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जन्मशती विशेष: अमृत राय के ललित निबंध; 'रम्या' के बहाने मुक्त चिंतन

अमृत राय को प्राय: 'कलम के सिपाही' के लेखक के रूप में जाना जाता है जबकि उन्होंने कहानी, उपन्‍यास, आलोचना, नाटक और संस्मरण हर विधा में प्रभूत साहित्य लिखा. उनकी जन्मशती पर उनके व्यक्तित्व पर प्रकाश डाल रहे हैं हिंदी के सुधी आलोचक डॉ ओम निश्चल

अमृत राय और रम्या का आवरण चित्र अमृत राय और रम्या का आवरण चित्र

अमृत राय को प्राय: 'कलम के सिपाही' के लेखक के रूप में जाना जाता है जबकि उन्होंने कहानी, उपन्‍यास, आलोचना, नाटक और संस्मरण हर विधा में प्रभूत साहित्य लिखा तथा 'हंस' का दशक भर संपादन करने के अलावा अनेक पुस्तकों का अनुवाद किया. इसके अलावा वे एक रम्य‍ रचनाकार भी थे- ललित निबंधों के सर्जक. छोटे छोटे किन्तु् चुटीली निबंध लेखन की कला में निष्णात, 'रम्या' जिसका एक अनन्य उदाहरण है. उनकी जन्मशती पर उनके इस व्यक्तित्व पर प्रकाश डाल रहे हैं हिंदी के सुधी आलोचक डॉ ओम निश्चल.
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अमृत राय हिंदी के उन लेखकों में हैं जिन्हें साहित्य की एक शानदार विरासत मिली. कथा सम्राट प्रेमचंद को पिता के रूप में पाने और उनकी छत्रछाया में पलने के चलते भले ही उनकी प्रतिमा बड़ी न बन सकी किन्तु अपने विपुल लेखन, अपने स्वभाव, साहित्यक चिंतन तथा प्रेमचंद की परंपरा को आगे बढ़ाने में उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता. उनकी बातचीत में जो बेफिक्री दिखती थी और जिस उन्मुक्त अंदाज में उनकी ठहाकेदार हंसी होती थी उसकी मिसाल कोई दूसरी नहीं है. लमही के प्रेमचंद में जो बनारसी ठसक दिखती है, समाज को बहुत भीतर तक पहचान लेने और उसकी एक-एक रग की व्याख्या कहानियों में दिखती है, उससे उलट अमृत राय ने अपने को शुरू से ही प्रेमचंद की छाया से बचाते हुए विकसित किया. इलाहाबाद में कुछ समय तक रहने व वहां की परवरिश में पले-बढ़े होने के कारण उनके लेखन की तासीर कुछ अलग थी. लेखकीय अंदाज तो उन्होंने पिता से ही पाया, पुश्तैनी लेखन-प्रकाशन का कारोबार भी चलाया किन्तु वे कारोबारी कतई न थे. विचारों से प्रगतिशील और प्रतिबद्ध अमृत राय ने अनेक विधाओं में लिखा व हिंदी जगत को वे सात उपन्यास, आठ कहानी-संग्रह, तीन नाटक, हास्य और साहित्यिक आलोचना की पांच पुस्तकें, आत्मकथाएं, एक यात्रा-वृत्तांत और आठ पुस्तकों का अनुवाद दे कर गए. किन्तु उनकी रचनात्मकता का एक कोना रम्य रचनाओं का भी रहा. 'रम्या'  ऐसी ही रम्य रचनाओं की कृति है जिसमें उनका विट व बतकही छांटने वाला स्वभाव अनुस्यूत मिलता है.

