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जन्‍मदिन विशेष: यतीन्द्र मिश्र, लेखक जिनमें साहित्य और ललित कलाएं लेती हैं सांस

अयोध्या की पवित्र माटी को अपनी भाषा के लालित्य से सींचने वाले कवि, कलाकोविद यतीन्द्र मिश्र के जन्मदिन पर साहित्य आजतक पर स्मरण कर रहे हैं अवध के ही एक लेखक, आलोचक डॉ ओम निश्चल

कवि, कलाकोविद यतीन्द्र मिश्र [स्रोतः फेसबुक] कवि, कलाकोविद यतीन्द्र मिश्र [स्रोतः फेसबुक]

आज कवि, कलाकोविद यतीन्द्र मिश्र का जन्मदिन है. अयोध्या की पुण्य, पवित्र माटी को अपनी भाषा के लालित्य से सींचने वाले यतीन्द्र मिश्र वहां के राजपरिवार से ताल्लुक रखते हैं, पर उन्होंने राजघराने की चारदीवारी से अलग साहित्य, कला व संगीत के दिग्गजों के बीच अपने व्यक्तित्व को मांजा और संवारा है. कैशोर्य में ही विद्यानिवास मिश्र, शायर आमिल, श्रीलाल शुक्ल, कुंवर नारायण, गिरिजा देवी, बिस्मिल्लाह खॉं, अशोक वाजपेयी जैसे साहित्य कलाचिंतकों के सान्निध्य का लाभ उठाने वाले यतीन्द्र ने 'यदा कदा' और 'अयोध्या और अन्य कविताएं' से कविता जगत में प्रवेश किया और तब से आज तक पीछे मुड़ कर नहीं देखा. लगभग दो दशक की अपनी साधना से वे साहित्य, कला, संगीत के क्षेत्र में ऐसा चेहरा बन चुके हैं, जिनके बिना हाल के दौर में इन विधाओं का जिक्र कर पाना भी मुश्किल है. यतीन्द्र मिश्र के जन्मदिन के अवसर पर साहित्य आजतक पर उनकी शख्सियत को स्मरण कर रहे हैं अवध के ही एक लेखक, आलोचक डॉ ओम निश्चल.
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बीते दो दशकों में यतीन्द्र मिश्र अपने कवि कर्म के साथ-साथ संगीत और सिनेमा पर लगातार कार्यरत रहे हैं. अपने लेखन की शुरुआत उन्होंने जरूर कविताओं से की. 'यदा कदा', 'अयोध्या और अन्य कविताएं' के साथ-साथ 'ड्योढी पर आलाप' और 'विभास' संग्रह उनके ललित कवित्व के परिचायक हैं. पर केवल कवि होकर रह जाना जैसे उन्हें पर्याप्त नहीं लगता था. यतीन्द्र ने अपने समय के संगीत, कला साधकों को अपने सतत ध्यान में बसाए रखा और उस्ताद बिस्मिल्लाह खॉं पर 'सुर की बारादरी' लिख कर उस्ताद की दंतुरित मुस्कान से लेकर उनके शहनाई वादन और उनके रहन-सहन तक को शब्दों में मूर्त कर दिया.

ठुमरी गायिका गिरिजा देवी पर लिखी किताब 'गिरिजा' उनकी जीवनी उनके विचार उनके सान्निध्य का काव्यात्मक प्रतिफल हो जैसे. इसी क्रम में ख्यात शाश्त्रीय नृत्यांगना सोनल मानसिंह पर लिखी किताब 'देवप्रिया' अपने ढंग की अनूठी पुस्तक है. अपने लेखन के गए डेढ़ दशक के अंदर ही यतीन्द्र मिश्र ने प्रख्यात कवि कुंवर नारायण पर दो पुस्तकें उपस्थिति और संसार का संपादन किया. इतना ही नहीं उनकी दो अन्य किताबें डायरी-'दिशाओं का खुला आकाश' एवं चयन- 'कई समयों में' भी संपादित कीं. अशोक वाजपेयी की कई पुस्तकों के साथ सिने शख्सियत एवं शायर गुलजार की नज्मों के चयन 'यार जुलाहे' और 'मीलों से दिन' संपादित किए और संगीत, सिनेमा व कलाओं पर विमर्श की एक पुस्तक 'विस्मय का बखान' लिखी.

