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अमरता के अक्षर बोने वाले लेखक-कलाकार, जो 2020 में हमसे बिछड़ गए

साल 2020 लगभग गुजर सा गया है. यह ऐसा साल था, जिसका अधिकतर वक्त कोरोना नामक महामारी से जूझने व प्रभाव में गुजरा. इस बीच कई कलमजीवी, कवि, कलाकार हमारे बीच से चले गए. इस जीवनावसान से साहित्‍य और शब्द की दुनिया की क्षति का जायज़ा साहित्य आजतक पर ले रहे हैं डॉ ओम निश्‍चल.

साहित्य व कला क्षेत्र की वह हस्तियां जो वर्ष 2020 में हमसे बिछड़ गईं साहित्य व कला क्षेत्र की वह हस्तियां जो वर्ष 2020 में हमसे बिछड़ गईं

साल 2020 की शुरुआत बेशक बहुत ही खुशनुमा अंदाज में हुई थी. देश ने नए साल का जश्न उल्लास के साथ मनाया था. बसंत की अगवानी भी सबने बहुत दिलकश अंदाज में की. पर होली आते-आते यह रंग फीका पड़ने लगा. कोविड-19 नामक वायरस के विश्व भर में संक्रमित होने की बात हवा में फैल गयी. पता चला कि चीन के वुहान की एक प्रयोगशाला से निकला वायरस धीरे-धीरे पूरे विश्व में फैल रहा है, जो इन्सानों से इन्सानों में संचरित हो रहा है और बुखार के साथ धीरे-धीरे सांसों को अपनी गिरफ्त में ले लेता है. पूरी दुनिया में इस वायरस से बचने के लिए सामाजिक दूरी का सुझाव दिया गया. यह इंसान से इंसान में न फैले इसके लिए कुछ समय के लिए लॉक डाउन करना पड़ा और देखते-देखते पूरी दुनिया की रफ्तार जैसे थम गयी. इस दौरान अनेक प्रियजन हमने खोए, अनेक लेखकों, कवियों और कलाकारों को खोया. कुछ तो कोरोना की वजह से और कुछ अन्य बीमारियों के कारण हमारे बीच नहीं रहे. एक सन्नाटा और अकेलापन आबोहवा में व्याप्त होता गया. इस बीच लाखों लोग संक्रमण से मरे. लाखों लोग अभी भी अस्पतालों में उपचार में हैं. लाखों लोग क्वैरंटाइन में हैं, लाखों लोग अपने ही घरों में कैद हैं.

इस विश्वव्यापी संकट के बीच हम कलम के उन लेखकों को याद करने की कोशिश कर रहे हैं, जो हमारे बीच से चले गए. लेखन के क्षेत्र में साल की शुरुआत हिंदी के जाने-माने कवि-कथाकार और कभी अकविता के आंदालकों में शुमार किए जाने वाले गंगा प्रसाद विमल के जाने के सदमे से हम उबरे भी न थे कि 2 जनवरी को चिंतन व साहित्य में दखल रखने वाले राजनेता व साहित्यकार देवीप्रसाद त्रिपाठी नहीं रहे. राजनीतिक विषयों के अलावा वे भारतीय वाड.मय, वेद, उपनिषद व भारतीय चिंतन के अध्ययनशील व्याख्याता थे. किसी भी विषय पर वह मोहक और तार्किक वक्तव्य देने में माहिर थे.

आधुनिक गद्य के वरिष्ठ लेखक कृष्ण बलदेव वैद का 6 फरवरी, 20 को निधन हो गया. पंजाब में 27 जुलाई, 1927 को जन्मे वैद ने अपनी किस्सागोई से एक नई गद्यशैली का आगाज किया. उसका बचपन, बिमल उर्फ़ जायें तो जायें कहां, तसरीन, दूसरा न कोई, दर्द ला दवा, गुज़रा हुआ ज़माना, काला कोलाज, नर नारी, माया लोक जैसे उपन्यासों और बीच का दरवाज़ा, मेरा दुश्मन, दूसरे किनारे से, लापता, उसके बयान, वह और मैं, ख़ामोशी, अलाप, लीला, पिता की परछाइयां, बोधिसत्त्व की बीवी, बदचलन बीवियों का द्वीप, मेरा दुश्मन व रात की सैर कहानी संग्रह और कई डायरियों सहित एक नौकरानी की डायरी जैसी कृतियों से उन्होंने हिंदी साहित्य में अपनी एक अलग ही पहचान बनाई. इसी साल 9 फरवरी को कानपुर मे  रह रहे कथाकार गिरिराज किशोर का निधन हुआ. लोग, चिडियाघर, दो, इंद्र सुनें, दावेदार, तीसरी सत्ता, यथा प्रस्तावित, परिशिष्ट, असलाह, अंर्तध्वंस, ढाई घर व पहला गिरमिटिया जैसे उपन्यासों और अनेक कथासंग्रहों के लेखक गिरिराज किशोर साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त लेखक थे. गिरिराज किशोर जीवन की आखिरी सांसों तक सांप्रदायिक होते समय पर तीखे लेख लिखते रहे. कस्तूरबा पर भी उनका हाल में ही एक बेहतरीन उपन्यास 'बा' आया था.

