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पुस्तक अंश: अफ़ग़ानिस्तान से ख़त-ओ-किताबत, चक्कू बन जाए तलवार

आज की पृष्ठभूमि में 'अफ़ग़ानिस्तान से ख़त-ओ-किताबत' जैसी पुस्तक को पढ़ना यह जानने के लिए ज़रूरी है कि बीती चार दहाइयों ने दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत जगहों में एक, अनेक धर्मों की भूमि रहे उस देश से क्या-क्या छीन लिया है.

अफ़ग़ानिस्तान से ख़त-ओ-किताबत का आवरण-चित्र अफ़ग़ानिस्तान से ख़त-ओ-किताबत का आवरण-चित्र

अफ़ग़ानिस्तान की जो तस्वीरें इधर दशकों से हमारे ज़ेहन में आ-आ कर जमा होती रही हैं, ख़ून, बारूद, खंडहरों और अभी हाल में जहाज़ों पर लटक-लटक कर गिरते लोगों की उन तमाम तस्वीरों का मुक़ाबला अकेला काबुलीवाला करता रहा है, जो हमारी स्मृति की तहों में आज भी अपने ऊंचे कंधों पर मेवों का थैला लटकाए टहलता रहता है. राकेश तिवारी का यह यात्रा वृतांत उसी काबुलीवाले के देश की यात्रा है, जिसे लेखक ने 1977 के दौरान अंजाम दिया था. तेईस साल की उम्र में बहुत कम संसाधनों और गहरे लगाव के साथ लेखक ने पैदल और बसों में घूम-घाम कर जो यादें इकट्ठा की थीं, इस किताब में उन्हें, तमाम ऐतिहासिक-भौगोलिक जानकारियों, तथ्यों के साथ संजो दिया है. उत्तर प्रदेश के बस्ती ज़िले के मूल निवासी और भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के महानिदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए लेखक राकेश तिवारी, रॉकी का जन्म 2 अक्टूबर, 1953 को सीतापुर ज़िले के बिसवां गांव में हुआ.

आपने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विषय में स्नातकोत्तर किया और मिर्ज़ापुर के चित्रित शैलाश्रयों पर अवध विश्वविद्यालय से पीएच.डी की डिग्री हासिल की. लगभग चार दशक तक देश के विभिन्न भागों में पुरातात्त्विक सर्वेक्षण एवं उत्खनन तथा गंगा-घाटी को दक्षिण भारत से जोड़नेवाले प्राचीन 'दक्षिणा-पथ' की यात्रा के साथ ही गहन अध्ययन किया और कई देशों की यात्राएं की. आपकी प्रकाशित पुस्तकों में लखनऊ से काठमांडू तक साइकिल से नेपाल की यात्रा पर आधारित 'पहियों के इर्द-गिर्द', दिल्ली से कलकत्ता तक की नौका-यात्रा पर आधारित यात्रा-वृत्तान्त 'सफ़र एक डोंगी में डगमग', उत्तर प्रदेश के दक्षिण-पूर्वी भू-भाग ज़िला मिर्ज़ापुर, सोनभद्र और चंदौली के सर्वेक्षण एवं सैर पर आधारित संस्मरण 'पवन ऐसा डोलै', चिली एवं टर्की की यात्राओं पर आधारित यात्रा विवरण 'पहलू में आए ओर-छोर: दो देश: चिली और टर्की' के अलावा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में हिमालय, अफ़ग़ानिस्तान, मॉरीशस के यात्रा-संस्मरण, कविताएं आदि प्रकाशित हैं.

'अफ़ग़ानिस्तान से ख़त-ओ-किताबत' पत्र शैली में लिखा गया दिलचस्प यात्रा-वृत्तांत है, जो 1977 के अफ़ग़ानिस्तान और ईरान के समाज, वहां की संस्कृति और समृद्धि के बारे में हमें सलीके से पर्याप्त जानकारी देता है. आज जिस तरह के अफ़ग़ानिस्तान को हम ख़बरों में देख रहे हैं, वह इस किताब के अफ़ग़ानिस्तान से उलट है. आखिर 5 दशकों के भीतर-भीतर ऐसा क्या हो गया कि आधुनिक हो रहे एक समाज पर दकियानूस नज़रिया हावी होता चला गया. आज की पृष्ठभूमि में 'अफ़ग़ानिस्तान से ख़त-ओ-किताबत' जैसी पुस्तक को पढ़ना एक अलग तरह का सुकून देता है, और इसे पढ़ना यह जानने के लिए ज़रूरी है कि बीती चार दहाइयों ने दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत जगहों में एक, अनेक धर्मों की भूमि रहे उस देश से क्या-क्या छीन लिया है.

