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2 अक्तूबर पर विशेषः वे बातें जिनसे गांधी जी बने हम सबके प्यारे बापू

गांधी जी ने सिखाया कि बड़ी-बड़ी बातें कहने के बजाय, हम छोटी-छोटी बातें अपनाएं, छोटे-छोटे संकल्पों को पूरा करें तो हम बड़े हो सकते हैं. खुद गांधी का जीवन बताता है कि वे इसी तरह बड़े हुए. और देश के सारे बच्चों के बापू कहलाए, बड़ों के भी.

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी [फाइल फोटो] राष्ट्रपिता महात्मा गांधी [फाइल फोटो]

हम महात्मा गांधी को याद करते हैं तो उनका एक सपना याद आता है. अपने देश को नए और सुंदर रूप में ढालने का सपना. एक सुंदर भारत का सपना, जो सारी दुनिया के लिए भी आदर्श हो. कल भारत सारी दुनिया को राह दिखाने वाला महान देश था, तो आज भी नैतिक आदर्शों में ढला एक सुंदर, स्वस्थ और जगमगाता भारत हम क्यों नहीं बना सकते? एक उम्मीद है इसके पीछे, एक झिलमिल सपना, जिसे गांधी जी हकीकत का परिधान पहनाने की कोशिश करते हैं.
और इस सपने की बात करें तो गांधी जी की बहुत सी बातें याद आती हैं. छोटी-छोटी बातें, जिनके बड़े अर्थ हैं. इसी में उनके जीवन का संदेश छिपा हुआ है. सच पूछिए तो गांधी जी की महानता के पीछे भी यही है. उन्होंने सिखाया कि बड़ी-बड़ी बातें कहने के बजाय, हम छोटी-छोटी बातें अपनाएं, छोटे-छोटे संकल्पों को पूरा करें तो हम बड़े हो सकते हैं.
खुद गांधी का जीवन बताता है कि वे इसी तरह बड़े हुए. और देश के सारे बच्चों के बापू कहलाए, बड़ों के भी. देश में राजनेता बहुत थे, पर बापू एक ही थे और यह नाम उन पर फबता था. उन्होंने इस देश के मर्म को जाना था. भारतीय जनता की कमजोरियों को भी वे जानते थे और इसकी अपार शक्ति को भी. इसीलिए केवल चरखे, खादी, स्वदेशी और सत्याग्रह के बल पर अंग्रेजी साम्राज्य को हिला दिया उन्होंने. लोगों को अजीब लगता था, खाली चरखे के बल पर कैसे आजादी हासिल हो सकती है? खादी के बल पर कैसे आजादी हो हासिल हो सकती है? बहुत से पढ़े-लिखे लोग उन पर हंसते. फब्तियां कसते हुए कहते, "जरा देखो तो गांधी को, खादी और चरखे के बल पर आजादी लेने चला है!"
इस सबके पीछे पढ़ाकू लोगों की किताबी पढ़ाई का अहंकार बोल रहा था. पर गांधी जी तो किताबी आदमी नहीं थे. वे बहुत बार पूरे देश में घूमे थे, जनता की वास्तविक हालत को देखा था. गांवों में बसे दीन, दरिद्र भारत को देखा था. वे जानते थे कि जनता दुर्बल है, निर्धन और असहाय है, पर यह भी जानते थे, कि यही जनता जाग जाए तो एक महाशक्ति भी बन सकती है, जिसका सामना करना अंग्रेजों के बस की बात नहीं है.
तो इसी आत्मविश्वास के बल पर गांधी जी ने कहा कि हां, चरखे और खादी से आजादी हासिल हो सकती है. चरखा और खादी गांधी जी के ऐसे हथियार थे जिनके जरिए वे दूर-दराज के गांव-गांव तक पहुंच गए. जहां भी कोई चरखा चला रहा होता, अंग्रेजी सत्ता भयभीय हो उठती, कहीं गांधी का सिपाही तो नहीं? शहर का पढ़ा-लिखा हो या गांव का अनपढ़ किसान, जो कोई खादी पहने होता, लगता गांधी का सिपाही जा रहा है, स्वराज्य का सिपाही...! अंग्रेजों की इतनी बड़ी शक्तिशाली हुकूमत जहां नहीं पहुंच पाई, वहां गांधी का सीधा-सरल संदेश पहुंच गया, चरखा और खादी पहुंच गए!.. और जो निरक्षर, अनपढ़, सदियों से उपेक्षित और सताए हुए लोग थे, वे भी गांधी के सिपाही के रूप में इस देश की महाशक्ति बनकर अंग्रेजी फौज के आगे आ खड़े हुए.
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खादी स्वाभिमान की पोशाक है
खादी को लेकर गांधी जी के आग्रह की कोई सीमा नहीं थी. यहां तक कि इसे लेकर वे कठोर से कठोर बात भी कह सकते थे. बारडोली सत्याग्रह के दिनों की बात है. वहां लोग गांधी जी से मिलने आते, तो साथ ही अपनी सामर्थ्य भर थोड़ा सा धन भी दे जाते, जिससे आंदोलन आगे चले. गांधी जी प्रसन्नता से यह राशि स्वीकार करते. सबसे दो-चार बातें भी करते कि कैसे इस सत्याग्रह को और प्रभावी बनाया जा सकता है. इसी बीच एक धनी महिला आई, जिसके पास रूमाल से ढकी थाली थी.
गांधी जी ने रूमाल हटाकर देखा, पूरी थाली रुपयों से भरी है. उन्हें खुशी हुई, पर फिर पलटकर उन्होंने महिला की ओर देखा तो उनका भाव एकदम बदल गया. महिला खादी नहीं, कीमती विदेशी वस्त्र पहने हुए थी. उन्होंने क्षुब्ध होकर कहा, "विदेशी वस्त्र पहनना तो ऐसा ही है, जैसे कोई निर्वसन खड़ा हो. खादी क्यों नहीं पहनती हो? विदेशी वस्त्र तुम्हारी लाज ढकते हैं, क्या यह लज्जा की बात नहीं है?"
सुनकर वह महिला सकपकाई. उसने अपनी भूल मानी और जीवन भर खादी पहनने का संकल्प किया. गांधी जी की एक छोटी सी बात ने उसके मन पर इतना गहरा असर डाला कि उसे वह कभी भूल नहीं पाई.
इसी तरह गांधी जी अहिंसा और सत्याग्रह की बात करते थे तो उनका पूरा विश्वास था इन पर, क्योंकि इनके साथ हमारी आत्मिक शक्ति जुड़ी थी. जबकि ज्यादातर लोग तो अहिंसा और सत्याग्रह को असंभव आदर्श ही मानते थे. केवल कहने की बातें. उनके जरिए कोई बड़ा आंदोलन खड़ा किया जा सकता है, या कि आजादी की इतनी बड़ी लड़ाई लड़ी जा सकती है, यह तो वे सोच भी नहीं सकते थे. पर गांधी जी चीजों को एकदम उलट देते थे. वही यहां भी उन्होंने किया. और सच में उन्होंने अहिंसा और सत्याग्रह को अमल में लाकर दिखा दिया कि इन नैतिक हथियारों से क्या नहीं हो सकता? यों शायद दुनिया ने पहली बार अहिंसा का इतना बड़ा महाप्रयोग देखा, जिसमें बंदूकें ताने सिपाहियों को, फौज को छाती खोले, 'जय हिंद' और 'वंदेमातरम्' कहते हजारों निहत्थे लोगों की भीड़ के आगे झुकना पड़ा. बंदूकें झुक गईं, सत्याग्रह जीत गया!
