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विजेंद्र: जिनकी कविता में थी बिजली की कौंध और लफ़्ज़ों में हवाओं की थरथराहट

विजेंद्र कवि थे, चित्रकार थे और आलोचक थे. लेकिन उनका कवि राजकमल चौधरी और मुक्तिबोध जैसी आभा प्रदीप्त था. उनका जाना गहरा और असाधारण वज्रपात है.

कवि, चित्रकार, आलोचक विजेंद्र [ सौजन्यः लेखक ] कवि, चित्रकार, आलोचक विजेंद्र [ सौजन्यः लेखक ]

विजेंद्र कवि थे, चित्रकार थे और आलोचक थे. लेकिन उनका कवि राजकमल चौधरी और मुक्तिबोध जैसी आभा प्रदीप्त था. उनका जाना गहरा और असाधारण वज्रपात है. गुरुवार दोपहर पौने दो बजे यह अनूठा कवि धरती छोड़कर चला गया. कैसी अनहोनी है, एक रात पहले उनकी जीवन संगिनी चली गईं. ऐसे परिवार पर कोरोना का ऐसा संघातक वार होगा, सोच भी नहीं सकते. बेटा भी चपेट में.

एक पुत्री जैसी बहू को सास और ससुर को इस तरह अंतिम विदा करना पड़े, यह सोचना भी मस्तिष्क जड़वत कर देता है. उनकी पुत्रवधू वसुधा नीलमणि लंबे समय से उनका बहुत ख़याल रख रही थीं. वे उदयपुर में अंगरेज़ी माध्यम के एक स्कूल की प्रिंसिपल हैं, लेकिन इन दिनों विजेंद्र जी और परिवार की देखरेख के लिए गुड़गांव ही थीं. वे पिछले साल से ही उनकी बहुत देखभाल कर रही थीं. विजेंद्र साल भर से बहुत सजग और सावधान थे. वे किसी से मिलते तक नहीं थे. ऐसी सावधानी के बावजूद कोरोना किसी को इस तरह लील सकता है, सोचकर ही डर लग रहा है.

विजेंद्र पैदा भले उत्तरप्रदेश में हुए, लेकिन उनका जीवन राजस्थान के विभिन्न शहरों में गुजरा. इस प्रदेश की कविता का अगर खाका खींचा जाए तो नंद चतुर्वेदी, ऋतुराज और विजेंद्र के बिना यह जुगराफिया पूरा नहीं होता. इन तीनों कवियों की अपनी दीप्ति है. यह विडंबना है कि न तो हिन्दी साहित्य के आलोचकों ने नंद चतुर्वेदी की परवाह की और न ही विजेंद्र और ऋतुराज की. विजेंद्र की यह खूबी है कि उनकी कविता में पेंटिंग भी उभर जाती है और अनुभूतियों की अभिव्यंजना भी. उनके भीतर आह्वान का सौंदर्य है. लय का लालित्य का भी है और लालित्य की लय भी है. एक अलग तरह के काव्य सौंदर्य को जीने वाले विजेंद्र में एक बेलाग खरापन था.

विजेंद्र हिन्दी के बेहतरीन कवियों में थे. उनका जाना मेरे लिए बहुत ही विचलित कर देने वाली घटना है. हिन्दी में जिन लोगों ने मुझे थोड़ी सी धरती दी, उनमें विजेंद्र एक थे. वे एक अन्नमय आत्मा वाले कवि थे. उनके भीतर एक ऐसा नभ था, जिसमें सघन भावनाओं का अरुणोदय होता था. वे शांति और सुंदरता से आप्लावित रचना के कवि थे. वे अपनी तरह के कवि थे. मार्क्सवादी होते हुए भी उनकी सैद्धांतिकी थी. कविता में आलोचकों ने उनका मूल्यांकन सही नहीं किया है. उनके बारे में यह प्रश्न उठना लाजिमी है कि जो मुक्तिबोध हो सकता था, वह हिन्दी कविता में राजकमल चौधरी भी क्यों न हो सका! उनकी खरी काव्यात्मकता की ऊष्मा और सघनता को वही महसूस करता है, जो उसमें से तन्मय होकर गुजरता है.

आज हिन्दी में कचरे की तरह कवि हैं. कई बार यह कचरा बहुत ऊपर आकर ख़ूबसूरती का प्रतीक भी बन जाता है. कविता के नाम पर कविता का झाग है और राग कहीं का कहीं छूट गया है. जैसे नौकरशाहों और ठसक भरे राजनेताओं के रनिवासों में राजस्थान का एक खरपतवार बूई भी लालित्य का रूप धर कर ऐंठ के साथ दिख जाता है. ताक़तवर लोग हर चीज़ की अपनी परिभाषा और अपने मुहावरे गढ़ते हैं. राजसत्ता से लेकर भाषा और साहित्य की सत्ता तक अपने-अपने उन्माद होते हैं और वे मानदंड की तरह तय होते हैं. विजेंद्र सच्चे, खरे और अंधेरे में दिपदिपाने वाले हीरा कवि थे.

