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पुस्तक समीक्षाः गांधी- जयपुर सत्याग्रह; नेहरू से निराश गांधी ने बोस को तरजीह दी, पर निराश हुए

विषय की जटिलता के बावजूद पुस्तक 'गांधी- जयपुर सत्याग्रह' की भाषा सरल एवं चिंतनशील है तथा विवादों को जन्म देने की बजाए घटनाओं को उजागर करती मालूम जान पड़ती है.

स्वतंत्रता संग्राम के अज्ञात तथ्यों को समेटती गोपाल शर्मा की पुस्तकः गांधी- जयपुर सत्याग्रह स्वतंत्रता संग्राम के अज्ञात तथ्यों को समेटती गोपाल शर्मा की पुस्तकः गांधी- जयपुर सत्याग्रह

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अब तक अज्ञात, जयपुर रियासत में प्रशासनिक सुधार के लिए तीन साल चले आंदोलन में मोहनदास करमचंद गांधी का नेतृत्व एक गौरवपूर्ण अध्याय है. 1942 के निर्णायक भारत छोड़ो आंदोलन से पहले उन्होंने दो रियासतों को नए आंदोलन की पाठशाला बनाया. उनमें से बड़ी रियासत जयपुर का जिम्मा अपने 'पांचवें पुत्र' जमनालाल बजाज को सौंपा और इस तरह असली बागडोर खुद के हाथ में रखी. अपने जमाने के तेजतर्रार पत्रकार और अब राजस्थान के एक अखबार के प्रधान संपादक व लेखक गोपाल शर्मा की हालिया किताब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के राजस्थान से रिश्तों के मद्देनजर आई है.

'गांधीः जयपुर सत्याग्रह' नामक इस किताब में राजस्थान की जटिल और तीक्ष्ण राजनीति के साथ ही उस दौर की जटिल सियासत का एक ऐसा सफरनामा सामने आता है, जिसमें गांधी बार-बार राष्ट्रनायक के रूप में सामने आते हैं. राजस्थान के संदर्भ में गांधी का ऐसा रूप इससे पहले ज्ञात नहीं था. साल 1933-39 के बीच जयपुर राज्य के ब्रिटिश प्रधानमंत्री रहे सर हेनरी ब्यूचैम्प सेंट जॉन ने एक बार जब धमकी दी कि जयपुर के अहिंसक आंदोलन का जवाब मशीनगन से दिया जाएगा. उसने कहा कि भारत के लोग अंग्रेजों की नस्ल में मौजूद मानवता का फायदा उठा रहे हैं; यदि जापान या हिटलर होते तो अहिंसक आंदोलन सफल नहीं होने देते. गांधी ने इसके जवाब में चेतावनी दी कि ऐसे ब्रिटिश प्रधानमंत्री के जाने का समय आ गया है. उन्होंने कहा कि जयपुर की जनता को मानसिक और नैतिक भूख से मरने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता. गांधी ने जयपुर के महाराजा को कठपुतली और ब्रिटिश अफसरों को जबर्दस्ती लादा हुए बताकर पूरी ताकत से अन्याय का मुकाबला करने का जनता से आह्वान किया. वे ब्रिटिश प्रधानमंत्री को हटाकर ही चुप नहीं बैठे बल्कि जनता को कुचलने की मानसिकता के हटने और जनता की मांगें पूरी होने तक अहिंसक संघर्ष जारी रखा. यह संघर्ष इतना प्रबल हुआ कि गांधी के जयपुर पहुंचते ही गिरफ्तार करने की तैयारियां कर ली गईं. गांधी ने सधे हुए कदम रखे. रणनीतिक सूझबूझ से जयपुर सत्याग्रह वापस लेकर शासन में सुधार के लिए वायसराय पर दबाव बनाया. गांधी का सोचना था कि घोड़े को दौड़ाते हुए उसकी जान ले लेना अच्छे घुड़सवार की पहचान नहीं है. एक योग्य सेनापति हमेशा युद्ध को अपने अनुसार चलाता है, अपने अनुकूल समय पर और अपनी पसंद के मैदान में. वह कभी भी यह अवसर अपने शत्रु के हाथ में नहीं जाने देता.

