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पुण्‍यतिथि विशेष: नेह-छोह लुटाने वाले अप्रतिम सर्जक पं विद्यानिवास मिश्र

पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित देश जब आज वेलेंटाइन दिवस मना रहे हैं, तब आज से 15 साल पहले इसी तिथि को जीवन भर बसंत, फागुन और प्रेम के चैतन्य स्वरूप को गाने वाले पंडित विद्यानिवास मिश्र का महाप्रयाण हुआ था. एक याद

पं विद्यानिवास मिश्र को सम्मानित करते भाजपा दिग्गज अटल बिहारी वाजपेयी [ फाइल फोटो] पं विद्यानिवास मिश्र को सम्मानित करते भाजपा दिग्गज अटल बिहारी वाजपेयी [ फाइल फोटो]

क्या संयोग है कि जैसे-जैसे मौसम में बासंती छुवन व्यापने लगती है, वैसे-वैसे हमारा मन आते हुए फागुन की राह अगोरने लगता है, पंडित विद्यानिवास मिश्र याद आने लगते हैं. आज पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित देश जब वेलेंटाइन दिवस मना रहे हैं, तब आज से 15 साल पहले इसी तिथि को पंडित मिश्र का महाप्रयाण हुआ था और काशी के महाश्मशान मणिकर्णिका में पंचतत्व में वे विलीन हो रहे थे. भीतर से कोमल अहसासों से भरा और जीवन भर बसंत, फागुन और प्रेम के चैतन्य स्वरूप को गाने वाला वैदुष्य शिरोमणि यह शख्स जीवन की निस्सारता को मुँह चिढ़ाता हुआ विदेह हो रहा था.

पंडित विद्यानिवास मिश्र अपनी पार्थिवता में अनुपस्थित लेकिन अपने शब्दों में अमरता का गान करते हुए भले ही इस तिथि को  विदा हो गए हों, पर उनके कृतित्व को याद करते हैं तो हम पाते हैं कि अपनी यायावरी में वे महापंडित राहुल सांकृत्यायन और सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय से कम नहीं थे. हर दिन कहीं न कहीं चलने को पांव आतुर. एक बार की याद है मुझे. दिल्ली से वाराणसी की हवाई यात्रा के दौरान पैसेज में विचरते हुए देखा कि एक सीट पर वर्तमान साहित्य और कुछ लघु पत्रिकाएं रखी हैं और बगल में एक शख्स कोई पत्रिका पढ़ने में तल्लीन है. ऐसी पत्रिकाओं को देखकर लेखकीय मन चकित होकर जब उन्हें गौर से निहारा तो पाया कि ये तो पंडित विद्यानिवास मिश्र हैं. चरण छूते ही पूछने लगे, 'बनारस चल रहे हो?' मैंने 'हां' कहा और कुछ हालचाल के बाद अपनी सीट पर बैठ गया. बाबतपुर में उतरने पर वे पूछने लगे कि कोई साधन है कि नहीं. फिर अपने साथ मुझे बिठाया और टूरिस्ट बंग्लो में जहां ठहरना था, वहां तक छोड़ गए.

पंडित मिश्र सनातन हिंदू थे पर अपनी परंपरा से उन्हें लगाव था. प्रगतिशीलों के वे आलोचक भी थे. एक बार नीदरलैंड से विदेश मंत्रालय में पधारी डॉ पुष्पिता अवस्थी का वे मंत्रालय की वरिष्ठ अधिकारी पद्मजा अवस्थी के कमरे में प्रतीक्षा कर रहे थे. पूछने पर पता चला कि वे विश्वनाथ त्रिपाठी जी के यहां मिलने गयी हैं, जबकि वे लक्ष्मी नगर में ठहरे विश्वनाथ प्रसाद तिवारी से मेरे साथ मिलने गयी थीं. कुछ देर से वे जब लौटीं तो यह बताने पर पंडित जी ने आश्वस्ति का भाव जताते हुए कहा था, 'मैं भी कहूँ कि तुम विश्वनाथ त्रिपाठी से मिलने भला क्यों जाओगी.'   
 
