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जयंती विशेष: भारतीय चिंतन प्रज्ञा के वाहक कवि कैलाश वाजपेयी

हिंदी की दुनिया में कैलाश वाजपेयी एक अलग तरह के कवि थे. अपने पहनावे व चिंतन दोनों में. उनके भीतर भारतीयता को लेकर न गांठें थीं न पाश्‍चात्‍य चिंतन से अरुचि. उनका लेखन चिंतन इस बात का साक्ष्‍य है.

भारतीय चिंतन की बहुस्‍पर्शिता के कवि कैलाश वाजपेयी [फाइल फोटो] भारतीय चिंतन की बहुस्‍पर्शिता के कवि कैलाश वाजपेयी [फाइल फोटो]

हिंदी की दुनिया में कैलाश वाजपेयी एक अलग तरह के कवि थे. अपने पहनावे व चिंतन दोनों में. उनके भीतर भारतीयता को लेकर न गांठें थीं न पाश्‍चात्‍य चिंतन से अरुचि. उनका लेखन चिंतन इस बात का साक्ष्‍य है. उनकी जयंती पर साहित्य आजतक के लिए उनके कवि व्‍यक्‍तित्‍व भारतीय चिंतन की बहुस्‍पर्शिता पर प्रकाश डाल रहे हैं डॉ. ओम निश्‍चल.

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कैलाश वाजपेयी कवि होने के साथ-साथ अपने समय के एक बड़े चिंतक थे और आज यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि उनका कवि बड़ा है या चिंतक. 'अनहद', 'शब्द संसार', 'आधुनिकता का उत्तरोत्तर' व 'है कुछ दीखै और' जैसी कृतियां उनके चिंतन की प्रशस्त चेतना की नुमाइंदगी करती हैं. विश्व की तमाम प्रसिद्ध कृतियों, दार्शनिकों, लेखकों, चिंतकों पर उन्होंने लिखा है तथा भारतीय व पाश्चात्य दर्शन के बारीक से बारीक तत्वों को उन्होंने आत्मसात किया है. हिंदी के कवियों-लेखकों के बीच ऐसी प्रतिभाएं विरल हैं जिनका सृजन संसार जितना संजीदा है उतना ही संजीदा उनका चिंतन. जहां हमारे समकालीन कवियों में अधिकतर मार्क्स, लेनिन या पाश्चात्य विचारकों से प्रेरणा तो लेते हैं पर हमारी ही भारतीय परंपरा के मनीषियों, ऋषियों तथा आर्ष ग्रंथों में उल्लिखित तत्व चिंतन से प्रेरित नहीं होते. संस्कृत की विद्वत्परंपरा सदियों पुरानी है. प्राचीन काल में संस्कृत अध्येता के रुप में हम मैक्समूलर या एबी कीथ के किए धरे को तो स्वीकार करते हैं, मान्यता देते हैं किन्तु आज की समकालीनता पुराण, आरण्यक, उपनिषद, वेद, महाभारत के बगल से गुजर जाना चाहती है. वह उससे प्रतिकृत नहीं होती. जबकि भारतीय सभ्यता व संस्कृति के निर्माण और तत्व चिंतन में इनकी महती भूमिका है. कैलाश वाजपेयी की कविता जितनी आधुनिक व विश्व वैचारिकी के निकट है उतना ही नैकट्य उनका भारतीय वैदिक, औपनिषदिक चिंतन से है. वे शुरू से ही भारतीय चिंतन, समाजशास्त्र, राजनीति, दर्शन, क्वांटम फिजिक्स, जैव विज्ञान एवं गहन पारिस्थितिकी के विश्लेषक रहे हैं.