सारी दुनिया ने अचरज के साथ देखा कि डेढ़ पसली के एक महान करिश्माई आदमी ने अहिंसा और सत्याग्रह के बल पर, जिसमें खादी, चरखा, स्वदेशी, नमक सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा आंदोलन जैसी नैतिक शब्दावली के जरिए बात लोगों तक पहुंचाई जा रही थी, अंग्रेजी सत्ता की धार को कुंठित कर दिया, उसे भारतीय जनता की महाशक्ति का पता दिया और देश को आजादी दिलाई.
गांधी जी ने जब देश भर में घूम-घूमकर जनता से स्कूल-कॉलेजों का बहिष्कार करने तथा विदेशी वस्त्रों की होली जलाने का आह्वान किया, तो पूरे देश में जैसे भूचाल आ गया. लोग अंग्रेजी सत्ता से नाराज थे, उसके उत्पीड़न से दुखी और मर्माहत थे. गांधी जी ने जब स्वदेशी की बात कही और विदेशी वस्त्र जलाने का आह्वान किया तो जैसे सबके मन में घुमड़ते हुए गुस्से को अभिव्यक्ति मिल गई. देश में हर जगह विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई और असंख्य युवक अपनी पढ़ाई और सरकारी नौकरी छोड़कर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े.
पर जब गांधी जी ने यह कठोर आह्वान किया तो उन्हें जनता के एक वर्ग का विरोध भी झेलना पड़े. संभ्रांत वर्ग के बहुत से लोगों का कहना था कि स्कूल-कॉलेजों के बहिष्कार और विदेशी कपड़ों को जलाने के पीछे हिंसा की भावना है. अहिंसा को मानने वाले गांधी जी को ऐसा नहीं करना चाहिए. यहां तक कि गुरुदेव रवींदनाथ टैगोर ने भी महात्मा गांधी को पत्र लिखकर अपना विरोध प्रकट किया.. उनका कहना था कि गांधी जी का यह आंदोलन उनके आदर्शों के अनुकूल नहीं है. जब हम स्कूल-कॉलेजों के बहिष्कार की बात या विदेशी वस्त्रों को जलाने की बात करते हैं, तो इसके पीछे कहीं न कहीं हमारा द्वेष ही है.
पर गांधी जी के मन में चीजें साफ थीं. वे अच्छी तरह जानते थे कि इस आंदोलन के पीछे जनता के दुख-दर्द और अंग्रेज सरकार के प्रति गुस्से की अभिव्यक्ति है. विदेशी वस्त्रों और सरकारी शिक्षा ने लोगों को अपनी संस्कृति से विमुख कर दिया था. इस आंदोलन के जरिए गांधी जी फिर से भारत और भारतीयता के प्रति लोगों के मन में स्वाभिमान पैदा करना चाहते थे. उन्होंने गुरुदेव टैगोर को जवाब दिया, "अगर व्यक्तियों पर लोगों का गुस्सा उतरता तो यह हिंसा होती. मैंने उस गुस्से को वस्तुओं की ओर मोड़ दिया. आखिर उत्पीड़न झेल रही जनता को अपना दुख और नाराजगी प्रकट करने का अधिकार है."
"पर फिर भी है तो द्वेष ही न!" गुरुदेव ने कहा, "देखिए, सुबह-सुबह चिड़ियां कितने मधुर कंठ से कलरव करके दिन का प्रारंभ करती हैं. गाते-गाते ऊपर आसमान में उड़ती हैं. तो क्या हम ऊपर न उठकर, इस हवा को अपने द्वेष से मलिन करें, यह अच्छा है?"
गांधी जी बोले, "पेट भरा हो तो पक्षी गाते हैं. कभी देखिए, अगर पिछले दिन दाना न मिला हो और पेट भूखा हो, क्या तब भी पक्षी ऐसे ही गाते हैं? भारत की जनता दुखी और विकल है. अंग्रेजी सत्ता के दमन की शिकार है. मैं उसका आर्तनाद सुन पाता हूं. इसीलिए मुझे यह जरूरी लगा कि जनता आगे बढ़कर हिम्मत के साथ कहे कि हमें विदेशी वस्त्र नहीं चाहिए, ऐसी शिक्षा नहीं चाहिए जो हमारे स्वाभिमान को खत्म करे."
गांधी जी जब यह कह रहे थे, तो देश की करुण सच्चाई उनकी आंखों के सामने थी. वे इसे अच्छी तरह जानते थे और एक क्षण के लिए भी भूल नहीं सकते थे. पर उनका रास्ता ऐसा था, जिसमें हिंसा न हो. हिंसा सच ही उन्हें किसी भी कीमत पर स्वीकार्य न थी.
इस दृष्टि से चौरीचौरा कांड सही मायने में गांधी जी के लिए निकष था, जिसमें उनके नैतिक बल की परीक्षा भी हुई. उन्होंने जब चौरीचौरा में दंगे भड़क जाने और हिंसा से दुखी होकर सत्याग्रह वापस लिया, तो देश की जनता में बड़ी उग्र प्रतिक्रिया हुई थी. गांधी जी के इस निर्णय के विरोध में जैसे तूफान उठ खड़ा हुआ था. कई बड़े राजनेताओं ने कहा कि आंदोलन स्थगित करना महा भूल है, इससे जनता के मनोबल पर भी बड़ा बुरा असर पड़ेगा. पर गांधी जी अपने निर्णय पर अडिग थे. उन्हें टस से मस नहीं किया जा सकता था.
बरसों बाद किसी ने गांधी जी से पूछा, "आपके जीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण दिन कौन सा था...?" इस पर गांधी जी ने इसका जो उत्तर दिया था, वह गौर करने लायक है. उन्होंने कहा, "मेरे जीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण दिन वह था, जब पूरे देश के विरोध के बावजूद मैंने चौरीचौरा कांड के बाद आंदोलन वापस लिया था. उसकी बड़ी कठोर आलोचना हुई, पर मेरी आत्मा कहती है कि वह ठीक निर्णय था. मुझे इस बात की खुशी और आनंद है कि मैंने सही निर्णय लिया."
गांधी जी ने सचमुच क्रोध को जीत लिया था. उनके मन में शत्रु या आततायी के प्रति भी गुस्सा नहीं था, हां, उनके कामों का पुरजोर विरोध करने में वे पीछे नहीं रहते थे. पर अंग्रेजों से इसलिए विरोध करें कि वे अंग्रेज हैं, यह उन्हें पसंद नहीं था. सन् 1931 में गांधी जी ब्रिटेन गए, तो उनकी सुरक्षा के लिए एक गोरे अंग्रेज सिपाही की ड्यूटी लगाई गई, जो हर वक्त उनके आसपास रहता. यों उसका काम गांधी जी की निगरानी करना था. पर गांधी जी हमेशा उससे प्रेम से बोलते. आखिर वह गोरा सिपाही उनकी बातों से इस कदर प्रभावित हुआ कि उसे हर वक्त उनके निकट रहने की इच्छा होती. गांधी जी के प्रेम ने उसका हदय बदल दिया था. कभी-कभी वह आकर कहता, "मेरे लायक कोई काम हो तो बताएं." छोटा सा भी कोई काम उसे दिया जाता तो बड़ा खुश होता था, और झट से उसे पूरा करता था.