पंडित जी से मेरा परिचय पुराना था और हर बार मिलने पर मुझे अपना परिचय देने की आदत पड़ चुकी थी. बाद के दिनों में तो वे कहते भी थे कि तुम हर बार अपना परिचय क्यों देते हो. 1985 में मैंने अपनी पहली पुस्तक बच्चों के साहित्यकार द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी पर लिखी तो माहेश्वरी का मन था कि उसकी भूमिका पंडित जी लिखें. आगरा में वे उन दिनों कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी भाषाविज्ञान संस्थान में निदेशक के पद पर थे. मेरी पांडुलिपि पढ़ कर उन्होंने बहुत अच्छी सी भूमिका लिखी तथा उसे एक उपपत्तिपूर्ण अनुशीलन बताया. यह शब्द मेंरे लिए नया था. संयोग से इसे मैंने उन्हें समर्पित भी किया. फिर तो कई बार उनसे भेंट होती रही. दिल्ली और अन्यत्र जगहों पर. एक बार वे डॉ. रामदरश मिश्र की काव्य कृति 'आग कुछ नहीं बोलती' पर आयोजित गोष्ठी की अध्यक्षता करने के लिए पधारे. आसपास के लेखकों कवियों से भरी इस गोष्ठी में वे बहुत अच्छा बोले. रामदरश मिश्र उनके बहुत निकट के थे. एक ही जिले की पैदाइश. वे रामदरश जी से दो साल छोटे थे किन्तु आपसी स्नेह में वे बहुत खुले थे. इसे उन्होंने कभी छुपाया भी नहीं. उन्हें अपनी अध्यक्षता में दयावती मोदी पुरस्कार भी दिलवाया.

अज्ञेय, ठाकुर प्रसाद सिंह, विश्वनाथप्रसाद तिवारी, कुंवर नारायण, कैलाश वाजपेयी, केदारनाथ सिंह, श्रीलाल शुक्ल, नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी, रमेशचंद्र शाह, वसुधा डालमिया, गोविंदचंद्र पांडेय, विष्णुकांत शास्त्री, उषा किरण खान, सुनीता जैन ऐसा कौन है- जो उन्हें प्रिय न हो, उनके निकट न रहा हो. वे भले बनारस में रहते रहे हों पर सबको अपने साथ समेट कर चलते थे. अपने शिष्यों को उनकी योग्यतानुसार स्थापित करने में भी उन्होंने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. पूरा देश ही उनके लिए गांव-जवार जैसा था. यह केवल उनकी लेखकीय योग्यता या पांडित्य के चलते न था, उनके मानवीय व्यवहार में ही यह था कि हर व्यक्ति उनसे उपकृत महसूस करता था. प्रगतिशीलों में उनके प्रति आस्था भले न थी पर नामवर सिंह जैसे प्रगतिशील ने भी उनकी मेधा और व्यक्तित्व की महनीयता को मान दिया. कभी उनसे अनमने नहीं रहे.
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स्‍मृति में पंडित जी

आज सहसा पंडित जी की याद हो आने की एक वजह और है. वह है विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की हाल ही में आई पुस्तक 'समय की स्मृति'. लेखकों के संस्मरण हैं इसमें और इस पुस्तक की शुरुआत ही पंडित विद्यानिवास मिश्र के स्मृति लेख से हुई है. विद्यानिवास मिश्र पर वे पहले ही 'आंगन का पंछी' शीर्षक से एक संस्मरण लिख चुके हैं जो उनकी पुस्तक 'एक नाव के यात्री' में संकलित है. वह भी संस्मरणों की बेहतरीन कृति है. उसी में ठाकुर प्रसाद सिंह पर उनका नेहभीगा संस्मरण है, जिससे हम अलक्षित ठाकुर दद्दा के माहात्‍म्‍य को जान पाते हैं. आज सोचता हूँ कि धरती लगातार पंडितों, विद्वानों, अच्छे लेखकों, कवियों से खाली होती जा रही है. यों तो अज्ञेय के जाने के बाद विद्यानिवास जी मन से अकेले हो गए थे. उम्र के अंतराल के बावजूद उनके बीच एक भाई का स्नेह था. वे उन्‍हें भाई ही कहते. इसके बाद उनके प्रिय ठाकुरप्रसाद सिंह नहीं रहे, उनकी बीमारी में उनके उपचार में दिल्ली में कितना सहयोग रहा उनका.