यह सब करते हुए जैसे वे लगातार कुछ अलग करने के लिए उद्विग्न रहे और एक ऐसे बड़े मिशन की खोज में थे, जो उन्हें लेखन में संतोष दे सके. उनके इस मिशन के लिए इस सदी में लता मंगेशकर जैसी शख्सियत शायद कोई और नहीं हो सकती थी, जिसके जीवन, समय और सिनेमानुभवों को लेकर इतनी बड़ी किताब 'लताः सुर गाथा' लिखी जा सकी. लगभग छह सौ से अधिक पन्नों वाली इस किताब में आधे में लता के सुर वैशिष्ट्य की गाथा है, तो आधे में उनसे विभिन्न मुद्दों—जीवन, समय, दिलचस्पियों, समाज, समकालीन शख्सियतों व उनके अपने बारे में की गयी बातचीत समाहित है. पूरी पुस्तक जैसे कई रागों की बंदिश हो. उनके रचे शब्दों से जैसे गुनगुनाहट की खुशबू आती है. इसी तरह बेगम अख़्तर पर संपादित और हाल में प्रकाशित 'अख़्तरी: सोज़ और साज़ का अफ़साना' पुस्तक भी अपने आपमें कलाविदों व गुणज्ञों के बखान और संस्मरणों से भरी है.

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इस तरह से देखें तो यतीन्द्र मिश्र का लेखन विपुल व बहुविध विधाओं के साथ तरंगित होता रहा है. पर अगर उन्हें मिले सम्मानों पर गौर करें तो उनके लेखकीय जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि 'लता: सुर गाथा' पर मिला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार है. यह पुरस्कार उत्तर प्रदेश के किसी लेखक को दिया जाने वाला पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार था. इसके अतिरिक्त अभी कुछ दिनों पहले ही अयोध्या के सांस्कृतिक, सामाजिक, सांगीतिक इतिहास पर एक समृद्ध गजेटियर का सा महत्त्व रखने वाली पुस्तक 'शहरनामा फैजाबाद' प्रकाशित हुई, जिस पर उन्हें हरिकृष्ण त्रिेवेदी स्मृति युवा पत्रकारिता पुरस्कार मिला. इससे पूर्व वे भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, रजा फाउंडेशन पुरस्कार, हेमंत स्मृति कविता सम्मान, भारतीय भाषा परिषद युवा पुरस्कार, परंपरा ऋतुराज सम्मान, उप्र संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, राजीव गांधी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार एवं महाराणा मेवाड़ सम्मान से विभूषित हो चुके हैं.

कलालोचन
हिंदी में संगीत, सिनेमा और रूपंकर कलाओं पर नियमित लिखने वाले कम हैं. इस क्षेत्र में ले दे कर कुँवर नारायण, प्रयाग शुक्ल, अशोक वाजपेयी और मंगलेश डबराल आदि कुछ संस्कृति चिंतकों के नाम ही बार-बार सामने आते हैं. यद्यपि इस क्षेत्र में अखबारी रपट के नाम पर सांस्कृतिक लेखन की उदरपूर्ति अवश्य होती रही है. कुँवर नारायण ने एक समय फिल्मों पर अनेक जीवंत टिप्पणियॉं लिखी हैं, प्रयाग शुक्ल और विनोद भारद्वाज ने कला के क्षेत्र की गतिविधियों को हमेशा अपने अवलोकनों और अभिलेखों में शामिल किया है. अशोक वाजपेयी की किताब 'समय से बाहर' अपने क्षेत्र की एक अलग ही पुस्तक है, जिसे आज भी कला-आलोचना का मील का पत्थर कहा जा सकता है. सिनेमाई धुनों पर पंकज राग का काम भी बुनियादी है. विनोद अनुपम, अजय ब्रह्मात्मज, अनंत विजय ने भी इस क्षेत्र में काफी कुछ लिखा है. यह अचरज की बात है कि उक्त गिनती के नामों के बीच जब आज के समकालीन युवा लेखकों का बड़ा समूह अपने समय की कलात्मक सांस्कृतिक गतिविधियों से कटता जा रहा है, तब यतीन्द्र मिश्र एक सक्रिय कला-संगीत चिंतक के रूप में उभरे हैं. कला रूपों पर आई उनके निबंधों की पुस्तक 'विस्मय का बखान' उनके कलात्मसक चिंतन और अनुशीलन का प्रमाण है.

