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पुण्‍यतिथि विशेष: अध्‍यवसायिता के पर्याय थे ललित शुक्ल

साहित्‍य में कुछ प्रतिभाएं फोकस के कारण जल्‍दी ही चर्चा में आ जाती हैं, कुछ पर रोशनी देर से पड़ती है. साहित्‍य के भीतर की खेमेबंदियों से कई लेखक अपने दौर में उपेक्षित ही रहे. उनमें एक नाम ललित शुक्‍ल का भी है. उनकी पुण्यतिथि पर उनके लेखक व्‍यक्‍तित्‍व की एक झलक.

ललित शुक्‍ल: साहित्यिक खेमेबंदी से परे एक रचनाकार ललित शुक्‍ल: साहित्यिक खेमेबंदी से परे एक रचनाकार

वह 1980 के आस पास का समय था जब लखनऊ में ललित शुक्‍ल से मुलाकात हुई थी. सूचना विभाग लखनऊ ने प्रेमचंद जन्मशताब्दी समारोह पर एक बहुत बड़ा उत्सव आयोजित किया था. रवींद्रालय सभागार में इस बड़े समारोह में देश के लगभग सौ से ज्यादा लेखक पधारे थे. उस वक्त का कौन बड़ा लेखक उस समारोह में नहीं था. कुंवर नारायण से लेकर जैनेन्द्र कुमार तक. जैंनेन्द्र जी विश्वनाथ प्रताप सिंह व ठाकुरप्रसाद सिंह के साथ मंच पर थे. आज भी उस सभागार के चेहरों को याद करता हूं, तो नामवर सिंह, अमृतलाल नागर, शिवप्रसाद सिंह, भगवती जैनेंद्र, कमल किशोर गोयनका, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, मुद्राराक्षस, कृष्ण नारायण कक्कड़, कन्है्यालाल नंदन, लीलाधर जगूड़ी, विजय राय, विजयकिशोर मानव, अकु श्रीवास्तव, विष्णु कुमार त्रिपाठी राकेश आदि ध्यान में तिर आते हैं. उन्हीं में एक ललित शुक्ल भी थे. अध्ययनशील और भाषा में नवीनता के सर्जक. बाद में प्रेमचंद पर उनकी पुस्तक भी आई: युगद्रष्टा प्रेमचंद.  कह सकते हैं पूरे देश का बौद्धिक समुदाय वहां इकट्ठा था. 'उत्तर प्रदेश' पत्रिका जिसके प्रधान संपादक ठाकुरप्रसाद सिंह थे और संपादक राजेश शर्मा, उसने प्रेमचंद पर एक ऐसा अनूठा अंक निकाला जैसा शायद ही उस दौर की किसी सरकारी पत्रिका ने निकाला हो. हंसराज रहबर, प्रभाकर माचवे, कुंवर नारायण, अंचल, अमृत राय, परिपूर्णानंद वर्मा, शिवकुमार मिश्र, मदन गोपाल, प्रबोध मजूमदार, अमरकांत, काशीनाथ सिंह, शेखर जोशी, दूधनाथ सिंह, परमानंद श्रीवास्तव, अजित कुमार, माधव मधुकर, हृषीकेश, रवींद्र वर्मा, बादशाह हुसैन रिजवी, गंगाप्रसाद मिश्र, चंद्रोदय दीक्षित, वीरेन डंगवाल, रामनारायण उपाध्याय, रवींद्र कालिया, गोपाल उपाध्याय, ममता कालिया,एम एल गोल्डस्मिथ, अमर गोस्वामी, शकील सिद्दीकी, ललित शुक्ल व वीरेंद्र यादव आदि इस अंक के विशिष्ट लेखकों में थे.  पहली बार कमल किशोर गोयनका के सहयोग से वह पत्रिका अदभुत आकल्पन और प्रेमचंद के अनूठे शोध संदर्भों से संपन्न बन पड़ी थी. तब तक गोयनका जी प्रेमचंद विश्वकोश संपादित कर चुके थे. प्रेमचंद अध्येता के रूप में पूरे हिंदी विश्व में उनकी पहचान बन चुकी थी. 'उत्तर प्रदेश' के संपादन से जुड़े होने के कारण समारोह की रिपोर्टिंग मेरे जिम्मे थी. सो पहले दिन की तो बहुत व्यस्तता रही पर उस दिन चौधरी लॉज में विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के साथ रह रहे जिस एक सुदर्शन प्रतिमूर्ति से मुलाकात हुई वे ललित शुक्ल थे. सौम्य और संयमित व्यक्तित्व के धनी.
