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जन्मदिन विशेषः संतोष चौबे, होना कवि इस दुःसह समय में

कुंवर नारायण ने कभी लिखा था व्यक्ति की ख्याति मंद-मंद हवा की तरह बहनी चाहिए, दुंदुभि की तरह बजनी नहीं- और ऐसा ही संतोष चौबे के साथ हुआ है.

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संतोष चौबे, एक तकनीक चेता कवि संतोष चौबे, एक तकनीक चेता कवि

पिछले कई दशकों से एक व्यक्ति साहित्य के परिसर में चुपचाप बिना किसी शोरोगुल के रचना के करघे पर रमा जमा है, उसके शहर में भी उसकी उपस्थिति एक ऐसे व्यक्ति की उपस्थिति मानी जाती है जो हर विधा का पारंगत है किन्तु उसकी दुंदुभि नहीं बजती. उसके हर काम में संस्कार बोलता है. विज्ञान के तालीमयाफ्ता इस शख्स के भीतर ऐसा कुछ शुरू से बजता रहा है कि उसने कहानियां लिखीं, कविताएं लिखीं, कई उपन्यास लिखे, साहित्यिक निबंध और आलोचनाएं लिखीं, आख्यान का आंतरिक संकट और उपन्यास की नयी परंपरा पर विचार किया, कई साहित्यिक पत्रिकाओं का शुभारंभ किया और जब वैज्ञानिक तकनीकी क्षेत्र में विश्वविद्यालय की स्थापना की ख्याल आया तो कहीं न कहीं उसका मन विश्वविद्यालय परिसर में साहित्य सर्जना के लिए भी एक कोना तलाशता रहा. इस शख्स का नाम है संतोष चौबे. एकोहंबहुस्याम. एक ही व्यक्ति में वैज्ञानिक चेतना संपन्न अकादेमिक शिक्षक, प्रशासक भी, कवि भी, कथाकार भी, आलोचक भी. अपनी ही कविताओं के कल्पना और यथार्थ लोक से बतियाता हुआ एक ऐसी बहुगुण संपन्न शख्सयित कि देख कर बात कर सुन कर मन तृप्त हो सके. कुंवर नारायण ने कभी लिखा था व्यक्ति की ख्याति मंद-मंद हवा की तरह बहनी चाहिए, दुंदुभि की तरह बजनी नहीं- और ऐसा ही संतोष चौबे के साथ हुआ है.
वे 1976 में भारतीय इंजीनियरिंग सेवा और भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए चयनित हुए थे, किन्तु उनके कल्पनाशील उद्यम और उदारचेता सहृदय धुनी मन ने उन्हें विश्ववविद्यालय का संस्थापक बना दिया. वे वर्तमान मे डॉ सी वी रमन विश्वविद्यालय तथा आईसेक्ट विश्वविद्यालय के चांसलर हैं तथा आईसेक्ट नेटवर्क, राज्य संसाधन केंद्र एवं बनमाली सृजन पीठ के अध्यक्ष हैं. संतोष चौबे द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय की पांच शाखाएं देश के विभिन्न भागों में कार्यरत हैं तथा वैज्ञानिक तकनीकी तालीम के विस्तार की दिशा में एक अलख जगाए हुए हैं. हिंदी में विज्ञान की बातें सब तक आसानी से पहुंचें इसके लिए उनका विश्वविद्यालय 'इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए' का पिछले तीन दशकों से संपादन प्रकाशन कर रहा है. उन्होंने खुद इसके लिए आगे बढ़ कर कंप्यूटर से परिचय कराने के लिए एक सीरीज ही लिखी- कंप्यूटर एक परिचय, कंप्युटर की दुनिया, कंप्यूटर आपके लिए तथा विज्ञान विषयों पर कई पुस्तकों की सीरीज का प्रकाशन उनके विश्वविद्यालय की अनूठी पहल है. विज्ञान और साक्षरता की दिशा में तो यह कदम है ही, अनेक वैज्ञानिक संस्थानों और समितियों के साथ जुड़ कर विज्ञान के प्रसार की दिशा में संतोष चौबे ने अथक प्रयत्न किए हैं.