कहते हैं प्रारब्ध को कोई नहीं टाल सकता. जिस आयोजन में उन्हें गोरखपुर मे भाग लेना था उसकी तिथि पहले 10 फरवरी रखी गयी थी, पर पंडित जी उन दिनों लगातार यात्राओं में थे. अनेक जगहों पर कार्यक्रम पूर्वनिर्धारित थे सो बहुत शोध कर 14 फरवरी 2005 की तारीख पुननिर्धारित की गयी. परन्तु् क्या विडंबना कि महायात्रा के लिए काल जैसे उनका पीछा कर रहा था. 14 फरवरी को घर से खा पी कर गोरखपुर के लिए निकले किन्तु मऊ-आजमगढ़ क्षेत्र के दोहरीघाट के आगे कार दुर्घटनाग्रस्त हो गयी और पता चला वे नहीं रहे. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने इस घटना का विस्तार से ब्योरा दिया है अपने संस्मरण में, जो पढ़ते हुए आंखें सजल कर देता है. वे पंडित जी के बहुत निकट रहे हैं. ऐसे अवसर पर जब व्‍यक्‍ति  नहीं रहता तो बहुत सी बातें याद आती हैं. पूरा अतीत आंखों के सामने चलचित्र सा प्रतिबिम्बित हो उठता है.

तिवारी जी ने पंडित जी के लंबे साहचर्य को याद करते हुए उनकी लेखकीय सदाशयता को आत्मीयतापूर्वक स्मरण किया है. यह भी कि पंडित जी मूड में हों तो वे गोरखपुर विश्वविद्यालय के एक पुनश्चर्या कार्यक्रम के विषय 'विचारधारा और साहित्य' को लक्ष्य कर कह सकते थे, ''मार्क्सवादी त अपनिये के विचारधारा माने लें. अच्छा, हम नामवर के कविता सुनाइबि उहॉं.'' और ऐसा कहते हुए वे नामवर जी की कविता की अनेक पंक्तियां याद से सुना गए. उनकी स्मृति विलक्षण थी. संस्कृत के सच्चे अध्येता होने के कारण उनकी जिह्वा पर सरस्वती विराजमान रहती थीं. उनकी नाराजगी भी बहुत सात्विक किस्म की होती थी. किसी की नियुक्ति की संस्तुति उन्होंने की हो और उसका चयन किसी कारणवश न हो पाए तो पंडित जी उसे ध्यान में रखते थे तथा मौका आने पर उसे सूची से छांट देने वाले विद्वान को सुना भी देते थे. तिवारी जी ने ऐसा एक वाकया अपने संस्मरण में दिया भी है.
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व्‍यक्‍तित्‍व की खूबियां

विद्यानिवास मिश्र के व्यक्तित्व में अनेक खूबियां रहीं हैं. उन्होंने 'डिस्क्रिप्टिव टेकनीक आफ पाणिनि' पर पीएचडी की थी. किन्तु संस्कृत के अध्येता होकर भी उन्होंने अपने को गतानुगतिक नहीं बनाया. 'पानी की पुकार' कविता संग्रह पढ़ें तो हम देखते हैं कि उसमे आधे में उनकी कविताएं हैं और आधे में विदेशी कविताओं के अनुवाद हैं- भाव रस और काव्य बोध से पगे. अनेक कवियों के अनुवाद जैसे उन्होंने किये हैं वैसे अन्यत्र पढ़ने को नही मिलते. उदाहरणत: बर्तोल्त ब्रेख्त के अनुवाद अनेक लोगों ने किए हैं. जर्मन जानने वाले लोगों ने भी, किन्तु पंडित जी का किया उनकी कविता का अनुवाद किसी भी काव्यानुवाद से विलक्षण है. दूसरे यह कि विदेशी कवियों के हिंदी अनुवाद में उनकी खासा दिलचस्पी रही है और ऐसी कुछ परियोजनाओं- माडर्न हिंदी पोएट्री, द इंडियन पोयटिक ट्रेडिशन आदि में वे शामिल भी रहे हैं. जहां तक व्यक्ति की ऊंचाई मापने का चलन हैं, हमारे यहां व्यक्ति का पद कद देखा जाता है. इस लिहाज से वे तमाम संस्थानों से संबद्ध रहे, देश-विदेश के विश्वविद्यालयों में विजिटिंग प्रोफेसर रहे, क.मा.मुंशी भाषा विज्ञान संस्थान में निदेशक रहे, संपूर्णानंद संस्कृत विश्ववविद्यालय वाराणसी व काशी विद्यापीठ के कुलपति रहे, नवभारत टाइम्स में प्रधान संपादक रहे, राज्यंसभा के मनोनीत सदस्य रहे. पद्मश्री, पद्मभूषण व मूर्तिदेवी पुरस्कारों से सम्मानित हुए. तथापि यह परिचय उन जैसे व्यक्ति के लिए बहुत तुच्छ है. आज यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि अपने आप में एक लेखक निबंधकार, वक्ता भर नहीं थे बल्कि एक संस्था‍न से. भारतीय संस्कृति, वांग्मय, सभ्यता के दिग्गज व्याख्याता थे. इस अर्थ में वे एक ऐसे वाग्गेयकार थे जिसकी तुलना सौ आधुनिक कुलपतियों से भी नहीं की जा सकती. वे हिंदी, संस्कृ्त, अंग्रेजी, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, अवेस्ता, उर्दू, बॉंग्ला, मैथिली व भोजपुरी के ज्ञाता थे तथा उन्होंने अनेक देशों की यात्राएं कीं.

