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रामदरश मिश्र: दो-दो सरस्वतियों के साधक का तीर्थतुल्य‍ मान

रामदरश मिश्र को ईश्वर ने न केवल लंबा जीवन दिया है बल्कि उन्होंने इस जीवन का बेहतरीन सदुपयोग रचना में किया है. उनके कृतित्व और व्यक्तित्व पर एक नज़र

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प्रोफेसर रामदरश मिश्रः सृजनात्मकता से भरा सादगीपूर्ण जीवन प्रोफेसर रामदरश मिश्रः सृजनात्मकता से भरा सादगीपूर्ण जीवन

यह संयोग भर नहीं है कि के के बिड़ला फाउंडेशन द्वारा भारतीय भाषाओं के लिए दिया जाने वाला 2021 का सरस्वती सम्मान हिंदी के जाने-माने कवि, कथाकार, उपन्यासकार, गद्यकार, आलोचक प्रो रामदरश मिश्र को उनकी काव्य कृति 'मैं तो यहां हूं' पर देने की घोषणा की है. मिश्र गए सात दशकों से भी अधिक समय से साहित्य की सारस्वत साधना में लगे हुए हैं, जिनकी हर रचना की पहली पाठिका उनकी सहधर्मिणी सरस्वती होती हैं. अब जब उम्र 98 की उम्र में उनकी झोली में साहित्य के सर्वोच्च पुरस्कारों में से एक 'सरस्वती सम्मान' आ गिरा है, तब दो-दो सरस्वतियों के इस साधक के कर्मठ, कृतित्व भरे जीवन पर बात करना जरूरी है. याद रहे 1991 में स्थापित सरस्वती सम्मान की इस प्रतिष्ठित कड़ी में हरिवंश राय बच्चन और गोविंद मिश्र के बाद मिश्र केवल तीसरे साहित्यकार हैं. गए सालों में पुरस्का‍र को लेकर जो दुरभिसंधियां और मुहिम रची जाती रही हैं, उसके कारण कई योग्य साहित्यकार प्रतिष्ठित पुरस्कारों से वंचित रहे और एक या एकाधिक कृतियां लिखने वाले पुरस्कार ले जाते रहे. यह और बात है कि दुनिया भर की भाषाओं में अनेक साहित्यकार ऐसे हुए हैं जिन्होंने जीवन की एक तिहाई उम्र में ही अपना सर्वश्रेष्ठ रच दिया, जिसका लोहा आज पूरी दुनिया मानती है किन्तु साहित्य साधना एक लंबा जीवन मांगती है और रामदरश मिश्र ने पूरी एक सदी के बड़े हिस्से का जीवन साहित्य संसार को दिया है. 

दिनचर्या में कवित्व 
रामदरश मिश्र को ईश्वर ने न केवल लंबा जीवन दिया है बल्कि उन्होंने इस जीवन का बेहतरीन सदुपयोग रचना में किया. 'पथ के गीत' से आरंभ कर उन्होंने अपने जीवन के बेहतरीन गीत लिखे तो 'पानी के प्राचीर', 'जल टूटता हुआ', 'सूखता हुआ तालाब', 'अपने लोग', 'रात का सफर', 'आकाश की छत', 'आदिम राग', 'बिना दरवाजे का मकान', 'दूसरा घर' जैसे नामचीन उपन्यास लिखे और अपनी किस्सागोई से पाठकों को वशीभूत किया. सैकड़ों कहानियों के रचयिता रामदरश मिश्र ने इस बीच ग़ज़लें भी आजमाईं और कई संग्रह गजलों के भी आए. कविता का तो कहना ही क्या. गीत की राह बीच में ही कहीं छूट गयी पर लय और रिद्म का साथ नहीं छूटा. जब भी मन करता वे गीत और ग़ज़लें लिखते रहे. आज भी लिखते रहते हैं और मिलने पर सुनाते भी हैं. गद्य की अन्य विधाओं संस्मरण, आत्मकथा, डायरी, ललित निबंध हर विधा में उनकी दशाधिक पुस्तकें और अनेक चयन संचयन आ चुके हैं. उनका जीवन गए सात दशकों से जैसे रचना को जीता रहा है. किसी उठापटक में पड़े बिना उनकी साहित्य साधना किसी एकाग्रचित्त साधक की साधना जैसी लगती है. 