मैं उन्हें कवि की तरह जानता हूं. राजस्थान के कवि की तरह. भारत के कवि की तरह. इस उपमहाद्वीप के कवि की तरह. उनकी कविता में वैविध्य है और ऋतुओं की एक सघन अनुभूति. उनकी कविता में एक पवित्रता है. आशा है. सपने हैं और ऐसा सच है, जो पढ़ने वाले को जीवन का तिरस्कार सिखाने के बजाय उसकी हथेलियों में एक अरुणोदय टपकाता है. उदासियों और धुंधलकों से अटे इस समय में अगर किसी कवि की आवश्यकता है तो वे विजेंद्र हैं. उनके भीतर गहरा क्षितिज है. उनके बाहर उनकी कविता से एक इंद्रधनुष उदित होता है. उनकी कविता में हिन्दी कविता का वह भव्य विरसा बहुत परिश्रम से सहेजा हुआ है, जिसे ज़्यादातर मार्क्सवादी कवियों ने अपने पश्चिमी काव्य बोध के कारण ऐसे फेंक दिया, जैसे कोई फूहड़ हीरे को कांच समझ कर छिटक दे!

विजेंद्र जी से मेरा परिचय काफी वर्षों से रहा है. वे मेरी भाषा के तीखे आलोचकों में रहे हैं. सच कहूं तो मेरी भाषा के खुरदरे और कंटीले काठ पर सही से रंदा और बसूला उन्होंने ही चलाया. वे बहुत नि:संकोच भाव से डांटते थे. अधिकारपूर्वक. हम अपने भीतर अंकुरित बिरवों को बहुत बार देख ही नहीं पाते. वे देखते थे. वे सहेजते थे. वे पानी देते थे. वे पौधे की उदासी और बिरवे की प्यास को समझ लेते थे. उनकी कविता में संगीत अगर झरन है तो इसीलिए कि उनकी संवेदना बहुत गहरी थी. वे हिन्दी में संचारी भावों का निर्दशन कराने वाले दुर्लभ कवियों में हैं. उनकी कविता में निर्वेद जिस तरह प्रकट होता है, वह अन्यत्र दिखाई नहीं देता.

दरअसल कटु सच तो यह है कि हिन्दी साहित्य के शासकों की स्थिति राजा जनक के दरबार जैसी है, जहां बुद्धि और विवेक से प्रदीप्त अष्टावक्र को देखकर कथित पंडित समुदाय खड़-खड़ कर अट्टहास करता है, लेकिन आज कहीं कोई अष्टावक्र नहीं है, जो यह कह सके कि इन चर्म विशेषज्ञों को यहां क्यों बिठा रखा है! इन्हें तो मेरे चमड़े की पहचान है. इनका मेरे बौद्धिक स्तर से क्या लेना-देना! अगर होता तो ये मेरी इतनी ख़राब देहयष्टि को देखकर हंसते ही क्यों? इसलिए विजेंद्र हों या वृंद, हिन्दी के शासकों का संसार अपनी कठपुतलियों से सजता है. यही कठपुतलियां रामंचद्र शुक्ल के हिन्दी साहित्य का इतिहास से लेकर अब तक अवस्थित हैं.

विजेंद्र की कविता का वैभव अपनी तरह का औत्सुक्य लेकर चलता है. अमर्ष और विषाद पैदा करके निद्रा और सुप्त अनुभूतियों की ओर ले जाने वाले इस समय में सांप्रदायिकता को किस तरह नृशंसतावाद में परिवर्तित किया जा रहा है, इस तरह की चेतावनियों को दरकिनार करके एक बड़ा वर्ग एक खास तरह का अपस्मार रच रहा है. वह अपने ही खोल में अपनी चिंगारियों को सूर्य समझकर सहेजे हुए है. मरण के इस अमंगल के विरुद्ध साहित्य के अदम्य साहसी अभियान 'पहल' के पन्ने जिस समय शांत हो रहे हैं, ठीक उसी समय आवेगों को अपनी वल्गा से थामे रखकर काव्य के अश्व का आरोहण करने वाला यह असाधारण कवि चुपचाप चला जाता है तो चिंताएं बढ़ जाती हैं.

विजेंद्र की कविता की अपनी ध्वनि है. उनकी आलोचना की अपनी दृष्टि और सृष्टि है. लेकिन उनकी कोई भी कविताओं में ध्वनि, ध्वनि की उत्पत्ति, उसका नाद और उसके स्वर के साथ-साथ उसका अर्थ गांभीर्य उन्हें बहुतेरे कवियों से अलग खड़ा करता है. उनकी कविता अंधरे को चीरकर पोदनी चिड़ियां, तितलियां, मधुमक्खियां और फूलों के परागकण ढूंढ़ती हैं. उनकी कविता की भाषा का अपना ताप है. उनकी कविता में बिजली की कौंध है. उनकी लफ़्ज़ों में हवा अलग ही थरथराती और गाती है. कौन यह कहने का साहस करेगा-

छिपा रहता है
दर्द का उफनता लहरा
क्या करूंगा देख कर
अपनी परछाई गंदले पानी में!

# लेखक वरिष्ठ पत्रकार, विचारक और कवि हैं. 

 

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