पंडित जी की पहली पहचान निश्चय ही उनके ललित निबंध हैं. पर केवल ललित निबंध ही नहीं, तब तो उन्हें बहुत सीमित करके देखना होगा. कुंवर जी येवतुंश्को का एक कथन उद्धृत करते थे कि कवि की कविता ही आत्मकथा होती है, अन्य चीजें महज फुटनोट. कुंवर जी ने इसीलिए अपने रहते कोई आत्मकथा नहीं लिखी. केवल डायरी छपवाई वह भी अनेक व्यक्तिगत उल्लेखों से मुक्त दिखती है. उनके विचारों के स्फुल्लिंग, उनकी डायरियों में मिलते हैं. पंडित विद्यानिवास मिश्र ने भी कोई आत्मकथा नहीं लिखी. जो भी व्यक्त किया वह निबंधों में चाहे वे व्यक्ति-व्यंजक निबंध हों या साहित्‍यालोचनपरक या प्रभावाभिव्यंजक. उन्होंने अपने वैदुष्य को डाइल्यूट कर ललित निबंधों के प्रवाह में बह जाने दिया कि आम जनता उनका रसावगाहन कर सके. मैं तो कहता हूँ कि वे ललित निबंधकार भले माने जाते रहे हों, पर भीतर से वे कवि थे. कौन निबंधकार है भला जो हमारी परंपरा के कवियों को इतने भावपूर्ण ढंग से याद करे. रसखान हों, विद्यापति हों, बिहारी हों, देव हों, द्विजदेव हों, तुलसी हों, सूर हों, सबका भावपूर्ण स्मरण उन्होंने किया है. महाभारत का काव्यार्थ और भारतीय भाषादर्शन की पीठिका लिख कर उन्होंने अपनी समावेशिता का परिचय दिया तो हिंदी की शब्द संपदा लिख कर शब्‍दों की व्युत्‍पत्ति में झांकने का सुअवसर दिया. कितने ही कोशों के वे नियामक रहे हैं, लोकभाषाओं की साहित्य संपदा के अनुरक्षक भी. अवधी, भोजपुरी, बुंदेलखंडी, मैथिली सबसे उन्हें स्नेह था. तथापि उनका भोजपुरिया मन किसी भाषा के प्रति पूर्वग्रहों की लक्ष्मण रेखा में न समाता था.
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एक कृति व्‍यक्‍तित्‍व

उनकी कृतियों का संजाल विभिन्न विधाओं में फैला है. निबंध, यात्रा-वृत्तांत, कविता, साहित्यालोचन, संस्कृति संवाद, भाषा चिंतन, अनुवाद एवं भाष्य आदि. अनेक कोशों के वे संपादक रहे. अनेक पत्र-पत्रिकाएं उन्होंने निकालीं. पर जहां उनका साहित्यालोचन का पलड़ा भारी है. साहित्य की चेतना, निज मुख मुकुर, साहित्य का प्रयोजन, महाभारत का काव्यार्थ, साहित्य् का खुला आकाश, रामायण का काव्य मर्म, रागबोध और रस, अज्ञेय: वन का छंद, भक्ति काव्य का उत्कर्ष, कालिदास से साक्षात्कार, भावपुरुष श्रीकृष्ण आदि कृतियां उन्होंने दी हैं, वहीं वे ललित निबंधों के अप्रतिम सर्जक रहे हैं. भ्रमरानंद छद्म नाम से भी वे लिखा करते थे. भ्रमरानंद के पत्र नाम से सर्जनात्मक निबंध उत्तर प्रदेश और ग्राम्या जैसी पत्रिकाओं में छपे भी हैं. वे विदेश में हुआ करते तो वहां से संपादकों को पत्र लिखा करते थे. वे पत्र भी ललित निबंध के प्रतिरूप ही होते थे. जैसा कि मैंने कहा ललित निबंधों में उनका कवि मन उड़ानें भरता था. उनके गंवई मन को आत्मतोष मिलता था.