'रम्या' के निबंधों को यद्यपि ललित निबंध ही कहा गया है, तथापि ये उस कोटि के निबंध नहीं है जैसे पं हजारीप्रसाद द्विवेदी, कुबेरनाथ राय, पं विद्यानिवास मिश्र, रामदरश मिश्र व विवेकी राय जैसे लेखकों के हैं. राय की रचनाओं का आस्वाद कुछ अलग सा लगता है. एक बेफिक्री व मस्तमौलापन उनके इन निबंधों में मिलता है जिसे पढ़ते हुए लगता है हमारे कंठ में पान का आस्वाद घुल रहा है. 1967 में प्रकाशित यह पुस्तक पहली बार मैंने लखनऊ के आचार्य नरेंद्रदेव पुस्तकालय से लेकर पढ़ी थी तथा इसकी एक रम्य रचना 'पहला पका बाल' पढ़ कर उनकी रचना शैली का मुरीद हो गया था. यह रचना उसी तरह मन के किसी कोने में टिकी रही जैसे 'झूला' में शिवानी के निबंध या बाद के दिनों में आए रमेशचंद्र शाह की पुस्तक 'पढ़ते-पढ़ते' के निबंध जिसे जैनेन्द्र कुमार ने पूर्वोदय प्रकाशन से छापा था. ये निबंध किसी पांडित्य प्रदर्शन के निमित्त नहीं लिखे गए बल्कि इन्हें मुक्त मन की साधनावस्था की रचनाएं कह सकते हैं.

अलग लीक अलग सरणि
इनके विषय देखें तो सहज ही इन्हें पढ़ने की उत्सुकता जगती है. नया साल मुबारक, डायरी, फ्लावर शो, नीलाम, नया नाखून, काल करन्‍ते आज कर, सूली ऊपर सेज, पहला पका बाल, हाट में, प्राप्ते तु षोडशे वर्षे, वक्त की पाबंदी, नई सभ्यता का राजा पॉपकार्न, रहिमन निज मन की बिथा..., घलुआ व कपड़ा आदि छोटे व मझोले आकार के इन निबंधों में अमृत राय के पुरलुत्फ अंदाजेबयां का आस्वाद लिया जा सकता है. ललित निबंध प्राय: प्रकृति के राग रंग से भरे होते हैं. मसलन अशोक के फूल, बसंत आया पर कोई उत्कंठा नहीं, कौन मैं फुलवा बीननिहारी जैसे विषय के पाठ के दौरान हम हजारीप्रसाद द्विवेदी और विद्यानिवास मिश्र के कल्पनाशील और रसज्ञ मानस के गलियारे से गुजरते हुए प्रकृति के साहचर्य सुख से भर उठते हैं. गांव का मन ऐसे निबंधों में रम जाता है. पर 'रम्या' के निबंध बिल्कुल अलग से हैं. यहां किसी अमराई, सरसों के फूल, होली, फागुन, बसंत, सावन के लालित्य पर नहीं, 'पहला पका हुआ बाल'  जैसे निज के अनुभव से उपजे निबंध हैं. डायरी पर निबंध है. कितने चाव से हम नए साल की डायरी बटोरते फिरते हैं, हुलस कर उस पर सबसे पहले अपना नाम दर्ज करते हैं कि उस पर जैसे अब हमारा स्वामित्व हो गया. पर रोज-रोज डायरी लिखने का संकल्प भले ही कोई कर ले, उसे रोज रोज लिखना एक साधना जैसा काम है. अमृत राय डायरी के साथ इसी असमंजस और जटिलता को व्यक्त करते हैं.