बाद में जब गांधी जी ब्रिटेन से वापस चलने लगे, तो एक बड़ा अधिकारी उनसे मिलने आया. पूछा, "आपको कोई कष्ट तो नहीं हुआ?" गांधी जी ने कहा, "नहीं, बिल्कुल नहीं. हां, मेरी बस एक इच्छा है, जिस खुफिया सिपाही की आपने मेरे पास ड्यूटी लगाई थी, उसे आगे ब्रिंदिसी तक हमारे साथ चलने की इजाजत दे दें, क्योंकि अब वह मेरे परिवार सा सदस्य बन गया है."
"अगर आपकी इच्छा है तो उसे जरूर ले जाएं...!" उस अधिकारी ने कहा. इस पर वह गोरा सिपाही इतना कृतज्ञ हुआ कि उसकी आंखें भर आईं.
गांधी जी ब्रिटेन से भारत आए तो यहां फिर से आंदोलन तेज हो गया. गांधी के लिए यह बहुत व्यस्तता का समय था. पर इस सबके बीच वे उस गोरे सिपाही को नहीं भूले. उन्होंने उसे पत्र लिखा और एक घड़ी भेजी. वह घड़ी सप्रेम भेंट करते हुए, उन्होंने उस पर अपना नाम भी खुदवाकर भेजा.
ऐसा आदमी कहीं नफरत कर सकता है? युद्ध के मोरचे पर भी शत्रु के प्रति मन में प्रेम और दया हो, यह गांधी के लिए ही संभव था.
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देश का हर आदमी आजादी का सिपाही
इसी तरह गांधी ने आजादी की लड़ाई का जो तरीका निकाला, उसमें हर आदमी शामिल हो सकता था. कोई पढ़ा-लिखा हो या निरक्षर, इससे फर्क नहीं पड़ता था. यहां तक कि जो अत्यंत कमजोर, रुग्ण, दीन-हीन और विकल थे, वे भी उनके कारवां में शामिल हुए. उनके यहां सबका स्वागत था. पर गांधी का ढंग अपना था और लड़ाई के तौर-तरीके भी कुछ अलग. जब चंपारण के किसानों ने उन्हें गोरों के अत्याचारों के बारे में बताया, अपनी विपदा बताई और उनसे वहां चलकर नेतृत्व करने का आग्रह किया, तो उन्होंने छूटते ही पहला सवाल किया, "ठीक है, मैं वहां आऊंगा और सत्याग्रह शुरू करूंगा. पर तुम लोगो को जेल जाने के लिए तैयार रहना पड़ेगा. क्या तम लोग जेल जाने को तैयार हो?"
जब किसानों ने उन्हें वचन दिया कि वे जेल जाने से हिचकिचाएंगे नहीं, तभी गांधी जी ने वहां सत्याग्रह प्रारंभ करने का निश्चय किया. और देखते ही देखते एक इतना बड़ा किसान आंदोलन खड़ा हो गया कि पूरे भारत में उसकी धमक सुनाई दी. भारतीय जनता में एक नया आत्मविश्वास पैदा हुआ. पर इस आंदोनलन की शुरुआत का ढंग बड़ा अजब था. गांधीजी मोतिहारी गए, वहां के किसानों से मिले और उनकी समस्याओं को जाना. अब तक वहां आसपास के बड़े जाने-माने वकील भी इकट्ठे हो गए थे, जिन्हें दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी के करिश्मे का थोड़ा-बहुत पता था. वे दूर-दूर से एक सुरक्षित दूरी रखकर देख रहे थे कि यह शख्स करता क्या है? मन में उत्सुकता थी कि गांधी जी का करिश्मा है कैसा?...अंग्रेज अधिकारी भी उत्सुकता से देख रहे थे कि अफ्रीका में जनता का इतना बड़ा आंदोलन खड़ा करने वाला गांधी आखिर यहां क्या करने जा रहा है?
लोगों से बात करके गांधी जी ने अपने आंदोलन की एक रूपरेखा बनाई. फिर उन्होंने दूर एक छोटे से गांव जसवलपट्टी में जाने का निर्णय किया, जहां अभी कुछ समय पहले एक प्रतिष्ठित परिवार को बुरी तरह अंग्रेजों का उत्पीड़न सहना पड़ा था. इस पर वकीलों को बड़ी हैरानी हुई. बोले, "यह आपका कैसा निर्णय है? इतने बड़े शहर को छोड़कर इतनी छोटी सी जगह जाएंगे? जबकि उत्पीड़न तो हर जगह है. वहां किसको आपके कामों का पता चलेगा? यहां अधिक प्रचार मिलेगा." सुनकर गांधी जी मुसकराए, कहा कुछ नहीं.
गांधी जी ने जिस जसवलपट्टी गांव में जाने का निर्णय किया था, वहां जाने के अधिक साधन भी न थे. चिलचिलाती गरमियां. कोई ढंग की सवारी न थी तो एक हाथी पर कुछ साथियों के साथ वे चल पड़े. आगे सरकार द्वारा जगह-जगह मुश्किलें खड़ी की गईं, तो कहीं बैलगाड़ी, कहीं इक्के से जाना पड़ा. इसी बीच जिलाधीश का फरमान उन्हें मिला, "आपके यहां रहने से शांति-व्यवस्था का खतरा है. इसलिए आप जिला छोड़कर चले जाएं, नहीं तो हमें गिरफ्तार करना पड़ेगा."
गांधी जी ने कहा, "मैं आपका आदेश मानने से इनकार करता हूं, क्योंकि मेरा मानना है कि एक भारतीय होने के नाते मुझे अपने देश में कहीं भी आने-जाने की स्वतंत्रता है. मैं इसे किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ने वाला हूं. आपको जो करना वह आप शौक से करें."
आखिर गांधी जी को गिरफ्तार करके अदालत में पेश किया गया. उन पर आरोप था कि वे यहां रहकर शांति-व्यवस्था को भंग कर रहे हैं, जनता को विद्रोह के लिए उकसा रहे हैं.
इस पर गांधी जी शांत चेहरा से चुपचाप सुनते रहे. "क्या आपका कोई वकील है?" उनसे पूछा गया.
"नहीं, वकील की जरूरत नहीं है." गांधी जी ने कहा, "मुझे जो सजा दी गई है, वह मैं स्वीकार करता हूं. हां, जेल से छूटने के बाद फिर मैं चंपारण से ही दोबारा अपने आंदोलन की शुरुआत करूंगा."
सुनकर वहां के वकील हक्के-बक्के रह गए. सोच रहे थे, यह कैसा आदमी है जो अपने बचाव के लिए कोई कोशिश नहीं करता और जेल जाने को तैयार है? अभी तक तो उन्होंने यही सुना था कि जेल जाने से बचने के लिए लोग क्या-क्या तौर-तरीके अपनाते हैं. इसकी सारी कानूनी पेचीदगियां वे जानते थे. पर पहली बार एक ऐसा विचित्र वकील उन्होंने देखा, जो वकालत का परम ज्ञाता होकर भी अपने बचाव में कानूनी धाराओं का जरा भी इस्तेमाल नहीं करता और तुरंत जेल जाने के लिए राजी हो गया.
