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पुस्तक अंशः निवेदिता मेनन के शब्द 'नारीवादी निगाह से' ही सच नहीं हैं

इस सत्य को स्वीकार करके चलें कि एक बार जब प्यार विवाह की संस्था में करीने से फ़िट हो जाता है तो यह विवाह भी किसी अन्य विवाह जैसा ही हो जाता है.

 'नारीवादी निगाह से' पुस्तक का आवरण चित्र [ सौजन्यः राजकमल प्रकाशन ] 'नारीवादी निगाह से' पुस्तक का आवरण चित्र [ सौजन्यः राजकमल प्रकाशन ]

स्त्री और उसके अधिकारों को केंद्र में रखकर हमेशा बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं, पर उनकी दशा आज तमाम नारीवादी नारों और आंदोलनों के बावजूद जस की तस है. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर निवेदिता मेनन की नई पुस्तक 'नारीवादी निगाह से' में स्त्री के अधिकारों और उसको लेकर गढ़े गए सिद्धातों की जटिल अवधारणा पर व्यावहारिक उद्धरणों और सुझावों के साथ स्पष्ट और सहज भाषा में एक विमर्श रखा गया है. यह विमर्श तथ्यपरक ढंग से यह बतलाता है कि नारीवाद सिर्फ महिलाओं का सरोकार नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक ज़रूरी मसला है.

यह मेनन की अंग्रेजी में खासी चर्चित पुस्तक 'सीइंग लाइक अ फ़ेमिनिस्ट' का हिंदी अनुवाद है, जो नारीवाद को पितृसत्ता पर अन्तिम विजय का जयघोष साबित करने के बजाय समाज के एक क्रमिक लेकिन निर्णायक रूपान्तरण पर ज़ोर देती है. नारीवादी निगाह से देखने का इसका आशय है मुख्यधारा तथा नारीवाद, दोनों की पेचीदगियों को लक्षित करना. इसमें जैविक शरीर की निर्मिति, जाति-आधारित राजनीति द्वारा मुख्यधारा के नारीवाद की आलोचना, समान नागरिक संहिता, यौनिकता और यौनेच्छा, घरेलू श्रम के नारीवादीकरण तथा पितृसत्ता की छाया में पुरुषत्व के निर्माण जैसे मुद्दों की पड़ताल की गई है.

मेनन की दूसरी चर्चित पुस्तकों में 'सीइंग लाइक अ फ़ेमिनिस्ट' के अलावा 'रिकवरिंग सबवर्जन: फ़ेमिनिस्ट पॉलिटिक्स बियॉन्ड दि लॉ' शामिल है. उन्होंने 'पावर एंड कंटेस्टेशन: इंडिया आफ़्टर 1989 का सह-लेखन भी किया है. दो सम्पादित पुस्तकों के अलावा भारतीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय जर्नलों में भी उनका विपुल लेखन प्रकाशित हुआ है. आजतक.इन के साहित्य प्रेमी पाठकों के लिए निवेदिता मेनन की इसी पुस्तक 'नारीवादी निगाह से' का यह अंशः

श्रम का यौनिक विभाजन
इस सत्य को स्वीकार करके चलें कि एक बार जब यह प्यार विवाह की संस्था में करीने से फ़िट हो जाता है तो यह विवाह भी किसी अन्य विवाह जैसा ही हो जाता है. अक्सर जब मैं और मेरे मित्र पश्चिम के लोगों के सामने पारम्परिक विवाह को जायज़ ठहराने की कोशिश करते हैं तो वे अचरज से पूछते हैं: क्या भारत में विवाह अब भी परिवार द्वारा ही तय किया जाता है? इस पर हम जैसे लोगों का जवाब होता है कि विवाह करने के ढंग से क्या फ़र्क़ पड़ता है. उसका स्वरूप चाहे जैसा हो. पश्चिम में भी कितने लोग हैं जो सचमुच 'प्यार में पड़ते' हों- यह एक अजीबोग़रीब सवाल है जिसके तहत पहले से यह मान लिया है कि पारम्परिक विवाह के कठोर नियंत्रण के उलट पश्चिम के लोग अपने माता-पिता से स्वतंत्र होकर विवाह कर सकते हैं. क्या इससे अन्तत: विवाह का वास्तविक स्वरूप कुछ और हो जाता है?
