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पुण्यतिथि विशेषः सूनी दुनिया में बराबर कौन रह सकता है, प्रेमचन्द की जीवनी 'कलम का सिपाही'

1962 में प्रकाशित 'कलम का सिपाही' को हिंदी समाज द्वारा व्यापक रूप में मुंशी प्रेमचन्द की पहली और अपने आप में सम्पूर्ण जीवनी का दर्जा प्राप्त है. आज उनकी पुण्यतिथि पर पढ़िए अमृतराय द्वारा लिखी इस जीवनी के अंश

'कलम का सिपाही' का आवरण चित्र [सौजन्यः राजकमल प्रकाशन] 'कलम का सिपाही' का आवरण चित्र [सौजन्यः राजकमल प्रकाशन]

प्रेमचन्द ने आज ही के दिन 1936 में इस दुनिया को अलविदा कहा था, पर क्या वाकई ऐसा हुआ? क्या केवल भौतिक रूप से हमारे बीच न होने से कोई समाप्त हो जाता है, चला जाता है? क्या बुद्ध, ईसा और गांधी गए? क्या तुलसी, सूर, कबीर, परमहंस गए? बौद्धिक हो या आध्यात्मिक, दार्शनिक हो या सृजनकार वह हमेशा जिंदा रहता है. प्रेमचन्द भी अपने अक्षरों, किताबों के साथ आज भी मौजूद हैं हमारे, आपके बीच. अभी जब भी कहीं किसानों पर जुल्म और ज्यादती की बात होती है तो 'गोदान' का होरी अपने आप उठ खड़ा होता है. प्रेमचन्द हिंदी के ही नहीं बल्कि विश्व साहित्य के ऐसे अनूठे कलमकार हैं, जिनकी कहानियों, उपन्यासों का कोई जोड़ नहीं. यह और बात है कि कुछ लोग जब तब उन्हें कमतर आंकने और दिखाने की कोशिश करते हैं. आंचलिकता हो या भाषा, क्षेत्र हो या जीवन प्रेमचन्द ने हर एक सीमा को बंधन को तोड़ा. वह एक साथ गांव के कलमकार थे, तो शहर के भी. किसान जीवन के साथ अभिजात्य और मध्यवर्ग भी था.प्रेमचन्द स्त्री के भी थे, और पुरुष के भी. वह पुरातन और आधुनातन दोनों थे.
सही मायनों में प्रेमचन्द भारतीय समाज का आईना हैं. यह और बात है कि इस आईने में उनके युग के संघर्ष, पीड़ा, दुःख, कुरीतियां, समस्याएं इस कदर उनसे कलमबद्ध हो गईं कि वह मानवीय संवेद्ना के श्रेष्ठ चितेरे रचनाकार के साथ ही सुधार के ध्वजवाहक भी करार दिए जाने लगे. शायद यही वजह है कि साहित्य आजतक के दौरान चर्चित लेखिका चित्रा मुद्गल ने कहा था कि प्रेमचन्द के बाद 30-40 सालों तक उनका प्रभाव साहित्य पर रहा. बंगाल के नवजागरण का प्रभाव केवल भारतेंदु पर नहीं हुआ था. प्रेमचन्द ने सृजनात्मकता को एक एक्टिविज्म में बदलने की कोशिश की. अपनी रचनाओं में उन्होंने भारतीय समाज में दबी रुढ़ियों, पाखंड जैसी तमाम विषयों को चुना. इन सब विषयों को उन्होंने सृजनात्मकता के माध्यम से लोगों के सामने रखा. लोगों में ये बातें उतर गईं और उन्हें लगा कि ये तो हमारी बात है. 'गोदान' के बाद उनका जीवन बहुत कम बचा. लेकिन हम पाते हैं कि अगले 40 वर्षों तक प्रेमचन्द हिंदी साहित्य को दिशा देते रहे.