इस बीच गांधी जी की गिरफ्तारी की खबर बिजली की तरह फैली. जगह-जगह लोग लोग इकट्ठे हो रहे थे. उनमें फिरंगी सरकार के लिए गुस्सा था. आततायी सरकार के विरुद्ध लोगों के गुस्से और रोष की लहर फैलती जा रही थी. लोग हैरान होकर एक-दूसरे से कह रहे थे, "गांधी जी कैसे आंदोलनकारी हैं? हमारी तकलीफों सुनकर यहां आए और अब खुद ही सबसे पहले जेल जाने को भी तैयार हो गए!"
उधर अंग्रेज अधिकारी भी हक्के-बक्के थे, हैरान. ऐसा कोई नेता उन्होंने देखा नहीं था. गांधी जी से कैसे निबटें, उन्हें समझ में नहीं आ रहा था. कहीं ऐसा तो नहीं कि गांधी जी के जेल जाने से जनता में भीषण क्रोध और उत्तेजना फैल जाए, स्थितियां और बिगड़ जाएं.
तभी ऊपर से आदेश आए, "इस आदमी से मत उलझो. यह जो करता है, करने दो, नहीं तो जनता का आंदोलन उग्र हो गया तो उसे संभालना मुश्किल हो जाएगा."
गांधी जी को रिहा कर दिया गया और उनका आंदोलन अपनी राह चल पड़ा, जहां दिनोंदिन बड़ी संख्या में किसान सत्याग्रह में शामिल होते. अहिंसा के इस नायक की सत्याग्रही सेना बढ़ती जा रही थी, और इसके पीछे थी अपार नैतिक शक्ति, आत्मा की ताकत, जिसकी कोई काट अंग्रेजी सरकार के पास नहीं थी. यह दीन, दुर्बल और सदियों से उत्पीड़ित जनता की ताकत थी, जिसके सामने गोलियां और बंदूकें भी बेअसर थीं. इसलिए कि हर मामूली से मामूली आदमी भी यहां स्वाधीनता सेनानी था. एक-एक कमजोर धागा मिलकर रस्सी बन गया था, जिससे किसी पागल और मदांध हाथी को भी बांधा जा सकता थे. यहां तक कि जो लोग एकदम लाचार और असमर्थ नजर आते थे, वे भी सत्याग्रहियों के इस बड़े काफिले से जुड़कर सबल और समर्थ हो गए थे.
चंपारण आंदोलन के दिनों का ही एक प्रसंग है. गांधी जी का जो काफिला था, उसमें एक कुष्ठ रोगी भी था, जिसके पैरों पर घाव था. इसलिए उसने पैरों पर पट्टी बांधी हुई थीं. तो भी कष्ट के कारण वह ठीक से चल नहीं पा रहा था. गांधी तो तेज चलते थे, इसलिए वे सबसे पहले आश्रम पहुंचे. उनके पीछे-पीछे तेजी से चलते हुए और लोग भी पहुंच गए.
तभी गांधी का ध्यान उस कुष्ठ रोगी की ओर गया. बोले, "वह कुष्ठ रोगी नहीं नजर आ रहा?"
लोगों ने कहा, "वह तेज नहीं चल पा रहा था, तो शायद थककर कहीं बैठ गया हो."
गांधी उसी समय पीछे मुड़कर गए. वह कुष्ठ रोगी एक पेड़ के नीचे बैठा बुरी तरह हाय-हाय कर रहा था. उसकी पट्टी रास्ते में ही खुल गई थी, घावों से खून बह रहा था. गांधी जी ने उसी समय चादर फाड़कर उसे अपने हाथों से पट्टी बांधी. फिर सहारा देकर अपने साथ ले गए.
कुछ देर बाद प्रार्थना सभा हुई, तो लोगों ने देखा, वह कुष्ठ रोगी सबसे आगे बैठा बड़े आनंद के साथ तालियां बजा रहा है. खुद गांधी जी ने उसकी इतनी चिंता की, इससे वह गदगद था.
यह था जनता को साथ लेने का गांधी जी का तरीका, जिससे जनता आनंद विभोर होकर उनका साथ देती थी. हर शख्स को लगता था, गांधी जी तो उसके अपने हैं.
चंपारण सत्याग्रह के दिनों का ही एक और प्रसंग है. वहां गांधी जी ने किसानों का एक बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया. अंग्रेज सरकार भयभीत थी. वह हर कीमत पर इस आंदोलन को कुचल देना चाहती थी, पर किसानों का सत्याग्रह भी दिनोंदिन तेज होता जा रहा था. किसानों का साथ देने के लिए आसपास की सारी जनता उठ खड़ी हुई थी. उधर अंग्रेज सरकार का उत्पीड़न और दमन भी बढ़ता जा रहा था.
जब किसान अपनी सही मांगों के लिए आवाज उठा रहे थे, तो एकाएक पुलिस ने लाठियां चलानी शुरू कीं. पर किसान पीछे हटने को राजी नहीं थे. तभी एक लाठी एक किसान युवक के सिर पर पर पड़ी. चोट इतनी घातक थी कि उसी समय उसके प्राण निकल गए.
उस किसान युवक की बूढ़ी मां के दुख की कोई सीमा नहीं थी. वह उसका इकलौटा बेटा था. अब वह भला कैसे जिए? वह बिलखती हुई गांधी जी के पास आई और फूट-फूटकर रोती हुई बोली, "अब मैं कैसे जिऊंगी? आप मेरे बेटे को जिला दीजिए. उसके बिना तो मैं नहीं जी पाऊंगी."
सुनकर गांधी जी एक क्षण के लिए चुप. फिर कहा, "मां, यह तो ईश्वर के हाथ में है. तेरे बेटे को मैं जीवित नहीं कर सकता. मैं ईश्वर से प्रार्थना करूं तो भी क्या जरूरी है कि वह उसे स्वीकार कर ले. अब तो बस एक ही तरीका है. तुम सोच लो कि गांधी मर गया, तुम्हारा बेटा जीवित है और तुम्हारे सामने बैठा है....तुम जो भी आज्ञा दोगी, मै उसे पूरा करूंगा." कहकर गांधी ने उस बूढ़ी स्त्री के कांपते हुए हाथ अपने सिर पर रख लिए.
"ओह, मेरे बेटे…" कहकर उस बूढ़ी स्त्री ने उसी समय उन्हें छाती से लगा लिया. उसका चेहरा आंसुओं से भीग गया था. ऐसा भावुक दृश्य था कि देखने वालों की भी आंखें डब-डब कर रही थीं.
गांधी जी अगर जनता के बापू बने, तो ऐसे ही नहीं. वे जनता से एकरस होना जानते थे, इसीलिए जनता उन पर जान छिड़कती थी. उनकी पुकार पर एक साथ हजारों लोग उठ खड़े होते थे, और बड़े से बड़े खतरे का सामना करने निकल पड़ते थे.
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तुम्हारी मां कितने कुरते सी सकती है?
गांधी जी की बातें बड़ी सीधी-सरल थीं, भाषा एकदम सादा, पर मामूली शब्दों से ही पता चलता था कि उनकी सोच कितनी बड़ी है. कैसे देश के करोड़ों दुखी, वंचित लोगों के दुख-दर्द से उन्होंने खुद को एकाकार कर लिया था. उनसे जुड़ी एक घटना बहुत मशहूर है. एक बार गांधी जी एक स्कूल में गए और वहां बच्चों से मिले. उनसे बातें कीं. बच्चों के मन में छोटे-बड़े बहुत सवाल थे. उनके पूछने पर गांधी जी आनंद से भरकर जवाब दे रहे थे.
