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75 का भारतः पुस्तक अंश- भूले-बिसरे क्रांतिकारी; असम में आजादी की अलख जगाने वाले राष्ट्रभक्त

जश्ने आजादी की 75वीं सालगिरह पर साहित्य आजतक पर पढ़िए असम में आजादी की अलख जगानेवाले उन राष्ट्रभक्तों के बारे में जिन्होंने अपने लहू से लिखा आजादी आंदोलन का अमिट फलसफा

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भूले बिसरे क्रांतिकारी का आवरण-चित्र
भूले बिसरे क्रांतिकारी का आवरण-चित्र

"मातृभूमि कोई उपहार नहीं जो कि पाया जा सके या जो दिया जा सके. यह किसी विशेषाधिकार के तहत या राजनीतिक समझौते से प्राप्त नहीं की जा सकती. यह स्वयं से नहीं खरीदी जा सकती, न बलपूर्वक इस पर कब्जा किया जा सकता है और न ही इसका निर्माण ललाट के पसीने से होता है. यह एक ऐतिहासिक कृति है और देश के लोगों का सामूहिक उद्यम, उनके कई पीढ़ियों के परिश्रम का फल-शारीरिक, आध्यात्मिक और नैतिक.” डैविड बैन गुरियन के इस कथन के साथ डॉ श्याम सिंह तँवर और मृदुलता की एक पुस्तक आई है, 'भूले-बिसरे क्रांतिकारी.' यह पुस्तक इतिहास के उपेक्षितों की दास्तानों को गुंजायमान कर स्वतंत्रता-संग्राम के स्वदेशानुराग के अप्रतिम हस्ताक्षरों, देशभक्तों और भारत के वीरों व वीरांगनाओं के जीवनवृत्त की टूटी-फूटी कड़ियों को जोड़कर उन्हें इतिहास के पन्नों में अंकित करने का यह एक नूतन प्रयास है.  

लेखकद्वय ने हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे? के प्रश्नों के बीच इस पुस्तक की भूमिका में यह सवाल उठाया है कि सन् 1962 के चीन-भारत युद्ध में हुए शहीदों की दासता तो अभी भी हेंडरसन रिपोर्ट के अंदर ठंडे बस्ते में बंद पड़ी है, उन्हीं शहीदों की व्यथा-गाथा का एक प्रामाणिक तथ्य सन् 1962 के युद्ध के 48 साल बाद 2010 में उजागर होकर हमारे स्वतंत्र भारत के शासन व सत्ता पर एक प्रश्नचिह्न लगा दिया था. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अपनी व्यवस्थागत सत्तात्मक प्रणाली देशभक्तों और शहीदों के क्रियाकलापों से कितनी अनभिज्ञ तथा उनके बलिदान के प्रति कितनी उदासीन एवं निष्क्रिय है. तँवर ने अपनी सहयोगी लेखिका के साथ इस पुस्तक के लेखन से देश के नाम पर दिवंगत हुतात्माओं को भावांजलि; शब्दांजलि, वाक्यांजलि, स्नेहांजलि और सर्वांजलि से ऊपर आदरांजलि दी है.

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जश्न-ए-आजादी की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर 'भूले-बिसरे क्रांतिकारी' पुस्तक के कुछ अंश

असमी शहीद (पहली बार)
1. मनीराम दीवान
17 अप्रैल, 1806 को जनमे मनीराम दत्त, जिन्हें 'मनीराम दीवान' के लोकप्रिय नाम से भी पुकारते थे. असम में चाय बागवानों के जनक मनीराम ही थे, जिन्होंने पहली बार बताया कि सिंगपो लोग असम में चाय की खेती करते हैं.
सन् 1839 में अंग्रेजों ने मनीराम को नजीरा की असम टी कंपनी का दीवान बनाकर 200 रुपए मासिक पगार पर नियुक्त किया, परंतु 1840 में अंग्रेज अफसरों से मतभेद होने से मनीराम ने यह नौकरी छोड़ दी, परंतु इस अनुभव से चाय उगाने की कला में दक्षता प्राप्त कर ली, बाद में मनीराम स्वयं के दो चाय बागान- एक तो जोरहट में चैनीमौरा और दूसरा, सिबसागर के सेलुंग में लगाकर व्यापारिक स्तर पर चाय की खेती करनेवाले पहले व्यक्ति बन गए.

फिर 1850 के दशक में मनीराम अंग्रेजों के विरुद्ध हो गए, क्योंकि प्रतियोगी यूरोपियन टी प्लांटों से उनकी चाय बागवानी में अड़चन और रुकावटें डालने लगे थे. 1851 में एक चाय बागान के झगड़े में अंग्रेज अफसर ने उनकी सारी सुविधाएँ छीन लीं, परिणामस्वरूप मनीराम और उसके 185 पारिवारिक सदस्यों को आर्थिक संकट में डाल दिया.
फिर जब 10 मई, 1857 को भारतीय जवानों ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजाया तो मनीराम ने उनको असम के पुराने राजवंश अहोम को पुनः स्थापित करने का अवसर समझा. उन्होंने तुरंत कंदरपेसवार सिंघा को डिब्रूगढ़ और गोलाघाट के सिपाहियों की मदद से अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह करने का आग्रह किया.

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कंदरपेसवार सिंघा ने अपने स्वामिभक्त लोगों के साथ एक षड्यंत्र रचा और हथियारों का जखीरा भी इकट्ठा कर लिया. कंदरपेसवार ने सिपाहियों को लुभाने के लिए कहा कि अगर वे अंग्रेजों को पराजित कर देंगे तो उनकी तनख्वाह दोगुनी कर दी जाएगी.

