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जीते जी इलाहाबाद: करघे पर संस्मरण के कपास, जिए हुए अतीत को पुनर्जीवन

इलाहाबाद बहुतों का प्रिय रहा है. एक दौर ही था इलाहाबाद साहित्य के केंद्र में था. उसका रुतबा हिंदी में कम से कम बनारस से कम न था. रचनाकारों की अनेक पीढ़ियां पली बढ़ीं और पनपीं.

ममता कालिया का संस्मरणः जीते जी इलाहाबाद ममता कालिया का संस्मरणः जीते जी इलाहाबाद

प्राय: उत्‍तर जीवन में पहुंचते ही लेखक संस्मरणों में सिमटने लगता है. कुछ लोग तो जीवन की अर्धशती से ही संस्मरणों का खाका बुनने लगते हैं. इस लिहाज से ममता कालिया संस्मरणों में तब आईं जब जीवनानुभव इतने सघन और बहुरंगी हो उठे थे कि उन्हें संस्मरणों के निमित्त सहेजना जरूरी हो गया था. किस्सागो होने के नाते ममता कालिया के गद्य में गल्प के अवगुंठन क्या खूब दिखते हैं. वे संस्मरण लिखती नहीं, जीती हैं. यह भी कि वे यहां अपना ज्ञान नहीं बघारतीं बल्कि अपनत्व की रंगशाला में फैले बिखरे किस्सों को संयोजित कर अल्पना सी सजाती हैं. लोग शहरों में रहते हैं, समय गुजारते हैं. कालो न यात: वयमेव यात: की तरह समय के विराट में व्यतीत हो जाते हैं. ममता जी ने शहरों में समय नहीं गुजारा, हर जिये हुए समय को अपने लेखकीय करघे पर सहेजा है.
'जीते जी इलाहाबाद' पुस्‍तक ऐसे ही संस्मरणों की एक खूबसूरत अदायगी है, जो ममता कालिया के भीतर दिये सी जलती लौ के प्रकाश-सा आनंद बिखेरती है. इस तरह जिस वर्तमान को वे जी चुकी हैं, उसके अतीत को वे पुन: जी रही हैं.
ममता कालिया जब पहली बार 'कितने शहरों में कितनी बार' के किस्से लिख रही थीं तो वे लगभग सत्तर की वय में थीं. यह वह दौर होता है जब संस्मरण हर सिंगार के फूलों से झरते हैं. 'क्या भूलूं क्या याद करूं'- की कसक भीतर उठती है और फिर जो कागज पर दर्ज होता है, वह बतकहियों, घटनाओं, सोहबतों का खुला खिला संसार होता है. इसीलिए जब ज्ञानरंजन के 'पुलिन पर आती नहीं अब प्रियतमा' जैसे कुछ संस्मरण सामने आए तो इलाहाबाद की ओर लोगों का ध्यान गया क्योंकि वह तो एक दौर में साहित्य का काशी और काबा रहा है. अनेक आंदोलनों, साहित्यिक गतिविधियों का मरकज़. 'गालिब छुटी शराब' के बहाने रवीन्द्र कालिया ने जिस इलाहाबादी कल्चर का विन्यास सामने रखा उसे देख पढ़ कर मन होता है, उसी दौर के इलाहाबाद में खो जाएं जहां कभी निराला, पंत, महादेवी, इलाचंद्र जोशी, नरेश मेहता, मार्कण्डेय, अमरकांत, ज्ञानरंजन, श्रीलाल शुक्ल, अश्क- आदि हुआ करते थे. पत्र-पत्रिकाओं के इस जीवंत शहर की बतकहियां कभी खत्म होने का नाम नहीं लेतीं.
हाल ही में ममता जी का संस्मरण 'अंदाजेबयां उर्फ रवि कथा' छप कर आया जो चर्चा में हैं. पर इस बीच संस्मरणों में ही ऊभ चूभ करती ममता जी ने 'जीते जी इलाहाबाद' लिख कर उस दौर के इलाहाबादी मिजाज को फिर एक बार चर्चा के केंद्र में ला दिया है, जो 'गालिब छुटी शराब' से कम चर्चित नहीं रहने वाला. खुशबू, खयाल और ख़्वाब बन कर यह शहर जिस तरह ममता जी के जीवन-संवेदन में बस गया है वह आजीवन उनसे विलग नहीं होने वाला. वे बार-बार अपने संस्मरणों में इलाहाबाद लौटती रहेंगी- सुधियों के खजाने के साथ. ऐसी ही वेधक स्मृतियों के लिए हिंदी के अप्रतिम कवि विष्णु कुमार त्रिपाठी 'राकेश' ने क्या खूब कहा है -
आजीवन रहना है सुधि के तहखानों में.