हिंदी की दुनिया में जुड़े रहते हुए भी अपने विपुल अध्ययन से उन्होंने भारतीय मनीषा की स्थापनाओं को सकारात्मक भाव से लिया है. ऐसे वैचारिक निबंधों को उन्होंने 'अनहद' शीर्षक से संकलित किया है. इस कृति को पढ़ते हुए लगता है कि वे भारतीय दर्शन में रमे व्यक्ति हैं. वैदिक वाड्.मय से उनका सघन रिश्ता है. कविता, कला, धर्म, मर्म के साथ विविध दार्शनिक प्रत्ययों, सत्ता, अनत्ता, ज्ञान-विज्ञान तथा भारतीय विद्या में वे पारंगत है. भारतीय चिंतन से उनका नाता केवल एक कवि के नाते नहीं बल्कि एक चिंतक के रूप में है. इसकी वजह यह कि लखनऊ में अध्ययन काल से ही उनका मन सांसारिक होते हुए भी तत्वचिंतन की रूढ़ियों और विभिन्न दर्शनों की उपपत्तियों से टकराता रहा है. अनेक दार्शनिक, राजनीतिक विचारकों को कैलाश वाजपेयी ने गहरे पढ़ा व साधा है. भारतीय दार्शनिकों समेत अनेक सूफी दार्शनिकों विचारकों ने उन्हें प्रभावित किया है. उनका संग्रह 'सूफीनामा' उनके सूफियाना चिंतन की काव्यात्मक फलश्रुति है. और केवल 'सूफीनामा' ही क्यों, संक्रांत, तीसरा अंधेरा, देहांत से हटकर, भविष्य घट रहा है, हवा में हस्ताक्षर व हंस अकेला जैसे कविता संग्रहों में भी दर्शन और चिंतन के अनेक सूत्र बिखरे हैं.
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शास्त्र सुचिंतित पुनि-पुनि देखिअ
अपनी कविताओं में उन्होंने गोरखनाथ, नाम खुमारी नानका, रैदास, कणाद को याद किया है. 'भविष्य घट रहा है' में एक कविता 'मंडी में' है. वे मंडी में फेंके जा रहे अनाज के बोरों से निकले बिखरे दानों को बीनते एक बूढ़े कंकाल को देखकर आज के युग के कणाद को याद करते हैं. कणाद जिन्हें वैशेषिक दर्शन का प्रणेता कहा जाता है और परमाणु सिद्धांत का जनक भी. कणाद एक महर्षि थे. किसान जब अपना खेत काट लेते थे तो उसके बाद जो अन्न-कण पड़े रह जाते थे, उन्हें बीन करके वह अपना जीवन चलाते थे. इसी से उनका यह नाम पड़ गया था. उन जैसा दरिद्र कौन होगा! देश के राजा को उनके कष्ट का पता चला. उसने बहुत-सी धन-सामग्री लेकर अपने मंत्री को उन्हें भेंट करने भेजा. मंत्री पहुंचा तो महर्षि ने कहा कि मैं सकुशल हूं. इस धन को तुम उन लोगों में बांट दो जिन्हें इसकी जरूरत है. इस भांति राजा ने तीन बार अपने मंत्री को भेजा और तीनों बार महर्षि ने कुछ भी लेने से इनकार कर दिया. अंत में राजा स्वयं उनके पास गया. वह अपने साथ बहुत-सा धन ले गया. उसने महर्षि से प्रार्थना की कि वे उसे स्वीकार कर लें लेकिन वे बोले कि उन्हें दे दो जिनके पास कुछ नहीं है. मेरे पास तो सब कुछ है.
राजा को विस्मय हुआ. जिसके तन पर एक लंगोटी मात्र है और वह कह रहा है कि उसके पास सबकुछ है. उसने लौटकर सारी कथा अपनी रानी से कही. वह बोली कि आपने भूल की. ऐसे साधु के पास कुछ देने के लिए नहीं लेने के लिए जाना चाहिए.
राजा उसी रात महर्षि के पास गया और क्षमा मांगी. कणाद ने कहा कि गरीब कौन है, मुझे देखो और अपने को देखो. बाहर नहीं भीतर. मैं कुछ भी नहीं मांगता और कुछ भी नहीं चाहता. इसलिए अनायास ही सम्राट हो गया हूं.
एक सम्पदा बाहर है तो एक भीतर है. जो बाहर है वह आज या कल छिन ही जाती है. इसलिए जो जानते हैं वे उसे सम्पदा नहीं, विपदा मानते हैं. जो भीतर है वह मिलती है तो खोती नहीं. उसे पाने पर फिर कुछ भी पाने को नहीं रह जाता. यह है एक कवि की वैचारिक दृष्टि. वह कविता में बाहरी नहीं, भीतरी उपादान खोजता है, देशज प्रत्यय.

सनातन भारतीय तत्वचिंतन से उनका गहरा वास्ता रहा है. 'हंस अकेला'  संग्रह में उन्होंने हमारे ऋग्वैदिक चिंतन के सूक्तव 'संगच्छद्ध्वम संवदध्वम्' की अवधारणा को किस खूबी से अपनी कविता 'संगच्छद्ध्वम' से रखा है. इस वैदिक सूक्त का अर्थ है:
हम सब एक साथ चलें; एक साथ बोलें; हमारे मन एक हों.