इस किताब को पढ़ना एक देश के इतिहास को समझने जैसा है. राकेश तिवारी अपने यात्रा-वृत्तांत में एक पुरातत्ववेत्ता की निगाह से हमें किसी जगह को दिखाते हैं. उनकी भाषा की रवानगी का अपना आकर्षण है. ऐसे में इस को पढ़ना कई तरह के अनुभवों की यात्रा जैसा है. विश्व की बड़ी सैन्य ताक़तों के ख़ूनी खेल का मोहरा बनने से पहले का यह अफ़ग़ानिस्तान-वर्णन बर्फ़ीली घाटियों, पहाड़ों के बीच मोटे गुदगुदे गर्म कपड़ों में गुनगुनी चाय का प्याला हाथों में दबाए, राजकपूर की फ़िल्मों के गाने सुनने का-सा अहसास जगाता है. साहित्य आजतक पर यह पुस्तक अंशः खास आपके लिएः

पुस्तक अंश: अफ़ग़ानिस्तान से ख़त-ओ-किताबत

चक्कू बन जाए तलवार

शहर पार हुआ, सामने हिन्दूकुश पहाड़ पर, सुबह की हल्की धूप में नहाई, बर्फ़ ऐसी दिखने लगी, मानो सोने का पानी चढ़ा हो. सड़क के दोनों बगल, चिनार के दरख़्तों की सतर क़तारें, फूलते हुए अखरोट और शहतूत के मझोले झाड़, अंगूर के कटे हुए बाग़ान, ढालों पर उगती नरम हरी घास. ज़माने से सुनते-पढ़ते आए कोह-ए-दामन (पहाड़ की गोद) के बीच से बढ़ते हुए, एक्साइटमेंट से लबालब. सोचने लगा, आने वाले दिनों में अखरोट फलेंगे और दूर-दूर तक के बाग़ान अंगूर के गुच्छों से सज जाएंगे.
जमालुद्दीन के यह बताने पर कि 'एक महीने बाद यहां जन्नत का नज़ारा उतर आएगा', मैं कुढ़ने लगा, तब ही क्यों नहीं आया. फिर सोचा, हम अधमलोक वालों के नसीब में यह सब कहां! एक बार एक ने बहुत कोशिश भी की तो त्रिशंकु बनकर लटक गया, न इस लोक में न स्वर्ग में. इतना पुण्य-प्रताप, ऊपर वाले ने अफ़ग़ान मर्दों और हसीन हूरों को ही बख़्सा है, जो हर बरस जन्नत की सैर कर लेते हैं.
खिड़की से बाहर के 'सीन्स' देखते-देखते फिर से तुम्हारा ख़याल आने लगा. श्याम ने एम्बेसी से लौटकर मेरे चेहरे का सवाल पढ़कर मज़ाकिया लहज़े में बताया था- "अब मुंह न लटका लेना, यह सुनकर कि अभी तक वहां से आपका कोई प्रेम-पत्तर नहीं आया, मगर तसल्ली रखिए आता ही होगा, रफ़्ता-रफ़्ता." बोला तो कुछ नहीं लेकिन सोचता रहा 'आ तो जाने चाहिए थे अब तक. ख़ैर, अभी नहीं आया तो कुंदूज़ से लौटने तक आ जाएगा. पता नहीं क्या चल रहा हो वहां. सब ठीक-ठाक तो है ना!'
बस की दो सीटों के बीच पैदल चलने के लिए छूटी जगह के उधर वाली चौकी पर बैठा फ़ौजी वरदी में फब रहा, अफ़ग़ान सेना का एक हमउम्र लेफ्टिनेंट बात करते-करते पश्तो और रूसी के अलावा अंग्रेज़ी के 'यस' या 'नो' भी टपका देता.
