरू कराती है, जिसे बतौर लोकतांत्रिक मनुष्य हमें जानना ही चाहिए, समझना ही चाहिए, और संभव हो तो हाशिए के उस समाज के लिए, उन बारह दुनियाओं के लिए कुछ करना भी चाहिए.
***
पुस्तक: एक देश बारह दुनिया
लेखक: शिरीष खरे
भाषा: हिंदी
विधा: रिर्पोताज
प्रकाशक: राजपाल एंड संज
पृष्ठ संख्या: 208
मूल्य: रुपए 295/ पेपरबैक संस्करण

 

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