वाकई आज हिंदी जानने वाला शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो, जिसने मुंशी प्रेमचन्द का नाम न सुना हो. वह उर्दू में लिखते थे और हिंदी में भी. लंबे समय तक उनकी लिपी देवनागरी नहीं थी. वह असल में कथाकार थे, चाहे उपन्यास लिखते या कहानी, शब्द सीधे नश्तर की तरह चुभते या रुला देते. प्रेमचन्द ने डेढ़ दर्जन उपन्यास और तीन सौ से अधिक कहानियां लिखीं. पर खुद प्रेमचन्द की जीवन भी किस्से कहानी से कम नहीं. उनके निधन के बाद कभी उनकी गरीबी, तो कभी अमीरी, कभी सरकारी नौकरी, तो कभी फांकाकसी, कभी बहुविवाह, तो कभी अंग्रेजों से उनके संघर्ष को लेकर अलग-अलग तरह की कथाएं हवा में तैरते रहे. पर उनके जीवन पर एक सटीक लेखन उनके पुत्र और ख्यात लेखक-कथाकार अमृतराय ने 'कलम का सिपाही' नाम से ही लिखा, जो 1962 में प्रकाशित हुआ. हिंदी समाज द्वारा व्यापक रूप में स्वीकृत इस पुस्तक को मुंशी प्रेमचन्द की पहली और अपने आप में सम्पूर्ण जीवनी का दर्जा प्राप्त है. खास बात यह कि यह जीवनी अमृतराय ने प्रेमचन्द का पुत्र होने के नाते नहीं, बल्कि एक लेखक होने के चलते उतनी ही निष्पक्षता के साथ लिखी थी. यह और बात है कि उन्हें कथा सम्राट के नजदीक होने के चलते यह सुविधा जरूर रही कि वे प्रेमचन्द के कुछ उन पक्षों को भी देख सके, जिससे यह जीवनी और समृद्ध हुई. लेखक से इतर प्रेमचन्द एक पिता, पति, भाई और मित्र के रूप कैसे थे, यह जीवनी इसका भी बेबाक बयान करती है. कहते हैं अमृतराय ने इस जीवनी के लिए बहुत श्रम किया था. वह इस जीवनी को सम्पूर्ण रूप देने के लिए हर उस जगह गए जहां प्रेमचन्द कभी रहे थे, हर उस व्यक्ति से मिले जो या तो उनके सम्पर्क में रहा था, या उनसे पत्र-व्यवहार करता था. केवल यही नहीं अमृतराय ने प्रेमचन्द की कलम से लिखी गई हिंदी और उर्दू की पूरी सामग्री को भी पढ़ा, चाहे वह छपी थी, या नहीं. इसी तरह कथा सम्राट के जीवनकाल की राजनीतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि का भी न केवल अध्ययन बल्कि जहां आवश्यकता थी, उनका उल्लेख भी अमृतराय ने किया.
खास बात यह कि इसी वर्ष अमृतराय की जन्मशती के अवसर पर राजकमल प्रकाशन समूह ने हंस प्रकाशन से छपी उनकी किताबों की दुर्लभ प्रतियां पाठकों को उपलब्ध कराने की घोषणा की थी. इस क्रम में अमृतराय के 'धुआँ' और 'बीज' जैसे उपन्यासों के अलावा उनका पूरा साहित्य, कथा सम्राट प्रेमचन्द की पुस्तकें और 'झांसी की रानी' जैसी अत्यंत लोकप्रिय कविता रचने वाली सुभद्रा कुमारी चौहान समग्र शामिल हैं. इस के अलावा महान रूसी लेखक निकोलाई आस्त्रोवस्की का उपन्यास 'अग्निदीक्षा' और अमेरिकी उपन्यासकार हावर्ड फास्ट के उपन्यास 'शहीदनामा' व 'समरगाथा' भी उपलब्ध हैं, जिनके अनुवाद अमृतराय ने किये थे. राय ने रवीन्द्रनाथ ठाकुर, शेक्सपियर, ब्रेख़्त, जूलियस फूचिक, आस्त्रोवस्की, हावर्ड फ़ास्ट जैसे विश्व-चर्चित लेखकों की महत्त्वपूर्ण कृतियों का हिन्दी अनुवाद भी किया था.
साहित्य आजतक पर आज प्रेमचन्द की पुण्यतिथि पर पढ़िए 'कलम का सिपाही' का एक अंशः
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सूनी दुनिया में बराबर कौन रह सकता है. जिंदगी ख़ुद उसे भरने का उपाय कर देती है, जैसे कि हर घाव वह भर देती है. बुड्ढे स्मृतियों की बैसाखी लेकर चलने लगते हैं और गुज़रे वक़्तों के प्रेत आकर उनकी दुनिया को भर देते हैं. नवाब तो अभी बच्चा था, बहुत ही शरीर, बहुत ही खिलंदरा, और सारी जिंदगी उसके सामने पड़ी थी.