जहां तक पुरस्कारों का ताल्लुक है, उन्हें दयावती मोदी सम्मान, भारत भारती सम्मा‍न, हिंदी अकादमी शलाका सम्मान, व्यास सम्मान और हिंदी संस्थान के अनेक कृति-आधारित पुरस्कारों सहित साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिल चुका है तथा अब वे सरस्वती सम्मान से समादृत होने जा रहे हैं, यह हिंदी समाज के लिए गौरव की बात है. वे अपनी लंबी साहित्य साधना के कारण भारतीय ज्ञानपीठ की विचारणीय सूची में भी हैं. लेकिन विडंबना यह रही कि कथा क्षेत्र में जहां उनके कई उपन्यासों ने प्रतिमान रचने वाली अंतर्वस्तु दी, और जो बड़े पुरस्कार उन्हें जीवन के मध्य में ही मिल जाने चाहिए थे, वे उन्हें जीवन के नवें दशक में मिले. संयोग यह भी कि प्रभूत औपन्यासिक संसार के बावजूद उन्हें दोनों सर्वोच्च पुरस्कार- साहित्य अकादेमी और सरस्‍वती सम्मान कविता संग्रहों पर मिले हैं. शायद सम्मान में यह देरी उनके कवि मन को कचोटती रही हो तभी तो उन्होंने अपनी एक ग़ज़ल में मस्ती से स्वीकार भी किया- ''जहां आप पहुंचे छलॉंगे लगा कर/ वहां मैं भी पहुंचा मगर धीरे धीरे.''  यह ग़ज़ल उनके जीवन स्वभाव का आईना भी है. यह आत्मस्वीकार का परिचायक भी है. 
पुरस्कार से बेपरवाह
पुरस्कार के इतने प्रसंग हैं कि उनकी चर्चा की जाए तो पुरस्कारों से विरक्ति हो जाए. जोड़-तोड़ के इस संसार से कोई बच न सका. जो तटस्थ रहे उन्हें वर्षों प्रतीक्षाएं करनी पड़ीं या किसी नगण्य सी कृति पर पुरस्कार पा कर संतोष करना पड़ा. कवियों के अपने आत्मसंघर्ष होते हैं. आज तो बड़ी नौकरियों वाले अनेक लोग बड़े कवि हैं. जीवन और जीविका का कोई संकट नहीं है उनके पास. किन्तु आज ऐसी भी अच्छी खासी संख्या है लेखकों की जिन्हें न उचित रायल्टी मिलती है न वाजिब पुरस्का‍र, न उनके रचनात्मक श्रम का उचित प्रतिफल. रामदरश मिश्र का भी अपने जीवन में खासा संघर्ष रहा है. वे अपनी डायरी 'मेरा कमरा' में लिखते हैं कि गांव से लेकर दिल्ली आने तक न जाने कितने कमरों में रहा. ऐसे ही पराये घरों और कमरों में उन्होंने सृजन के सपने देखे, रचनाएं लिखीं और लोगों से सुख दुख का रिश्ता कायम किया. उन्हें पुरस्कार मिलें न मिलें इसकी कभी परवाह नहीं की. बस लिखते जाना ही एक मात्र ध्येय रहा. 
जीवन और साहित्य की राह
1924 में गोरखपुर के डुमरी गांव में जन्मे. रामदरश मिश्र 1947 में मैट्रिक के लिए वाराणसी आए. यहां बीएचयू के छात्र बने. छात्रावास में रहे. साहित्यिक गहमा गहमी के दिनों को वे आज भी याद करते हैं जहां शंभुनाथ सिंह, ठाकुरप्रसाद सिंह, नामवर सिंह, बच्चन सिंह, शिवप्रसाद सिंह, त्रिलोचन जैसे कवियों लेखकों का एक सुपरिचित समवाय था. पीएचडी करते हुए आर्थिक संकट भी झेला, भाई रामअवध मिश्र नौकरी से अलग हो चुके थे सो उन पर भार क्या बनना. स्वावलंबन की राह अपनाते हुए वे वहां एक सस्‍ते किराये के मकान में रहे. प्रत्याशा तो बीएचयू में ही नौकरी करने की रही पर बनारस तो प्रतिभाओं को नकारने वाला शहर रहा है. अनेक प्रतिभा पुत्रों को बनारस से बाहर जाना पड़ा, नामवर सिंह, ठाकुरप्रसाद सिंह और बाद में हजारी प्रसाद द्विवेदी तक को. लिहाजा, नौकरी के निमित्त उन्हें  बनारस छोड़ कर बिराने शहरों बड़ौदा, अहमदाबाद, और नवसारी आदि की शरण लेनी पड़ी. किन्तु गुजरात में उन्‍होंने एक अपनी ही दुनिया बना ली. अनेक मित्रों के साथ कविवर रघुवीर चौधरी का संग साथ उनके जीवन की एक सुखद उपलब्धि रही. गुजरात रहते हुए उपन्यास 'पानी के प्राचीर' छप चुका था, 'जल टूटता हुआ' लिखा जा रहा था तथा वे कथायात्रा में निरंतर डूबते जा रहे थे. साथ ही, कविता भी साथ न छोड़ती थी. गीतों के बाद आया संग्रह 'बैंरंग बेनाम चिट्ठियां' नई कविता के क्षेत्र में उन्हें स्थापित करने के लिए पर्याप्त था. तब से यह यात्रा अनवरत चल रही है. 