इस संस्था का बुनियादी लक्षण श्रम का यौनिक विभाजन है. महिलाओं पर घर के कामकाज की ज़िम्मेदारी रहती है, जिसका मतलब है कि वे श्रम-शक्ति के पुनरुत्पादन का स्रोत होती हैं. स्त्रियां ही उस श्रम का स्रोत होती हैं जिसके बल पर लोग-बाग दिन-ब-दिन काम करने की क्षमता विकसित कर पाते हैं (भोजन, घर और कपड़ों की साफ़-सफ़ाई तथा आराम). औरत से अपेक्षा की जाती है कि वह इस तरह के काम ख़ुद निबटाए या किसी ग़रीब महिला को मामूली मज़दूरी पर रखकर उससे काम कराए. दोनों स्थितियों में, घरेलू काम स्त्रियों की पहली ज़िम्मेदारी माना जाता है- भले ही, और जैसा कि अक्सर होता भी है, वह घर से बाहर नौकरी या कोई अन्य काम करती हो.
श्रम के इस यौनिक विभाजन में कुछ भी 'स्वाभाविक' नहीं है. इस बात का जीव-विज्ञान से ख़ास लेना-देना नहीं है कि स्त्री और पुरुष परिवार के अन्दर और बाहर तरह-तरह के काम करते हैं. यह एक सामान्य बात है. इसमें केवल गर्भावस्था की प्रक्रिया ही जीव-विज्ञान के दायरे में आती है, बाक़ी खाना पकाने, साफ़-सफ़ाई, बच्चों की देखभाल करने जैसे तमाम काम (जिन्हें 'घरेलू काम' की श्रेणी में रखा जाता है) पुरुष भी बख़ूबी कर सकते हैं. लेकिन ऐसे सभी कार्यों को 'महिला का काम' माना जाता है. श्रम का यह यौनिक विभाजन 'सार्वजनिक' दायरे के वैतनिक कार्यों तक फैला है. ध्यान रहे कि इसका 'सेक्स' (जीव विज्ञान) से कोई ताल्लुक़ नहीं है, यह पूरी तरह जेंडर अर्थात् संस्कृति से जुड़ा हुआ है. कुछ प्रकार के कार्यों को महिलाओं का कार्य माना जाता है और कुछ काम पुरुषों के माने जाते हैं; लेकिन इससे ज़्यादा अहम तथ्य यह है कि महिला चाहे जो भी काम करे, उसे पुरुष की तुलना में कम वेतन दिया जाता है और उसके काम को कमतर आंका जाता है. मसलन, निचले स्तर पर नर्सिंग और अध्यापन जैसे काम पूरी तरह महिलाओं के हिस्से में आते हैं तथा अन्य मध्यवर्गीय सफ़ेदपोश कार्यों के मुक़ाबले उनमें वेतन भी बहुत कम रहता है. नारीवादियों का मानना है कि अध्यापन और नर्सिंग का यह 'स्त्रीकरण' इसलिए हुआ है क्योंकि ऐसे कार्यों को स्त्रियों की घरेलू ज़िम्मेदारी- देखभाल आदि करने का ही विस्तार मान लिया जाता है.
इसी के साथ, एक बार जब 'औरतों के काम' का पेशेवर ढर्रा तय हो जाता है तो उस पर व्यावहारिक रूप से पुरुषों का एकाधिकार हो जाता है. मिसाल के तौर पर, न्यूयॉर्क हो या नई दिल्ली- अधिकांश पेशेवर बावर्ची पुरुष ही होते हैं. इसकी वजह साफ़ है: श्रम का यौनिक विभाजन पहले से तय कर देता है कि महिलाओं को वैतनिक कार्य के बजाय घर के अवैतनिक काम को तरजीह देनी होगी.
तथ्य यह है कि श्रम के यौनिक विभाजन के पीछे जीव विज्ञान की किसी 'स्वाभाविक' भिन्नता के बजाय कुछ निश्चित वैचारिक पूर्व-धारणाएं ज़िम्मेदार हैं. इस तरह, एक तरफ़ तो महिलाओं को शारीरिक दृष्टि से कमज़ोर और श्रम के भारी कार्यों के लिए अनुपयुक्त माना जाता है, वहीं हम देखते हैं कि घर हो या बाहर- पानी और जलावन ढोने, अनाज पीसने, धान की रोपाई करने, खदान और आवासीय निर्माण जैसे क्षेत्रों में सिर पर भारी बोझा उठाने जैसे काम भी महिलाओं के ही हिस्से में आते हैं. लेकिन यहां भी जब महिलाओं द्वारा किए जानेवाले कार्यों का मशीनीकरण हो जाता है और उन्हें हल्का और ज़्यादा कमाऊ बना दिया जाता है तो नई मशीनों के इस्तेमाल का प्रशिक्षण पुरुषों को दिया जाता है और महिलाओं को काम से बाहर कर दिया जाता है. यह सिर्फ़ कारख़ानों में नहीं, उन कार्यों पर भी लागू होता है जिन्हें महिलाएं अपने समुदायों में परम्परागत तौर पर करती आई थीं. मसलन, जब अनाज पीसने का काम बिजली से चलनेवाली आटा-चक्की करने लगती है या महिलाओं द्वारा मछुआरों के लिए बनाए जानेवाले जाल की जगह नायलॉन के जाल बनने लगते हैं तो नए कार्यों का प्रशिक्षण पुरुषों को दिया जाता है और महिलाओं को पहले से भी कम मज़दूरी और ज़्यादा मेहनत वाले काम में झोंक दिया जाता है.
समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 में पारित हो गया था परन्तु स्थिति आज भी यही है कि महिला को उसी काम के बदले पुरुष से कम मज़दूरी दी जाती है. क़ानूनी प्रावधानों से बचने के लिए ठेकेदार/नियोक्ता एक तरीक़ा यह अपनाते हैं कि वे पुरुषों और महिलाओं को श्रम-प्रक्रिया के अलग-अलग ख़ानों में बांटकर महिलाओं द्वारा किए जानेवाले काम की मज़दूरी-दर कम कर देते हैं. उनका दावा यह रहता है कि 'महिलाओं' को 'पुरुषों' के मुक़ाबले किसी भी तरह कम मज़दूरी नहीं दी जा रही है, बल्कि इस काम में मज़दूरी ही कम मिलती है. जबकि सच्चाई यह होती है कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं द्वारा किया जानेवाला काम शारीरिक दृष्टि से ज़रा भी कम श्रमसाध्य या अकुशल नहीं होता.
महिलाओं को जिन कार्यों के बदले कोई दाम नहीं मिलता उनमें ईंधन, चारा और पानी आदि जुटाने; पशुओं की देखभाल, फ़सल की कटाई के बाद उसे संसाधित करने, घरेलू बग़ीचे की देखभाल तथा मुर्गीपालन जैसे काम शामिल किए जा सकते हैं जिनसे पारिवारिक संसाधनों में साफ़ इज़ाफ़ा होता है. अगर महिलाएं इन कार्यों को हाथ नहीं लगातीं तो ऐसी कई वस्तुएं बाज़ार से खरीदनी पड़तीं, किसी को मज़दूरी देनी पड़ती या फिर परिवार को इन चीज़ों से वंचित रहना पड़ता. लेकिन जेंडर के बारे में ऐसी धारणाएं इतनी स्वाभाविक बन चुकी हैं कि भारत की जनसंख्या-गणना की प्रक्रिया में भी ऐसे कार्यों को बहुत लम्बे समय तक 'काम' का दर्जा नहीं दिया गया क्योंकि इस काम को घरेलू मानकर उसके बदले कोई मज़दूरी नहीं दी जाती. ख़ुद महिलाएं भी इसे अलग काम न मानकर अपनी 'घरेलू' ज़िम्मेदारियों में शामिल करके चलती हैं. कई दफ़ा महिलाओं के कार्यों से सृजित आय की अनदेखी इसलिए कर दी जाती है क्योंकि उनके इन कार्यों से परिवार के दूसरे कार्यों में बाधा पहुंचती है. (कृष्णा राज 1990; कृष्णा राज तथा पटेल 1982) इस तरह महिलाओं के काम पर कभी ध्यान नहीं दिया गया. 1991 की जनगणना में यह सवाल पहली बार जोड़ा गया: 'क्या पिछले साल आपने कोई काम किया?' इस सवाल में 'पारिवारिक खेती या पारिवारिक उद्यम में किया गया अवैतनिक कार्य' भी शामिल था. इस तरह, राज्य की नज़र में ऐसा काम पहली बार दर्ज किया गया. ऐसे बदलाव नारीवादी हस्तक्षेप के कारण ही सम्भव हुए हैं, और इन बदलावों की ज़मीन तैयार करनेवाले लोगों का मानना है कि अगर राज्य के पास महिलाओं द्वारा किए जानेवाले विभिन्न कार्यों की पुख़्ता जानकारी होगी तो ग़रीबी-उन्मूलन तथा रोजगार-सृजन की नीतियों पर ज़्यादा कारगर ढंग से काम किया जा सकेगा.