प्राचीन समय में देवताओं का ऐसा आचरण रहा, इसी कारण वे वंदनीय है. कैलाश जी इस मंत्र को किसी खूबी से अपनी कविता की आधुनिकी में साधते हैं:
पृथ्वी पर हो तो पृथ्वी के होकर रहो
अपनो से तोड़ो न डोर अपने आप से.
अकेला तो ईश्वर भी नहीं रहा
घबरा कर उसने अपनी सृष्टि की
अभ्यास करो
अपनों में घुल मिल कर होने का
मुश्किल भी उतनी मुश्किल नहीं लगती
सहप्रयास से
अकेला दांत कौर नहीं काटता
अकेली पड़ जाए तो चींटी मर जाती है -हंस अकेला, पृष्ठ 39.
इसी तरह वे शास्त्र पर भरोसा करने वाले कवि हैं. प्रतीत्यसमुत्पाद जैसे शब्द उनकी कविता में आते ही नहीं, उसकी विषय वस्तु बनते हैं. एक ऐसी ही कविता: शास्त्र कहते हैं, पढ़िए-
जो कम खाता है
ग़म भी सहता है जीवन भर
तर्क नहीं करता कम बोलता है
वैर, ईर्ष्या, स्पर्धा सहित
कुत्साह, मक्कारी, छल प्रपंचादि से दूर-दूर रहता है
शास्त्र कहते हैं
बहुत दिन जीता है ऐसा आदमी
काक चेष्टा के लिए प्रसिद्ध
कौवा भी, कहते हैं, दीर्घजीवी होता है.- हंस अकेला, पृष्ठ 47.

कहा गया है, शास्त्र सुचिंतित पुनि-पुनि देखिअ. ऐसे कवि शास्त्र और रीति का अनुधावन करते हैं. इस अर्थ में वे पूर्णत: भारतीयता के, भारतीय चिंतन के कवि थे. तभी तो वे अतिथि देवो भव की तर्ज पर कह सकते थे, 'तरु देवो भव'. पेड़ होकर चिड़ियों से बतियाने की इच्छा तो उनमें पहले से ही रही है. 'पेड़' कविता में उन्होंने यह अभिलाषा व्य‍क्त की है:
पता नहीं मैं पेड़ कब हूँगा हरा और खुरदुरा
कब तू चिड़िया आएगी झूलने
बातें करनी मेरी शाख पर.-तीसरा अंधेरा, पृष्ठ 49.
'तरु देवो भव' शीर्षक कविता में वे जैसे वैदिक ऋषियों की वाणी दुहराते हैं. वे बुद्ध के इस निर्वचन का उल्लेख करते है कि कैसे उन्होंने भिक्खुओं को कहा था कि
वृक्षों की सेवा में रहना क्योंकि वृक्ष जिन्दगी के पहरुए हैं
प्रतीक सब तरह के उछाह के
हरे विकास के.- डूबा-सा अनडूबा तारा, पृष्ठ 86.

आज के पर्यावरणवादियों की तुलना में वे कितने आधुनिक थे कि परंपरा की अच्छी बातों का अंतर्भाव अपने आधुनिक चिंतन में करते चलते थे. 'हवा में हस्ताक्षर' में शामिल 'तरु देवो भव' नामक कविता में वे कहते हैं कि जो अपनी जड़ से नफरत करता हो, ऐसा कोई वृक्ष अब तक मुझे नहीं मिला और अंत में इस अभिलाषा का इज़हार करते हैं कि ओ धरती मां, मुझे वृक्ष बनाना अगली बार/ जैसे ही बंद बंद सी आंख बंद हो. -हवा में हस्ताक्षर, पृष्ठ- 31. अन्यत्र एक कविता 'गैया' में वे गोहत्या के विरुद्ध नज़र आते हैं. केवल यही नहीं कि तुम्हारी हरियाली हथिया ली हमने बल्कि तुम्हें सड़कों पर छोड़ दिया कूड़ा अखबार प्लास्टिक चबाने को, गोरस चूस लिया, बछड़ा काम आ गया नरम जूते बनाने के और तुम्हें लोभवश किसी कत्ल्गाह छोड़ आए. अंत जिस क्षोभ व क्षमायाचना से होता है वह किसी आदि कवि वाल्मीकि के क्रौंचवधोपरांत उभरे क्षोभ से कम नहीं: तुम्हारी चुप चीख का, बाजार में आह का- कोई मूल्य नहीं. -हवा में हस्ताक्षर, पृष्ठ 32. 'गेहूँ का आत्मकथ्य' लिखते हुए वे यह विनती करते हैं कि वह किसी शराबी और अघाए अय्याश की आंत में न जाए. बल्कि किसी फटेहाल थके पेट की भट्ठी में जाकर स्वाहा हो जाए. वही मोक्ष सही मोक्ष होगा मेरे तुम्हारे विकास का. -वही, पृष्ठ 17. यह एक भारतीय कवि का नैतिक आत्मबल है जो कभी पेड़ो के काटे जाने से व्यथित होता है कभी गायों के वध से, कभी इस बात से कि अन्न की सार्थकता इस बात में है कि वह किसी गरीब की क्षुधा की तृप्ति का साधन बने.
