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पुस्तक समीक्षाः विकट काल की प्रतिध्वनि, जीवनानुभवों की इबारत

चंद्रमाप्रसाद खरे इंदुभूति ऐसे ही कवियों में हैं जिन्हें परिस्थितियों ने कवि बना दिया. 90 पार के खरे की रचनाशीलता उम्र की उत्तरशती के बावजूद थमी नहीं. उनकी बौद्धिक इंद्रियां सजग हैं- इसलिए वे सदैव अपने देखे जिये और भोगे को लिखते रहे.

विकट काल की प्रतिध्वनि- थीमवादी कविताएं का आवरण-चित्र विकट काल की प्रतिध्वनि- थीमवादी कविताएं का आवरण-चित्र

कविता का संसार सदैव उर्वर रहता है. हर कोई जोइ सोइ कछु गावै की तर्ज पर कुछ न कुछ मन में ही गाता गुनगुनाता रहता है. इन्हीं में कोई उम्दा कवि बन जाता है. कुछ कवि जन्मजात भी होते हैं, तो कुछ अपनी मेहनत से कवि बनते हैं. पर चंद्रमाप्रसाद खरे इंदुभूति ऐसे ही कवियों में हैं जिन्हें परिस्थितियों ने कवि बना दिया. लंबे अरसे तक दिल्ली प्रेस के संचालक मंडल के सदस्य रहे 90 पार के चंद्रमाप्रसाद खरे की रचनाशीलता उम्र की उत्तरशती के बावजूद थमी नहीं. उनकी बौद्धिक इंद्रियां सजग हैं- इसलिए वे सदैव अपने देखे जिये और भोगे को लिखते रहे. विकट काल की प्रतिध्वनि- थीमवादी कविताएं उनकी इसी जिजीविषा और विवक्षा का प्रतिफल है.

कभी खरे जी का पहला संग्रह 1980 में आया था --'दंश' नाम से. जीवन में दंश मिलते ही रहते हैं फिर भी फूल जैसे लोग कांटों की परवाह नहीं करते, उनके बीच ही रह कर सुगंध बांटते रहते हैं. जीवन ऐसी ही चुभनों का नाम है. चुभनों के बीच खिलने वाले सुमनों का नाम है. माधुरी के पूर्व संपादक एवं कोशकार अरविंद कुमार ने इस कवि के उद्भव की कहानी 'विकट काल की प्रतिध्वनि- थीमवादी कविताएं' की भूमिका में लिखी हैं कि कैसे आज से कोई 66 वर्ष पहले 1954 में खरे की भेंट अरविंद जी से हुई और कैसे उनके कवित्व का पौधा वहीं एक नौकरी की शुरुआती घटना से पल्लवित पुष्पित होने लगा और आज एक छतनार वृक्ष में बदल गया है.  

कविता क्या है, सदियों से इसकी परिभाषाएं होती आई हैं. हर कवि अपनी तरह से कवितानुभूति को जीता और रचता है. कविता यदि लोकमंगल की साधना है तो निज ऐंद्रिय बोध और संवेदन तंत्र को परिमार्जित करने का माध्यम भी. कभी कहा था भारत भूषण जैसे कवि ने --
जब नींद न आई और न जाग सका
बेचैनी की कुछ दवा न मांग सका
दम घुटा नयन का कोना गरम हुआ
तब तब मेरे गीतों का जनम हुआ.  

खरे जी की यहां प्रस्तुत 143 कविताओं से गुजरते हुए ऐसा ही लगता है कि कवि जीवन, समाज की तमाम नग्न सचाइयों से गुजरता हुआ कैसे उन अवलोकनों, अनुभवों को अनुभूति और संवेदना में सहेजता है तथा अपने अनुभव सारांश को हमारे सामने कविता के रूप में परोसता है. इन कविताओं के मूल में अनुभव के छोटे छोटे पल तो हैं ही, कठोपनिषद, तुलसी, भर्तृहरि, चाणक्य नीति, अथर्ववेद, कालिदास, मनुस्मृति, ऋग्वेद, यजुर्वेद, ऐतरेय ब्राह्मण यानी नानाविध स्रोतों से जुटाए विशद ज्ञान का समाहार भी यहां उन्होंने सहेजा है. 'खामख्या‍ली' कविता देखें, क्या खूब सच कहा है, जो मन न रंगाए रंगाए जोगी कपड़ा जैसे अनुभवों से निकली काव्य पंक्तियां हैं-
चश्मा पहनने से कोई गांधी नहीं हो जाता
जटाएं दिखाने से कोई संत नहीं हो जाता
मूँछों पर ताव देने से कोई जंग नहीं जीत जाता
गमछा दिखाने से कोई गरीब नहीं हो जाता
हवा में तलवार घुमाने से
कोई सत्ता सवार नहीं हो जाता
पर ये सब उसके पीछे पड़े हैं.  