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लेखक से पहली मुलाकात
वह रात देर तक दोनों लेखकों के साथ बातचीत में बीती. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी पूर्व परिचित थे. 'दस्तावेज' के दो तीन अंक आ चुके थे. वे कभी-कभार सूचना विभाग आते थे ठाकुर प्रसाद सिंह और राजेश जी से मिलने तब मुलाकात होती थी. सो तिवारी जी से अपनापा उत्तरोत्तर प्रगाढ होता गया. फिर तो दस्तावेज के अनेक अंकों में लिखना छपना हुआ. वह धीरे-धीरे उत्तरप्रदेश से निकलने वाली एक महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका बन गयी. यह कहना अतिशय न होगा कि परमानंद श्रीवास्तव की अधिकांश शुरुआती बेहतरीन आलोचनाएं, समीक्षाएं दस्तावेज में ही छपीं. 'दस्तावेज' में बाद में भारतीय भाषाओं के साहित्य से भी कुछ चुनिंदा अनुवाद भी छपने लगे थे जिससे यह पत्रिका राष्‍ट्रीय स्‍तर पर पहचान बनाने लगी. प्रेमचंद समारोह के बाद ललित शुक्‍ल दिल्‍ली वापस चले गए किन्‍तु उनसे पत्राचार का सिलसिला प्रारंभ हो गया था.  इससे धीरे-धीरे उन्हें और निकट से जानने का सुअवसर मिला. साहित्य में क ख ग सीखने के दिन थे ये. बच्चों के कवि द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी से निकटता के कारण पहली आलोचनात्मक कृति उन्हीं पर लिखी, जो 1985 में किताबघर से प्रकाशित हुई. फरवरी 84 में मैं भी सूचना विभाग से निवृत्त होकर केंद्रीय हिंदी निदेशालय दिल्ली से जुड़ गया और कुछ ही महीनों बाद राजभाषा अधिकारी के रूप में इलाहाबाद बैंक से संबद्ध हुआ. लिहाजा, दिल्ली आ जाने के बाद से ललित शुक्ल से निकटता और बढ़ी.  उनके निवास से कुछ ही दूरी पर ही  रामदरश मिश्र, पं रामविलास शर्मा, गिरिजाकुमार माथुर, गोविंद चातक, रमाशंकर श्रीवास्तव, रमाकांत शुक्ल जैसी विद्वत्विभूतियां विद्यमान थीं और दिल्ली तो उन दिनों लेखकों, कवियों का गढ़ था ही. छोटे शहर प्रतिभाओं से खाली हो रहे थे और साहित्य में दिल्ली को केंद्रीयता मिल रही थी. मुझे रह-रह कर ठाकुरप्रसाद सिंह का कहा याद आता कि लेखक कार्य से जुड़े लोगों को 30 की वय तक दिल्ली पहुंच जाना चाहिए. वे मेरे दिल्ली पहुंच जाने से बहुत खुश थे. सूचना विभाग के माहौल में प्रतिभा का विकास संभव न था. वे खुद सूचना विभाग की फाइलों में खो से गए थे. ललित शुक्‍ल के भीतर कार्य करने की अपरिमित ऊर्जा थी. मानस और पदमावत पर संदर्भ कोश से लेकर कविता, कहानी, उपन्‍यास, आलोचना, रिपोर्ताज, बाल साहित्‍य सारी विधाओं में उनकी समान गति थी.