इसी तरह नये वर्ष के स्वागत पर लिखा निबंध 'नया साल मुबारक' है. हम नए साल को लेकर ऐसे उतावले रहते हैं जैसे कि सब कुछ इस नये साल से बदल जाने वाला है. नया साल एक अनजाने सुख की सिहरन सा और पुराना साल भोगे हुए कष्टों की एक कड़ी सा लगता है. पुराने साल के नाम सारी बुराइयां सोच कर हम इस कामना में होते हैं कि जैसे नया साल सब कुछ बुरा खत्म़ कर देगा. नये साल की पूर्व संध्या के जश्न में पूरी दुनिया डूब जाती है पर होता क्या है. वह एक दिन का अंतराल. बाकी सब वही. अमृतराय लिखते हैं, ''नया साल वह फीनिक्स पक्षी है जो हर साल पुराने की खाक पर नया जनम लेता है. उसके मां-बाप की फैमिली प्लानिंग इतनी पक्की है कि हमें ठीक-ठीक पता रहता है कि कब, किस रोज और किस घड़ी में उसका जनम होगा. तभी तो दुनिया भर में करोड़ों लोग उत्सव के सब साज सामान से लैस उसको हाथों हाथ लेने के लिए जगे बैठे रहते हैं. सोना गुनाह है उस वक्त. सोते में जो कभी नया साल आ गया तो समझो तुम्हारी तकदीर भी सो गयी पूरे एक साल के लिए, किसी तरह फिर इस दलिद्दर से तुम्हारा छुटकारा नहीं.'' (नया साल मुबारक, पृष्ठ 10) क्या अंदाजे-किस्सागोई है. बात है कि बात से बात निकलती जा रही है. ज्यों चतुरन की बात में बात-बात में बात. लब्बोलुआब यह कि नये साल की जिस अफरातफरी को इस निबंध में सहेजते हैं, उसका सार उन्हीं के शब्दों में यह कि आदमी को ''जब वर्तमान संवत्सर की विदाई का सहृदय आयोजन करना चाहिए, तब वह एक अजन्मे और तुरंत के जन्मे शिशु के स्वागत में इस तरह मतवाला होकर पिपिहरी बजाता घूमता है...और सो भी आज के इस जमाने में जब कि सब जानते हैं कि हर नया बच्चा मुसीबतों की एक नयी गठरी लेकर घर में आता है.'' जाहिर है कि निबंध आज से कोई पचपन साल पुराना है पर क्या आज भी नए साल के स्वागत को लेकर हम ऐसे ही अधीर हुए नहीं रहते जैसे आने वाला साल हमारे सारे संकट काट देगा. पर होता वही है सब कुछ अपरिवर्तनीय. यह है एक लेखक की दूरदृष्टि.

'नीलाम' निबंध एक नीलामघर का किस्सा है कि कैसे तमाम चीजें फर्नीचर आदि नीलामी के लिए इकट्ठी हैं और बोली बोलने वाला तड़-तड़ बाजा बजाता हुआ नीलामी का ऐलान कर रहा है कि मजमा जमे. मजमा जम भी गया है. मजमा हाल में जमा हर चीज का ठोक बजा कर जायजा भी ले रहा है और बोली में शामिल भी है. किसी भी चीज का दाम दस रुपये से शुरू होते ही लगता है कि चीज तो बहुत ही सस्ते दाम पर बिक रही है. वह भी बोली बोलता है. धीरे-धीरे यह बोली एक प्रतिस्पर्धा में बदल जाती है. जिसे नहीं भी लेना है वह भी दो रुपये दाम ज्यादा उछाल कर बोली लगा रहा है. बहुत ही जीवंत वर्णन है यह नीलामघर का जहां एक बार ऊंची बोली पर जाकर ठहर जाने पर उस दाम पर उसे लेना ही होता है भले ही वह मन से इसके लिए राजी न हो. नीलाम घर का तो यही उद्देश्य होता है कि जैसे उस वस्तु का दाम लागत और लाभ की परिधि में आ जाए उसे निकाल देना है. एक बार अच्छे या बुरे फंस ही गए तो ली गयी चीज को खरीददार कलेजे से लगाए फिरता है कि इससे चोखा सौदा दूसरा नहीं. मेले-ठेले की रौनक के बीच नीलामघर की गहमा-गहमी का कहना ही क्या. जरा सी बात और पूरा खाका खींच दिया अमृत राय ने.