1964 में वे दिल्ली आए तो यहीं के होकर रह गए. मॉडल टाउन तब अनेक लेखकों- का अड्डा था. वहीं रिहाइश रखते हुए रामदरश मिश्र धीरे-धीरे दिल्ली के साहित्य समाज के केंद्र में आते गए और राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें पहचान मिलने लगी. मॉडल टाउन रहते हुए उन्होंने 'जल टूटता हुआ', 'पक गई है धूप', 'खाली घर', 'फिर वही लोग', 'समय देवता' आदि रचनाएं पूरी कीं. यहीं रहते हुए 'सूखता हुआ तालाब', 'अपने लोग', 'रात का सफर' और 'आकाश की छत' जैसे बड़े उपन्यास लिखे गए और अनेक समीक्षा ग्रंथ प्रकाशित हुए. 1980 में वे दिल्ली के पश्चिमी इलाके की कालोनी उत्तम नगर में आ गए, जहां उनकी सर्जनात्मकता को पंख लग गए. हर साल कविता कहानी, उपन्यास, संस्मरण, आत्मकथा इत्यादि विधाओं में रचनाएं आती रहीं. दसियों उपन्यास यहीं लिेखे गए. सुख-दुख के अनेक प्रसंग आते और जाते रहे. हेमंत जैसे बड़े कलाकार पुत्र का असमय अवसान भी उन्हें देखना पड़ा जिसे उन्होंने अपने एक उपन्यास 'एक था कलाकार' में याद किया तो अपनी पत्नी सरस्व‍ती पर 'एक बचपन यह भी' लिख कर जैसे पत्नी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की. 
कवि लेखक तो प्राय: सरस्वती के साधक होते ही हैं. जब तक सरस्वती सिद्ध न हों, कोई बड़ा लेखक नहीं बनता यह धारणा आज भी पुरानी नहीं पड़ी है. किन्तु रामदरश मिश्र तो बीए करते हुए ही सरस्वती-साधक बन चुके थे. उनका सरस्वती जी से ब्याह हो चुका था. बड़े से बड़ा कौन सा लेखक ऐसा है जिसने सरस्वती जी का आतिथ्य न ग्रहण किया होगा. आज भी आतिथ्य परायण सरस्वती जी रामदरश मिश्र से मिलने आए लेखकों-कवियों का पूरा ख्याल रखती हैं तथा कवि की शाश्वत सहचरी होने का बोध कराती हैं. अब जब इस परिपक्ववय में मिश्र को सरस्वती सम्मान भी मिल रहा है, मैं पीछे कह ही चुका हूं कि वे दो-दो सरस्वतियों के साधक बन चुके हैं और उनका घर तीर्थतुल्य‍ आकर्षण में बदल चुका है. अतीत में केदारनाथ अग्रवाल के दाम्पत्य प्रेम से भीगी कविताओं की चर्चा होती रही है. उन्होंने 'हे मेरी तुम' और 'मार प्‍यार की थापें' जैसी अनेक कविताएं पत्नी पर लिख कर शोहरत पाई है. रामदरश मिश्र ने यों तो स्त्री रूप में अनेक कविताओं में पत्नी सरस्वती की छवि को रचा है पर एक बचपन यह भी में उन्होंने उनकी जीवन यात्रा को बखूबी समेटा है. इस उपन्यास के समर्पण में ही उन्होंने लिख दिया है कि 'सरस्वतीजी को, जिनकी छवि चेतना में व्याप्त है.'  इस उपन्यास की नायिका चेतना में पत्नी सरस्व‍ती के जीवन की आभा है तो प्रसून में स्वयं रामदरश मिश्र की छवि.  इस तरह उत्तर जीवन की यह कृतज्ञता दाम्पत्य के गुर भी सिखाती है. 
