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जन्मदिन विशेषः कुदरत की छाया में कविता रचते प्रेमशंकर शुक्ल

हिंदी कवि प्रेमशंकर शुक्‍ल ने प्रकृति को अपनी संवेदना के सबसे निकट पाया है. उनके जन्‍मदिन पर साहित्य आजतक पर उन्‍हें याद कर रहे हैं हिंदी के सुधी कवि, समालोचक डॉ ओम निश्‍चल

कवि प्रेम शंकर शुक्ल कवि प्रेम शंकर शुक्ल

हमारे समय की कविता के अनेक रंग रूप हैं. वह कहीं सामयिक है, कहीं शाश्वत, कहीं राजनीतिक है, कहीं सामाजिक और सांस्कृतिक. शुद्ध कविता की धातु के कवि हमारे समय में कम हैं. कभी दिनकर ने 'शुद्ध कविता की खोज' पुस्तक लिखी थी, जिसमें उन्होंने कविता पर गंभीर चर्चा की थी. जैसे-जैसे हमारा समय आधुनिकता और पूंजी के गिरफ्त में आया है, कविता भी बाजार के हवाले हुई है. वह मनोरंजन की वस्तु बनती जा रही है. कविता का वाचिक इतना छिछला बना दिया गया है कि उसे सुन कर हमारी कवि परंपरा शरमा जाए. ऐसे में कुछ कवि ऐसे हैं जो अपनी कविताओं से कविता का एक अलग पर्यावरण बचाए हुए हैं. जो अपने रचनात्मक एकांत में पृथ्वी के भविष्य के लिए, जल के लिए, कुदरत के लिए चिंतित हैं. वे कविता की व्यासगद्दी पर बैठ कर जो कुछ भी देख रहे हैं उसे अपनी कविताओं के अंत:करण में दर्ज कर रहे हैं. ऐसे ही कवियों में प्रेमशंकर शुक्ल का नाम आता है.  

कुछ आकाश, झील एक नाव है, पृथ्वी पानी का देश है, भीमबैठका एकांत की कविता है, जन्म से जीवित है पृथ्वी, अयस्क वर्णमाला, और 'शहद लिपि' जैसे संग्रहों के इस कवि ने पंत के बाद फिर उस कुदरत की छाया में शरण ली है, जो यह जानता है जो कुछ है इसी मिट्टी की काया में है, इसी जल में, इसी अयस्क, इसी पंचतत्व में है. इसी पर बैठ कर कबीर ने चदरिया बुनी, भाषा की चदरिया भी. भाषा के साथ कविता के रिश्ते को इस कवि से ज्या‍दा भला कौन जानता होगा जो यह कहता है- भाषा के साथ कविता की लंबी जुगलबंदी है/ इसीलिए भाषा को ठस होठ छूने से कविता को लगती है ठेस. यह कवि पत्थर में भी रस उपजाने वाला, पानी को भी अपने नैरेटिव से पानी-पानी कर देने वाला, वर्णमाला में अयस्क सा लौहतत्व आयत्त करने वाला, देशज मूछों और गँवई गांव का सा नागरिक लगने वाला कवि है, जो अपनी ही धुन में लिखता है, अपनी ही रौ में बोलता है और कुदरत और अपने मन के सिवा किसी की नहीं सुनता. अनुभूति की शुद्धता में यह कवि शमशेर का वंशज और कुदरत के साहचर्य में पंत का सा सौंदर्यद्रष्टा है. विन्ध्‍य-अंचल के इस सांवले कवि में अर्थ का अनन्य सलोनापन भरा है.