अनुभव की वैयक्तिकता
कहते हैं ललित निबंध में वैयक्तिकता की छाया होती है. लेखक का मैं निबंध की अंतर्वस्तु से ऐसा हिलगा होता है जैसे स्वयंवर से सिंदूर. यों तो येवतुंश्को कहा ही करते थे कि कवि की कविता ही उसकी आत्मकथा है बाकी सारा कुछ फुटनोट. तो जब कविता आत्मकथा है जिसकी काया इतनी सूक्ष्म होती है कि वह निज भी है और सार्वजनिक भी. वह उतना ही आत्मनेपद है जितना परस्मैपद. 'नया नाखून' ऐसी ही रचना है. नाखून की पीड़ा से भला कौन बचा होगा. कौन ऐसा होगा जिसे ठेस न पहुंची होगी. जिसका कभी नाखून न टूटा होगा और अगर टूटा होगा या पिच कर कहीं काला न हो गया होगा तो उसका अनुभव ठीक वैसा ही होगा जैसा लेखक का. चोट खाकर काले हुए नाखून का उखड़ना एक दर्दनाक प्रक्रिया है किन्तु इस दर्द को भी रचना की किस्सागोई में ढाल लेना यही तो लेखक की सिफत है. अपने घायल नाखून का दर्द कुछ अनूठे ढंग से अमृत राय ने बयान किया है कि उनकी मासूमियत पर मन करुण-करुण हो जाए.

ऐसा ही वैयक्तिक अनुभव पहले पके बाल का है. किसका अनुभव नहीं होता. कौन है जो पके बाल को कैंची से नहीं हटाता रहता है कि उस पके बाल का सामना न हो. पर कब वह चुपके से बालों के बीच प्रकट हो जाता है, पता ही नहीं चलता. हर किसी का जीवन में कभी न कभी ऐसे अनुभव से गुजरना होता है. 'पहला पका बाल' ऐसी ही रचना है, जिसमें लगता है अपना अनुभव साझा किया हो लेखक ने. हालांकि इसमें पूरी छौंक है. पहले पके बाल के दिग्दर्शन के दर्द की. पर लहजा चूंकि रमणीयार्थ प्रतिपादक है इसलिए इस दर्द का बयान भी पुरलुत्फ अंदाज में किया है. जैसे पहला पका बाल किसी परिपक्वता की नहीं बल्कि किसी आसन्न संकट की निशानी हो. कहा भी लेखक ने कि 'इसे देख कर लतिका क्या कहेगी जिससे अगले ही महीने शादी होने वाली है. यही न कहेगी कि क्यों पड़ते हो बाबू अब इस सब झमेले में.' वह सोचता है 'अब कौन सा मुंह लेकर लतिका के पास जाऊँ?' और फिर बाल पकने के हर पहलू को अमृत राय ने यहां पर छेड़ दिया है. बचपन जवानी से लेकर हर उम्र में बालों के पकने के औचित्य पर चर्चा करते हैं और अंत में तमाम व्याधियों दुश्वारियों से गुजरते जीवन के अधेड़ मोड़ पर जब यह पका बाल सामने आता है तो उनका दिल यही कह उठता है कि 'यही क्या कुछ कम सितम है जो पके हुए बालों का ठप्पा मार कर किसी बेचारे की रही सही उम्मीद का दिया भी इस बेदर्दी के साथ गुल कर दिया जाए?'