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नया काव्‍य नये मूल्‍य
ललित शुक्ल 1974 में मैकमिलन एंड कंपनी से प्रकाशित अपनी आलोचनात्मक कृति 'नया काव्य नये मूल्य' से काफी चर्चित थे. आज भी जिन्होंने यह कृति पढ़ी है, वे इसके सुगठित आलोनात्मक गद्य की तारीफ करते हैं. छायावादोत्तर काव्य पर यह पुस्तक उनके समावेशी अघ्ययन अनुशीलन का पर्याय है. कविता पर उनकी निगाह बहुत ही अचूक थी. ललित शुक्ल खुद कवि थे - समरजयी और स्‍वप्‍ननीड़ जैसी काव्‍य कृतियां लिख चुके थे तथा 1981 के आसपास 'अनाहूत' पत्रिका संपादित कर रहे थे. वह वाम कविता के प्रतिष्‍ठित अंक में भी शामिल थे. सलिल गुप्त संपादित 'साठोत्तरी कविता' के भी वे एक कवि थे. नई कविता के कवि जगदीश गुप्त ने उन्हें 'त्रयी' में भी शामिल किया था. यानी उस दौर में साठोत्तर कविता का एक बेहतरीन माहौल बन चुका था. अकविता के कल्मष के बाद कविता अपनी शुद्धता और नवता की ओर प्रस्थान कर चुकी थी. इस दौर की कविता के ललित शुक्ल एक अन्यतम अध्येता थे. वे मैथिलीशरण गुप्त के सान्निध्य में रहे थे. सियारामशरण गुप्त के सृजन और चिंतन पर शोध किया था तथा छायावादोत्तर काव्य पर डीलिट -सो वैचारिक मेधा के धनी थे. उनकी लेखनी से निकले अक्षर कागज पर दर्ज होकर एक सुचित्रित इबारत बन जाते थे. इतना अच्छा हस्त लेख किसी कातिब से ही संभव है. उनके पत्र उनके लालित्यपूर्ण व्यक्तित्व का परिचय देते थे. जिनके पास भी ललित शुक्ल के पत्र होंगे वे इस बात की तस्दीक करेंगे कि उन्हें पढ़ते ही कुछ कुछ ललित निबंधों का-सा सम्मोहन जाग उठता था गोकि उन्होंने ललित निबंध नहीं लिखे. पर हां रिपोर्ताज में उनकी गति थी. साहित्यिक रिपोर्ताज जिनसे ललित निबंधों की खुशबू आती थी. 'सोजालोबो' उनका पहला रिपोर्ताज संग्रह था जो युनाइटेड बुक हाउस से आया. दूसरा रिपोर्ताज संग्रह 'पार्वती के कंगन' किताबघर प्रकाशन से छपा. वहीं से सियारामशरण गुप्त रचनावली  पांच खंडों में छपी. रचनावली के संपादन की बात पहले डॉ नगेंद्र से चलायी गयी. वे सहमत भी थे तथा गुप्त परिवार से उनका सघन रिश्ता भी था. इसी तरह ललित शुक्ल का भी अपने शोध के सिलसिले में चिरगांव की बखरी में आना जाना था. रचनावली का काम उनके भांजे प्रमोद गुप्त देख रहे थे. ललित शुक्ल को उसमें सहयोग करना था पर बाद में नगेंद्र जी ने कहा कि अच्‍छा हो कि इसका संपादन ललित शुक्ल ही करें. सो रचनावली भव्य रूप में सामने आई. साप्ताहिक हिंदुस्तान के कलाकार सत्यसेवक मुखर्जी ने उसका नयनाभिराम कवर बनाया था. तत्कालीन उप राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने उप राष्ट्रपति भवन में एक सादे  समारोह में उसका लोकार्पण किया.

अध्ययन अनुशीलन का एक युगपत प्रवाह ललित शुक्ल के भीतर बहता था. उनके पास बैठ कर साहित्य चर्चा का क्या असली आनंद होता है, यह समझा जा सकता था. उनका पुस्तकालय बहुत समृद्ध था और आज भी है. पुराण, महाभारत से लेकर संस्कृत, उर्दू, बांग्ला, हिंदी व अंग्रेजी की आधुनिक पुस्तकों का एक बड़ा संग्रह उनके पास था. वे पुस्तकें खरीदने के शौकीन थे. उन्हें हिंदी, बांग्ला, संस्कृत, उर्दू व अंग्रेजी का प्रभूत ज्ञान था. प्रेमचंद पर उनकी बाल पुस्तक छपीं तो उसका बाद में उर्दू तर्जुमा छपा जिसे वे आसानी से बांच लेते थे. लिख भी लेते थे. दक्षिण भारत के अनेक लेखकों से उनका घना संपर्क था. यात्राओं में उनकी रुचि बनी रहती थी. भारत के अनेक जगहों की उन्होंने साहित्यिक यात्राएं कीं, जिसके साक्षी केंद्रीय हिंदी निदेशालय के अधिकारीगण व उनके साहित्‍यिक मित्र रहे हैं. इसी सिलसिले में एक बार वे शांति निकेतन गए. उनके साथ संयोग से मैं भी था. तब इलाहाबाद बैंक के वरिष्ठ अधिकारी व कवि प्रभात पांडेय के सहयोग से शांति निकेतन में परिभ्रमण आदि की सारी व्यवस्थाएं हो गयी थीं. लौट कर उन्होंने 'कवि का घर' शीर्षक रिपोर्ताज लिखा जिसे पढ़ते ही शांतिनिकेतनी वातावरण मुखरित हो उठता है. यह रिपोर्ताज उनकी कृति 'पार्वती के कंगन' में संग्रहीत है.