रीवा, मध्यप्रदेश के गांव गौरी सुकुलान में 16 मार्च, 1967 को जन्मे प्रेमशंकर शुक्ल  अपने मिजाज से ही प्रकृति प्रेमी हैं. आज से कोई 34 साल पहले भारत भवन से जुड़े प्रेमशंकर शुक्ल आज मुख्य प्रशासनिक अधिकारी के पद पर विराजमान हैं तथा बहुकला केंद्र भारत भवन की आलोचना पत्रिका 'पूर्वग्रह' के संपादक हैं. अब तक रज़ा पुरस्कार, दुष्यंत कुमार स्मृति सम्मान, नवीन सागर सम्मान, अभिनव शब्दशिल्पी सम्मान, स्पंदन कृति सम्मान, रंगकृति सम्मान आदि अनेक पुरस्कारों से विभूषित प्रेमशंकर का आदि प्रेम कविता से है. वे समकालीनता की रूढ़ मिजाज वाली कविताओं से अलग शुरू से ही कुदरत के रंगों को बीनते बटोरते आए हैं. रीवा से भोपाल आ बसे इस कवि का पहला लगाव भोपाल का ताल रहा है, जिसके पानी में उसने कविता की अनेक छवियां देखी और रचीं. पानी के अतल में तलस्पर्शी काव्य बिम्बों को निहार कर सुख पाने वाले इस कवि का दूसरा प्रेम भीमबैठका के पत्थ‍र रहे हैं. भीमबैठका का परिदृश्य‍ ही कुछ ऐसा है कि कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है. पृथ्वी और पारिस्थितिकी से लगाव ही रहा कि 'पृथ्वी पानी का देश है' के बाद 'जन्म से ही जीवित है पृथ्वी' के साथ वे पुन: पृथ्वी  की ओर लौटे और कविता में कुदरत के नवाचार को नए ढंग से देखा परखा.
***

अपनी कविता के एकांत में
यह कवि एकांतजीवी सा लगता है. जिसने कभी अपने होने की दुंदुभि न मचाई. जो कविवर कुंवरनारायण के इस कौल पर कायम हो कि ख्याति खुशबू की तरह फैले, दुंदुभि की तरह न बजे- उस कवि के बारे में क्या कहा जाए. वह हिंदी का खास तौर पर आज के दौर का एकमात्र ऐसा कवि है जो कभी झील, कभी पानी, कभी पृथ्वी, कभी नाव, कभी पत्थरों, कभी इतिहास, कभी अतीत, कभी निरभ्र आकाश, कभी सृष्टि की अनंतता से ऐसे संवाद करता है जैसे वह इनका कोई प्रवक्ता हो, हितुआ हो. एक साहित्यिक प्रवास में दक्षिण अफ्रीका में इस कवि से मुलाकात न होती तो मनुष्यता की इस कोमल प्रजाति से कितना अनभिज्ञ रहता. तमाम कोमल तंतुओं और संवेदन के झीने-झीने स्पंदनों को अपने जीवन के जागतिक अनुभवों में समेटता हुआ यह कवि प्रथमद्रष्ट्या, यही लगता है कि वर्तमान से पीठ फेरे हुए है पर उसमें उस कवि से कम चिंता नहीं है, जिसने कहा है बचाना है नदियों को नाला हो जाने से. जो जानता है- लिखना सांस लेना है हवा को जीवित रखने के लिए. जिसकी कविता की बिम्बों की विंध्‍याटवी में प्रवेश सुगम नहीं .

कवि अपने पूर्वज कवियों की कोख से जन्म लेता है- ऐसा कहा गया है. प्रेमशंकर शुक्ल कवि परंपरा से प्रतिकृत लगते हैं तभी वे चाहते हैं कि किसी भी कवि में उसका भूगोल, उसका देश, उसका समय बोलना चाहिए. अपनी परंपरा को अपने भीतर आत्मसात करने वाला यह कवि 'भीमबैठका एकांत की कविता है' में कहता है-

मेरी देह में
पूर्वजों की नसें फैली हुई हैं
मैं अपने दौड़ते रक्त में
आदि पुरखों का चलना सुन रहा हूं (छुवन)

यह भी कि
मेरी सांसों में जो हवा है
वह धरती के पहले मुनष्य  के
फेफड़े से चल कर आई है. (सांस)

आखिर अपने समय के वर्तमान को अनदेखा किए इस कवि से पूछना चाहता हूँ कि वह ऐसा क्यों करता है तो जैसे इस बात का उत्तर उसकी एक कविता ही दे देती है-
घड़ी में समय बज रहा है
बस, संगीत नहीं है
नदियों में पानी है
बस स्वच्छ तल बहाव नहीं है
घर है
आसपास भी घर ही घर है
बस अपनत्व का बसाव नहीं है
आकुल व्याकुल भीमबैठका आया
पत्थरों ने रंग दे दिया है
कविता की जुबान में
उतार रहा हूँ वही रंग
संग में दर्द चल रहा है (वही रंग)
***