यही कचोट 'प्राप्ते तु षोडषे वर्षे'- की है. किसी के साहबजादे यदि 'किलकत कान्ह घुटरुवन आवत' की पायदान से आगे बढ़ते-बढ़ते सोलह की सीढ़ी पर पहुंच गए और धूमधाम से उस्तरा फेरने के दिन आ गए, तो कहना ही क्या. आप भले पुराने-धुराने ब्लेड से सैकड़ों बार दाढ़ी बना लें पर साहबजादे को जिलट चाहिए. जमाना 66 से पहले का पर जनरेशन गैप तब भी ऐसा ही भीषण था. बाप उूदपुर तो बेटा महमूदपुर. नामुराद दाढ़ी की आवभगत सेवा टहल जितनी बेटे करते हैं, बाप के जमाने के लोग क्या करेंगे. देखें कि वे उस बाप के बेटे हैं जो कभी चमरौधा पहन कर फोटो खिंचाने में भी शरम नही करते थे. आज दुनिया चमरौधे से कितना आगे निकल आई है. वे इस निबंध के बहाने नई पीढ़ी में पैदा होते कुसंस्कारों की बात करते हैं. सब कुछ खुल्लमखुल्ला हो रहा है जिसे उनके जमाने के युवा छुपा कर किया करते थे कि वालिदैन को पता न चले. तभी शायद बहुत पहले ही शास्त्रों में कह दिया गया कि प्राप्ते तु षोडषे वर्षे पुत्र मित्रवदाचरेत्. शायद इसीलिए कि जवान होती पीढ़ी से मित्रवत पेश न आए तो पता नहीं जवान पीढ़ी कैसा स्वागत-सत्कार करे आगे चल कर. इसलिए ऐसे युवाओं से मैत्री करने में ही भलाई है. बहुत ही पुरलुत्फ़ अंदाज में अमृत राय ने अपने जमाने के युवाओं के बारे में बहुत पते के बात कह दी है.  

अनुभव के भव
लेखक सामान्य‍ व्यक्ति से कहीं अधिक दूरदर्शी होता है इसलिए वह रचना में जो कुछ उकेरता है वह अपने समय की सभ्यता समीक्षा का ही पाठ-पाठांतर होता है. प्रेमचंद ने जो कहानियां लिखीं वे उस दौर के समाज का दर्पण है. उसकी विडंबनाओं का दर्पण हैं. आज प्रथाओं रीतियों दृष्टि यों में फर्क के बावजूद कुछ न कुछ ऐसा है, जिसे प्रेमचंद अपने जमाने में देख सुन कह और लिख चुके. यानी वे आज भी प्रासंगिक हैं. कितने किरदार आज भी वैसे के वैसे हैं, कितनी प्रवृत्तियां मामूली भेद के साथ वैसी की वैसी हैं. यही तो काम एक लेखक का है कि वह अपने समय व समाज को पढ़ता हुआ ऐसी रचना दे कि जो समय के साथ ही नहीं, समय के आगे चले. उसके लेखन में उसके अनुभव का भव समाया हुआ होता है.

इस दृष्टि से अमृत राय के ये निबंध आज भी न केवल पढ़े जाने योग्य है बल्कि एक हद तक अपने विट से गुदगुदाते हैं. मनुष्य की कई ऐसी प्रवृत्तियों का उन्मीलन करते हैं जो आज भी वैसी ही हैं कमोवेश कुछ तब्दीलियों के. काल करन्‍ते आज कर. कभी कबीर ने कहा होगा. कई लोग इसका नियम से पालन भी करते हैं. पर ऐसा समाज भी है जो सोचता है इतनी भी हड़बड़ी क्या है. आराम से कर लेंगे. किसी कवि ने तो कहा ही है, सहसा विदधीत न क्रियाम/ अविवेक: परमापदामपदम्. सहसा राम सोने के मृग को देख लुब्ध न हुए होते, कुछ विचार किया होता तो उनकी दुर्गति न होती. बड़ी आपदा से वे बच जाते. लेकिन कहा ही है कि विनाशकाले विपरीत बुद्धि:. यह पल में प्रलय का डर दिखा कर कह तो दिया कबीर ने. पर अमृत राय कहते हैं कहीं परलय-वरलय नहीं है, यह तो कबीर ने अपनी बात जरा नमक मिर्च लगा कर कह दी है. 'काल करंते आज कर' पर लिखे निबंध में कवि के इस कथन की बारीक चीरफाड़ की है अमृत राय ने. क्यों जरूरी है कि कल किया जाने वाला आज ही कर दिया जाए. आखिर क्या हड़बड़ी है. वे अपना ही उदाहरण देते हैं कि माना मुझे कल कोई कहानी लिखनी है तो आज क्यों उसे लिखना शुरु कर दूँ ;  व्यर्थ में चारमीनार के पैकेट फुंकते जाएंगे और कहानी न बनेगी क्योंकि मन में एक खाका खिंच चुका है कि कल बैठना है कहानी को लेकर तो कल ही बनेगी. आज कैसे बनेगी. दूसरा उदाहरण और दिलचस्प है. कहते हैं माना कल मुझे ससुराल जाना है तो कबीर के अनुसार आज ही क्यों न चल दूं पर आज ही वहां जा धमका तो लोग क्या कहेंगे. अमृत राय कहते हैं भारत इत्मीनान से काम करने वाला देश है. तेजरफ्तारी से ही दुनिया महाप्रलय की ओर बढ़ रही है. अंतत: वे इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि हड़बड़ी किस बात की. जो काम किया जाए वह चाहे आज कल या दस बरस बाद लेकिन सोच विचार कर किया जाना चाहिए. तभी वह काम टिकाऊ होगा.