कवि-मन की उड़ान
रामदरश मिश्र एक सिद्ध कवि हैं. उनके गीतों का चुंबकीय आकर्षण भला किससे छिपा है. 'धरती' (त्रिलोचन) और 'पथ के गीत' (रामदरश मिश्र) की कविताएं लगभग एक धुरी पर एक से  कवि मन की उपज लगती हैं तो यह उनका गंवई जीवन से सान्निध्य का ही प्रतिफल है. वे प्रकृति को आज भी अपने भीतर बसाए हुए होते हैं. उसकी स्मृतियों मे खोए से रहते हैं. यही वजह है कि उनकी कविताओं में मौसम को लेकर कितनी ही कविताएं मिलेंगी. पेड़ों, वनस्‍पतियों, जीव-जंतुओं, किसानी जीवन से लेकर मानवीय संवेदना का हर पहलू उनकी कविताओं में प्रकट हुआ है. अब तक दो दर्जन से ज्यादा संग्रहों के कवि रामदरश मिश्र ने कविताओं में बेबाकी से अपनी व्यंजना की ताकत का परिचय तो दिया ही है, संवेदना की एक तार वाली चासनी भी परोसा है.  
मैं तो यहां हूं: पुरस्कृत काव्य-कृति
'मैं तो यहां हूं' ही वह कृति है जिस पर सरस्वती सम्मान घोषित हुआ है. कवि की लाड़ली कृतियां तो सभी होती हैं पर जो पुरस्कृत हो जाए उस पर उसके साथ पूरी दुनिया की निगाह पड़ती है. नई कविता का मुहावरा तो रामदरश मिश्र ने 'बैरंग बेनाम चिट्ठियां' में ही पा लिया था तथापि उसके बाद आए  'पक गई है धूप', 'दिन एक नदी बन गया', 'जूलूस कहां जा रहा है', 'आग कुछ नहीं बोलती', 'बारिश में भीगते बच्चे', 'आम के पत्ते', 'रात सपने में' आदि संग्रहों में एक से बढ़ कर एक कविताएं हैं. विचार कविता और लंबी कविता का आंदोलन चला तो रामदरश मिश्र उसके सहभागी भी रहे तथा उस दौर में  अनेक लंबी कविताएं भी लिखीं. समांतर कहानी, सचेतन कहानी आदि के आंदोलन चले तो उसमें भी शामिल रहे किन्तु आंदोलन तो आते-जाते रहते हैं. भले ही वे अज्ञेय की सप्तक श्रृंखला के कवि नहीं रहे, किसी संगठन के कवि विशेष नहीं रहे, किन्तु उनकी कविताओं की आंच धीरे-धीरे लोगों की चेतना पर पड़ती रही है. यह भी संयोग है कि व्यास सम्मान, साहित्य अकादेमी सम्मान और सरस्वती सम्मान सभी कविता संग्रहों पर ही दिए गए हैं. इसका अर्थ है कि रामदरश मिश्र का काव्यावदान अपने कवि समय का प्रतिनिधित्व करता है. 
चौहत्तर कविताओं का यह संग्रह इंद्रप्रस्थ प्रकाशन से 2015 में प्रकाशित हुआ था. इस साल पंद्रह अगस्त को वे इक्यानवे वर्ष के होने वाले थे. वय की थकान और रचना के उद्वेगों को देखते हुए उन्होंने एक कविता ही लिख दी जिसमें कहा कि-  
मन कहता है अभी जवां सा ये चहिए औ वो चहिए
तन कहता है बहुत पा चुके अब तो चुप बैठे रहिए. 
पर वे जानते हैं कि चुप होकर बैठने वाले लेखक वे नहीं है. साहित्य का एक युग जिया है उन्होंने. हिंदी जगत के जाने माने हस्ताक्षर हैं वे. इस संग्रह में उन्होंने स्वीकार किया कि कविता का बंद द्वार जब खुलता है तो खुलता ही चला जाता है और भीतर से एक के बाद एक कविता निकलती जाती है. दूसरे यह कि कविता में केवल सजीव संसार की उपस्थिति नहीं है, अनेक निर्जीव तत्व कवि चिंतन से संपृक्‍त होकर एक नया अर्थ पा जाते हैं और एक नई प्रतीति से भर देते हैं. यह आज की कविता का स्वभाव भी है. न केवल रामदरश मिश्र बल्कि अनेक समकालीनों में निर्जीवता में सजीवता का अहसास कराने वाली कविताएं लिखी हैं. 