मिजाज से कवि यतीन्द्र मिश्र ने अयोध्या जैसी धार्मिक नगरी में रहते हुए भी उसे अपनी कला और संगीतप्रियता से गुंजायमान बनाया है और बराबर कलात्म‍क गतिविधियों, कलाकारों, शास्त्रीय गायकों, गीतकारों के सान्निध्य में रहते आए हैं. समय समय पर उन्होंने पं. मल्लिकार्जुन मंसूर, उस्ताद अमीर खॉं, पं. भीमसेन जोशी, बेगम अख़्तर, शैलेन्द्र, सत्यजित रे, साहिर लुधियानवी, निर्मल वर्मा, कुंवर नारायण, अशोक वाजपेयी, गिरिजा देवी, सोनल मानसिंह, लता मंगेशकर, रसन पिया सहित इस क्षेत्र के अनेक मूर्धन्यों, वाग्गेयकारों, नर्तक-नर्तकियों पर लिखा है तथा अपनी भाषा के वैभव में इन कलाकारों, कलामर्मज्ञों की संगत और शख्सियत को मूर्त रूप देते रहे हैं.

अक्सर कला की बखान के लिए हमारे पास उपयुक्ता भाषा नहीं होती. चाहे प्रदर्शनकारी कलाएं हों या संतों, निर्गुनियों के वचन, पद उलटबांसियां या उनकी उपासना पद्धति, यतीन्द्र के शब्दों में, 'एक तरह से यह श्रद्धा और साधना सुर और लय में विलीन होती हुई प्रतीत होती है.' अवध के संगीत और समाज पर यतीन्द्र का गहरा अध्ययन है. इसके लिए वे वाजिद अली शाह के 'रहस'-रास और कथक का समाहार- से लेकर शरर के 'गुजिश्ता लखनऊ' से होते हुए बेगम अख़्तर की गायकी, मुहर्रम के दिनों में गाये जाने वाले 'स्यापा', तथा नवाब शुजाद्दौला के दरबार में सोज़ख्वानी और मर्सियाख्वानी के महफिलों तक की चर्चा करते हैं, तो अवध के सोहर गीतों, बनारस के बुढवा मंगल, झूला, कजरी, चैती, बारामासी व फाग गायकी के साथ-साथ अवध के समाज में कथिकों की परंपरा का जिक्र भी करते हैं. गीत, संगीत के क्षेत्र में बाइयों और तवायफों की भी एक समृद्ध परंपरा रही है, जिसने हिंदी फिल्मों के गीत संगीत की आधारशिला रखी है. रसन पिया इतिहास के तहखाने को खंगालते हुए यतीन्द्र मिश्र यह बात बड़ी शिद्दत से कहते हैं कि 1945 के बाद पेशेवर शास्त्रीय गायक गायिकाओं के उदय के बाद भले ही बाइयां और तवायफें गुमनामी के अंधेरे में खो गयी हों, किन्तु बसंत बहार, बैजू बावरा और चित्रलेखा जैसी फिल्मों के उत्कृष्ट संगीत तक पहुंचने में इन बाइयों और तवायफों की गायिकी का अहम रोल रहा है. कला, संगीत तथा रागदारी को बखानने का संयम और सलीका सबके पास नहीं होता, न इतना विपुल अध्ययन ही कि वह बारीकी से वैशिष्ट्य का निरूपण कर सके. पर यतीन्द्र ने यह खूबी साधना से अर्जित की है और उनकी दृष्टि में सारी कलाएं एक बड़े कला-कुटुम्ब का हिस्सा हैं.