कुदरत से लगाव
हमारे आदि कवियों में प्रकृति के प्रति पंचतत्वों के प्रति कृतज्ञता का बोध रहा है. तभी तो वैदिक ऋचाओं में आदि कविता समाई हुई है. वे ऐसी ही इटर्नल फीलिंग यानी शाश्वत अनुभूति के कवि हैं. कभी आलोचक विजय कुमार ने कवियों के 'नए पते ठिकाने' शीर्षक से एक पुस्तक लिखी थी. प्रेमशंकर शुक्ल की कविताएं कविता का नया ठीहा है. एक नया पता है. वे कविताएं नहीं, लैंड स्केप बनाते हैं. वे जलतंरगों में जीवन की तरंग देखते हैं. कभी मैंने बाबुषा कोहली की कविताओं के बारे में कहा था, कि उसकी कविताएं पढ़ते हुए लगता है, किसी शहनाईनवाज की महफिल से उठ कर आया हूँ, वैसे ही उनकी कविताएं पढ़ते हुए लगता है जैसे किसी ललित कला की दीर्घा से होकर लौटा हूं -इतना धीर, इतना ललित, इतना प्रशांत आज का कवि कैसे हो सकता है? वे भीमबैठका के रंगों दृश्यों उसकी नीरवता उसके स्थापत्य, उसके भूगोल, उसकी स्थानीयता, उसकी संगत, उसके उजाले, उसके उजास और चट्टानों में उकेरी स्नेहिल आकृतियों को अपनी कविताओं में सहेजते हैं पर यह कहना नहीं भूलते कि अपनी ही बोली बानी से ही बसता है कविता का घर.

'जन्म से जीवित है पृथ्वी' की कविताएं उनकी इस काव्यकला का परिचायक हैं. कला अनुशासनों पर केंद्रित कविताओं का इतना वृहद संग्रह शायद हिंदी कविता में कोई दूसरा न हो. उसकी इन कविताओं के पीछे कलाओं के घर भारत भवन में उसकी सतत उपस्थिति बहुत मायने रखती है. इस कवि की दिनचर्या का एक बड़ा हिस्सा प्रशासन की पेचीदगियों से मुक्त होकर कला संगीत की सभाओं में गुजरता है. जिस भारत भवन की सभाओं में देश दुनिया के बड़े से बड़े कलाकारों, संगीतकारों, रंगकर्मियों, कवियों, लेखकों, वैयाकरणों की आवाजाही लगी रहती हो, वहां इस कवि का जागतिक व्यास्तताओं से समय चुराकर ऐसी कलाओं की सन्निधि में समय गुजारना उस सुर वैविध्य के आलाप में खो जाना होता है जहां से कविता के प्रत्यय पराग की तरह उसकी चेतना में झरते हैं. वह इस पराग को सहेजता है. अपने स्मृतिकोश में सहेजता है और कालांतर पर इन्हें वह ऐसे काव्यांतरित करता है जैसे वे कवि के लिए आवश्यक उपादान हों. यों तो कहने वाले यह भी कह सकते हैं कि यह कैसा कवि है जो अपने समय के ज्वलंत सवालों से मुंह फेरे कलाओं और सृष्टि के सौंदर्य और अनहद में खोया हुआ दिखता है. पर रह रह कर उसकी निर्मल कवि चेतना में जो कौंधता है वह उसके कवि को कलाओं का साझीदार बना देता है. इन कलाओं की अंतर्दृष्टि से ही वह सृष्टि के स्थापत्या को देखता समझता है.

प्रेमशंकर शुक्ल कहते हैं, ''बहुत भाषा लगाना उचित नहीं है कविता में. अर्थ से अधिक अभिप्राय में खुलता है कविता का मन.'' कविता अर्थ से ज्यादा अपने अभिप्रायों में निवास करती है. आज की स्फीति के दौर में कवियों के लिए यह सीख है तथा अपने लिए भी एक कसौटी एक मार्कर. एक लक्ष्मण रेखा जो कवि खुद ही अपने लिए खींचता है. कविता में मुड़ कर देखना समक्ष प्रेक्षण से ज्यादा जरूरी है. वही नहीं जो देख रहे हो. वह भी जिसे देख आए हो छोड़ आए हो उसे भी कविता में मुड मुड कर देखना होता है. कवि कहता है:
जब कविता से बाहर आओ
तब एक बार पीछे मुड़ कर उसकी तरफ देखो जरूर
कविता के मन का बोझ कम होता है इससे
और वह सही वजन की कविता है
बनता है इस पर कविता का विश्वास. (अपील, पृष्ठ 74)