इस संग्रह की पहली ही कविता ईश्वर पर है जिसकी अंतिम पंक्ति है- 'वे ईश्वर को ईश्वर से मार कर ईश्वर को प्यार करते हैं.' यह आज के धार्मिक उन्माद और उससे मनुष्यता पर हो रहे प्रहार की  वह कचोट है जो कवि महूसस करता है. अपनी ही कालोनी वाणी विहार जिसे उनके ही एक अध्यापक मित्र ने बसाया, अध्यापकों को प्लाट दिलवाये तथा ऐसी कालोनी को वाणी के वरद पुत्रों के नाम पर वाणी विहार का नाम दिया. पर धीरे-धीरे वहां बाजार हावी होता गया और देखते-देखते वह वणिक पुत्रों की कालोनी बनती गयी. यह कचोट वाणी विहार शीर्षक कविता में व्यक्त हुई है. 
लेखकों को महान घोषित करने की कवायद आए दिन चलती ही रहती है. इसी महानता के दंभ में हिंदी ने अपना विपुल पाठक संसार गंवा दिया और कवि-जगत पुरस्कार पोषित होने का सपना ही देखता रह गया. कवि रचनाजीवी न बन कर पुरस्कारजीवी बनता गया तो रचना उसके हाथ से छूटती गयी. शिखर से शिखर तक -ऐसी ही व्‍यंग्‍यात्‍मक रचना है जहां एक लेखक को एक दूसरे लेखक द्वारा महान कहते देख कवि को लौरिक की कुदान याद आती है जो इस खंभे से उस खंभे तक कूदता था हाथ में दूध की बाल्टी लिए हुए. ऐसे लेखक केवल शिखर से शिखर तक की ही यात्रा करते हैं. जबकि सामान्य लेखक लगातार लिखता रहता है बिना किसी शिखर को छूने या रचने की प्रत्याशा लिए हुए. दिल्ली में गांव को याद करते हुए ऐसी ही एक कविता में कवि सोचता है कि वह तो आज भी दिल्ली में बैठे हुए गांव को अपनी रचनाओं में सहेजता हुआ जहां कहा तहां खड़ा है जबकि कुछ लोग महानगरी फार्मूलों के सहारे अंतरराष्ट्रीय हो गए. 
रामदरश मिश्र अपने पूरे काव्य में सांस्कृतिक आभा के कवि हैं. उनकी कविताओं में भारतीय जन जीवन की छवियां मिलती हैं. गांव को जीता हुआ एक जिद्दी कवि मिलता है. राजनीति से उसका वास्ता वैसा नहीं जैसा रघुवीर सहाय या सर्वेश्‍वर या बाद के धूमिल जैसे कवियों का रहा है पर वह दलों की दलीय राजनीति और तूतू मैंमैं वाली कुरूपताओं को शुभ नहीं मानता. केवल गर्जन तर्जन रह गया है अब राजनीतिक दलों के बीच. जन सेवा निहित स्वार्थों के बीच उद्देश्यहीन हो चुकी है. सही रास्ता भी उन लोगों पर तंज है जो अपने हिंतों के लिए किसी का भी दामन थाम लेते हैं. वह महानता के मिथक की वास्तविकता से भी परिचित है तभी इस पर 'अंगीठी' कविता लिख कर अपने भीतर के अपनत्व की आंच से सहबद्ध करता रहा. कविता देखें-
वह सोचता है कि 
अच्छा हुआ महान नहीं बना
उसकी लपटें चारों ओर नहीं फैलीं
वह तो घर के कोने में 
जलता रहा अंगीठी की तरह 
और चुपचाप देता रहा-
भूखों को रोटियां और ठिठुरते शरीरों को 
ऊष्मा का धीमा धीमा प्यार 
और यह घर घर बना रहा. (मैं तो यहां हूं, पृष्ठ 53)
'हम दोनों'  भी लगभग इसी व्यंमग्यबोध की रचना है. 