'गांधीः जयपुर सत्याग्रह' पुस्तक में तत्कालीन राजनीतिक घटनाक्रम को शोधपूर्ण तरीके से सामने लाया गया है. यह जानना महत्त्वपूर्ण है कि एक मौके पर गांधी जी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू की जगह नेताजी सुभाषचंद्र बोस को न केवल तरजीह दी बल्कि वह उन्हें अध्यक्ष भी बनाना चाहते थे. लेकिन जैसे वे नेहरू से निराश हो चले थे, वैसा ही बोस के मामले में भी हुआ, और एक समय ऐसा आया कि गांधी और बोस में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता इतनी गहरी हो गई कि बोस ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया. उस वक्त नेहरू ने मौके की नजाकत समझी और रुख बदलकर गांधी के साथ खड़े नजर आए. इससे ठीक पहले रियासतों में राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर गांधी-नेहरू में इतना जबर्दस्त टकराव चला कि गांधी जी ने उन्हें सीधे पत्र लिखना तक पसंद नहीं किया और अपने तत्कालीन सचिव महादेव देसाई को इसका माध्यम बनाया.

यह पुस्तक इस बात का भी रहस्योद्घाटन करती है कि दूसरी बार कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद पंडित नेहरू का रियासती मुद्दों पर गांधी से टकराव और तेज होता गया. नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने मैसूर में चल रही लोकतांत्रिक गतिविधियों के लिए अहिंसक संघर्ष का समर्थन करके गांधी की राजनीतिक सोच को सीधे चुनौती दे दी. यह प्रस्ताव गांधी जी को पसंद नहीं आया. अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की कलकत्ता बैठक में समझौते के तमाम प्रयासों के बावजूद गांधी मैसूर प्रस्ताव को भूलने को तैयार नहीं हुए. उन्होंने हरिजन में अधिवेशन के प्रस्तावों की आलोचना से शुरुआत की और आखिरकार मैसूर प्रस्ताव को भी निशाने पर लिया. हरिजन में गांधी का लेख छपते ही नेहरू ने उन्हें कटाक्ष भरा जवाब दिया. नेहरू अपने हर वाक्य के साथ गांधी की आलोचना को गलत ठहरा रहे थे और उनके तर्कों को चुनौती दे रहे थे. उन्होंने गांधी से कई नीतिगत सवाल भी किए.

गांधी जी ने मैसूर प्रस्ताव की आलोचना करते हुए लिखा था कि अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी को कम-से-कम दूसरे पक्ष की बात सुने बिना यह प्रस्ताव पास नहीं करना चाहिए था. नेहरू उनकी इस बात से सहमत नहीं थे. उन्होंने लिखा, 'यह कहना सही नहीं है कि किसी की बात सुने बगैर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने इकतरफा निंदा की है. यह सब मैं आपको इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि हमारी क्या नीति है, इस बारे में खुद अपने दिमाग में मैं कोई अस्पष्टता नहीं रहने देना चाहता. अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी और मैंने जिस तरह काम किया, उसके लिए आपने हमारी निंदा की है. अभी तक भी मैं यह नहीं समझ पाया कि मैंने कैसे और कहां भूल की है; और, जब तक मैं यह समझ नहीं लेता तब तक और किसी तरह काम करना मुश्किल ही है.'

नेहरू के पत्र की शब्दावली गांधी के लिए अनूठी थी. कांग्रेस में सक्रियता के दौरान इस तरह पहले उन्हें सीधी चुनौती नहीं मिली थी. नेहरू के प्रति शुरू से भावुक रहे गांधी सीधा जवाब तक नहीं लिख सके. गांधी की ओर से पत्र का जवाब देते हुए महादेव देसाई ने नेहरू को 19 नवम्बर, 1937 को लिखा कि गांधी की राय में 'हस्तक्षेप नहीं करने की नीति का स्पष्ट उल्लंघन हुआ है... बापू चाहते हैं कि मैं आपको विश्वास दिला दूं कि उनका इरादा आपकी निंदा करने का कभी नहीं था.' उसी दिन नेहरू ने कर्नाटक कांग्रेस के मंत्री आर.एस. हुकेरिकर को पत्र लिखकर गांधी पर कांग्रेस और मैसूर की जनता के साथ अन्याय करने का आरोप लगाया.