ललित निबंध: व्यक्तित्व की खूबियां
अमृत राय के इन निबंधों में उनके व्यक्तित्‍व की खूबियां भी प्रकट होती हैं. इत्मीनान से काम करना शायद उनकी भी आदत में शुमार हो. कवि ने कह दिया तो वह कोई ब्रह्मा की लकीर थोड़े न हो गयी. ऐसे ही वक्त की पाबंदी की सीख हर कोई देता है. टाइम एंड पंक्चुअलिटी की तो हर आफिस में आए दिन जांच होती है पर आज किसी भी सरकारी कार्यालय चले जाइये. समय पर कोई काम होता दिखे तो. वक्त की पाबंदी के अनेक आदेशों के बाद भी स्थिति जस की तस. इसी वक्त की पाबंदी पर जब राय लिखते हैं तो वे भी इस सीख के उलट चलते हैं. पूछते हैं इस मूर्खता का आदि गुरु आखिर कौन है. बताइये कोई मतलब है, वक्त की पाबंदी? वे सोचते हैं यह सोच कहीं पश्चिम से आई होगी. घड़ियों की ईजाद भी शायद इसी वक्त, की पाबंदी के लिए हुई होगी. वे सोचते-सोचते इस नतीजे पर पहुचते हैं कि जिन्दगी अजीरन कर रखी है इस हरामजादी वक्त की पाबंदी ने. वे कहते हैं, ''इस देश का खमीर ही कुछ ऐसा है. इस वक्त के गुलाम नहीं, वक्त हमारा गुलाम है. वक्तं हम पर नहीं चढा बैठा है, हम वक्त पर चढ़ बैठे हैं.''  
जैसा कि ऊपर कहा वे दूसरों की सीख को उसी पर दे मारने की कला में निष्णात हैं. अभी कबीर के कहे का क्या हाल किया देख ही लिया होगा. अब उनके निशाने पर रहीम हैं. 'रहिमन निज मन की बिथा ..' मन ही राखो लोय की सीख देते हुए. वे कहते हैं क्या यह व्यावहारिक रूप से संभव है. हर पहलू पर वे विचार करते हैं. दोस्तों मित्रों में जरा सी अनबन होने पर बात उजागर हो जाती है. मन उदास है तो चेहरा ही डुगडुगी पीट देता है. यार दोस्‍त भी लटका मुंह देख कर पूछ ही लेते हैं कि हुआ क्या है. और फिर निज मन की व्यथा को छुपा ही लिया तो क्या  मिल जाएगा. जग हंसाई और होगी कि लो मुझसे बताया तक नहीं. वे कैकेयी का उदाहरण देते हैं कि वे मन की व्यथा दशरथ से न कहतीं तो कहीं कुछ न होता. बच्चा अपनी व्यथा न बताए तो मां दूध तक नहीं पिलाती. अपने दर्द की नुमाइश न करो तो लोग समझते हैं कि ऐश कर रहा है. वे कहते हैं कि मन की व्यथा तो जानवर ही नहीं कह सकते. आदमी है तो कहेगा ही. छुपा कर आखिर क्या पाएगा. इसी तरह 'कपड़ा' शीर्षक निबंध में कपड़ा पहनने को लेकर वे दिगंबरत्व तक जाते हैं और नग्न पैदा करने की ईश्वर की मर्जी तक की छानबीन करते हुए अंतत: वे इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि कपड़ा ही सारी मुसीबत की जड़ है. न कपड़े होते न इतनी तामझाम होती. न पहनने की बाध्यता न ऊंच-नीच का भेद होता. यह व्यर्थ का एक बोझ है मन पर शरीर पर जिसके उतरते ही व्यक्ति इतना निर्भर हो उठता है कि स्नान घर में उसके कंठ से रागिनी फूट पड़ती है. बाथरूम सिंगिंग का रहस्य. यही है. सुरीले ही नहीं, फटे-ढोल भी यहां गाए बिना नहीं रह सकते.