शुरू से ही यतीन्द्र मिश्र की परवरिश साहित्य, कला व संगीत के आंगन में हुई. उनकी दादी राजकुमारी विमला देवी स्वयं संगीत की गहरी जानकार थीं व तमाम वाद्यों को बजाने में कुशल थीं. यतीन्द्र मिश्र ने पारिवारिकता से आयत्त इन गुणों को अपने भीतर समाहित किया तथा अपने शुरुआती दिनों में गुरु आमिल, पं विद्यानिवास मिश्र, अशोक वाजपेयी, निर्मल वर्मा और कुंवर नारायण जैसे गुणज्ञ लेखकों के सान्निध्य में साहित्य व कला की बारीकियां सीखीं तथा आज देश में इन तीनों अनुशासनों की कोई ऐसी शख्सियत न होगी, जिससे यतीन्द्र की सोहबत न हो. यतीन्द्र ने जिस पर भी लिखा, मन से लिखा, उसे किसी परियोजना की नहीं, अंत:करण की इबादत का हिस्सा बनाया. गिरिजा जी पर किताब लिखी तो वह उनके कवित्वपूर्ण संयोजन के चलते एक साहित्यिक विनय पत्रिका बन गयी. सोनल मानसिंह पर लिखी तो वह अनुगूंजों की तहरीर बन गयी. उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के जीवन चरित को 'सुर की बारादरी' लिख कर अमर बना दिया. यों तो उनकी सभी पुस्तकें मानक हैं, किन्तु अनेक काव्यकृतियों व गद्यकृतियों के सर्जक यतीन्द्र मिश्र लता मंगेशकर की शख्सि‍यत और संगीत साधना पर 'लता: सुर गाथा' लिख कर एकाएक राष्ट्रीय क्षितिज पर छा गए. इस बीच अन्य‍ कई पुस्तकें संपादित कीं. इसी कड़ी में 'अख़्तरी: सोज़ और साज़ का अफ़साना' बेगम अख़्तर की शख्सियत पर एक ऐसी किताब है, जिससे गुजरते हुए वह पूरा युग जीवंत हो उठता है, जिससे गुज़र कर उन्होंने करोड़ों दिलों में जगह बनाई.

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कवि-व्यक्तित्व
यतीन्द्र ने अक्सर दूसरों पर लिखा है. पर दूसरों पर लिख कर यह जरूर जताया है कि दूसरों के महत्त्व को आंकना दरअसल खुद की सार्थकता को भी कहीं न कहीं दर्ज करना है. पर हम यह न भूलें कि यतीन्द्र मिश्र मूलत: कवि ही हैं जिसने यदा कदा, अयोध्या और अन्य कविताएं, ड्योढी पर आलाप और विभास सहित चार उल्लेखनीय संग्रह हमें दिए हैं. हमारे समय में समसामयिकता का इतना बोलबाला है कि कोई कवि जब अपनी परंपरा से जुड़ता है तो उसे किंचित संशय की निगाह से देखा जाता है. लेकिन उसी परंपरा से आती हुई सदियों के आगे की आवाज़ को सुनता हुआ कवि जब कबीर जैसे कृती कवि की बगल में बैठ कर उससे संवादमयता का एक सघन रिश्ता बनाता है तो जैसे कवि के शब्दों में कृतज्ञता का सत्व उतर आता है. 'विभास' में यतीन्द्र मिश्र कबीर जैसे जुलाहे कवि से शब्दों को बुनने-गुनने और रचने का सलीका सीखते हैं, जो उनके इस संग्रह में मुखरता से दीख पड़ता है. कबीर की अनहद सुनते हुए वे जब कबीरी प्रत्ययों को आज के आलोक में बरतते हैं, तो जैसे काल का सदियों का अंतराल सिमटता हुआ महसूस होता है.

'विभास' की कविताओं में अशोक वाजपेयी ने अनश्वरता के उजाले की खोज की है, तो लिंडा हेस ने कबीर के प्रतिबिम्बों के एक नये आभास की बुनावट लक्षित की है, कबीर मर्मज्ञ पुरुषोत्तम अग्रवाल ने इन कविताओं में कवि के खुद के अनुभवों को कबीर की वाणी के आलाप में ढलते देखा है. मनीष पुष्कले कहते हैं, इन कविताओं की साख- कथन की कथरी, बिरह के बीज और रहस्य की राख़ से ओतप्रोत है और कबीर को गाने वाले प्रहलाद सिंह टिपान्या इसे यतीन्द्र के अंतर की अभिव्यक्ति मानते हैं. कभी देवीप्रसाद मिश्र ने एक बातचीत में यह कहा था, 'यतीन्द्र की कविताओं में अवध की कूक, अवसाद और वक्रता है.' गुलजार ने ऐसा ही भरोसा यतीन्द्र में जताया है. एक सम्मोहित आलोक से भरी यतीन्द्र की कविताओं से गुजरते हुए लगता है, यह युवा कवि है तो सगुण भक्ति वाले राम की अयोध्या में जनमा, जहां लोक में यह श्रुति है कि 'हम ना अवध मा रहबै हो रघुबर संगे जाब,' - पर निरगुनिया कबीर के पड़ोस में बैठ कर वह जैसे उन्हीं की साखियों को सदियों बाद अपने शब्दों में उलट-पुलट रहा है. विभास से यतींद्र की ही एक कविता 'न जाने कौन सा धागा है' उठाता हूं:

न जाने कौन सा धागा है
जो बांधे रखता हमको
दुनिया भर के तमाम रिश्तों में

न जाने किस फूल से उपजा कपास है
जो ढके रखता हमारी
तार-तार हो चुकी गाढ़े प्रेम की रेशमी चुनरी

न जाने कहॉं से आए हुए लोग हैं
जो थामे रहते हमारी
जीवन-तानपूरे की खुलती जाती जवारी.