गांधी-नेहरू के विवाद का विषय केवल दो व्यक्तियों के आत्मीय व्यवहार से जुड़ा हुआ नहीं था. उस दौरान की राजनीतिक घटनाओं में एक मुख्य गुत्थी यह भी थी कि क्या गांधी सेवा संघ जैसे प्रयोग के जरिए कोई राजनीतिक दल खड़ा करके कांग्रेस को चुनौती देना चाहते थे? इसका स्पष्ट जवाब अब संभव नहीं है. पर यह निश्चित है कि 1935 से बाद के वर्षों में उनका कांग्रेस से विरोध हो चला था और कांग्रेस कार्यसमिति तक दो हिस्सों में बंट गई थी. उस दौरान नेहरू-बोस राजनीतिक रूप से साथ थे. देश की नौजवान पीढ़ी इन्हें वर्तमान एवं भविष्य के नेता के रूप में देख रही थी. आखिर गांधी ने आर-पार का फैसला करने के लिए कदम आगे बढ़ा दिए. 23 जनवरी, 1938 को सुभाषचंद्र बोस विदेश यात्रा से कराची लौटे. गांधी ने उसी दिन बोस को तार भेजकर नेहरू की जगह उन्हें तरजीह देने की अपनी इच्छा कुछ यों प्रकट की. 'स्वदेश लौटने पर तुम्हारा स्वागत है. परमात्मा तुम्हें जवाहरलाल की जगह संभालने की शक्ति दे.'

बावजूद इसके महात्मा गांधी को एक बार फिर बोस से निराशा हुई. सुभाषचंद्र बोस की राह और अलग थी. रियासतों के मामले में गांधी-नेहरू विवाद हरिपुरा के कांग्रेस अधिवेशन में और खुलकर सामने आया. चूंकि कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में बोस को कार्यभार संभालना था, इसलिए यह और महत्त्वपूर्ण हो गया. नेहरू ने 16 फरवरी, 1938 को कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार अलग से रिपोर्ट पेश की. उनका कहना था कि उन्हें जिन समस्याओं का सामना करना पड़ा, उसके अहम विषयों पर वे ध्यान आकर्षित करवाना चाहते हैं. इस रिपोर्ट में उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय हालात, भारत पर कथित रूप से मंडरा रहे युद्ध के खोखलेपन के साथ रियासतों के विषय को प्रमुखता से उठाया. गांधी ने उस माहौल में सत्य का एक और प्रयोग करने के लिए निर्णायक कदम बढ़ाए. लेकिन वे अपनी इस रणनीति पर कायम थे कि लड़ाई को फैलाने की बजाय केन्द्रित किया जाए. इसलिए रियासतों में लोकतांत्रित अधिकारों और स्वतंत्रता की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन के बीच उन्होंने अपने दो भरोसे के साथियों जमनालाल बजाज और वल्लभ भाई पटेल के जरिए जयपुर और राजकोट में सीधा मोर्चा खोला.

विषय की जटिलता के बावजूद पुस्तक की भाषा सरल एवं चिंतनशील है तथा विवादों को जन्म देने की बजाए घटनाओं को उजागर करती मालूम जान पड़ती है. पुस्तक में पर्याप्त संदर्भ दिए गए हैं और कोई भी बात प्रमाण के बिना नहीं लिखी गई है. इतिहास के अनेक अज्ञात पृष्ठों को समेटे यह पुस्तक जयपुर सत्याग्रह और समकालीन राजनीति का यह सशक्त अभिलेखीय दस्तावेज है, इतिहास में रूचि रखने वाले पाठकों व शोधार्थियों के लिए अवश्य ज्ञानवर्धक सिद्ध होगी.
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पुस्तकः गांधी- जयपुर सत्याग्रह
लेखकः गोपाल शर्मा
भाषाः हिंदी
विधाः इतिहास/ दस्तावेज
प्रकाशकः महानगर प्रकाशन
मूल्यः 695/रुपए
पृष्ठ संख्याः 400

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