हमारा देश ऐसे ही प्रतीकों का देश है. हमने आत्मा को नहीं धोया पोंछा. वह मलिन की मलिन रही और हमने ये सारे कवच कुंडल धारण कर लिए कि हमारा असली रूप न दिखने पाए. मनुष्य को मापने के मापदंड कितने सतही हैं, खरे जी कहते हैं-
आदमी की लंबाई
लंबी गाड़ी से नापी जाती है
रुतबा
कुरसी से
और दिमाग मंहगे पैन से
कलम घिसने वाले सब बौने हैं. -नापदंड

वे भर्तृहरि के इस कथन से प्रभावित होकर कविता लिखते हैं कि विवेकभ्रष्टानां भवति विनिपात: शतमुख:. यानी विवेकभ्रष्ट लोगों का पतन सैकड़ों प्रकार से होता है. इस श्लोक के रचने के पीछे भर्तृहरि के जीवनानुभव के निश्चय ही बड़े उदाहरणों से गुजरे होंगे इंदुभूति. उन्होंने प्रेम का बानक रचने वाले कामदेव को भी धिक्कारा था जब वे स्वयं के अनुभव से गुजरे. धिक च तां च तं च मदनं च इमां च मां च. 'अंधेरे का आघात' कविता में वे इस सारभूत सचाई से जुड़ते हैं कि
जिनके जीवन में अंधेरे का आघात होता है
वे ही एक दिन
देश को जगमगा जाते हैं
देखते रह जाते हैं वे  
जो झिलमिल रोशनी की विरासत में
घात में जीते हैं.  -अंधेरे का आघात.

कवि होना क्या होता है. अनुभव तो साधारण जन भी वही करते हैं जो कवि करता है पर अभिव्यक्ति का सामर्थ्य कवियों में ही होता है. वक्त‍ की सुई, विभीषण, नया मुखौटा, यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, चरैवेति चरैवेति, ताकि सनद रहे, सत्ता की भूख, मनोविज्ञानाय नम:, न स्वर्ग न मोक्ष, आत्मा का नया वर्जन- ऐसी कितनी ही कविताएं हैं जिन्हें पढ़ते हुए यह पता चलता है कि लगभग पूरा जीवन प्रकृति, मनुष्य, समाज और समय के प्रशस्त  गलियारे में रमते हुए चंद्रमाप्रसाद खरे इंदुभूति जी ने जो सीपियां इन कविताओं में संजोई हैं वे मंत्र का सा प्रभाव छोड़ती हैं. भले इनमें समकालीन कविता की वक्रताएं, ध्वनिमयता न हो, पर जीवन और जीवन के सत्यों को पकड़ने की कोशिश में कवि कामयाब हुआ है इसमें संदेह नहीं. कहा गया है-
सत्येजन धार्यते पृथ्वी
सत्येन तपते रवि:
सत्येन वायवो वान्ति
सर्व सत्ये प्रतिष्ठितम्.

कविता से भले कल्पना का कोई रिश्ता बनता हो पर कवि कल्पना ऐसे ही जीवन सत्यों का समाहार है जिसकी छाया 'विकट काल की प्रतिध्वनि' में बखूबी दिखाई देती है.

पुस्तक: विकट काल की प्रतिध्वनि
रचनाकारः चंद्रमाप्रसाद खरे इंदुभूति
विधाः कविता
भाषाः हिंदी
प्रकाशकः रिजेंसी पब्लिकेशंस
मूल्यः ₹295.00
पृष्ठ संख्याः 200

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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक, कवि एवं भाषाविद हैं. शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित व अन्वय एवं अन्विति सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं.  हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार, आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059, मेलः dromnishchal@gmail.com

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