कोलकाता में रहने वाली रंगकर्म की जानी मानी शख्सियत उषा गांगुली 23 अप्रैल, 2020 को नहीं रहीं. उन्होंने कोलकता जहां बंगाली थियेटर का बोलबाला रहा है, वहां हिंदी थियेटर को स्थापित किया. 'मिट्टी की गाड़ी' (मृच्‍छकटिकम्)) के मंचन से अपने हिंदी रंगकर्म की शानदार शुरुआत करने वाली उषा ने 'रंगकर्मी' संस्था बनाकर उसके झंडे तले उस दौर की अनेक कृतियों महाभोज, होली, रुदाली, कोटमार्शल का नाट्यमंचन किया. उनके निर्देशन में कथाकार काशीनाथ सिंह के उपन्यास-सह कथा रिपोर्ताज पर आधारित 'काशी का अस्सी' का नाट्य मंचन भी बहुत चर्चित रहा तथा कई जगहों पर इसका मंचन किया गया.

मई में हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक और मूर्धन्य डॉ नंदकिशोर नवल का निधन भी हो गया. 83 साल के डॉ नवल पटना विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक रह चुके थे. उनका जन्म दो सितंबर, 1937 को वैशाली जिले के चांदपुरा में हुआ था. उनकी दर्जनों पुस्तकों में कविता की मुक्ति, हिंदी आलोचना का विकास, शताब्दी की कविताएं, समकालीन काव्य यात्रा, कविता के आर-पार, कविता: पहचान का संकट, आधुनिक हिंदी कविता का इतिहास और हिंदी कविता: अभी, बिल्कुल अभी आदि प्रमुख हैं. उन्होंने निराला रचनावली (आठ खंडों में) और दिनकर रचनावली का संपादन भी किया था. उनका संस्मरण मूरतें माटी और सोने की के नाम से छपा, जो काफी चर्चित रहा.

साहित्यिक कृतियों पर फिल्में बनाकर शब्दों को परदे पर उतार देने वाले जाने माने फिल्मकार बासु चटर्जी 4 जून, 2020 को हमारे बीच से विदा हो गए. इरफान खान, ऋषि कपूर व वाजिद खान के बाद बासु चटर्जी का जाना फिल्मी दुनिया में कुछ और सूनापन बढ़ गया है. इन सबने किताबें भी लिखीं थीं और सामाजिक मसलों पर सभी बेहद मुखर थे. 1969 में 'सारा आकाश' से बतौर निर्देशक अपना फिल्मी करियर शुरू करने वाले बासु ने 'पिया का घर', 'उस पार', 'रजनीगंधा', 'छोटी सी बात', 'चितचोर', 'स्वामी', 'खट्टा-मीठा', 'प्रियतमा', 'बातों बातों में' जैसी बेहतरीन फ़िल्मों का निर्देशन किया और दूरदर्शन के लिए 'रजनी', 'कक्का जी कहिन' और 'ब्योमकेश बख्शी' जैसे लोकप्रिय धारावाहिकों का निर्माण किया. वे सात बार फिल्म फेयर अवार्ड व राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजे जा चुके हैं. 2007 में वे आईफा के लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से नवाजे जा चुके हैं.

प्रसिद्ध उर्दू शायर आनंद मोहन जुत्शी उर्फ गुलजार देहलवी का भी 12 जून, 2020 को निधन हो गया. 93वर्षीय देहलवी कोराना से ग्रस्त थे किन्तु उससे मुक्‍त हो गए थे पर कुछ दिनों बाद ही वे नहीं रहे. पिछले वर्ष मशहूर श्रीराम कवि सम्मेलन की उन्होंने अध्यक्षता की थी तथा काफी सक्रिय नजर आ रहे थे. बड़ी जिन्दादिली से उन्होंने अपनी शायरी सुनाई थी. अदब में योगदान के लिए सरकार ने उन्हें पद्मश्री से नवाजा था.

18 अगस्त, 2020 को संगीत की दुनिया के मूर्धन्य पंडित जसराज जी हमारे बीच नहीं रहे. वे साहित्यिकों में भी काफी लोकप्रिय थे तथा दो साल पहले ही उनकी बेहतरीन जीवनी हिंदी की जानी मानी कवयित्री व कलाविदुषी सुनीता बुद्धिराजा ने लिखी थी, जो कि बहुचर्चित रही. वे अपने जीवन काल में हिंदी के अनेक कवियों, लेखकों के संपर्क में रहे. महादेवी वर्मा का जिक्र उन्होंने सुनीता बुद्धिराजा द्वारा ही लिखित 'सात सुरों के बीच' में शामिल अपने इंटरव्यू में बहुत भावपूर्ण ढंग से किया है.