श्रम के इस यौनिक विभाजन के कारण एक नागरिक के तौर पर महिलाएं अपनी उचित भूमिका का निर्वाह नहीं कर पातीं. जिस चीज़ को उनकी 'प्राथमिक' ज़िम्मेदारी कहा जाता है, उससे महिलाओं का क्षितिज बुरी तरह संकुचित हो जाता है. करियर तय करने का मुद्दा हो या राजनीति में भागीदारी (मज़दूर संगठन, चुनाव आदि) करने का, महिलाओं को यह बात बहुत जल्द समझ लेनी होती है कि उन्हें अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को पिंजरे में रखना होगा. ख़ुद को एक निश्चित सीमा में बांध कर रखने की इस प्रवृत्ति से ही वह 'अदृश्य बाधा' खड़ी होती है जिसे पेशेवर महिलाएं बमुश्किल फांद पाती हैं; बच्चों की देखभाल करने में उनके जीवन के सबसे उत्पादक वर्ष ख़त्म हो जाते हैं, इसलिए अपनी पेशेवर ज़िन्दगी में वे सही जगह नहीं पहुंच पातीं. राज्य की नीति भी यही मानकर चलती है कि स्त्रियों का पहला काम मां बनना होता है, यही वजह है कि जन्म-दर में बढ़ोतरी लाने के लिए फ्रांस, जर्मनी और हंगरी जैसे देशों की सरकारें महिलाओं को तीन साल का मातृत्व-अवकाश प्रदान करती हैं. 2008 में भारत सरकार ने भी मातृत्व-अवकाश की अवधि में छह महीने तक की वृद्धि करने का निर्णय लिया था. इसके अलावा सरकार ने महिला कर्मचारियों को छोटे बच्चों की देखभाल के लिए वैतनिक अवकाश की अवधि में दो वर्ष की वृद्धि (जिसे किसी भी समय अर्जित किया जा सकता था) करने की भी घोषणा की थी. एक अख़बार में इस ख़बर को इस तरह प्रस्तुत किया गया था कि इससे 'भारत के उद्योग-जगत में काम करनेवाली महिलाएं ख़ासी नाराज़' होंगी. मतलब यह कि इसके बाद निजी क्षेत्र की महिला कर्मचारी भी सरकारी क्षेत्र में काम करनेवाली महिलाओं जैसे विशेषाधिकार की मांग करने लगेंगी- यानी अपने करियर में आगे बढ़ने से समझौता कर लेंगी. इस सारे शोर-शराबे में यह याद रखना मुश्किल हो जाता है कि बच्चों का लालन-पालन करना केवल एक अभिभावक का काम नहीं होता. यह बात ग़लत है कि पुरुष तो अपने करियर की दौड़ में लगा रहे और स्त्री बच्चों का लालन-पालन करने के लिए अपना करियर दांव पर लगा दे. यह मुश्किल फ़ैसला केवल मां के हिस्से में नहीं आना चाहिए.
कहने का आशय यह नहीं है कि घरेलू कामकाज या बच्चों का लालन-पालन करना बेकार काम होता है, हमारा कहना यह है कि इस काम के सकारात्मक-रचनात्मक पहलुओं और इसकी नीरसता में स्त्री और पुरुषों की भागीदारी बराबर होनी चाहिए.
श्रम का यौन-आधारित विभाजन केवल परिवार ही नहीं, अर्थव्यवस्था के संरक्षण में भी बुनियादी भूमिका निभाता है. अगर पति या नियोक्ता द्वारा इस अवैतनिक काम का पारिश्रमिक दिया जाने लगे तो पूरी अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएगी. एक बार यह कल्पना करके देखें: नियोक्ता अपने पुरुष या महिला कर्मचारी को उसके श्रम के बदले पैसा देता है. लेकिन इस कर्मचारी का अगले दिन काम पर आ पाना किसी अन्य द्वारा (या ख़ुद पर) किए जानेवाले कार्यों जैसे खाना बनाने, सफ़ाई और घर की देखरेख पर निर्भर करता है. इन कार्यों के लिए नियोक्ता कोई पैसा नहीं देता. ऐसे में, अगर अवैतनिक श्रम की एक पूरी संरचना अर्थव्यवस्था का आधार बनी हुई हो तो श्रम के यौनिक विभाजन को घरेलू या निजी मसला न मानकर उसे अर्थव्यवस्था की चालक शक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए. अगर कल प्रत्येक महिला अपने इस काम के दाम मांगने लगे तो पारिश्रमिक देने की ज़िम्मेदारी पति या नियोक्ता को वहन करनी होगी. और इस तरह अर्थव्यवस्था की चूलें हिल जाएंगी. यह पूरी व्यवस्था इस धारणा पर काम करती है कि महिलाएं घर का काम प्रेमवश करती हैं.