इलाहाबाद बहुतों का प्रिय रहा है. एक दौर ही था इलाहाबाद साहित्य के केंद्र में था. उसका रुतबा हिंदी में कम से कम बनारस से कम न था. रचनाकारों की अनेक पीढ़ियां पली बढ़ीं और पनपीं. फिर वहां से लोग अन्य केंद्रों की ओर शिफ्ट हुए. इलाहाबाद ने प्रगतिवाद, छायावाद, प्रयोगवाद और नई कविता का दौर देखा. छायावाद के प्रमुख स्तंभ यहीं हुए. नई कविता के उदभावक निराला जी यहीं हुए. नई कविता के अंकों से जगदीश गुप्ता ने 'नई कविता' की सैद्धांतिकी को स्थापित किया तो लक्ष्मीकांत वर्मा ने नई कविता के प्रतिमान लिख कर नई कविता के प्रतिमानों का स्थिरीकरण किया. यहां पैदा, विकसित और परवान चढ़ी विभूतियों का जिक्र करूं तो यह सिलसिला थमेगा नहीं फिर भी कोई न कोई नाम छूट ही जाएगा. मैं तो बस वहां ले चलना चाहता हूं जिस इलाहाबाद को कथाकार ममता कालिया ने देखा जिया और वहां रह कर रचा और रचने की ऊर्जा लेकर वे कोलकाता और दिल्ली-गाजियाबाद आईं.
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तेरे शहर में इक जहां छोड़ आए!
ममता कालिया के जिये भोगे शहरों में इलाहाबाद का स्थान सर्वोपरि है. ज्ञानरंजन के संस्मरण 'पुलिन पर आती नहीं अब प्रियतमा' की याद अक्सर आती है. एक कवि के पद को अपने संस्मरणों में व्यवहृत कर कौन उसे ज्ञानरंजन से ज्यादा चमक और दमक दे सकता है. यह वही इलाहाबाद है जहां काफी के प्यालों में तूफान उठा करते थे. दूधनाथ सिंह, मार्कण्डेय, अश्क, सत्यप्रकाश मिश्र, रवींद्र कालिया, उमाकांत मालवीय, लक्ष्मीधर मालवीय जैसे लेखकों का होना इलाहाबाद से उठते साहित्यि‍क तापमान की कसौटी हुआ करता था. अभी 'रवि कथा' को आए बहुत दिन नहीं हुए कि ममता कालिया का रुचिर संस्मरण इलाहाबाद को लेकर फिर आया है- जीते जी इलाहाबाद. रवि के साथ बिताए इलाहाबाद के दिनों को वे आज भी नहीं भूली हैं और इस पुस्तक में तो खास ही. वे कहती हैं, शहर- पुड़िया में बांध कर हम नहीं ला सकते साथ, किन्तु स्मृति बन कर वह हमारे स्नायुतंत्र में, हूक बन कर हमारे हृदतंत्र में और दृश्य बन कर हमारी आंखों के छवि गृह में चलता फिरता नजर आता है.
छह खंडों के इस संस्मरण में खुशबू, खयाल और ख्‍वाब बन कर पीछा करते इलाहाबाद की अनेक छवियां हैं कि आप पढ़ते जाइये और संस्मरणों के लच्छे खुलते चले जाएंगे. जिन्हें 'गालिब छुटी शराब' में कालिया के रुचिर गद्य का विन्यास भाया है, उन्हें ममता कालिया के इन संस्मरणों में भाषा की वाचिक अदायगी का सुख मिलेगा.