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अनहद: चिंतन और बहुज्ञता
यों तो कैलाश वाजपेयी समकालीन कवियों में अपने चिंतन के बलबूते बहुत अलग माने जाते हैं. उनकी कवि दृष्टि में पूरी दुनिया में हो रही हिंसा, नकार, इंसानियत के विरुद्ध चलने वाले अभियान, नस्ली भेदभाव, रंगभेद आदि शामिल है. यद्यपि दुनिया भर की विचारधाराओं के वे अध्येता रहे हैं, दुनिया के अनेक देशों की यात्राएं की हैं, वहां के नागरिकों के हालात से रूबरू हुए हैं, तथापि उनके भीतर भारतीयता के प्रति अटूट आस्था भरी है. तमाम विचारधाराओं की विशिष्टताओं से अवगत होते हुए भी उन्होंने भारतीय काव्यमूल्यों को अपने सम्मुख रखा. भारतीय चिंतना और विचारणा को बहुमान दिया. विराट वैदिक साहित्य का अध्ययन किया. भारतीय दर्शन का विशद पारायण किया. ज्ञान के स्रोतों- महाभारत, पुराण, आरयण्यक, उपनिषद, संस्कृत वाड्.मय, पतंजलि, तिरुवल्लवर, सिद्ध कवि सरहपा, भर्तृहरि, द्वैतवाद, द्वैताद्वैत, कालिदास, भवभूति, गुरु गोरखनाथ, दादू, तुकाराम, कबीर, नंददास, परमानंद दास, निपट बाबा, ध्रुपद और स्वामी हरिदास, प्राण विद्या, भारतीय काल गणना, सत्ता और अनत्ता, दर्शन, लीला, नाद, मध्वाचार्य, निम्बार्क, बल्लभ, कुमारिल, आजीवक, जैनागम, विज्ञानवाद, तत्वार्थसूत्र आदि का उन्होंने न केवल गहरा अध्ययन किया था बल्कि दुनिया के अन्य तमाम दार्शनिकों चिंतकों से भी उन्होंने वैचारिक सीख ली. पर इस सबके बावजूद वे किसी पाश्चात्य वैचारिकी के समर्थक न थे. वे एक ऐसे कवि थे जिनकी परवरिश भारतीय विचारों की पाठशाला में हुई. उन्होंने विश्व वैचारिकी को समझने से पहले भारतीय वैचारिकी को समझा तथा जितने भी दर्शन, विचार संप्रदाय व दार्शनिक हुए हैं, उनकी विशिष्टताओं को आत्मसात किया. यही वजह है कि उनकी कविताओं में ऐसे वैचारिक प्रत्यय आते हैं जो अन्ये कवियों में नहीं मिलते. यथा प्रतीत्यसमुत्पासद, निसर्ग, द्वैताद्वैत, विदेह वाक्, देहांतर, निरुक्ति, विबोध, देशना, प्रत्यय, सांख्य स्थिति- ये पद भारतीय दर्शन और चिंतन से गृहीत हैं. वे कवियों, दार्शनिकों, संतों के प्रेमी थे. इसीलिए जितना वे बुद्ध और कबीर से जुड़े थे उतना ही जे कृष्णमूर्ति, परमहंस रामकृष्ण और स्वामी हरिदास से भी.