अगस्त महीने में ही उर्दू के जाने माने शायर राहत इंदौरी का हृदयाघात से इंतकाल हुआ. राहत इंदौरी साल साहित्य आजतक के मुशायरा मंच की शान थे और पिछले साल 2019 में जब आए थे, तो यहीं दीपक रुहानी की लिखी उनकी जीवनी 'मुझे सुनाते रहे लोग वाकिया मेरा' का लोकार्पण हुआ था. शायरी में उनका अपना मेयार रहा है और सांप्रदायिकता के खिलाफ उनकी शायरी कौमी एकजहती के एक ऐलान की तरह थी. उनके पढ़ने का अंदाज निराला होता था. वे पोडियम पर होते थे तो समां बँध जाता था. उनकी ग़ज़लों में व्यवस्था की खामियों पर तल्‍ख टिप्पणियां होती थीं.

2 नवंबर को जनपक्षधर कवि-कथाकार-आलोचक विष्णु चन्द्र शर्मा का दिल्ली के सेंट स्टीफन अस्पताल में बीमारी के चलते निधन हो गया. 1933 को काशी में जन्मे विष्णुचंद्र जी 'कवि' व 'सर्वनाम' पत्रिकाओं के संपादक रहे हैं. वे अंत तक श्रमजीवी लेखक बने रहे. उन्होंने अपने जीवन काल में लगभग चालीस पुस्तकें लिखीं. अनेक कवियों पर उनका लेखन प्रामाणिक कोटि का माना जाता था.

मुजफ्फरपुर बिहार में जन्मी व कभी गोवा की राज्यपाल रहीं लोक विषयों व स्त्री विषयक मामलों की जानी-मानी लेखिका मृदुला सिन्हा 18 नवंबर, 2020 को नहीं रहीं. उनका अचानक जाना लोगों को अचरज में डाल गया. इसलिए कि राजभवन गोवा से मुक्ति के बाद भी वे लगातार रचनात्मक रूप से सक्रिय थीं और उनकी अस्वस्थता के समाचार भी नहीं थे. ज्यों मेंहदी को रंग, घरवास, नई देवयानी, सीता पुनि बोलीं, जैसे उपन्यासों व देखन में छोटे लगें, ढाई बीघा जमीन, कहानी संग्रहों व कई निबंधात्मक कृतियों व राजपथ से लोकपथ जीवनी की लेखिका मृदुला जी ने लोक संस्कृति पर व स्त्री विमर्श पर भी अनेक पुस्त‍कें लिखीं व हिंदी संस्थान सहित अनेक संस्थानों से अपने लेखन के लिए सम्मानित हुईं.

नवंबर में ही नालंदा जिले के मूल बाशिंदे मगही, हिंदी व बांग्ला के ख्यात उपन्यासकार नरेन का 19 नवम्बर को निधन हो गया. उन्होंने 'चांदनी रात का जहर' जैसे कालजयी उपन्यास से अपनी पहचान बनाई थी और वह उपन्यास, कथा, जन-सांस्कृतिक आन्दोलन और पत्रकारिता में अपने प्रयासों के लिए जाने जाते रहे.

हिंदी पत्रकारिता की दुनिया में अजातशत्रु कहे जाने वाले एवं साहित्यिक पत्रिका 'कादंबिनी' के कार्यकारी संपादक राजीव कटारा भी अचानक 26 नवंबर को कोरोना संक्रमण के कारण नहीं रहे. दिल्ली विश्व विद्यालय से हिंदी में एमए राजीव कई अखबारों से होते हुए अंत में हिंदुस्तान से जुड़े थे तथा कादंबिनी के कार्यकारी संपादक का कार्यभार संभाला था. हर अंक किसी विशेष विषय पर केंद्रित होने के कारण 'कादंबिनी' साहित्यिकों के बीच एक डायजेस्ट की तरह पढ़ी व सराही जाती थी. कोविड-19 से जुड़े आर्थिक व व्यावसायिक दिक्कतों के चलते हाल ही में इसका प्रकाशन बंद हुआ था, जिससे मुक्त होकर वे स्वतंत्र लेखन कर रहे थे. धर्म दर्शन और अध्यात्म के बारीक पहलुओं में पैठ रखने वाले तथा इन विषयों पर हिंदुस्तान में लगातार लिखने वाले राजीव पुस्तकों के भी बहुत शौकीन थे. वाराणसी के साहित्यप्रेमी पत्रकार श्याम नारायण पांडेय भी इसी साल हमसे बिछड़ गए. उन्होंने स्वतंत्र भारत और दैनिक हिंदुस्तान में एक अच्छी पारी खेली थी.