पत्नी के मरने के कुछ ही दिन बाद मुंशी अजायब लाल बीमार पड़े. ठीक होने भी न पाए थे कि फिर तबादले का हुक्म आया. नई जगह, सूने घर में नवाब को ले जाना पागलपन होता, इसलिए नवाब को फिर लमही में ही रखने की ठहरी. इलाहाबाद से चलने लगे तो उन्होंने बलदेव से भी साथ आने को कहा. पर बलदेव साथ नहीं आए. कुछ ही वक़्त बाद उनके साहब की, जो डाक-तार विभाग का कोई बड़ा अफ़सर था, इन्दौर की बदली हुई. वह बलदेव लाल को भी, जो मुंशी अजायब लाल के चले जाने के बाद उसी के यहां रहते थे, अपने साथ इन्दौर लेता गया और उन्हें तार का लाइन्समैन बनवा दिया. वह पन्द्रह बरस इन्दौर में रहे आए और घर का मुंह नहीं देखा. बाद को अपने छोटे भाई बलभद्र को भी उन्होंने अपने पास बुलाकर अपने ही समान लाइन्समैन बनवा दिया पर बलभद्र कच्ची उम्र में ही चल बसे.
नवाब की अब फिर अपनी वही पुरानी दुनिया थी-वही मौलवी साहब और वही खेत-मैदान, ऊख-मटर, आम-इमली, दौड़-भाग, गुल्ली-गोली. फ़र्क़ बस इतना था कि सर पर अब और भी कोई न था, मां तो कभी किसी काम के लिए रोकती भी थीं, डांटती भी थीं, दादी तो बस लाड़ करती थीं, कुछ तो शायद इसलिए भी कि मां अभी हाल में ही मरी थी, उस ग़म को बच्चा अगर खेल-कूद में भूल जाए...
लिहाज़ा जैसे-जैसे समय बीतता गया, उम्र के साथ-साथ आवारागर्दी भी बढ़ती गई. दो बरस बाद पिता ने फिर ब्याह कर लिया था, लेकिन उससे नवाब का अकेलापन न घटना था न घटा और वह अलग अपनी दुनिया में घूमता रहा, खेलता रहा, दादी से कहानी सुनता रहा. किसी क़दर वह एक जंगली पौधे की बाढ़ थी, बिलकुल निर्बाध, उन्मुक्त. इसे उसका अच्छा पहलू कह सकते हैं. लेकिन कुछ बुरा पहलू भी था-बारह-तेरह बरस की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते उसे सिगरेट-बीड़ी का चस्का लग चुका था और अपने ही शब्दों में उन बातों का ज्ञान हो गया था जो कि बच्चों के लिए घातक हैं. बिना मां के बच्चे का ऐसा ही हाल होता है. न हो, तो अचरज की बात है. पता नहीं मां का प्यार किस रहस्यपूर्ण ढंग से बच्चे का परिष्कार किया करता है. दोनों में से किसी को पता नहीं चलता पर वह छाया अपना काम करती रहती है. वह प्यार छिन जाए, सर पर से वह हाथ हट जाए तो एक ऐसी कमी महसूस होती है जो बच्चे को अन्दर से तोड़ देती है. और उसके साथ ही बहुत से सांचे, बहुत-सी मूर्तियां टूट जाती हैं जिनको बनाने में बरसों लगे थे.
यह कमी कितनी गहरी, कितनी तड़पानेवाली रही होगी जो सारी जिंदगी यह आदमी उससे उबर नहीं सका और वह टीस बराबर पहाड़ों से टकरानेवाली सारस की आवाज़ की तरह उसकी नसों में गूंजती रही. बार-बार उसने ऐसे पात्रों की सृष्टि की जिनकी मां सात-आठ साल की ही उम्र में जाती रही और फिर दुनिया सूनी हो गई. 'कर्मभूमि' में अमरकान्त कहता है:
'जिंदगी की वह उम्र जब इनसान को मुहब्बत की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, बचपन है. उस वक़्त पौधे को तरी मिल जाए तो जिंदगी-भर के लिए उसकी जड़ें मज़बूत हो जाती हैं. उस वक़्त ख़ुराक न पाकर उसकी जिंदगी खुश्क हो जाती है. मेरी मां का उसी जमाने में देहान्त हुआ और तब से मेरी रूह को ख़ुराक नहीं मिली. वही भूख मेरी जिंदगी है.'