जमालुद्दीन से पता चला कि 'यहां के पढ़े-लिखे लोग ग़ैर-मुल्की ज़ुबानों में से अमूमन रूसी और फ़्रेंच सीखने में दिलचस्पी रखते हैं. इनके ज़ेहन में बसी है अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ के लिए ख़ासी नफ़रत, उनकी हुकूमत और उनसे हुई जंगों की वजह से.' फ़ौजी अफ़सर लगातार मुझसे बातें करता सवाल दर सवाल करता रहा, धाराधार, पश्तो में. जमालुद्दीन दुभाषिए की ज़िम्मेदारी संभाले बात की बात उर्दू में तर्जुमा करते चलते- 'हिन्द में अंगूर, अखरोट, शहतूत होता है या नहीं? राजकपूर को देखा है कभी?' और ऐसे ही तमाम सवालात.
सड़क से हटकर, कुछ दूर पर ख़ानाबदोशों के तने हुए ख़ेमे, उनके आसपास ऊंट, बूढ़े, जवान, बच्चे, अल्हड़ लड़कियां, भेड़ों के रेवड़, भेड़ियों जैसे कुत्ते, और चूल्हों से उठता-घूमता धुआं दिख जाता. एक सड़क कटकर 'बेग्राम हवाई अड्डे' की ओर चली गई, बेग्राम के पास ही है 'तोपदरा स्तूप', मगर ग़ैर फ़ौजी उधर नहीं जा सकते. काबुल से 60 किलोमीटर की दूरी पर, चारीकार के नज़दीक, पंजशीर और घोरबन्द नदियों के मेल पर बसे बेग्राम शहर से होकर जाने वाले रास्ते पुराने ज़माने से ही इसे पश्चिमी पहाड़ों में बसे बामियान और उत्तर में कुषाण-दर्रे के पार 'बाघलान घाटी', 'सुर्ख़ कोतल' और 'बल्ख़' से जोड़ते रहे. प्राचीन कपिश या 'कपिशी नगर' से पहचाना गया यह शहर दो हज़ार बरस पहले कुषाण बादशाहों की राजधानी और तिजारती मरकज़ बन गया. इस इलाक़े से बौद्ध-मूर्तियों, स्तूपों वग़ैरह के बहुत से अवशेष मिलते रहते हैं.
'कपिश राज्य' की राजधानी के निशानात इसी बेग्राम और उसके आसपास दबे माने जाते हैं. आज से कोई पच्चीस सौ वर्ष पहले 'पाणिनि' ने इस नगर का ज़िक्र 'कपिशी' नाम से किया है. 'कपिश राज्य' की पहचान प्राचीन संस्कृत साहित्य में वर्णित आज से छब्बीस सौ बरस पहले के भारत के 'सोलह महाजनपदों' में गिने जाने वाले उत्तर-पश्चिमी भारत में स्थित 'कम्बोज महाजनपद' से की जाती है. यहां के रहने वाले अश्वकायन और अश्वायन कहलाते थे. न केवल पाणिनि वरन् प्राचीन साहित्य के अनेक लेखकों ने यहां की मशहूर सुरा कपिशायन (कपिशायनी द्राक्षा) या कपिशायनी अंगूर और अंगूरी शराब की शोहरत बार-बार दर्ज की है.
क़रीब 1300 साल पहले कपिशा आए चीनी यात्री ह्वेनत्सांग ने यहां के बाशिन्दों के समूर से सज्जित ऊनी कपड़ों, अक्खड़ कठकरेजी और उग्र स्वभाव, रूखी बोली, यहां उपजने वाले अनाजों और फलों और 'शेन नस्ल' के घोड़ों के बारे में लिखा है. यहां का क्षत्रिय बौद्ध राजा प्रजा से बहुत प्यार करने वाला, निर्धनों को दान करने वाला और हर साल बुद्ध की अठारह फ़ीट ऊंची मूर्तियां बनवाने वाला था, यह भी दर्ज है उसके लेख में. 1939 के आसपास यहां हुई खुदाई में मिले शीशे के सुरापात्रों से इसके एक बड़े द्राक्षासव बाज़ार रहे होने की तस्दीक़ हुई है. यहां से मिली क़रीब दो हज़ार साल पुरानी हाथी दांत पर उकेरित कलाकृतियां दुनिया भर में जानी जाती हैं. इनमें शामिल हैं बेहतरीनी से नक्श की गईं शेर, हाथी, अज़दहे जैसे घोड़ों पर सवार, परिंदे, फूल, लगभग अनावृत नारियों, वादकों, नर्तकों जैसी आकृतियां और कुछ पर उकेरित खरोष्ठी, ब्राह्मी और दूसरी लिपियों के अभिलेख.