गांधी जी का पहनावा सबसे अलग था. वे एक मामूली धोती पहनते थे. खुला बदन. एक बच्चे ने देखा तो उसे अटपट लगा. बोला, "बापू, आप कुरता क्यों नहीं पहनते?"
गांधी जी हंसकर बोले, "मेरे पास तो कुरता नहीं है, तो क्या पहनूं?"
"अगर आपके पास कुरता नहीं है तो मेरी मां सी देगी." बच्चे ने कहा, "मैं अपनी मां से कहूंगा. अगर वह कुरता सी दे तो आप पहनेंगे?"
"पर एक कुरते से मेरा काम चलने वाला नहीं है. मुझे तो बहुत कुरते चाहिए." गांधी जी ने कहा, "तुम्हारी मां कितने कुरते सी सकती है?"
"अगर आप कहें तो वह दो कुरते सी देगी." बच्चे ने कहा.
इस पर गांधी जी का जवाब था, "मेरे बच्चे! इस देश में चालीस करोड़ गरीब लोग हैं जिनके पास पहनने के लिए वस्त्र नहीं है. अपनी मां से पूछना, क्या वह चालीस करोड़ कुरते सी देगी?... अगर वह सी दे, तो मैं जरूर पहन लूंगा."
सुनकर बच्चा हैरान. आसपास जो लोग खड़े थे, वे भी एकदम हक्के-बक्के रह गए. यह कैसा आदमी है, जिससे देश के हर नंगे और गरीब आदमी की चिंता है...?
पर गांधी जी का यही ढंग था. वे देश के गरीब से गरीब आदमी के बारे में सोचते थे. अगर वह सुखी नहीं है तो हमारी बड़ी-बड़ी बातों से क्या फायदा? उनकी चिंता इतनी बड़ी थी, दिल इतना बड़ा था कि जब भी वे बोलते तो लगता, करोड़ों भारतीयों का सच्चा प्रतिनिधि बोल रहा है. इसीलिए वे छोटे-बड़े सबके बापू थे, और इसीलिए, भारतीय समाज में उन्होंने जो जगह बनाई, वह कोई और हासिल नहीं कर पाया. इस देश के मामूली से मामूली आदमी को वे अपने लगते थे, अपने बापू. इसलिए कि उन्हें ऊपर-ऊपर की बातें करना पसंद नहीं था. जो कहो, वह करके दिखाओ. उनकी एक-एक साँस में दुखी जनना का आर्तनाद बस गया था, इसीलिए वे राष्ट्रपिता थे और सबके बापू भी!
यही नहीं, देश और समाज का काम करने वालों के लिए गांधी जी ने एक कसौटी भी बनाई. एक सार्वकालिक कसौटी, जिससे कभी कोई चूक नहीं हो सकती. और उसे आप एक मनके की तरह संभालकर रख सकते हैं. उनका कहना था कि जब तुम्हें अपने किसी काम को लेकर शंका हो कि यह करना चाहिए कि नहीं, तो देश में विकास के सबसे आखिरी छोर पर बैठे हुए आदमी के बारे में सोचो. क्या इससे उसे कुछ फायदा है? और अगर है तो बेहिचक होकर हमें उस काम को करना चाहिए. ऐसा काम सच में ही देश और जनता की सेवा का काम होगा.
सच ही यह ऐसी कसौटी है कि अगर इसे ईमानदारी से सामने रखकर चलें तो कभी गफलत हो ही नहीं सकती. देखा जाए तो गांधी जी के काम करने का ढंग और पूरा तौर-तरीका इससे समझ में आ जाता है. साथ ही इससे यह भी समझ में आ जाता है कि गांधी जी क्या थे, और उनकी असली शक्ति क्या थी?
कुछ छोटी-छोटी चीजों से भी यह बात समझ में आ जाती है. एक बार की बात, किसी अंग्रेज ने गांधी जी को पत्र लिखा. और उस पर पता था, 'द किंग ऑफ इंडिया, डेल्ही'. आश्चर्य, वह पत्र इधर-उधर भटका नहीं, सीधा गांधी जी को मिल गया. एक बार राजघाट पर गांधी जी पत्रों की प्रदर्शनी लगाई गई, तो उनमें वह पत्र भी था, जिस पर पता चमक रहा था, 'द किंग ऑफ इंडिया, डेल्ही'. गांधी जी के पास कोई पद नहीं थी. पर उनके पास एक ही शक्ति थी, जनता की शक्ति, जिससे बड़ी कोई शक्ति नही होती. इसीलिए अगर कोई किंग ऑफ इंडिया था, तो वे महात्मा गांधी ही थे. भारत ही नहीं, दुनिया के सबसे बड़े बेताज बादशाह!
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मेरा हृदय मर्माहत है!
गांधी जी के मन में इस देश को बदलने की बात हर वक्त रहती थी. उन्होंने बहुत बार कहा, मुझे ऐसी आजादी नहीं चाहिए जो अनैतिक चीजों पर टिकी हो, या जिसमें हिंसा, अन्याय और गैर-बराबरी हो. छुआछूत मिटानी है, ऊंच-नीच खत्म करना है- यह उनका सपना था. इसलिए हरिजन की बात लेकर वे आए, और जो सफाई करने वाला है, उसे ईश्वर का सच्चा पुत्र कहा. वह सम्माननीय है, उपेक्षा के लायक नहीं. उसकी उपेक्षा या उसके साथ अन्याय सभ्य समाज का लक्षण नहीं है. इसी तरह स्वच्छता और स्वास्थ्य पर उन्होंने बहुत जोर दिया. आत्मनिर्भरता और शारीरिक मेहनत के आदर्श पर भी. इन बातों को वे केवल कहते ही नहीं थे, बल्कि अपने जीवन को भी उन्होंने उसके अनुरूप ढाला. शायद आधुनिक युग में छोटी-छोटी नजर आती दैनंदिन जीवन की इन दोनों बातों पर जितना जोर गांधी जी ने दिया, उतना और किसी ने नहीं.
गांधी जी के जीवन से जुड़े ऐसे कई प्रसंग हैं. एक प्रसंग जगन्नाथ पुरी मंदिर का है, जहां दूर-दूर से लोग दर्शनों के लिए जाते हैं. गांधी जी उन दिनों मंदिरों में हरिजनों के प्रवेश के लिए मुहिम चला रहे थे. वे रात-दिन इसी बारे में सोचते. उन्होंने इसे लेकर बहुत लंबा अनशन किया. फिर प्रवास पर निकल पड़े, ताकि लोगों को इस बारे में समझाया जा सके. उन्हीं दिनों वे बा और महादेव भाई के साथ घूमते हुए जगन्नाथपुरी के मंदिर में भी पहुंचे. उन्होंने वहां प्रबंधकों को समझाया कि जब तक हरिजनों को मंदिर में प्रवेश नहीं मिलेगा, ईश्वर कभी प्रसन्न नहीं हो सकते. पर मंदिर के अधिकारी इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं थे. वे अपनी जिद पर अड़े हुए थे. इस पर गांधी जी ने भी दुखी मन से निर्णय किया कि जहां हरिजनों का प्रवेश नहीं है, वे उस मंदिर में नहीं जाएंगे.