इन षड्यंत्रकारियों में सुबेदार शेख भीकुन और नूर मोहम्मद भी मिल गए. 29 अगस्त, 1857 को ये विद्रोही नोगौरा में शेख भीकुन के घर पर सम्मिलित हुए, परंतु दुर्भाग्य से अंग्रेजों को षड्यंत्र का पता चल गया और कंदरपेसवार, मनीराम और अन्य नेताओं को हिरासत में ले लिया, फिर वे जोरहट जेल में लाए गए.

मनीराम द्वारा कंदरपेसवार को लिखे गए पत्रों को बीच में अंग्रेज विशेष आयुक्त कैप्टन चार्ल्स होलरॉड ने पकड़ा था, जो इस समय मुकदमे में जज भी थे. मनीराम को षड्यंत्र करवाने का मुखिया करार दिया गया और 51 वर्ष की उम्र में पिली बरुआ को जनता के सामने 26 जनवरी, 1858 को जोरहट जेल में फाँसी दे दी गई.

1963 में मनीराम पर बनी फिल्म में डॉ. भूपेन हजारिका ने यह गाना गाया- "बुकू हूम-हूम करे"

2. सूर्यसेन-चिटगाँव का स्वतंत्रता सेनानी

चौराचौरी की हिंसात्मक घटना ने गांधीजी को ठेस ही नहीं पहुँचाई, बल्कि उनको असहयोग आंदोलन को वापस लेने के लिए बाध्य कर दिया. आनेवाले समय को देखते हुए सूर्यसेन ने यह एहसास किया कि ब्रिटिश शक्ति का मुकाबला केवल क्रांतिकारी ढंग से ही संभव है.

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सूर्यसेन की पहल व कार्य-योजना को उनके समर्थकों एवं साथियों का सहयोग प्राप्त था, जिनमें मुख्यतया गणेश घोष, अंबिका चक्रवर्ती, अनंत सिंह, लोकनाथ सिंह, निर्मल सेन और विख्यात महिला क्रांतिकारी कल्पना दत्ता और प्रीतिलता वाडेदार थीं. 18 अप्रैल, 1930 को सूर्यसेन ने बच्चों की एक मंडली को साथ लेकर एक दिन में ही ब्रिटिश शस्त्रागार, छावनी, तारघर, रेल पटरियाँ और यूरोपियन क्लब पर धावा बोलने की योजना बनाकर अपनी मातृभूमि चिटगाँव को अंग्रेजी साम्राज्य से मुक्त कराना चाहा. आक्रमण तो सफल रहा, परंतु क्रांतिकारियों को पता चला कि हथियार तो हैं, पर बारूद नहीं है. थोड़े हथियार से सुसज्जित होकर सूर्यसेन अपने समर्थकों को साथ लेकर पुलिस शस्त्रागार के भवन पर झंडा फहराने लगे. इस धावे के बाद सूर्यसेन अपनी मंडली के साथ जलालाबाद की पहाड़ियों पर, जहाँ अंग्रेज सेना की गोलियों और तोपों से मुकाबला करना पड़ा. बहुत सारे किशोर उम्र के क्रांतिकारी मारे गए, जिनमें लोकेनाथ बाल का छोटा भाई तेगड़ा भी मारा गया. बाद में सूर्यसेन की मंडली का एक बालक सरकारी गवाह बनकर ब्रिटिश लोगों को सूर्यसेन की षड्यंत्र संबंधी सभी सूचनाएँ देने लगा. धीरे-धीरे ब्रिटिश द्वारा चलाई गई मुठभेड़ में सारे सदस्य या तो पकड़े गए या मारे गए. प्रीतिलता वाडेदार को भी उस समय अपनी जान से हाथ धोना पड़ा, जब वह पहाड़तली यूरोपियन क्लब पर आक्रमण कर रही थी.

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सूर्यसेन को एक अन्य देशभक्त तारकेश्वर दस्तिदार के साथ 12 जनवरी, 1934 को फाँसी दे दी गई. सूर्यसेन ने अपने पत्र में एक मित्र को अंतिम शब्दों में संदेश दिया- "मृत्यु मेरे दरवाजे को खटखटा रही है. मेरा मस्तिष्क अनंत में विचरित हो रहा है...यह वह क्षण है, जब मुझे मृत्यु का प्रियतर तथा मित्रवत् आलिंगन करना है, इस सुखद, पवित्र और महत्त्वपूर्ण क्षण में क्या मैं आप सभी लोगों को छोड़ रहा हूँ? केवल एक ही बात मेरा स्वप्न, सुनहरा स्वप्न-स्वतंत्र भारत का स्वप्न. प्रिय साथियो, आगे बढ़ो, कदम पीछे मत हटाना, गुलामी के दिन सिकुड़ रहे हैं, स्वतंत्रता की जाज्वल्यमान किरणें उधर दृष्टिगोचर हो रही हैं. उठो, निराशा को प्रश्रय मत दो, सफलता निश्चित रूप से आएगी."

सूर्यसेन के नेतृत्व में बंगाल के क्रांतिकारियों ने चिटगाँव के शस्त्र-भंडार काे 1930 में लूट लिया. सूर्यसेन, जिन्हें प्यार से लोग ‘मास्टर दा’ कहते थे, ने अंग्रेजों से कई लड़ाइयाँ लड़ीं, जिनका उल्लेख भारत की किताबों में नहीं है, उनको पकड़कर 1934 में अग्रेजों ने फाँसी पर लटका दिया.

पुस्तकः भूले बिसरे क्रांतिकारी
लेखकः डॉ. श्याम सिंह तँवर, मृदुलता
विधाः जीवनी एवं आत्मकथा
प्रकाशकः प्रभात प्रकाशन
मूल्यः 600/रुपए
पृष्ठ संख्याः 288

 

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