एक बड़े कवि ने जब यह कहा कि जिस तरह हम देखते हैं उस तरह तू लिख. तो वे आजमाई हुई बरती हुई भाषा में कहने की बात कर रहे थे. हम वह लिखें जो हमारी कमाई हुई भाषा हो. यह नहीं कि हम वैसा लिखे जैसे ताद्युष रोजेविच लिखते हैं, जार्ज सेफरीज लिखते हैं, मोंताले लिखते हैं या नेरूदा. हमारी कविता अरसे से इसी आकर्षण और अनुसरण में अनूदित कविता की सहयात्री हुई जा रही है. सब कुछ एक से सांचे में निबद्ध हो रहा है. कवि अपनी शैली से विरत हो रहा है. वह पराई भाषा पराये सांचे का अनुसरण कर रहा है. कवि प्रेमशंकर यहां एक अनुशासन सौंपते हैं कवियों के लिए-
कविता तत्सम में बोलती
और मैं तदभव में सुनता
खेती-किसानी का आदमी
तत्सम को तद्भव में रुपांतरित कर लेना
आया है पीढ़ियों से मेरे भीतर (तद्भव-तत्सम )
वह कविता खोजते हुए लोक रस में पगी उन स्त्रियों तक पहुंचता है जिन्होंने गाते-गाते गीतों में अपना मन रख दिया. अभी भी लोकराग का कोई तोड़ नहीं है. उसका देशज पाठ कितना तांबई कितना धात्विक और अनगढ़ होता है. बिना भाषाई पालिश में चित्त के सारे सर्गों को खोल कर हमारे समक्ष रखता हुआ. यह बात कवि को अविस्मरणीय लगती है तभी तो वह इसे नोट करता है --
गाते-गाते उसने अपना मन
एक गीत में रख दिया
और भूली रही वह बहुत दिन
अचानक उसे अपने मन की जरूरत पड़ी
लेकिन बिसर गयी कि कहां रख दिया है अपना मन
....
झूमती बारिश में अचानक उसके कंठ में
उठा वही गीत
तब जाकर पाया उसने गीत में अपना मन (अपना मन)
***

अपनी शैली अपना शिल्‍प
कवि अपने शब्द अपनी शैली अपनी पदचाप अपने प्रयोगों अपनी कवि मुद्राओं अपने अनुभवों अपनी संवेदनात्मक मौलिकताओं के लिए जाना जाता है. और जब तक वह अपने पैरों पर अपनी शैली पर अपनी नींव पर खड़ा नहीं होता, उसका वुजूद भी पहचान के लिए संघर्षरत रहता है. इस मामले में प्रेमशंकर ने कविता के ढांचे को शुरु से ही इस तरह रखा कि वह किसी समकालीन का बगलगीर न लगे; किसी की छाया से संवलित न हो; किसी की आंख से देखा न गया है न किसी संवेदना में सहेजा गया हो; वह खालिस उनका अपना हो और यह भान उन्हें खुद भी है वे जिस शिल्प में लिखते हैं वह उनकी ईजाद है. इस बारे मे उनकी यह कविता ही उनके कवि होने की कसौटी है.

अपनी आवाज के शिल्प में लिखता हूँ

लिख-लिख कर काटता हूँ
अपनी आवाज़ से
अपनी ही आवाज़
.....
देखते हुए दुनियादारी
सुनते हुए सबकी
गुनते हुए अपने वक्ता का चाल चलन
मैं अपनी आवाज़ के ही
असर में हूँ (अपनी आवाज़ )

'अयस्क वर्णमाला' उनके काव्यानुभवों का परिपक्व उदाहरण है. यह उसके अनुभवों का अयस्क  है. चाकचिक्य‍ का इस्‍पात नहीं. यहां कविताओं में उसके अनुछुए प्रेक्षण मिलते हैं. जैसे 'रोटी एक फूल है' लंबी कविता देखें- इतने विस्तार से रोटी के बारे में हिंदी में कविता नहीं मिलेगी. वह कहता है- रोटी एक फूल है जिसे आग में फूलना होता है, बिना जले बचाते हुए अपनी गंध. इस लंबी कविता में अनेक उतार-चढ़ाव हैं, अनेक मोड़ और पड़ाव हैं, एक जगह ऐसी करुणा है कि बिना कहे रहा नहीं जाता-
आज भी मेरी भाषा की बोलती बंद हो जाती है
याद कर यह दृश्य कि-
मॉ कैसे हम भाई बहनों को सारी रोटी परोस
पानी पीकर सुला देती थी अपनी भूख
और किसी गीत की मीठी लय से बांधे रखती थी
हम सभी का मन (अयस्क वर्णमाला, पृष्ठ 23)
***