'अनहद' उनके विश्लेषणात्मक निबंधों का चयन है. विराट् वैदिक साहित्य से लेकर भारतीय वांड्.मय और दर्शन-चिंतन के तमाम आयामों को अपने में समेटता हुआ कैलाश वाजपेयी के सुचिंतित भारतीय चिंतन की पुष्टि करता है. इसकी विषयवस्तु को देखें तो ज्ञात होगा कि भारतीय विचारणा में कितने गहरे धँसे  : संगत समतावाद, भारतवर्ष और भरत, आदि कवि, तीर्थंकर वाणी, हिंसा का उत्स, अनेकांतवाद का मर्म, निक्षेपवाद, आजीवक सम्प्रदाय, बौद्धों का विज्ञानवाद, बौद्धों का वज्रयान, सहजयान, रसेश्वर दर्शन, संवर्ग विद्या, अनत्ता की सत्ता, ऊर्जा के ध्रुव, पतंजलि के बहाने, कवि भर्तृहरि, निम्बार्क का द्वैताद्वैत, मध्वाचार्यका द्वैतवाद, कुमारिल का देहदान, नंददास की रूप मंजरी, ध्रुपद और स्वामी हरिदास, दिक् क्षेत्र में विकर्षण, भारतीय काल गणना, दर्शन का शिवभाव, लीला की अवधारणा आदि. इसी के साथ उन्होंने सामान्यत: चिंतनसजग पाठकों के लिए कुछ ऐसे निबंध भी लिखे हैं: दुनिया भांडा दुख का, जब बुद्ध को हुआ देह-यथार्थ का दर्शन, सर्पिल मन की मुश्किल, सपने से ज्यादा नहीं है यह संसार, होना ही दुख है, यह देह धरोहर है किसी की, कवि भर्तृहरि: रागी भी वैरागी भी, भरा हुआ खालीपन, शंकर भारती शास्त्रार्थ, जो सामने है शोचनीय है, कालिदास और संन्यास, करुणा और भवभूति, बंद आंखों का आकाश, कहा करौ बैकुंठहिं जाय, दुनिया ऐसी बावरी, प्रायश्चित कौन करता है, जिह्वा पर निवास करती है सरस्वती, असीम विस्तार से झरते ज्योतिकण, अहं क्या है इसे गहराई से समझें और विस्फोटक ध्यान से जगाएं भीतर की अक्षय ऊर्जा आदि.
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भारतीय प्रज्ञा: गति और मति
कैलाश वाजपेयी की मति और गति भारतीय प्रज्ञा के पारंपरिक और सनातन स्रोतों में थी. भारत सदियों से विश्व गुरु रहा है. कम से कम धर्म, अध्यात्म और दर्शन के क्षेत्र में इसकी प्रभुता असंदिग्ध है. वाजपेयी ने न केवल भारतीय वाड्.मय को साधा बल्कि विश्व के विपुल साहित्य का भी अध्ययन किया. विश्व के अनेक दार्शनिकों ने भी उनका मन मोहा. उन पर अस्तित्ववादी विचारणा का कवि होने का लेबल लगाया जाता है; इसका अर्थ है कि वे अस्तित्ववादी दार्शनिकों चिंतकों कामू, काफ्का, सार्त्र, यास्पिर, हीडेगर से भी वैसा ही अपनापा रखते हैं जैसा वे भारतीय चिंतकों दार्शनिकों से. उनके भीतर अपढ़ किन्तु् प्रज्ञापुरुष कबीर, दादू, नानक, रैदास, निपट बाबा के प्रति भी आकर्षण था, उनकी वाणी के वे मुरीद थे तथा शंकर भारती शास्त्रार्थ भी उनके लिए स्त्री के प्रज्ञावान होने का द्योतक था. वे भारतीय व विश्वतचिंतन के सारभूत के संग्रही थे. विचारों के मधुसंचयी. इसीलिए उनकी कविताओं में कभी कभी लगता था कोई परिव्राजक बोल रहा है. कोई संन्यासी बोल रहा है, कोई सूफी बोल रहा है. उनकी वाणी में परिपक्वता थी. शुरुआती दौर की कविताओं -संक्रांत, देहांत से हटकर व तीसरा अंधेरा- से लगता है जो मारकाट विश्व में मची है, आदमी-आदमी को लेकर जो खाईं पैदा की गयी है, जो नस्ल भेद मानवीय सौंदर्य को श्रीहत कर रहा है, आजादी को लेकर जो मोहभंग जनता में व्यापा, नेहरू की नीतियां विसंगत लगने लगीं, सांप्रदायिकता सर चढ़ कर बोलने लगी, जिस तरह हिंदू-मुसलिमों को बांट कर देश का विभाजन हुआ, अपने से विपरीत मत रखने वाले के प्रति विद्वेष की भावनाएं पनपीं, इस सबके प्रति कैलाश वाजपेयी