साहित्य से गहरा रिश्ता रखने वाले दैनिक देशबन्धु के प्रधान सम्पादक, सुप्रसिद्ध पत्रकार, कवि और लेखक ललित सुरजन भी 2 दिसंबर को नहीं रहे. उनके निधन से छत्तीसगढ़ में साहित्य और पत्रकारिता के एक सुनहरे युग का अंत हो गया. देशबंधु को साहित्यिक स्वरूप देने मे उनकी बड़ी भूमिका रही है. साहित्य को प्रश्रय देने के कारण ही उन्होंने 'अक्षर पर्व' जैसी साहित्यिक पत्रिका देशबंधु समूह से निकालनी शुरू की थी, जिसका एक बड़ा पाठक वर्ग था.

साल के जाते-जाते 9 दिसंबर को हिंदी के जाने माने कवि मंगलेश डबराल का दिल के दौरे से निधन हो गया. 72 वर्षीय डबराल कुछ दिनों से कोरोना से ग्रस्त थे तथा एक निजी अस्पताल में उपचार के बाद वे एम्स में इलाज के लिए लाए गए थे. उनके छह कविता संग्रह, कई गद्य कृतियां व एक यात्रा वृत्तांत की पुस्तक प्रकाशित है. हिंदी में वामपंथी चिंतन से जुड़े मंगलेश डबराल ने कई कृतियों का अनुवाद भी किया. हाल में अरुंधती राय ने दूसरे उपन्यास का उनके द्वारा किया अनुवाद बहुत सराहा गया है. उनके निधन पर तमाम भारतीय भाषाओं के लेखकों व विदेशी लेखकों ने दुख जताया. वे अज्ञेय, कुंवर नारायण, कैलाश वाजपेयी व केदारनाथ सिंह के बाद विश्व के स्तर पर हिंदी कवि के रूप मे अपनी पहचान रखने वाले चुनिंदा कवियों में थे तथा कई बार वे आयोवा एम्सटर्डम आदि जगहों पर काव्यपाठ के लिए जा चुके थे. अभी 27 दिसंबर को ही हिंदी के अपनी तरह के अनूठे कथाकार विजय नहीं रहे. वे अपनी कहानियों मे देश के विभिन्न भूभाग की विशिष्टताओं को थीम बनाते थे तथा उनकी कहानियां उस विषय पर उनकी जानकारियों का मुकम्मल स्रोत होती थीं.

इस साल उर्दू अदब के आधुनिकतावादी लेखक आलोचक, विचारक, कवि और उपन्यासकार शम्शुर्हमान फारूकी का जाना भी एक अपूरणीय क्षति है. वे उर्दू अदब के साथ हिंदी की दुनिया में भी काफी लोकप्रिय थे. 'कई चांद थे सरे आस्मां' उपन्यास अपनी तरह का अकेला उपन्यास रहा है जिसकी काफी चर्चा हुई. आलोचना के क्षेत्र में फारूकी साहब का काम काफी सराहा जाता है. उर्दू, फारसी और अंग्रेजी पर फारूकी साब की जबर्दस्त पकड़ थी तथा उन्होंने दास्तानगोई की खत्म हो रही परंपरा को अपनी किस्सागोई के जरिए पुनर्जीवित किया. 'कई चाँद थे सरे आसमां' एक ऐसा उपन्यास है जिसे पढ़कर गुजिश्ता दौर के हिंदुस्तान की झॉंकी मिलती है, उस वक्त की शायरी, लोगों का रहन-सहन, खान-पान, आम ज़िंदगी से लेकर शाही ज़िंदगी तक के परिदृश्य से भरपूर यह उपन्यास गद्य के चुंबकीय आकर्षणों में बॉंध लेता है. वे पद्मश्री व सरस्वती सम्मान से नवाजे जा चुके हैं.

हालांकि कोरोना संक्रमण ने लेखन तथा लेखकों कवियों कलाकारों को भी काफी नुकसान पहुंचाया, कई लेखक कोरोना के कारण ही गए, पटरी से उतरी अर्थव्यवस्था ने जीने के उत्साह में गत्यवरोध तो पैदा किया ही, अनेक श्रमजीवी लेखकों, कलाकारों का जीवन संकट में रहा. कभी रामदरश मिश्र ने एक गीत लिखा था: एक एक जा रहे सभी मन बड़ा अकेला लगता है. यह अकेलापन और सूनापन इन लेखकों, कवियों, कलाकारों के जाने से और बढ़ गया है.

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डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक, कवि एवं भाषाविद हैं. शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित व अन्वय एवं अन्विति सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं.  हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार, आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हैं.  
संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059, मेलः dromnishchal@gmail.com

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