पहला खंड लोकभारती प्रकाशन के प्रमुख दिनेशचंद्र के न रहने से शुरू होता है और दूधनाथ सिंह, मार्कण्डेय, 370 रानीमंडी से होती हुई सतीश जमाली, नरेश मेहता, भैरवप्रसाद गुप्त, अमरकांत, ज्ञानरंजन, शेखर जोशी, दुष्यंत, कमलेश्वर तक के इतिवृत्त को दर्ज करता है. इसी दौर में उनका पहला उपन्यास 'बेघर' रचा गया. दूसरे खंड में सिविल लाइंस में ज्ञानरंजन, सतीश जमाली, शैलेश मटियानी और अमर गोस्वामी और रवींद्र कालिया से लेकर सैयद अकील रिज़वी, अली अहमद फातमी, एहतराम इस्लाम, असरार गांधी, यश मालवीय की आमदरफ्त से लेकर गंगा-जमुना टैब्लायड के प्रकाशन तक के चर्चे हैं. तीसरे खंड में वे 'प्रतीक' पत्रिका को लेकर नेमिचंद्र जैन, भारतभूषण अग्रवाल और अज्ञेय की सम्मिलित साधना की बात करती हैं, तो 'कहानी' पत्रिका के पीछे श्रीपत राय की साधना और हंस प्रकाशन से प्रकाशित 'हंस' के गौरवशाली दिनों का स्मरण करती हैं.
ममता कालिया शुरू करती हैं तो खंड-खंड इलाहाबाद की गुत्थियां सुलझती चलती हैं. शहर के ताने-बाने में दोस्तियां-दुश्मनियां, आयोजन, प्रकाशन समारोहों, निंदा प्रस्तावों से लेकर मान-मनौव्वल तक की दास्तानें यहां खुलती हैं. भले ममता कालिया ब्रांडेड आलोचकों में न शुमार की जाती हों पर उनके भीतर का आलोचक पग-पग पर नीर क्षीर करता नजर आता है. मेंहदौरी कालोनी, रसूलाबाद, जीरो रोड, चौक, सिविल लाइंस, पत्र-पत्रिकाओं की दूकानें शहर के बुद्धिजीवियों से लेकर कवियों, गीतकारों तक वे उदात्त भाव से सबका यश उसके माथे पर लिखती-चलती हैं. जीरो रोड का जिक्र आते ही मुझे नासिरा शर्मा का बेहतरीन उपन्यास 'जीरो रोड' याद आ जाता है, जिसके तार सुदूर दुबई से जुड़ते हैं. अपने भीतर जमा संस्मरणों की यह पोटली वे जितनी बार खोलती हैं, उतनी बार वह नए अंदाजेबयां में सामने आती है. उन्होंने 2003 तक के देखे, जिए इलाहाबाद को इस कदर अपने भीतर बसा रखा है कि वह निकलता ही नहीं. बल्कि उन्हें पढ़ते हुए एक शायर का यह शेर याद आता है-
मोहब्बत की इक दास्तां छोड़ आए
तेरे शहर में इक जहां छोड़ आए.
वे 2003 में इलाहाबाद से कोलकाता गईं जहां रविंद्र कालिया वागर्थ के संपादक व भारतीय भाषा परिषद के निदेशक बने, फिर वहां से ज्ञानोदय के संपादक और भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक बन कर दिल्ली आए तो वे यहां रह कर रविंद्र कालिया के लेखन, संपादन के स्वर्णिम काल और उत्तर जीवन की साहित्‍यिक गतिविधियों की साक्षी रहीं और बाद में गाजियाबाद में बस गयीं. यद्यपि दिल्ली से समय-समय पर वे इलाहाबाद जाती रहीं और अपने शहर के अतीत और वर्तमान की दुनिया को अपने भीतर सहेजती और जीती रहीं. आखिरी खंड के संस्मरणों में पंजाबी के डायलाग्स की छौंक भी मिलेगी जो रविंद्र कालिया की अपनी मातृभाषा थी, जिसे उनकी सोहबत में ममता जी ने कुछ हद तक सीख भी लिया था. इलाहाबाद है तो कुंभ भी है, कैलाश गौतम भी होंगे- वे तमाम यादें जिनके दुकूल में सिमट कर अतीत से हिलगा रहा जा सकता है. ममता कालिया का जीते जी जिया गया इलाहाबाद सलीके से 'जीते जी इलाहाबाद' में उपस्थित है. यह तो यह ऊपरी झॉंकी है- जिसे विहंगम देख पाना केवल उस ख्वाब को महसूस करना है जिसे हम किसी शहर में शुरू तो करते हैं, पर उसे अंजाम तक नहीं पहुंचा पाते. अब न वह इलाहाबाद रहा, न वह लेखकों का जमावड़ा, न नौकरियां- लोग बड़े शहरों की ओर रुख कर रहे हैं, सो इलाहाबाद भी अब पत्रहीन नग्न गाछ में बदल रहा है. शायद फिर नए कल्ले फूटें; फिर कोई रवि कालिया- ममता कालिया की तरह अपने रहन-सहन से इलाहाबाद को किसी बड़े गल्प में बदल दें.