में जो क्षोभ और विक्षुब्धता पनपी, उनके प्रारंभिक संग्रह इसके गवाह हैं. वे किसी विचारधारा से भी बंधे न थे. क्योंकि विचारधाराओं और पंथपरकता की फलश्रुति वे जानते थे. हमारे समय के बड़े कवि कुंवरनारायण ने भी विचारधाराओं में बंधना स्वीकार न किया. वाजपेयी यह मानते थे कि विचारधाराएं जाने अनजाने व्यक्ति को एक कठपुतली की तरह नचाने लगती हैं. रचना की स्वत:स्फूर्त आंतरिकता बेमानी होने लगती है और दूसरे दर्जे की कला बेमानी होने लगती है. उनका मानना था कि पंथपरकता अथवा विचारधाराओं ने कलाओं को गंभीर क्षति पहुंचाई है. -संक्रांत, पृष्ठ 8, भूमिका. उनकी कविताओं में जो टूटे हुए अक्षरों का विलाप ध्वनित होता है, दम तोड़ती शताब्दी नजर आती है, दिवा स्वनप्नों की शामें दिखती हैं, अपना भटका हुआ अकेलापन दिखता है, एक निस्सहाय नकारात्मकता अस्तित्वबोध को हिलाती हुई-सी लगती है, पिशाच संस्कृति का बोध होता है, मृत्यु, अवसान, अनिद्रा, यंत्रचालित जीवन, और हैल्युसिनेशन का जो भाव पैदा होता है, अपराधग्रस्तता और क्षमा भाव अंतस को विगलित करने लगता है- वह कहीं न कहीं उन्हें एक नियतिवादी बनाता हुआ लगता है. परास्त बुद्धिजीवी का वक्तव्य उस दौर की पूरी कविता का जैसे निहितार्थ हो -
न हमारी आंखें हैं आत्मरत
न हमारे होठों पर शोकगीत
जितना कुछ ऊब सके ऊब लिए
हमें अब किसी भी व्यवस्था में डाल दो
                       -जी जाएंगे, संक्रांत, पृष्ठ 15.
यही वह दौर था जब उनकी 'राजधानी' कविता को सुनकर उन पर देशभक्त विरोधी तमगा आरोपित किया गया जबकि वह तत्कालीन राजनीतिक फलश्रुति का क्रिटीक था. ऐसे ही वक्त उन्हें लिखना पड़ा-
मेरा आकाश छोटा पड़ गया है
मुझे नींद नहीं आती
कहां हो तुम
इस विस्तृत परिवार के धड़कते सदस्यो!
मैं तुम्हें आवाज देता हूँ
मेरा आकाश छोटा हो गया है
मुझे नींद नहीं आती
यह मेरे माथे पर जो चोट का निशान है
यह मेरी मां के घायल मन की पहचान है.
यह थी एक भारतीय कवि की तड़प जो उस वक्त नीत्शे के प्रभाव में कह रहा था: 'हम सब अपनी मृत्यु से पहले, बहुत पहले मर गए हैं.' वे नेहरू के प्रशंसक होकर भी उस दौर की राजनीतिक फलश्रुति और चमक दमक के आलोचक थे. एक कवि के रूप में उनका यह कहना केवल उनके कवि-चित्त की पराजिक मानसिकता का पर्याय न था बल्कि उसमें उस दौर की हताशा भी बोलती हुई दिखती थी:
विवेक की बूढ़ी हथेलियों से छूट कर
मेरा वर्तमान
फर्श पर गिर हुए पारे-सा
बिखर गया है
किसी अजगर की स्याह सांसों के
अदृश्य खिंचाव में पड़े पक्षी-सी मेरी आत्मा
जीने के लिए छटपटाती है
मेरे आस-पास बाढ़ के पानी-सा
जो आलोक फैला है
मटमैला है.- संक्रांत, पृष्ठ. 77.

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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुपरिचित कवि-आलोचक व भाषाविद हैं. तीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित. हिंदी अकादमी दिल्ली के युवा कविता पुरस्‍कार, उ.प्र. हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद्र शुक्ल आलोचना पुरस्का‍र, विचारमंच कोलकाता के प्रो. कल्याणमल लोढ़ा साहित्य सम्मान एवं जश्ने अदब के शाने हिंदी खिताब से समादृत हैं. संपर्क: जी-/506 ए, दाल मिल रोड, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059. मेल: dromnishchal@gmail.com

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