पंडित जी का पहला निबंध संग्रह छितवन की छॉंह 1952 में आया और इसे साहित्य में हाथोहाथ लिया गया. अशोक के फूल के अरसे बाद ऐसे व्यक्तिव्यंजक निबंध प्रकाश में आए तो साहित्य को जैसे एक नई विधा मिल गयी हो. इसके पहले आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी निबंधकार कहे जाते थे, ललित निबंधकार नहीं, पर विद्यानिवास मिश्र के निबंधों ने निबंधों की पारिभाषिकी बदल दी. फिर तो 'फागुन दुइ रे दिना, गांव का मन, आंगन का पंछी और बनजारा मन, कंटीले तारों के आर पार, मैंने सिल पहुंचाई, तुम चंदन हम पानी, चिड़िया रैन बसेरा, बसंत आ गया पर कोई उत्कंठा नहीं, फागुन दुइ रे दिना, दिना, भ्रमरानंद के पत्र, रहिमन पानी राखिए, राधा माधव रंग रंगी, सपने कहां गए' आदि कितने ही निबंधों के संग्रह आए और पंडित जी के निबंध भावकों के मन में उतरते गए. पहली बार लोक उनके निबंधों में मुखरित होकर प्रकट होने लगा.

उस दौर की पत्रिकाएं पलटें तो होली, दीवाली, वसंत, फागुन आदि के मौसम में ऐसा  कोई विशेषांक न होगा जिसमें पंडित जी के ललित निबंध न छपे हों. लोग ऐसे विशेषांकों की राह अगोरते थे ताकि वे उन्हें पढ़ सकें. आकाशवाणी पर प्रसारित उनकी वार्ताएं और ललित निबंध वातावरण में सुगंध भर देते थे. अपने संस्कृत के अगाध ज्ञान को घुला कर उन्होंने निबंधों में पिरो दिया था. जैसे तुलसी कहते हैं, भाषा निबद्ध मति मंजुल मात्नोति- ऐसी मंजुल भाषा में निबद्ध उनके ललित निबंध मन मोह लेते थे. उन्हें पढ़ते हुए हम उनके नैरेटिव में खो जाते हैं. आज गांव भले बदल गए हों, चुनावी अखाड़े बन चुके हों, संस्कृति पर पाश्चात्य संगीत और बम्बइया तहजीब का बोलबाला हो, पर उनके निबंधों का संसार आज भी बहुज्ञता के साथ लोक लालित्य का प्रमाण है.

उनकी बहुज्ञता कैसे निबंधों में हरसिंगार की तरह झरती है, इसे उनके 'हरसिंगार' निबंध में देखा जा सकता है. आपके लिए वह हरसिंगार होगा पर पंडित जी की दृष्टि में वह धैर्य की अंतिम सीमा है, मान की पहली उकसन है और प्रणयवेदना की सबसे भीतरी परत. वे पारिजात पर लिखते हुए जैसे खुद पारिजात बन जाते हैं. उनकी सर्जना की माधुरी देखिए-