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रहने की नहीं, जीने की जगह
इलाहाबाद रहने की नहीं जीने की जगह है, यह इस संस्मरण का लब्बोलुआब है. पर हमें अपनी प्यारी जगहें भी एक दिन छोड़नी पड़ती हैं. वे अब रहती हैं इमारतों के जंगल में. यहां न गंगा है, न संगम, न सिविल लाइंस, न चौक, न लेखकों का जमघट. शहरी सभ्यता ने लेखकों की लेखकी छीन ली है. लेखक भी यहां बाबू बने नजर आते हैं. पूंजी ने धीरे-धीरे लेखकों की फाकामस्ती छीन ली है, नौकरियां छीन ली.
हम किसी संस्मरण में भाषा की रवानी को लेखक का गुण मानते हैं पर चाहते हैं कि भाषा की विंध्याटवी में ऐसा कुछ मिले, जो बोलचाल के गद्य में किसी अलक्षित फूल की तरह ध्यान खींचता हो, कृष्णा सोबती के लेखन में ऐसे प्रयोग देखने को मिलते हैं कि बोलचाल में ही वे ऐसा कुछ कह गयी हैं जो अद्भुत है. ऐसे कई अवसर ममता कालिया के यहां भी आए हैं. विदित हो कि कथाकार ज्ञानरंजन के पिता रामनाथ सुमन इलाहाबाद में ही रहते थे. ममता कालिया लिखती हैं: ''मिर्जा गालिब की जीवनी लिखने वाले रचनाकार स्वाधीनता सेनानी रामनाथ सुमन का लूकरगंज में बहुत विस्तृत और विशाल बंगला था. वह चारों तरफ हरियाली से भरा रहता. कथाकार मित्र ज्ञानरंजन इन्हीं सुमन जी के पहले सुपुत्र हैं. ...विलक्षणता के अपने वलय होते हैं. सन् 70 के ज्ञानरंजन को हम बेधक रचनाकार, बेधड़क इनसान और बेमिसाल दोस्त की तरह जानते थे. पिता के बड़े बंगले में ज्ञानरंजन फ़कीर की तरह बसते थे.'' (पृष्ठ 53) इलाहाबाद का जिक्र हो और लोकनाथ उसमें न आए तो उसका कोई आस्‍वाद नहीं बनता. बकौल ममता कालिया: ''लोकनाथ की गली में मिठाइयों के साथ-साथ हरि नमकीन नाम की दूकान भी थी, जिसके समोसे, खस्ता और दम आलू की दुनिया भर में धूम रही. कई लोगों का तो सुबह का नाश्ता यही होता था. यही नाश्ता खाने खिलाने ज्ञानरंजन लूकरगंज से लोकनाथ आया करते.'' अनीता गोपेश भी इन संस्मरणों में हैं. वे 'गालिब छुटी शराब' में भी थीं. योग्य पिता की पुत्री जो पढ़ाने के साथ थियेटर में रमी जमी थी. अभी जब कुछ साल पहले अनीता का उपन्यास 'कुंज गली नहिं सॉंकरी' आया तो ममता जी दिल्ली में उसकी चर्चा गोष्ठी में पधारी थीं. रानी मंडी से जब ममता कालिया शहर के किनारे मेहदौरी में जा बसी तो शहर में रहते हुए भी उन्हें रानीमंडी की याद आती. वे गोष्ठियां, वह चहल-पहल जो वहां थी वह यहां कहां. पर यहां भी कुछ साहित्यकार रहते थे यश मालवीय जैसे जो अकेले ही एक गोष्ठी का आनंद देते हैं. वे लिखती हैं, ''इलाहाबाद की जलवायु में यह जलवा और जोश घुला मिला है. जिस भी गोशे में निकल जाओ, हिंदी के इतिहास का कोई पन्ना फड़फड़ाता हुआ हाथ में आ जाता है.''  