अमृत राय के ये निबंध इस तरह उनकी शख्सियत को समझने की कुंजी भी हैं. उनका मिजाज, उनका मजाहिया लहजा, उनकी खुद की आदत सब कुछ इन निबंधों को पढ़ते हुए उद्घाटित होता है. यों तो इस कृति में फ्लावर शो, संगीत सम्मेलन, सूली ऊपर सेज, हाट में, नयी सभ्यता का राजा पापकार्न, घलुआ जैसे निबंध भी हैं और हर निबंध उनके व्‍यक्‍तित्‍व की अलग ही बानगी देता है. लेकिन जिन निबंधों की चर्चा ऊपर की है वे तो जैसे आला दर्जे के निबंध हैं और उनकी बातें बनाने की कला के बेहतरीन नमूने भी.
अमृत राय बेफिक्र इंसान थे, मस्ती के मालिक थे. एक बड़े लेखक के बेटे थे, जिसकी पूरी पीढ़ी में लिखने पढ़ने का शौक रहा है. प्रेमचंद भले ही कठिनाई से पले बढ़े हों, पर अमृत राय व श्रीपत राय को वे दुश्वारियां नहीं झेलनी पड़ी जो प्रेमचंद ने झेलीं. इलाहाबाद में हेस्टिंग्ज रोड पर बंगला, इलाहाबाद जैसे उस वक्त के साहित्य के केंद्र में रहना जो कि पढ़ाई-लिखाई का केंद्र भी था, ऊपर से लेखकों की उस जमाने में कद्र ने अमृत राय को अपने समय का हीरो बनाए रखा. भले वे प्रेमचंद की छाया में हमेशा कमतर नजर आते रहे हों पर वे उनकी छाया से भरसक अलग ही रहे, उनकी रचनाओं का डिक्शन अलग रहा. 'कलम का सिपाही' लिख कर उन्होंने अपनी लेखकीय क्षमता की बारीकियों का अहसास कराया. अपने पिता की जीवनी लिख सकना कितना कठिन है, यह कोई अमृत राय से पूछे. उन पर लिखना जैसे खुद पर लिखना है. क्या वह निस्संगता लेखक अपने भीतर पैदा कर सकता है जब उसे खुद या अपने पिता पर लिखना हो. पर अमृत राय ने यह संभव किया और पूरी निस्संगता से. 'रम्या' में यही निस्संगता और बेफिक्री उन्हें एक बड़ा लेखक बनाती है. 'रम्या' के निबंध भले ही आकार प्रकार में छोटे हों, ललित निबंधों की प्रवृत्तियों से कम मेल खाते हों, पर रम्य रचनाओं के तौर पर इन्हें आज भी उसी चाव से पढ़ा जा सकता है जितना सत्तर के दशक में. इनमें भाषा का वैसा स्थापत्य नहीं जैसा क्लासिक निबंधों में पर जिस तरह प्रेमचंद आम बोलचाल की भाषा के लेखक थे, अमृत राय ने भाषा की इस विरासत को आगे बढाया, इसमें संदेह नहीं.
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डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हैं. वे हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली 110059, फोनः 9810042770, मेलः dromnishchal@gmail.com

 

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