''हरसिंगार बरसात के उत्तरार्ध का फूल है, जब बादलों को अपना बचा खुचा सर्वस्व लुटा देने की चिंता हो जाती है, जब मघा और पूर्वा में झड़ी लगाने की होड़ लग जाती है और जब धनिया का रंग इस झड़ी में धुल जाने के लिए व्यग्र सा हो जाता है. हरसिंगार के फूलों की झड़ी भी निशीथ के गजर के साथ ही शुरू होती है और शुरू होकर तभी थमती है, जब पेड़ में एक भी वृन्त नहीं रह जाता. सबेरा होते होते हरसिंगार शांत और स्थिर हो जाता है, उसके नीचे की जमीन फूलों से फूल कर बहुत ही झीनी गंध से उच्छ्वसित हो उठती है.''
                                                                                                           (हरसिंगार, व्यक्ति-व्यंजना, पृष्ठ-11)
यों तो बसंत ऋतुओं का राजा है पर वह आ भी जाए तो हमारे भीतर का वसंत जाग उठे इसकी कोई गांरटी नहीं है. तभी तो वे लिखते हैं, 'बसंत आ गया पर कोई उत्कंठा नहीं'. इसके अभिप्राय में वे कहते हैं, बसंत का प्रमाण बाहर ढूढ़ने की जरूरत नहीं, रागाकुल चित्ता ही बसंत का अधिष्ठान है, इसलिए कोयल बोले न बोले, भोर में अलसायी दखिनैया बहे न बहे, आम में बौर आये न आये, महुआ के कूचे द्रवें न द्रवें, कुछ अंतर नहीं पड़ता, चित्त अकुला पड़े, बस उसी क्षण बसंत का आविर्भाव हो गया.                                                            (व्यक्ति-व्यंजना, पृष्ठ- 116)
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रामभक्‍ति और लोक

यथार्थ और मिथक में कितना भी वैपरीत्य हो, लोक तो मिथकों और जनश्रुतियों पर चलता है. हम सबको याद है मेले ठेले के दिनों लंबे रास्ते इसी तरह गउनई से तय किए जाते थे. भोर होते ही गंगा नहान या अन्यत्र धर्म-कर्म से जाती हुई स्त्री-पुरुषों की कतारबद्ध टोलियां सिर पर ढूंढी रसद लादे ऐसे गीत गाते हुए जा रही होती थीं- 'मोरे राम के भीजै मुकुटवा, लछिमन के पटुकवा. मोरी सीता कै भीजै सेनुरवा. त राम घर लौटिहैं.' इस गीत की टेर सुनते हुए पंडित जी का संस्कृरपगा लेखक लोकगंधी हो उठता है. वे कौशल्या के चित्त की थाह में उतर जाते हैं और निबंध का जन्म होता है: मेरे राम का मुकुट भीग रहा है. वन चले गए राम के प्रति कौशल्या की यह चिंता कितनी वाजिब है जो शायद आज भी हर मां की हो सकती है. वे कौशल्या के वात्सल्य को कितने कवि मन से टटोलते हैं कि आंखें नम हो उठती हैं. एक मां ने बेटे के लिए वनवास मांगा, दूसरी मां की चिंता यह कि जंगल जंगल भटकते हुए राम का मुकुट इस बारिश में भींग रहा होगा. लछिमन का पटुका और सीता का सिंदूर भी. राम के प्रति आज भी लोक में भक्ति है, अनुरक्ति है. वे वन चले गए तो पूरी अयोध्या उदास हो उठती है. पूरा लोक गा रहा है: हम ना अवध मा रहबै हो रघुबर संगे जाब. इसे लेकर भी पंडित जी का एक रसभीना मार्मिक निबंध भी है जो इस विकल टेर को जैसे एक मार्मिक निबंध में बदल देता है.