संतोष चौबे, जैसा कि कह चुका हूं यानी  एक ही व्यक्ति़ के भीतर अनेक गुणों से संपन्न एक ऐसा लेखक भी विराजता है, जो सतत साहित्य के नवाचारों के लिए भी उतना ही सक्रिय और सचेष्ट रहता है जितना वैज्ञानिक तकनीकी क्षेत्रों में नवाचार और उद्यमिता के लिए. भोपाल से जरा सी दूरी पर उनके द्वारा स्थापित रवीन्‍द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय उनके अथक और स्वप्नतदर्शी प्रयत्नों की कहानी कहता है. इस विश्वविद्यालय में भव्य आडिटोरियम, कार्यक्रम प्रस्तुति केंद्र, प्रकाशन केंद्र, साहित्य केंद्र एवं ऑडियो विजुअल कार्यक्रमों के निर्माण पटकथा एवं संवाद इत्यादि के प्रणयन के लिए एक पूरी सुयोग्य, टीम तैनात है. पिछली भोपाल यात्रा में इस विश्वविद्यालय के भ्रमण के दौरान पाया था कि कोरोना की विश्व व्‍यापी त्रासदी के बावजूद विश्वविद्यालय की हर इकाई फिर से उठ खड़ी हुई है तथा भावी शिक्षण व्यवस्था के लिए एक नई उड़ान भरने के लिए तत्पर है.
संतोष चौबे एक कवि कथाकार, उपन्यासकार, आलोचक निबंधकार एवं वैज्ञानिक चेतना संपन्न गद्यकार हैं, जिनकी कई दर्जन कृतियां उनके बहुवस्तुस्पर्शी व्‍यक्‍तित्‍व का आईना हैं. उनसे मिल कर व बातचीत कर जरा सी देर से यह पता लग जाता है कि हम ब्रज के किसी कलाकोविद से मिल रहे हैं. उन्हें अनेक फाग मुंह जबानी याद हैं और वे फागुन व होली के मौके पर ऐसे किसी आयोजन में हों तो उनका ब्रज कवि मन बिना गाए नहीं रहता. चतुर्वेदियों की यह खास अदा है. खाना पीना और मस्ती उनके स्वभाव का सहजात हिस्सा है. श्री नारायण चतुर्वेदी, तथा बाद में, ज्ञानेन्द्रपति से लेकर कविवर नंद चतुर्वेदी तक से मिल कर जाना कि चौबे होना ही मस्ती के आलम से जुड़ना है. कभी एक लंबी बातचीत में चतुर्वेदियों के राजस्थान आगमन और वहां बस जाने को लेकर नंद जी से बहुत सी बातें हुई थीं. उन्होंने कहा था कि चतुर्वेदी तो दूर से ही पहचान लिए जाते हैं. पहले तो वे जहां भी होंगे गौरवर्ण के होंगे. दूसरे जो सबसे बड़ा गुण है वह यह कि उनकी बातें कुछ अलग होंगी. विद्वत्समाज में और लोक में भी उसकी छटा कुछ निराली ही होगी. तीसरे गुण के बतौर उन्होंने एक संपुट में बांध कर एक पद ही सुना दिया. चंचल नारि को छैल छिपै पर चौबे को छैल छिपे न छिपाए. इस तरह कवि होना ही जैसे किसी व्यक्‍तित्‍व में एक साथ तमाम गुणसूत्रों का समावेशन हो जाना है. संतोष चौबे इसी कोटि के कवि हैं.
संतोष चौबे के भीतर संगीत के प्रति एक खास आकर्षण है. वे उपन्यास लिखते हैं तो संगीत को आधार बनाते हैं. राग केदार हो या जलतरंग- इसकी आंतरिक संरचना में संगीत की गहरी अनुगूंज छिपी है. यों तो उन्होंने लेखन की कोई विधा नहीं छोड़ी, किन्तु जो विधा उनके मिजाज के बहुत सन्निकट जान पड़ती है वह है कविता. एक कवि के रूप में संतोष चौबे ने लगभग तीन दशकों में उत्तरोत्तर विकास किया है. कहीं और सच होंगे सपने, कोना धरती का, और इस अकवि समय में- तीन संग्रह उनके कवि व्यक्तित्व की गहराइयों के साक्ष्य हैं. हम आज उनके इसी कवि रूप की चर्चा करते हैं.
उनके कवि व्यक्तित्व में सीरीजप्रियता है. सामान्य से कुछ लंबी उनकी कविताएं ब्यौरों में खिलती हैं. वे कविता के विषय को शृंखलाबद्ध थीमबद्ध बना कर सामने रखते हैं. 'इस अकवि समय में' संग्रह की पहली कविता है- आना जब अच्छे दिन हों- नौ उपखंडों में बंटी यह कविता धीरे-धीरे जैसे अगरु गंध की तरह सुलगती हुई हमारी चेतना में अच्छे  दिनों की एक उम्मीद भरी लौ जगा देती है. इसका एक अंश देखें-
आना
जब मेरे अच्छे दिन हों.
जब दिल में
निष्कपट ज्योति की तरह
जलती हो
तुम्हारी क्षीण याद
और नीली लौ की तरह
कभी कभी
चुभती हो इच्छा.
जब मन के
अछूते कोने में
सहेजे तुम्हारे चित्र पर
चढ़ी न हो
धूल की परत
आना जैसे बारिश में अचानक
आ जाए
कोई अच्छी सी पुस्तक हाथ
या कि गर्मी में
छत पर सोते हुए
दिखे कोई अच्छा सा सपना. (इस अ-कवि समय में, पृष्ठ 07)