प्रेम कविताओं की शहद लिपि
इधर प्रेम कविताओं का पाट बहुत प्रशस्त हुआ है. जिसे देखो वही प्रेम कविता लिख रहा है. पर मेरे देखे कविवर ज्ञानेंद्रपति की प्रेम कविताओं का संकलन 'मनु को बनाती मनई' के बाद प्रेमशंकर शुक्ल का ही संग्रह ऐसा देखने में आया है जो प्रेम कविताओं को किसी उच्छ्वास में विलीन नहीं हो जाने देता बल्कि प्रेम कविता को 'शहद लिपि' कहते हुए प्रेम की मिठास को ऐंद्रिय मिठास से तुलनीय मानता है. अरुण कमल जी ठीक कहते हैं कि प्रेमशंकर शुक्ल ने अपनी देह और आत्मा के अमरकोषों से यह जीवन घर बनाया है, जहां प्रेम की मधुमक्खियों ने बहुवर्णी व बहुगंधी पुष्पों से रस सिंचित कर विपुल शहद कोष निर्मित किया है. वे कहते हैं, आत्मा के कपास से बुनी ये कविताएं अत्यंत सांद्र व ऐंद्रिक हैं. प्रेम कविताएं लिखनी आसान नहीं है. कवि कहता है--
प्यार के इज़हार में
कविता के माथे पर हर बार पसीना आया है
पन्नों में शब्द. लाखों बरिस इसीलिए नहीं मरते
कि उनमें प्यार है.

प्यार जिससे मन पूर जाय
कविता पा जाए अपने सारे रंग. (प्यार अपरंपार, शहद लिपि, पृष्ठ 33 )

किसी कविता में कुंवर जी ने यह कल्पना की है कि 'उस वक्त आना ऐसे कि लगे/ किसी ने द्वार खटखटाया/ कोई न हो/ पर लगे कि कोई आया इतना आत्मीय इतना अशरीर/ जैसे हवा का झोंका और मुझमें समाकर निकल जाना/ जैसे निकल गई एक पूरी उम्र.' इस भाव को इसके विपरीत विन्यस्त करते हुए प्रेमशंकर लिखते हैं-
आओ जैसे फूल में आती है सुगंध
धूप में आंच
आओ और मेरी उम्र में रच जाओ
प्यार की मेंहदी की तरह
चुप के साथ जैसे बानी रहती है (कहने के लिए दरद)
रहो मेरे साथ
आओ लेकिन जाओ नहीं कभी
छूटे ही नहीं कैसे भी हमारी सांस की गॉंठ. (शहद लिपि, पृष्ठ  229)

कविता क्या है, हर समय हर कवि के लिए यह सवाल मौजूँ रहा है. हर कवि ने इसे अपने तौर पर देखा बरता और इस समस्‍या को सुलझाया है. प्रेमशंकर शुक्ल की कविताएं समग्रत: कहा जाए तो शहद की ही लिपियां हैं. सृष्टि के मूल को प्रेम से बांधने की कला सिखाती हुई. भोपाल के कलामय वातावरण में और भोपाल के ताल के किनारे कुदरत के साथ संवाद करते हुए कोई भगवत रावत बन जाता है, कोई अशोक वाजपेयी और कोई प्रेमशंकर शुक्ल. भीतर-भीतर ही कोई परंपरा का धागा एक-दूसरे को जोड़े रहता है. न केवल भारत भवन की बहुआयामी गतिविधियों को आज वे बखूबी अंजाम दे रहे हैं बल्कि अपने भीतर कविता, कला, संगीत और रंगमंच की खूबियों को समेटे प्रेमशंकर शुक्ल एक ऐसी कविता यात्रा पर हैं जो कभी खत्म नहीं होती. इस कवि के लिए अज्ञेय की यह पंक्ति सटीक नजर आती है --वह गाता है अनघ सनातनजयी.

# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं तथा शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं . वे हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली 110059, फोन 9810042770, मेल dromnishchal@gmail.com

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