नारीवाद के इतिहास में एक पड़ाव ऐसा भी आया था जब घरेलू काम के बदले पारिश्रमिक की मांग की गई थी. पिछली सदी के सातवें दशक के दौरान इंग्लैंड में यह मुद्दा एक ज़बरदस्त मांग के रूप में उठाया गया था. इसके पीछे मूल भावना यह थी कि स्त्रियों द्वारा किए जानेवाले घरेलू काम का आर्थिक महत्त्व स्वीकार किया जाना चाहिए. लेकिन कुछ नारीवादियों का मानना है कि यह मांग श्रम के यौनिक विभाजन को एक तरफ़ छोड़ देती है. यह बात सच भी है कि तीन वर्ष के वैतनिक मातृत्व अवकाश जैसे उपायों को 'मातृत्व के पारिश्रमिक' के तौर पर देखना बहुत ग़लत भी नहीं है क्योंकि, जैसा कि हम पहले दर्ज कर चुके हैं, इससे यही विचार मज़बूत होता है कि कुछ काम 'महिलाओं के काम' ही होते हैं.
सर्वोच्च न्यायालय ने 2010 में महिलाओं द्वारा किए जानेवाले घरेलू काम के सम्बन्ध में एक महत्त्वपूर्ण निर्णय पारित किया था. मसला एक ऐसी महिला से जुड़ा था जिसकी एक वाहन दुर्घटना में मौत हो गई थी और इस सम्बन्ध में महिला के पति ने मुआवज़े का दावा किया था. पंचाट ने तय किया कि मुआवज़े की राशि पति की आय की एक-तिहाई होनी चाहिए. इस पर महिला के पति ने मुआवज़े की रक़म बढ़ाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में गुहार लगाई. सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फ़ैसले में न केवल मुआवज़े की राशि में अच्छा-ख़ासा इज़ाफ़ा किया बल्कि यह भी कहा कि महिलाओं द्वारा घर की चौहद्दी में किए जानेवाले काम को आर्थिक रूप से महत्त्वहीन मानना जेंडरगत पूर्वग्रह का उदाहरण है. न्यायाधीशों ने यह सुझाव भी दिया कि मौजूदा मसले से जुड़े ख़ास सवालों- मोटर वेहिकल एक्ट में बदलाव करने के अलावा अन्य क़ानूनों में भी बदलाव किया जाना चाहिए. अपनी टिप्पणी में न्यायाधीशों ने इस बात पर भी ज़ोर दिया था कि महिलाओं द्वारा किए जानेवाले घरेलू काम के सम्बन्ध में संसद को भी पहलक़दमी करनी चाहिए. (गुनु 2010)
घरेलू काम के सम्बन्ध में इस ऐतिहासिक निर्णय का सन्दर्भ हमेशा याद रखा जाना चाहिए. इस निर्णय की पृष्ठभूमि में एक स्त्री की मौत थी जिसके पति ने इस आधार पर मुआवज़े की मांग की थी कि उसकी पत्नी एक निश्चित काम किया करती थी. लिहाज़ा इस नुक़सान की भरपाई की जानी चाहिए. क्या हम जीवित स्त्री के मामले में भी ऐसे ही फ़ैसले की उम्मीद कर सकते हैं? क्या अदालत तब भी यही निर्णय लेती अगर जीवित स्त्री यह मांग रखती कि उसे अपने काम के बदले में पति से वित्तीय पारिश्रमिक चाहिए? मुझे नहीं लगता कि तब अदालत यही निर्णय लेती. एक क्षण के लिए मान लीजिए कि महिला वाक़ई यह मांग करती- जैसा कि घरेलू काम के बदले पारिश्रमिक तय करने की मांग से जुड़े आन्दोलन के दौरान किया गया था, तब भी मैं इसका समर्थन नहीं कर पाती क्योंकि मेरी नज़र में यह क़दम श्रम के यौनिक विभाजन को दुबारा निजीकरण की ओर मोड़ देता. मतलब यह कि पति दिहाड़ी देनेवाला और पत्नी कामगार की स्थिति में आ जाती.
घरेलू काम अदृश्य बना रहता है, लेकिन उसके सामाजिक आयाम से नज़रें नहीं चुराई जा सकतीं. यह सामाजिक आयाम तब स्पष्ट होता है जब हम पगार पर काम करनेवालों अर्थात् घरेलू 'नौकरों' की स्थिति पर विचार करते हैं.

• पुस्तक: नारीवादी निगाह से
• लेखक: निवेदिता मेनन
• अनुवादक: नरेश गोस्वामी
• प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन
• भाषा: हिंदी
• पृष्ठ संख्या: 240 पेज
• मूल्य: 275/ रुपए पेपरबैक

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