कविता में वे कितना चुप रहते हैं, जबकि यह समय ही अपने को जताने का है. वे अपनी कविता 'थोड़ा हूं, थोड़ा बाहर'' में लिखते हैं-
इधर घर बनाया है
शहर से कुछ दूर
इस तरह थोड़ा शहर में हूं
थोड़ा बाहर

लिखता हूं
पर रहता हूं
गोष्ठियों से दूर
इस तरह थोड़ा साहित्य में हूं
थोड़ा बाहर

अब उमर पहुंची पचास
इस तरह
थोड़ा जीवन में हूं
थोड़ा बाहर (वही, पृष्ठ 102)

संतोष चौबे की कविताओं में गुणीभूत व्यंग्य की चेतना भी दिखती है. इस अकवि समय में- कहना ही कविता को उसके भीतर के गुणसूत्रों को कसौटियों पर रख कर देखना है. वे कभी कभी कविता के भेड़ियाधसान में तमाम चीजों का वृत्त बनता देखते हैं. वामपंथी एकता का वृत्त, ईमानदारों का वृत्त, कलाकारों का वृत्त, प्रकाशकों का वृत्त आदि तरह तरह के वृत्त. सभी कुछ एक वृत्त में घूम रहा है. शायद यही गतिमान रहने की एक युक्ति भी है. लेकिन इसी तरह उन्हें  यह समय तरह तरह की कविता का भी लगता है. आग की, राग की, दौड़ भाग की, विषम राग की, स्वप्न की मुखरता की जगर मगर की अगर मगर की. तरह तरह की कविताओं के इस संसार में कवि चाहता है कि वह एक लंबी रेखा खींचे. उन्होंने क्रांतिकारी मुद्राएं ओढ़े लोगों की भी खबर ली है, जो बदलाव के ठेके उठाये फिरते हैं और लगातार मोटे होते जाते हैं. (पृष्ठ 70 )