पर कस्तूरबा की बड़ी इच्छा थी कि वे भगवान जगन्नाथजी के दर्शन करें. तो वे गांधी जी को बिना बताए महादेव भाई को साथ लेकर चली गईं. बाद में बापू को भी यह पता चला. इससे वे बहुत दुखी और विकल हुए. कहा, "बा, जहां हरिजन नहीं जा सकते, जहां मनुष्य और मनुष्य में भेद होता है, वहां जाकर तुमने इतनी बड़ी भूल की है कि मेरा हृदय मर्माहत है और दुख मेरे अंदर समा नहीं रहा. तुम इतने लंबे समय से मेरे साथ रही हो. तो तुम्हारे वहां जाने का मतलब है कि मैं ही वहां चला गया. यह कितने दुख की बात है कि जहां हरिजनों को प्रवेश नहीं है, वहां हम जाएं."
तब कस्तूरबा को अपनी गलती महसूस हुई. और यह भी कि गांधी जी सिर्फ कहने के लिए कुछ नहीं कहते. उस पर अपना जीवन भी दांव पर लगाते हैं.
यही बात गांधी जी के सादगी और सार्वजनिक शुचिता के आदर्श को लेकर भी थी. जिन दिनों गांधी जी सेवाग्राम में ही रहते थे, उन दिनों का एक प्रसंग है. 2 अक्तूबर आया, गांधी जी का जन्मदिन, तो बा ने सोचा, सादगी से गांधी जी का जन्मदिन मनाया जाए. इसके लिए उन्होंने कुछ और तो नहीं किया, घी का दीया जला लिया. गांधी जी ने पूछा, "यह किसने जलाया?" बा ने कहा, "मैंने."
सुनकर गांधी जी के चेहरे पर दुख की गहरी छाया नजर आने लगी. बोले, "इस देश में इतने गरीब और लाचार लोग हैं जिन्हें घी देखने को भी नहीं मिलता. ऐसे में मेरे जन्मदिन पर तुम घी की ऐसी बरबादी करो, यह क्या शोभा देता है? बा, आज तुमने ऐसा काम किया है कि मेरा मन दुख और ग्लानि से भर गया है."
सुनकर बा को भी बहुत दुख हुआ. उन्होंने क्षमा मांगी. उस दिन प्रार्थना सभा में गांधी जी ने इस प्रसंग का जिक्र करते हुए कहा, "जनता के दिए धन की एक-एक पाई कीमती है. हमें कोई हक नहीं है कि उसे अपने थोड़े से सुख के लिए खर्च कर दें. यह पाप और अनैतिक है." कहते हुए गांधी के स्वर में बड़ा दर्द था. बोले, "जन्मदिन पर तो अच्छे काम करने चाहिए. पर आज यह एक ऐसा काम हुआ जो मुझे अंदर ही अंदर साल रहा है."
बा ने जीवन भर यह पाठ याद रखा. और यह भी, कि हम कोई बड़ा काम करने चलें तो उसमें छोटी-छोटी चीजों की भी कितनी अहमियत है. गांधी जी का जीवन यही सिखाता है, और हम मौजूदा दौर के चारित्रिक पतन को देखें, तो उन चीजों की अहमियत आज कहीं ज्यादा है.
रूढ़ियों का विरोध करने में भी गांधी जी इसी तरह सचेत थे. एक बार की बात, एक श्रद्धालु मारवाड़ी के बेटे का विवाह हुआ तो वह गांधी जी का आशीर्वाद दिलाने के लिए उन्हें साथ लेकर आश्रम आया. पर गांधी जी की दिनचर्या बहुत व्यस्त थी. उनसे मिलना कैसे हो? आश्रम के लोगों ने कहा, "गांधी जी सुबह-सुबह घूमने जाते हैं. तुम रास्ते में खड़े हो जाना तो उनसे भेंट हो जाएगी."
उस श्रद्धालु मारवाड़ी ने ऐसा ही किया. अगले दिन गांधी जी घूमने निकले तो वह बेटे और बहू के साथ रास्ते में खड़ा था. गांधी जी को देखकर वह आगे आया. बोला, "बापू, ये मेरा बेटा और बहू हैं. इनका विवाह हुआ तो आपके आशीर्वाद के लिए इन्हें ले आया." कहकर उसने दोनों को बापू के चरण छूने के लिए कहा. गांधी जी ने दोनों को ऊपर उठाया. तभी उन्होंने देखा कि बहू के मुख पर घूँघट है. वे एकाएक गंभीर हो गए. बहू के घूँघट को ऊपर उठाकर उन्होंने उस आदमी से कहा, "स्त्रियां घूँघट करें, यह अच्छी बात नहीं है. मैंने इसका घूँघट उघाड़ दिया, अब यह ऐसे ही खुले मुंह रहे. आगे कभी इसके मुख पर घूँघट नहीं होना चाहिए."
उस श्रद्धालु मारवाड़ी ने खुशी-खुशी कहा, "ऐसा ही होगा, बापू." और तब गांधी जी ने बेटे-बहू दोनों को आशीर्वाद दिया और तेजी से आगे बढ़ गए.
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साफ करने का जिम्मा भी हमारा है
इसी तरह गांधी जी ने स्वच्छता और स्वास्थ्य को लेकर बार-बार चेताया है कि इसके बिना एक सुंदर देश और समाज का सपना अधूरा है. यों तो भारतीय संस्कृति में स्वच्छता और स्वास्थ्य को लेकर बहुत कुछ कहा गया है, पर वह भावनात्मक ही ज्यादा था. नित्य व्यवहार से जुड़े उसके सीधे-सादे अर्थ को हमने ओट कर दिया. इस तरह की बहुत सारी कथा-कहानियां हैं, जिनमें मामूली शब्दों में बड़े अर्थ छिपे हैं. पर अकसर उन छिपे हुए आशयों को खोलने की जरूरत किसी ने नहीं समझी.
मुझे आज भी याद है, बचपन में मां मुझे लछमी और कुलछमी की कथा सुनाती थी. बहुत ही सुंदर कहानी. उस कहानी में बार-बार यह बात आती थी कि जहां सफाई है, वहां लछमी हैं और जहां गंदगी है, वहां कुलछमी का वास होता है. और कुलछमी के आते ही हमारा भाग्य, बल, वैभव, कांति और समृद्धि सब कुछ चला जाता है. ये सारी बातें मां की सुनाई उस कहानी में उपदेश की शक्ल में नहीं, बल्कि किस्सागोई में ढलकर आती थीं. सोचकर आज लगता है, सचमुच कितनी अद्भुत थीं वे कहानियां!...तो यह एक प्रतीक-कथा है हमारे लोकजीवन की, जो इशारों में बहुत कुछ कहती है. ढूँढ़ने पर और भी बहुत सारी कहावतें, आख्यान और श्लोक मिल जाएं. लोककथाएं मिल जाएंगी, जो अपने ढंग से स्वच्छ जीवन और स्वस्थ जीवन की बात करती हैं.