वे जानते हैं फागुन बस दो दिन का सहचर है और चैत चार दिन का. पर ऐसा क्यों है यह जानने की जिज्ञासा उनसे पूरा आख्यान ही लिखवा लेती है- फागुन दुइ रे दिना. वे इसे उस सामूहिक उल्लास से जोड कर देखते हैं जिसे दो दिन से ज्यादा झेला नहीं जा सकता. वे इस संदर्भ में भवभूति और महाभारतकार को याद करते हैं कि सुख तो बस कुछ क्षणों के लिए आता है, यानी सुख दगाबाज है पर दुख बड़ा वफादार साथी है. वह बड़ा साथ देता है. वे सुख को उस मिठास से जोड़ कर देखते हैं जिसका दूसरा नाम लुनाई अर्थात लावण्य है पर यह लावण्य भी कितनी देर टिक कर बैठता है. होली दीवाली पर पंडित जी संपादकों द्वारा मन से याद किए जाते रहे हैं, इसका जिक्र कर चुका हूँ. लिहाजा वे खुद भी स्वीकार करते हैं- 'लीजिए मैं भी बौरा गया. अखबारी यथार्थ में जीने वाला कहां से कहां चला गया.कल होली का अंक निकलना है, हमारे लिए तो फागुन बस दो रंगीन पृष्ठ है, छपा, बँटा और फिर कहीं कोने में जैसा का जैसा चौपत करके रख दिया गया. रद्दी कागज वाला आएगा, उसकी सदगति हो जाएगी.' और फिर वे गांव की याद में डूब जाते हैं. यानी ललित निबंध का पूरा का पूरा स्थापत्य दर्ज करते हुए. वे फागुन को जैसे पुकारते है. फागुन तुम कल चले जाओगे, इन सब चिंताओं को गठरी में समेटे चले जाओगे. फिर कह उठते हैं, तुम दो दिन के लिए ही सही, फिर अगले साल आना...आते रहोगे न फागुन. इस शहर से डर कर तुम किनारा तो नहीं करोगे.
                                                                                                        -(फागुन दुइ रे दिना, व्यक्ति-व्यंजना, पृष्ठ 256)

जीविका और यायावरी में पंडित जी का गांव छूट गया था. वे गोरखपुर, बनारस और यात्राओं, बैठकों, सम्मेलनों और समारोहों में बँट कर रह गए थे. किन्तु उनके भीतर की पुकार गंवई थी. उनका मन गांव की बंसवारी में लगता था. बंसवारी से होकर आती हवा में लगता था. वे मन को दिलासा देते हुए कहते थे, 'ये दो चार दिन भी क्या कम हैं चरखी की तरह नाचती जिन्दगी में....ये दिन अंजुरियों में भर लेने दो फागुन, न भर पाएं तो उसकी प्यास भर लेने दो, 'अभी न होगा मेरा अंत'. '                                                                                 '(वही, पृष्ठ 257)
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फिर वही बसंत

ये फिर वही बसंत के दिन हैं, धीरे-धीरे हवा मन में अकुलाहट भरती हुई और पंडित जी के निबंधों की याद दिलाती हुई. आज वेलेंटाइन दिवस यानी प्रेम के देवता का दिन. जीवन से छिनते जा रहे प्रेम और विश्वास के इन दिनों में बाजार हावी है. प्रेम के इजहार के लिए सौ-सौ तरकीबें खोजी जा रही हैं. जिस प्रेम को कहने और महसूसने के लिए कबीर को ढाई आखर प्रेम की व्यंजना कहनी पड़ी और जिस ढाई आखर को व्यक्त करने में बड़े-बड़े कवियों के पसीने छूट गए, वह आज की युवा पीढ़ी के लिए कितना सरल हो गया है. उसके लिए मोबाइल व फेसबुक आदि ने कोमलतम इमोजी रेडीमेड उपलब्ध करा दी है. प्रेम देखते-देखते आइकन में बदल गया है, स्मा‍इली में बदल गया है. तब भी क्या इस सृष्टि में सब कुछ प्रेममय है. कुछ तो है जो छिन रहा है, जो खत्म हो रहा है. आज का दिन या यानी प्रेम के इजहार का दिन तो है ही अपने निबंधों में नेह छोह लुटाने वाले लेखक की पुण्य-तिथि भी तो है. जिस बसंत, जिस प्रेम जिस फागुन को वे अपने निबंधों में मूर्त करते रहे, उसी दिन उन्होंने इह लोक से प्रयाण किया. इस दिन उनके जाने का अर्थ बस यही हो सकता है कि वे जा रहे हैं एक ऐसे दिन जिस दिन पूरी दुनिया प्रेम की बात करेगी, बसंत के अहसास की बात करेगी और नेह छोह के संदेशों के विनिमय में खो जाएगी. विद्यानिवास मिश्र की रचनाएं भी तो इसी नेह छोह की इबारत हैं. इस सृष्टि को इसकी ऋतुओं को इसकी संस्कृतियों को पूरे मानवीय उछाह से प्रेम करने का संदेश देकर जाने वाले ऐसे मनीषी को हिंदी समाज कभी न भूल सकेगा.
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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक, कवि एवं भाषाविद हैं. शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित व अन्वय एवं अन्विति सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं.  हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार, आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब  द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059, मेलः dromnishchal@gmail.com

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