'कोना धरती का' संग्रह की कविताएं संतोष चौबे के भीतर की मुलायमियत का हाल प्रकट करती हैं. उनके भीतर कुदरत के लिए एक खास जगह है. गांव, मां, नुक्कड़ की दूकान, ताजी हवा, आदिवासियों व पर्यावरण का एक खास आकर्षण है. वे पत्तों के पीछे दुबकी धूप के दुनिर्वार आकर्षण से बच नहीं पाते जो गवाक्ष खोलते ही चेतना पर दस्तक सी देती है. वे खिड़की से आती छन छन कर धूप जैसे हथेलियों में भर लेना चाहते हैं. धूप ध्वनि और रंगों के खेल से उनकी कविताओं में कितने ही रंग घुल आए हैं. कवि के भीतर तो संवेदनाओं की बारिश होती रहती है और वह उसी बारिश में नहाता रहता है. कविता जैसे इन्हीं बारिशों से धुल पुछ कर अपनी राह बनाती हुई पैदा होती है. वे वैज्ञानिक चेतना से संपन्न हैं, इसलिए गांव के नाम पर जो स्मृति की एक भावधारा प्राय: बहती दीखती है कवियों में, वह उनमें नहीं दिखती. वे गांव का जिक्र चलने पर वहां के दर्द और अभाव को याद करते हैं और उफ करते हुए कहते हैं -कितनी दूरी है गांव में. संयोग से इस संग्रह की दो बेहतरीन कविताएं हैं- 'मेरे अच्छे आदिवासियो' और दूसरी कविता 'आदमी और सूरज.' आज विकास की दौड़ में आदिवासी जंगल और पर्यावरण पर जो संकट विद्यमान है, कॉरपोरेट के गठजोड़ ने जिस तरह पर्यावरण को बदरंग और आदिवासियों को विस्थापित करने का षडयंत्र किया है उसके खिलाफ संतोष चौबे की कविताएं व्यंजना में प्रतिरोध करती हैं. आदमी और सूरज- कविता भी इसी चिंता को दृश्यमान करती है.

कवि होना प्रकृति पारिस्थितिकी और मानवीय संकट के दौर से गुजरते समाज के लिए चिंतित होना है. हमारे समय के सभी बड़े कवियों ने इस ओर ध्यान दिया है. मुक्तिबोध ने साठ के दशक में पूंजी और साम्राज्यवाद के घटाटोप के विरुद्ध कविताएं लिखीं, नया खून के संपादकीय लिखे थे. आज विकास और उत्‍तर औद्योगिक समाजों में जो पर्यावरण पर संकट गहरा हुआ है वह थमा नहीं है. विकासशील देशों के साथ यह संकट और संहारकारी है. संतोष चौबे की कविताएं ही नहीं कहानियां और उपन्यास भी मानवीय संकट के  सवालों को उठाते हैं.

22 सितंबर 1955 को खंडवा मध्यप्रदेश में जन्मे संतोष चौबे ने मौलाना आजाद कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी से बीई किया. 1976 में वे भारतीय इंजीनियरिंग सेवा के लिए चयनित हुए और 1981 में भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए उनका चयन हुआ. विज्ञान, तकनीकी के क्षेत्र में 35 वर्षों तक निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र के जिन संस्थानों में सेवा दी, उनमें ज्योति लिमिटेड, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, मध्य प्रदेश कंसलटेंसी आर्गेनाइजेशन शामिल है. उन्हें अनेक पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है जिनमें दुष्यंत कुमार पुरस्कार, राष्ट्रीय विज्ञान प्रचार पुरस्कार, मेघनाद साहा पुरस्कार, इंडियन इनोवेशन अवार्ड, श्वाब फाउंडेशन अवार्ड आदि शामिल हैं. उन्हें उनके उपन्यांस 'जलतरंग' पर उन्हें वैली आफ वर्ड्स देहरादून का पुरस्कार भी मिल चुका है. पिछले कुछ सालों से वे विश्वरंग साहित्य महोत्सव के जरिए वे साहित्य  और कलाओं को एक बड़ा प्लेटफार्म दे रहे हैं तथा विश्वविद्यालय से प्रकाशित 'विश्वरंग' पत्रिका से साहित्य के दुस्साध्य समय में सर्जनात्मकता का एक नया प्रमेय रच रहे हैं. उनके जन्मदिन पर बधाई और शुभकामनाएं.

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डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हैं. वे हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली 110059, फोनः 9810042770, मेलः dromnishchal@gmail.com

 

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