कवि को इस अवधि में पुत्र शोक से भी गुजरना पड़ा जिसकी परिणति उनकी दो कविताओं में हुई है. दरवाजा बंद है और वह चला गया चुपचाप. एक कलाकार पुत्र का दुखद अंत था यह, जिसकी याद में बाद में चलकर उन्होंने एक अलग उपन्यास ही लिखा और इसे एक शोकांतिका जैसी किस्सागोई में विन्यस्त किया.  
रामदरश मिश्र ने सदा प्रगतिशीलता की बांह गही. कहीं धार्मिकता को प्रश्रय नहीं दिया. उन्हें मालूम है कि प्रभु मूर्तियों में नहीं, प्रकृति के जर्रे जर्रे में विराजते हैं. यही कारण है कि 'मैं तो यहां हूं' कविता में कवि मंदिर से बाहर निकल कर देखता है तो पाता है कि जैसे प्रकृति लहलहा रही है, हवाएं खुशुबुओं में महमहा रही हैं, सब कुछ चेतना में स्पंदित हो रहा है, धरती और आकाश संवाद कर रहे हैं, और एक आवाज जैसे कहती हुई लग रही है-
अरे मैं तो यहां हूं, यहां हूं, यहां हूं. यह किसी भी ईश्ववरीय सत्ता के विरुद्ध कवि का कुदरत के प्रति अटूट विश्वास है जो उसे प्रकृत कवि के रूप में स्थापित करता है. दिसंबर का दिन, वह बसंत का दिन था, फिर पानी बरसा, पूजा और फूल, ऐसी कविताएं भी यहां हैं जो कवि के भीतर के भीतर झरते हरसिंगार के फूलों का-सा अहसास देती हैं और 'आभारी हूं कविते!' तो शायद पूरे कवि जीवन की कृतज्ञता का ज्ञापन है. कविता ने उन्‍हें क्या नहीं दिया. वे कहते हैं- 
तुमने मुझे कितना कुछ दिया
मेरी कविते!
जो बीत गया, वह भी मुझमें जीवित है तुम्हारे सहारे
आज के जलते समय में भी 
मेरा मन पा लेता है कोई घनी छांह
और मनुष्यता के प्रति 
मरता हुआ विश्वास 
फिर-फिर जी उठता है. (वही, पृष्ठ-43)
कुल मिलाकर रामदरश मिश्र का जीवन एक साधु रचनाकार का जीवन है. अपने एकांत में साधनारत. किसी भी उखाड़ पछाड़ से अलग मनुष्य के उच्चादर्शों को अपने जीवन में उतारता हुआ यह कवि वाणी विहार में सतत सरस्वती की साधना में रत दिखता है. दूर दूर से मिलने आए लेखकों से बातचीत कर वे तोष का अनुभव करते हैं. यद्यपि गए दो वर्षों के कोरोना काल में वे घर में ही सिमटे रहे तथापि एक ऑनलाइन काव्यपाठ 'कविता के रंग रामदरश मिश्र के संग' की श्रृंखला में वे नियमित आते रहे हैं तथा अपने सान्निध्य में काव्य पाठ करने वाले कवियों को चाव से सुनने के अलावा अपनी रचनाएं भी सुनाते हैं. 
धीरे-धीरे 99वीं वर्षगांठ की ओर बढ़ रहे रामदरश मिश्र हिंदी साहित्‍य की लीजेंड शख्सियत हैं. देश विदेश में लाखों पाठकों के लेखक उनकी कविताओं, गीतों, ग़ज़लों, उपन्यासों, कहानियों और संस्मरणों में दिलचस्पी रखते हैं तथा एक अनुमान के मुताबिक साहित्य के इस शती पुरुष पर अब तक तमाम लेखों के अलावा कोई तीन सौ शोधग्रंथ लिखे जा चुके हैं. वे संप्रति हिंदी जगत के सबसे वयोवृद्ध लेखक भी हैं, कहीं बाहर आते-जाते नहीं पर उन्होंने अभी छड़ी का आश्रय ग्रहण नहीं किया. अपनी हस्तलिपि में रचनाएं लिखते हैं जिनके अक्षर स्पष्ट और सुलिखित होते हैं. 2021 का के.के.बिड़ला फाउंडेशन का सरस्वती सम्मान उन्हें दिया जाना इस बात का भी परिचायक है कि अभी पुरस्कार निर्णायक मंडल की मति मंद नहीं पड़ी है और अपनी-अपनी भाषा के गौरवशाली सक्रिय लेखकों के कृतित्व पर उसकी सजग निगाह है. 
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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. आपकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. आप हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, मेल dromnishchal@gmail.com
 

 

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