यतींद्र मिश्र अपनी कविताओं में कई प्रश्न उछालते हैं. वे पूछते हैं क्या तुम सच बोल कर बचे रहने की कला सिखा सकते हो? क्या समय आ गया है कि सच बोल कर महफूज रह पाना कितना कठिन हो गया है. वे यह भी पूछते हैं कविता हमें क्या देती है? क्या पानी? कतई नहीं क्योंकि यह तो कविता का पनघट है, जहां शब्दों की गागर भरी जाती है और इसकी डगर वाकई कठिन है. वे घर फूंक कर अपने साथ चलने की हांक लगाने वाले कबीर से पूछते हैं कि हम अपने घर जला देंगे तो कहां जाएंगे? वे यह भी कहते हैं कि क्या फर्क पड़ता है कि अयोध्या में पद की जगह कोई सबद गाए. पर सन्मति के अभाव की इस वेला में हम अपने पुरखों खुसरो, नानक, कबीर, रहीम और रसखान की सीखें जैसे भूल गए हैं. हम वे बंदिशें भूल गए हैं जो भाषा और लय की सराय हैं, जहां कलंदर और सूफी भटकते पाए जाते हैं, जिनके अर्थ में मन्नतें टंकी होती हैं, नए-नए रागों के फूल उग आते हैं, जिसके बगैर जीवन और सुर की थाप दिन ब दिन कम होती जाती है.

वे कहते हैं कि कबीर की बानी में जीवन में मानी छिपे हैं, तभी तो आस्था के भार से आच्छादित मंदिरों के जीर्णशीर्ण नगर में आदमी का चोला जरूर रंगा जाता है, मन अनरंगा ही रह जाता है. जबकि काशी अयोध्या और मगहर मन के कपास को रंगने की ही नगरियां रही हैं. यों तो संग्रह की अनेक कविताएं कबीरी रंग में ही रंगी हैं. पर कई कविताओं में यतींद्र ने अपने रूपक रचे हैं जैसे 'दुख के कुंएं में', 'बिना डोर की गागर है' -सांगरूपक जैसी गठन से भरी हैं। उन्होंने टिपान्या की कबीर-गायकी पर 'मेरे राम गाड़ीवाले' जैसी सुंदर कविता लिखी है तो पलटूदास पर 'प्रेम जोगी का घर' जैसी कविता. 'हम पर इतने दाग़ हैं' कविता में यतींद्र कबीर द्वारा जतन से ओढ़ कर रख दी गयी चादर की ओर इशारा करते हैं तथा इस पर आश्चर्य करते हैं कि कबीर तो अपनी विपन्नता में भी चादर को मैली होने से बचाए रहे और हम जैसे संसारियों की चादर मैली हो गयी. हमारे पास बार-बार बिछाने के लिए वही एक मैली चादर.

कहना न होगा कि यतीन्द्र मिश्र ने अब तक की साहित्यिक यायावरी में ऐसे ही नेह-पगे धागे से साहित्य और कला के बीच सहकार और संबंधों की गांठ लगाई है. वे अब शब्दों के उस तल पर पहुंच चुके हैं जहां वे जरा, व्याधि, ऊंच-नीच और अपयश से मलिन नही होते. आज यतीन्द्र मिश्र की उपस्थिति के बिना साहित्य महोत्सवों की महफिलें संपन्न नहीं होतीं. कला की दुनिया के दिग्गजों व नई पुस्तकों पर पत्र-पत्रिकाओं में उनके नियमित स्तं‍भ चाव से पढ़े जाते हैं. जन्मदिन की अशेष शुभकामनाएं कलाविद, कवि व चिरंतन लेखक.

# लेखक डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक, कवि एवं भाषाविद हैं. इनकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों अन्वय एवं अन्विति सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. हिंदी अकादमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब के शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं. संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059, मोबाइल 9810042770, मेलः dromnishchal@gmail.com

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