पर इन बहुत सारे आख्यानों की भावना समझते हुए, व्यवहार में पहली बार इसे एक कसौटी के रूप में सामने रखा महात्मा गांधी ने. उन्हें यह बुरा लगता था कि हम अपना घर तो साफ रखते हैं, पर हमारी गलियां अकसर कूड़े और गंदगी से बजबजाती नजर आती हैं. मोहल्ले में जगह-जगह गंदगी के ढेर हैं. हम उनसे बच के निकल जाते हैं, पर उनके बारे में सोचते नहीं हैं. यहां तक के हमारे जो पवित्र तीर्थस्थान कहे जाते हैं, वहां भी स्वच्छता नहीं है और इसका बड़ा खराब असर हमारे मन, शरीर और आत्मा पर पड़ता है. हमने अपनी नदियों तक को मैला कर दिया है और उनके किनारे गंदगी के ढेर है. हमारे मंदिर और देवस्थान तक साफ नहीं है.
पहली बार गांधी जी ने इस बात को जोर-शोर से उठाया. ऐसे मौकों पर वे खुद झाड़ू उठाकर सफाई करने में लग जाते थे और इससे लोग अचंभे में पड़ जाते थे. पर गांधी जी के लिए तो यह कोई अजूबा नहीं, बल्कि बड़ी सहज बात थी. उन्होंने बहुतों को इस बात के लिए प्रेरित किया कि अगर गंदगी हम फैलाते हैं तो उसे साफ करने का जिम्मा भी हमारा ही है.
उनके आश्रम में सभी को अपने बरतन खुद साफ करने होते थे. साफ-सफाई करनी होती थी और गांधी जानते थे कि यह कोई छोटी चीज नहीं है. इसलिए कि इन छोटे-छोटे कामों से हम बहुत कुछ सीखते हैं. जीवन के बड़े-बड़े पाठ. समानता और भाईचारा का पाठ. अनुशासन का पाठ. आत्मनिर्भरता का पाठ....और भी बहुत सारी चीजें. अगर हम इन्हें तुच्छ और मामूली चीजें ही समझते रहे तो जो बड़े-बड़े काम हम करना चाहते हैं, वे कभी नहीं कर पाएंगे. बड़े कामों के पीछे जो दृढ़ता, सरलता और आत्मशक्ति होती है, वह इन छोटे-छोटे कामों से ही हासिल होती है. इनसे हमारा अहं घुल जाता है और हम सरल, निश्छल बनते हैं. कुछ ज्यादा मानवीय और इऩसान बनते हैं. वरना तो हालत यह है कि जो शख्स साफ-सफाई कर रहा है, वह हमें छोटा और तिरस्कार करने लायक लगता है. मगर गांधी जी सारे पैमानों को उलटा कर देते हैं. वे पूछते हैं, भला जो साफ-सफाई करता है, वह कैसे छोटा हो गया? जो गंदगी फैला रहा है, वह छोटा है या उसे साफ करने वाला?
तो इस तरह की चीजों ने, इन अस्वस्थ और गलत धारणाओं ने हमारे समाज में ऊंच-नीच, शोषण और गैर-बराबरी पैदा की. आपस की समरसता, मेल-मिलाप और भाईचारा खत्म किया. उसने हमारे समाज में बहुत कुछ नष्ट किया है. इतना ही नहीं, वे जो लिखने-पढ़ने और ऐसे ही दूसरे दिमागी काम करने वाले लोग हैं, अध्यापक, वकील, डाक्टर, इंजीनियर, राजनेता, अधिकारी वर्ग सबके लिए गांधी जी शरीरिक श्रम जरूरी मानते थे. अपने साफ-सफाई के और दूसरे काम सबको खुद करने चाहिए. बगैर शरीरिक श्रम के हम पूरे नहीं होते. कोई व्यक्ति कितना ही बड़ा हो, अगर शारीरिक श्रम नहीं करता तो गांधी जी का मानना था कि वह चोरी का खाता है. इतना बड़ा आदर्श!...
मगर उन्होंने खुद इसे जीवन में उतारा. सब जानते हैं कि गांधी जी हमारे स्वाधीनता संघर्ष के महानायक थे. बड़े-बड़े आंदोलन उन्होंने किए, जिससे हमारा इतिहास बना. सबको अचंभा होता था, कितना बड़ा है यह आदमी! उस समय देश-दुनिया के बहुत बड़े और नामी-गरामी लोग गांधी जी से मिलने आते थे. पर गांधी जी अगर उस समय अपनी कुटिया में चरखा चला रहे हैं तो उसका चक्का थमता नहीं था. वह चरखा जिसे वे देश की जनता के स्वाभिमान, स्वावलंबन और कर्मयोग का प्रतीक मानते थे और जिसे उन्होंने भारतीय जनता के सम्मान और अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई का महा अस्त्र बना दिया था, वह चलता ही रहता था. बड़ी सहजता से चरखा चलाते हुए या ऐसे ही दूसरे दैनंदिन काम करते हुए, वे लोगों से मिलते-जुलते, सलाह-मशवरा करते और आंदोलन के बारे में अपनी गंभीर बातें भी समझाते जाते थे.
यहां तक कि जेल में भी यही चरखा उनका संगी-साथी बना. इसी के साथ-साथ वे आध्यात्मिक चिंतन और आजादी की लड़ाई को लेकर सोच-विचार भी करते जाते थे. कोई काम उनके लिए छोटा नहीं था. वे बराबर कोशिश करते थे कि लोगों के दिमाग से यह बात निकालें कि साफ-सफाई और ऐसे दूसरे काम छोटे या असम्मानजनक काम हैं.
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आप लोग कंकड़ बीन दीजिए!
साने गुरुजी ने लिखा है कि एक बार कुछ वकील गांधी जी के आश्रम में उनसे मिलने आए. उन्होंने कहा, "बापू, आप स्वाधीनता की लिए इतनी बड़ी लड़ाई लड़ रहे हैं. हमारे लिए भी कोई काम हो तो बताइए." गांधी जी उस समय आश्रम के लिए दाल में कंकड़ बीन रहे थे. आश्रमवासियों के शाम के भोजन के लिए जरूरी था कि दाल साफ हो. उन्होंने दाल से भरी थाली उन वकीलों के आगे रख दी और कहा, "चलिए, आप लोग इसमें से कंकड़ बीन दीजिए."
वकील हक्के बक्के! वे लोग सोचते थे कि हम इतने दिमाग वाले लोग हैं कि गांधी जी पढ़ने-लिखने से जुड़ा कोई बड़ा काम बताएंगे. पर यह क्या...? "बापू, क्या यही काम है?" उन्होंने अचकचाकर पूछा. "हां, इस समय तो बस यही काम है. दाल साफ होगी तो खाने वालों का स्वास्थ्य ठीक रहेगा." गांधी जी ने मुसकराकर कहा.
बेचारे वकील...! उन्होंने कभी यह काम किया न था. थोड़ी देर तक तो वे दाल में से कंकड़ बीनने की आधी-अधूरी कोशिश करते रहे. फिर वह थाली वहीं छोड़कर, नमस्कार करके चले गए. और गांधी जी समझ गए कि जो लोग यह छोटा सा काम नहीं कर सकते, उनसे बड़े कामों की कोई उम्मीद नहीं की जा सकती. गांधी जी की महानता इसमें थी कि जितनी तन्मयता और एकाग्रता से वे स्वाधीनता संग्राम की रणनीति बनाते थे, उतनी ही तन्मयता और एकाग्रता से चरखा भी चलाते थे और चुपचाप बगैर ढिंढोरा पीटे, आश्रम के छोटे-बड़े काम भी किया करते थे.
