scorecardresearch
 

बुक रिव्यू: स्कूली शिक्षा के पाखंड के खिलाफ आवाज

तितली अलग किस्म का उपन्यास है. यह पब्लिक स्कूल के पाखंड को खंड-खंड करता है. यह रिपोर्ताजनुमा आख्यान बड़े नाजुक मुद्दों से भिड़ता है.

Advertisement
X

ताजा किताब, ताजा खबर, ताजा तरकारी की तासीर एक-सी होती है, तीनों आपकी शिराओं में खून का दौरा बढ़ा देती हैं. बहुत-से पत्रकार, रचनात्मक लेखन में प्रविष्ट हुए हैं तो इसकी ठोस वजहें हैं. पत्रकार लगातार यथार्थ से टकराते हैं, खबरों का खुलासा करते, खबरों का पीछा करते और खबरों के खतरे उठाते अगर वे खुद लिखने के लिए खलबला उठते हैं, तो यह एकदम सहज, स्वाभाविक है. इसका स्वागत होना चाहिए.

और सिर्फ तितली अलग किस्म का उपन्यास है. पब्लिक स्कूल के पाखंड को खंड-खंड करता, यह रिपोर्ताजनुमा आख्यान बड़े नाजुक मुद्दों से भिड़ता है. अंतरराष्ट्रीय स्कूलों की स्थानीय, आंतरिक राजनीति, छात्रों से भेदभाव, अध्यापक वर्ग का आचरण—सब पर प्रदीप का कैमरा बारी-बारी से जूम करता है. तान्या मैम के किरदार में प्रदीप ने बहुआयामी चरित्र खड़ा किया है.

उसकी चपलता और तरलता बच्चों को प्रेरित, स्पंदित करती है. लेकिन सभी शिक्षक तान्या जैसी नहीं हैं. उनमें कुटिल प्रिंसिपल, जटिल संगीता, प्रेमिल जग्गी और अन्य मनोविकारों से ग्रस्त अध्यापिकाएं हैं. इनके छोटे सरोकार इनकी सीमित दुनिया से चालित होते हैं, जिनमें छोटे, मासूम बच्चों के विकास और प्रगति जैसे उद्देश्य उपेक्षित रह जाते हैं. तान्या युवा है, सुंदर है और स्मार्ट भी.

अपने करियर के दौरान उसे तरह-तरह के अनुभव होते हैं. बच्चों का निश्चल प्रेम उसे भाव संपन्न करता है लेकिन वयस्कों का संसार छल-कपट से भरा हुआ है. जो आदर्श स्कूल की घोषणाओं, स्थापनाओं में दिखाया जाता है, स्कूल के पालनहार ही उसका पालन नहीं करते. स्कूल के मालिक अमित जैन और प्रिंसिपल सुमेधा कौल डेटिंग पर कभी शिमला तो कभी मसूरी जाते हैं. ईशिता ऊपर से सख्तमिजाज एकेडमिक है लेकिन उसकी भी कुछ कमजोरियां हैं.

मिनी जोशी कुंठित शिक्षिका है जो छोटे बच्चों से यौन कुचेष्टा करती है. यह अत्यंत नाजुक विषय है जिस पर लेखक ने एकाधिक बार कलम रखी है कि छोटे, अबोध बच्चे स्कूल परिसर में ही यौन छेड़छाड़ के शिकार हो जाते हैं. तान्या चाहती है कि इन धांधलियों के बारे में मीडिया से शिकायत करे लेकिन स्कूल में उसकी अपनी स्थिति डांवाडोल है. ऊपर से मिनी को इशिता से अभयदान मिला हुआ है.

अपने सीधेपन और स्पष्टवादिता के चलते तान्या कई बार धोखा खाती है लेकिन वह बहादुर भी है. 'हार नहीं मानूंगी' की तर्ज पर वह जीवन जीती है. उसकी अदम्यता से चिढ़कर इशिता उसे नौकरी से निकाल देती है. तान्या भी तय कर लेती है कि महज एक नौकरी की खातिर वह स्कूल के  मालिक अमित जैन के मनोरंजन का साधन नहीं बनेगी. उसकी सहेली पल्लवी भी उसके साथ है. वह नौकरी से इस्तीफा दे देती है.

अगली संस्था महादेवा स्कूल में भी तान्या को कटु अनुभव होते हैं. विद्या का मंदिर कहे जाने वाले इन स्कूलों में न शिक्षण की फिक्र की जाती है न शिक्षक की. टीचरों को 40,000 देकर 15,000 रु. नकद वापस करने की शर्त पर नौकरी दी जाती है.

इसमें तितली और चील का प्रतीक तान्या से संबद्ध है. शुरू में वह तितली जैसी सुंदर और संवेदनशील है. हालात उसे चील बनना सिखा देते हैं. यह उसकी खूबी है कि वह चील के गुण ग्रहण करती है, अवगुण नहीं. और सिर्फ तितली का कथा-प्रवाह तेज और तेवर भरा है. अंत में सवाल उठता है कि क्या एक स्कूली अध्यापिका का जीवन इतना विविधरंगी और घटनाप्रधान होता है जितना तान्या का. उपन्यास स्कूली शिक्षा के खोखलेपन और पाखंड के खिलाफ अपनी अवाज उठता है, यह एक बड़ी पहल है. लेखक की बेबाक शैली इस रचना का शक्तिबिंदु है.

और सिर्फ तितली
लेखक: प्रदीप सौरभ
वाणी प्रकाशन
मूल्य 250 रु.

Advertisement
Advertisement