वे कवियों का जिक्र करती हैं, कहानीकारों, उपन्या्सकारों की तो पत्र-पत्रिकाओं के उद्भव और विकास की कहानी भी कहती चलती हैं. अपने वक्त की हंस, कहानी, माध्यम, अभिप्राय, उन्‍नयन, कथ्य रूप जैसी पत्रिकाओं को याद किया है उन्होंने. प्रयाग जो कभी हिंदी प्रदीप, सरस्वती, अभ्युदय, मर्यादा, प्रतीक, नई कविता, निकष जैसी ऐतिहासिक पत्रिकाओं का गढ़ रहा है, कथा, वर्तमान साहित्य, विकल्प, लेखन ऐसी जाने कितनी भूली-बिसरी पत्रिकाओं का जिक्र उन्होंने किया है, जो साहित्यिक अंतर्धारा की हलचलों का हिस्सा रही हैं. वे इलाहाबाद को याद करते हुए उसका नाम बदलने को जैसे भीतर से स्वीकार नहीं पातीं. वे यहां संदीप तिवारी की एक कविता भी उद्धृत करती हैं, जो कहती है कि जो इलाहाबाद छोड़ कर गया है वह प्रयागराज नहीं लौटेगा. प्रयागराज के नए नामकरण पर वे फिराक की बेबाकी को याद करती हैं कि वे होते तो कहते , 'यह क्या बदतमीजी है, शहर के नाम कमीजों की तरह नहीं बदले जाते.'
यहां जिन दिनों श्रीलाल शुक्ल मुख्य प्रशासनिक अधिकारी नियुक्त थे, वे 'सारिका' के लिए उनका इंटरव्यू लेने गयीं. शुक्ल जी ने सारे सवालों के आदर्श उत्तर दिए. लगा ही नहीं कि 'राग दरबारी' का लेखक बोल रहा है. रविंद्र कालिया ने उस इंटरव्यू के बारे में पूछा तो कहा कि वे तुमसे खुले ही नहीं तो इंटरव्यू कैसे होता. फिर श्रीलाल शुक्ल ने माजरा भांप कर ममता कालिया से कहा कि कल का इंटरव्यू फाड़ कर फेंक दो, आज आओ. तब जाकर वह बातचीत संपन्न हुई पर जैसी-तैसी ही. पर जो श्रीलाल शुक्ल को जानते हैं वे इस बात से वाकिफ होंगे कि वे एक वाक्य के प्रश्न का उत्‍तर भी एक ही वाक्य में देते थे. बहुत अनुशासित व मितभाषी. उनसे बातचीत करते समय सवाल पूछने वाले का उत्साह जरा सी देर में ठंडा पड़ जाता था.   
कालिया जी व नामवरजी का प्रसंग आए और पीने-पिलाने की चर्चा न हो तो संस्मरण झूठे सिद्ध होंगे. नामवर जी तो इलाहाबाद जाते ही रहते थे. एक बार नामवर जी और काशीनाथ सिंह जी घर आए तो बैठकी हुई. काशी जी की कसमसाहट को देखते हुए कालिया जी ने जिन्हें पंडित रामचंद्र शुक्ल ने समझा बुझा कर शराब पीने से मना कर रखा था, कैबिनेट से एक बॉटल निकाल कर रखी व माहौल बनने लगा. नामवर जी ने पूछा, ''कालिया तुम साथ नहीं दोगे?'' रवि ने कहा कि आजकल छोडी हुई है. फिर जिद करने पर बोले, ममता साथ दे देंगी. इस पर नामवर जी बोले, ''काशी उठो यहां नहीं बैठेंगे अब.''  मजबूरी में रवि ने ममता जी से गिलास मांगा और कहा कि ''एक गुरु ने कहा शराब छोड़ दो, दूसरा गुरु कह रहा है, पियो तो मैं कथागुरु का कहना मानूंगा.'' नामवर जी की उनके लिए सीख थी कि ''तुम पियो पर घातक प्रणाली से मत पियो. ''
क्या सीख देती है कोई भी पुस्तक -हर रचना पढ़ते हुए मेरे मन में यह विचार जरूर कौंधता है. केवल डिटेलिंग, केवल चित्रण भर या केवल शब्द और शिल्प का चाकचिक्‍य या गद्य का नैसर्गिक सुख. क्या देती है कोई भी रचना हमें. शायद कुछ अनुभव, कुछ वाक्य् अनूठे, कोई अंदाजेबयां जो चिपक जाय पढ़ने वाले की चेतना से. कुछ ऐसी चीजें खोजने की गरज से पन्ने पलटता हूं तो पाता हूं वे जगहें हैं यहां और कम नहीं हैं जहां ममता कालिया बोलती हैं अन्यथा तो वे नैरेटर तो हैं ही. एक ऐसा ही कथन उनका: ''शादी को पच्चीस साल हो जाएं तब स्त्री की तीन चौथाई देह और दिमाग बच्चों के इर्द गिर्द घूमता रहता है. वह अपने शयन कक्ष में एक चौथाई देह-दिल के साथ पहुंचती है....''