एक बार की बात, गांधी जी जेल की कोठरी में थे. तभी जेल का सुपरिटेंडेंट उनसे मिलने आया. जो जूते वह पहने हुए था, उन्हें पहने हुए ही कोठरी के अंदर आया और कुछ देर तक बात करके चला गया. गांधी जी उस समय चरखा कात रहे थे. जेल सुपरिंटेंडेंट के जाने के बाद उन्होंने देखा कि उसके जूतों के निशान पूरी कोठरी में हैं और बहुत बुरे लग रहे हैं.
उसी समय वे उठे. एक बालटी भरकर पानी और झाड़ू लाए. उन्होंने कोठरी को अच्छी तरह साफ किया और फिर से अपने काम में लग गए. जेल के और लोगों ने देखा तो कहा, "बापू, आप इतनी मेहनत कर रहे हैं! आप जेल के अधिकारी को मना नहीं कर सकते थे कि वह जूते पहनकर भीतर न आए." सुनकर गांधी जी मुसकराए. बोले, "कोई बात नहीं, उसने अपना काम किया और मैंने अपना. इस बहाने शरीर की भी थोड़ी कसरत हो गई."
इसी तरह चंपारण सत्याग्रह के दिनों का प्रसंग है. गांधी जी को वहां किसानों ने अपनी समस्या बताकर राह दिखाने के लिए बुलाया था. और सच ही गांधी जी ने किसानों का बड़ा आंदोलन खड़ा करके अंग्रेज अधिकारियों की नींद उड़ा दी थी. उन्हीं दिनों उन्होंने बा से कहा, "तुम यहां बच्चों को कुछ सिखाओ."
बा ने कहा, "मैं क्या सिखाऊं? मैं तो यहां की भाषा भी नहीं जानती. तो ये लोग मेरी बात कैसे समझेंगे? मैं इन्हें क्या सिखा सकती हूं? क्या गुजराती सिखाऊं?"
सुनकर बापू एक क्षण के लिए चुप हो गए. फिर बोले, "ये किसानों के बच्चे हैं. अभाव और तंगी में रहते हैं. इन्हें हम सफाई का पाठ तो सिखा ही सकते हैं. तुम इन बच्चों का मुंह खोलकर देखो, आंखें देखो, और इन्हें शरीर को साफ रखना सिखाओ. ये सफाई का महत्त्व जानेंगे तो जल्दी से बीमार भी नहीं पड़ेंगे. इससे इन किसानों की आर्थिक परेशानियां भी कम होंगी."
बा को बात समझ में आ गई. अब उन्होंने बच्चों को पास बुलाकर उन्हें सफाई का महत्त्व समझाना शुरू किया. कैसे आंख-मुंह साफ रखना है, हाथ-पैरों को साफ करना है. और भी बहुत सी बातें. फिर तो बच्चों का उनसे ऐसा संबंध जुड़ गया, जैसे मां और बच्चों का लाड़-प्यार का संबंध होता है. बच्चे उनकी ओर खिंचे चले आते. इस बीच भाषा की दीवार जाने कब टूट गई. बा और बच्चों में खूब बातें होने लगीं.
भला मां और बच्चों के बीच भाषा की क्या दरकार? बा ने मां के ममत्व के साथ बच्चों को सफाई का महत्त्व समझाया तो हर बच्चा उन्हें मां कहकर ही पुकारता था. ऐसे आनंद की तो उन्होंने कल्पना ही नहीं की थी. मगर यह सिलसिला बच्चों के बीच बैठकर सफाई की छोटी-छोटी बातों की चर्चा से ही शुरू हुआ था, और जल्दी ही एक प्यार भरे संबंध में बदल गया. बा की बातों में, सफाई की उनकी चिंताओं के पीछे बच्चों को मां का ममत्व भरा चेहरा नजर आया. और यह तय है कि अगर हम प्यार से और निःस्वार्थ भाव से कोई अच्छी बात कहते हैं तो वह दूसरों के दिल में उतर जाती है.
इसी तरह स्वास्थ्य को गांधी जी बहुत महत्त्व देते थे. वे कहते थे, "सत्याग्रही को मन की तरह शरीर से भी पूरी तरह स्वस्थ होना चाहिए. अगर स्वस्थ नहीं रहोगे तो सत्याग्रह के दौरान जो बड़ी-बड़ी मुश्किलें आती हैं, कष्ट सहने पड़ते हैं, उन्हें कैसे सहोगे?"
यों तो खुद गांधी जी बड़े कृशकाय थे. शरीर बहुत मजबूत नहीं था उनका. पर जो भी शरीर प्रकृति से हमें मिला है, उसकी अच्छी तरह हिफाजत करना और अपने को स्वस्थ रखना वे हर किसी का दायित्व मानते थे. वे कहते थे, "यह शरीर केवल मेरा ही नहीं है, यह तो समाज की संपत्ति है. मुझे कोई हक नहीं है कि मैं इसकी दुर्दशा करूं."
इसके लिए समय से भोजन, पथ्य-परहेज, व्यायाम ये सब वे जरूरी मानते थे. हर रोज तड़के बहुत तेज-तेज कदमों से चलना, यह उनके नियम या संकल्पों में से एक था और बड़ी से बड़ी चिंता या परेशानी में भी वे इसे छोड़ते नहीं थे. चरखा चलाना इसीलिए उन्हें बेहद संतुष्टि देता था और वे हर किसी के लिए इसे जरूरी मानते थे. चरखा आत्मनिर्भरता का प्रतीक है, पर साथ ही चरखा चलाना एक स्वाभाविक व्यायाम भी है, जो हमें स्वस्थ रखता है. यह हमें तन और मन दोनों से स्वस्थ रखता है. इसीलिए गांधी जी को चरखा इतना प्रिय था.
साने गुरुजी ने, जिन्हें बहुत अरसे तक गांधी जी के निकट रहने और उनकी छोटी-छोटी बातों के अवलोकन का अवसर मिला, लिखते हैं कि एक बार गांधी जी घूमने जा रहे थे. साथ में बा भी थीं. रास्ते में गांधी जी के पैर में एक पत्थर लगा और खूब बहने लगा. उन्होंने बा से पट्टी बांधने के लिए कहा. इस पर बा ने हंसकर कहा, "वैसे तो आप देश के लिए बड़ी से बड़ी कुरबानी करने की बात कहते हैं, पर इस जरा सी चोट से घबरा गए?"
इस पर गांधी जी ने जवाब दिया, "बा, यह शरीर मेरा जरूर है, पर यह समाज की संपत्ति है, धरोहर है. अगर मैं बीमार पड़ गया, या जिस उँगली में चोट लगी है, वहां घाव पक गया तो कितने दिन उसे ठीक होने में लगेंगे. इतने दिन मैं देश और समाज का काम नहीं कर पाऊंगा. तो मेरी वजह से यह नुकसान तो देश और समाज का हुआ न!"
इस तरह छोटी-छोटी बातों में बड़ी सीख देते चलना गांधी जी को आता था. यह उनका अपना तरीका था, जिससे उनके आसपास के लोग बिन कहे बहुत कुछ समझ जाते थे. और सच में गांधी होने का सही अर्थ भी यही है.
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संपर्कः प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008, मो. 09810602327, ईमेल- prakashmanu333@gmail.com

 

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