रास्ते में आया काराबाग़, बक़ौल जमालुद्दीन, मौसम आने पर मूंगफली के ढेर की तरह, ताज़ा फले अंगूर से पट जाता है. बर्तनों पर अफ़ग़ान कारीगरी के लिए मशहूर एक और क़स्बा आया, और उसके बाद आई, काबुल से 40 मील (64 किमी.) दूर समन्दर की सतह से 5250 फ़ीट (1600 मी.) की ऊंचाई पर बसी, परवान सूबे की राजधानी चारीकार. यहां से आगे आता है हिन्दूकुश के उस पार ले जाने वाला सालंग दर्रा, पुराने वक़्त में इस दर्रे के पश्चिम और आसपास
उस पार जाने और उधर से आने वाले कई दर्रों में से मशहूर हैं- 'दर्रा-ए-कुशन' या 'दर्रा-ए-काओशान', 'खवाक दर्रा', 'शिबर दर्रा'. मोटे तौर पर आज से दो हज़ार तीन सौ बरस बीते, खवाक और कुषाण दर्रों के रास्ते से ही मकदूनिया के सिकन्दर महान ने हिन्दूकुश पार करने की बात यहां के आम लोग भी जानते हैं.
हमारी बस आगे चली और जमालुद्दीन ने शहतूत और अखरोट की पोटली खोलकर मेरी ओर बढ़ाते हुए बताया चारीकार में बनने वाले लाजवाब चाकू-कैंची के बारे में. और यह सब सुनते-जानते मेरा मन उड़ गया ढाई हज़ार किलोमीटर से भी ज़्यादा लम्बे दायरे और सुधियों की परतों में. बेग्राम नाम ने याद दिलाई, एम.ए. में पढ़े बांग्लादेश के बोगरा ज़िले से मिले कुमारगुप्त के पन्द्रह सौ बावन बरस पुराने तांबे के पत्तर पर लिखे लेख में दर्ज 'वयिग्राम' (बेग्राम) की. और चारीकार के चाकू-कैंची ने अपने रामपुरी चाकुओं और बचपन में देखे-सुने गली-गली फेरी लगाकर-'चाकू-छुरी तेज़ करा लो'; 'चाकू-छुरी पर धार धरा लो' की आवाज़ लगाने वालों के साथ, 'ज़ंजीर' सिनेमा और इसमें आशा भोसले की आवाज़ में लटके-झटके वाली अदाओं के साथ जया बच्चन के गाए उस गाने के बोलों की भी याद दिला दी:
चक्कू छुरियां ते-ऽ-ऽ-ऽ-ऽज करा लो
चक्कू छुरियां ते-ऽ-ऽ-ऽ-ऽज करा लो
चक्कू छुरियां ते-ऽ-ऽ-ऽ-ऽज करा लो
मैं तो रक़्खूं अइसी धार,
चक्कू बन जाए तलवार.
क्या कमाल का 'मन' बनाया है बनाने वाले ने! एक ही पल में कहीं भी रहते हुए पैठ जाता है दुनिया की जुगराफ़िआ में कहीं भी, साथ के साथ काल की गहराई या आने वाले कल की कल्पनाओं तक में, देख-सुन-समझ सकता है एक साथ कई-कई जगहें और घटित-अघटित वाक़ये.

पुस्तकः अफ़ग़ानिस्तान से ख़त-ओ-किताबत
लेखकः राकेश तिवारी
भाषाः हिंदी
विधाः यात्रावृत्त
प्रकाशक: सार्थक, राजकमल प्रकाशन उप्रकम
मूल्यः 250/- रुपए
पृष्ठ: 224

 

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