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मैं छिपाना जानती तो....
ममता कालिया ने यहां दुनिया जहान की बातें की हैं. कुछ ललित, कुछ विटी अंदाज में तो कुछ क्रिटिकल एनालिसिस के तौर पर भी. बातों-बातों में निपटाना भी उन्हें आता है. पर एक ऐसा किस्सा भी यहां बयान किया है कि उसे पढ़ कर बच्चन याद आ जाते हैं- मैं छिपाना जानता तो जग मुझे साधू समझता. वे किन्‍हीं प्रसून का जिक्र छेड़ती हैं जो रवि के निकट आ कर एक दिन अपनी पत्नी के निर्गंध होने की शिकायत करते हैं जिस पर ममता कालिया सख्ती से पेश आती हैं. दूसरी बार एक दिन भोजन पर आमंत्रित होने के नाते रसोई में हौले आकर ममता कालिया से एक किस का अनुनय करते हैं. मना करने पर बात आई गयी हो जाती है पर उनमें अपराध बोध यूं कि वे यह बात रवि को बता देते हैं. तभी से रवि का खाना पीना बंद. आखिर पति भी तो सामाजिक प्राणी ही है. पूरा किस्सा मान-मनौवल, जिरह और बातचीत का ऐसा कि जैसे वे आपबीती नहीं, किसी कहानी के पन्ने पलट रही हों. आखिरी खंड में कृष्णा सोबती के इलाहाबाद आने और उनके आतिथ्य का किस्सा लिखा है ममता कालिया ने. सोचा प्रसंगवश कृष्णा सोबती के उस आक्रामक आलेख का जिक्र भी वे शायद करें जिसे उन्होंने रविंद्र कालिया के विरोध में कथादेश में लिखा और बाद में उसे 'हम हशमत' में भी शामिल किया. पर ममता कालिया अपने प्रीतिकर प्रसंगों में शायद इस अप्रिय को टालना चाहती रही हों.
तो जीते जी इलाहाबाद. सच कहें तो हम संस्मरणों के मुरीद हैं. वह संस्मरण जो बांध ले. कुछ छाप छोड़ जाए मन पर. पूरे छह खंडों में इसे पढ़ते हुए सच कहें तो जैसे इलाहाबाद की धार्मिक सांस्कृतिक साहित्यिक 'परिकम्मा' पूरी हो जाती है. इससे अधिक किसी संस्मरण की सार्थकता क्या होगी कि वह गपाष्टक भी हो और अनुभव के भव का निरूपण भी. ममता कालिया के गद्य में उच्छल जलधि तरंग सी उन्मुक्तता है.  
और अंत में चित्रावली. क्या खूब चित्र संजोए है ममता कालिया ने जिसमें सबसे लाजवाब है जहां रविंद्र कालिया के पीछे खटिया खड़ी है और वे एक काठ की कुर्सी पर उकडू मुकुड़ू बैठे हुए हैं बड़ा मासूम सा चेहरा बनाए. नरेश मेहता का काव्यपाठ करते हुए चित्र है, नीलाभ की पहली पत्नी को स्टेशन से रिक्शा चला कर घर लाते हुए ज्ञानरंजन और रविंद्र कालिया हैं. ममता कालिया, विष्णु प्रभाकर और घर पर होने वाली गोष्ठी में लेखकों के साथ कुछ चित्र -सब मिलाकर 'जीते जी इलाहाबाद' में वैल्यू एडिशन करते हैं. लगातार गद्य लिखने में फिसलन या स्ख्लन से बचना असंभव होता है पर जिस तरह ममता जी गद्य में गोते लगा रही हैं, हाल ही 'रवि कथा', फिर 'जीते जी इलाहाबाद' और आगे की लिखने पढ़ने की योजनाओं में रमी हैं, उसे पढ़, देख लगता है कि वे गद्य को साधे हुए हैं उस अमिट पोटली की तरह जिसमें अभी अमूल्य बहुत कुछ बचा हुआ है.
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पुस्तकः जीते जी इलाहाबाद
रचनाकार: ममता कालिया
विधाः संस्मरण
भाषाः हिंदी
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन
पृष्ठ संख्याः 192
मूल्यः 199.00
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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. आपकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. आप हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, मेल dromnishchal@gmail.com

 

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