दूसरी मां के आ जाने से बात कुछ नहीं बदली, उलटे उसका अकेलापन और बढ़ गया क्योंकि अब वह दादी के साथ लमही में नहीं बल्कि अपनी नई मां के साथ गोरखपुर में रह रहा था और पिता को बेटे की ओर ध्यान देने का और भी कम समय मिल रहा था. शायद अपनी कुछ उसी मनोदशा को उन्होंने 'कर्मभूमि' में यों व्यक्त किया है:
'समरकान्त ने मित्रों के कहने-सुनने से दूसरा विवाह कर लिया था. उस सात साल के बालक ने नई मां का बड़े प्रेम से स्वागत किया, लेकिन उसे जल्द मालूम हो गया कि उसकी नई मां उसकी जिद और शरारतों को उस क्षमादृष्टि से नहीं देखती जैसे उसकी मां देखती थी. वह अपनी मां का अकेला लाड़ला था. बड़ा जिद्दी, बड़ा नटखट. जो बात मुंह से निकल जाती, उसे पूरा करके ही छोड़ता. नई माताजी बात-बात पर डांटती थीं. यहां तक कि उसे माता से द्वेष हो गया. जिस बात को वह मना करतीं, उसे अदबदाकर करता. पिता से भी ढीठ हो गया. पिता और पुत्र में स्नेह का बन्धन न रहा.'
यह मन:स्थिति ठीक वह थी जिसमें नवाब के बिलकुल बहक जाने का पूरा सामान था, लेकिन प्रकृति जैसे अपने और तमाम जंगली फूल-पौधों को नष्ट होने से बचाती है जिनकी सेवा-टहल के लिए कोई माली नहीं होता, उसी तरह इस आवारा छोकरे को भी बचा रही थी. उसको बचाने के लिए उसने ढंग भी ऐसा ही अख़्तियार किया जो उसकी प्रतिभा के अनुकूल था.
बस एक हल्का-सा मोड़ दे दिया. आवारागर्दी अब भी चल रही थी-मगर मोटी-मोटी किताबों के पन्नों में, जिनका रस छन-छनकर उसके भीतर के किस्सागो को ख़ुराक पहुंचा रहा था. जो भूख उसके भीतर न जाने कब से, शायद जन्म से ही पल रही थी, जिसे दादी की कहानियों ने और उकसा दिया था, अब नवाब ख़ुद उसके लिए ख़ुराक जुटा रहा था-और इस तरह फिर वह आवारागर्दी आवारागर्दी न रह गई, गुल्ली-डंडे और मटरगश्ती की जगह तलिस्म और ऐयारी की मोटी-मोटी किताबों ने ले ली, ऐसी कि 'पूरी एन्साइक्लोपीडिया समझ लीजिए. एक आदमी तो अपने साठ वर्ष के जीवन में उनकी नक़ल भी करना चाहे तो नहीं कर सकता, रचना तो दूर की बात है.' यह मौलाना फ़ैज़ी के 'तलिस्मे-होशरुबा' की तारीफ़ है जिसके पच्चीसों हज़ार पन्ने तेरह साल के नवाब ने दो-तीन बरस के दौरान में पढ़े और और भी न जाने कितना कुछ चाट डाला जैसे रेनाल्ड की 'मिस्ट्रीज आफ़ द कोर्ट आफ़ लंडन' की पच्चीसों किताबों के उर्दू तर्जुमे, मौलाना सज्जाद हुसेन की हास्य-कृतियां, 'उमरावजान अदा' के लेखक मिर्ज़ा रुसवा और रतननाथ सरशार के ढेरों किस्से. उपन्यास ख़त्म हो गए तो पुराणों की बारी आई. नवलकिशोर प्रेस ने बहुत से पुराणों के उर्दू अनुवाद छापे थे, उन पर टूट पड़े. कोई पूछे कि इतनी सब किताबें इस लड़के को मिलती कहां थीं?
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पुस्तकः प्रेमचन्द- कलम का सिपाही
लेखक: अमृतराय
विधाः जीवनी
भाषाः हिंदी
प्रकाशनः हंस प्रकाशन,
(राजकमल प्रकाशन समूह का सहयोगी उपक्रम)
पृष्ठ संख्याः 591
मूल्य: 499 रुपए, पेपर बैक संस्करण

 

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