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रचनात्‍मकता का प्रशस्‍त पाट
ललित शुक्ल की रचनात्मकता का पाट चौड़ा है. प्रारंभ में उन्होंने 'समरजयी' एवं 'स्वप्ननीड़' जैसे काव्य लिखे. अगले कविता संग्रह 'अंतर्गत' में वे साठोत्तर कविता के मुहावरे के साथ सामने आए तो 'सहमी हुई शताब्दी' आपातकाल के बाद लिखी ज्वलंत युगीन समस्याओं पर एक प्रासंगिक संग्रह बन गया. साठोत्तर मोहभंग के बाद आपातकाल ने भी लेखकों को बहुत विक्षुब्ध किया था. सत्ता का प्रलोभन बड़े-बड़े नेताओं को लोकतंत्र की हत्या करने पर विवश कर देता है. 'सहमी हुई शताब्दी' का बिम्ब युगीन विक्षोभ का ही परिचायक है. कविता के अलावा वे कथाकार भी थे. उनकी कहानियों के दो संकलन आए. 'धुंधलका' व 'आंच के रंग'. मानवीय मूल्यों को छूने वाली कहानियां लिखने में वे कुशल थे. सई नदी की याद उन्हें अक्सर आती थी. इसकी वजह शायद यह थी कि सई के किनारे प्रतापगढ़ उत्‍तर प्रदेश में उनका गांव था. नाम था नेवादा. 8 जनवरी, 1937 को जनमे ललित शुक्ल की प्रारंभिक पढ़ाई गांव व प्रतापगढ़ में हुई. तदुपरांत वे उच्च़ शिक्षा के लिए कानपुर आ गए थे. वहीं रह कर उन्हों ने पीएचडी व डीलिट की उपाधि पाई. कानपुर के डॉ उपेंद्र, आचार्य कृष्णशंकर शुक्ल, भगवती प्रसाद वाजपेयी, शील आदि साहित्यकारों व रामनरेश त्रिपाठी, मैथिलीशरण गुप्त़, सियारामशरण गुप्त, डॉ नगेंद्र, जैनेंद्र कुमार, अज्ञेय, बच्चन, शंकरदेव अवतरे, देवेंद्र सत्यार्थी, विवेकी राय, देवेंद्र इस्सर, सन्हैयालाल ओझा व जयशंकर त्रिपाठी के वे सघन सान्निध्य में रहे. इन लेखकों पर उन्होंने संस्मरण भी लिखे हैं तथा प्रगतिशील कवि शील, आचार्य कृष्णशंकर शुक्‍ल, जयशंकर त्रिपाठी व भगवतीप्रसाद वाजपेयी पर उन्होंने स्‍वतंत्र रूप से पुस्तकें भी संपादित की हैं.

कानपुर से डीलिट करने के बाद वे कुछ दिन बाद दिल्ली आ गए तथा यहां दिल्ली़ विश्वविद्यालय के मोतीलाल नेहरू कालेज-सांध्य में अध्यापक नियुक्त हुए. मैकमिलन से प्रकाशित 'नया काव्य नये मूल्यं' साठोत्तर कविता पर उनकी बेहतरीन आलोचनात्ताक कृति मानी जाती है. उन्होंने अंत तक अपनी कविताओं, कहानियों व आलोचनात्मक निबंधों में प्रगतिशील मूल्यों का समर्थन किया. अवधी जनजीवन पर आधारित उनका उपन्यास 'शेष कथा' अवध के एक गांव की गाथा है जिससे अवध के रहन-सहन व अवधी संस्‍कृति की खुशबू आती है. इससे पूर्व आया उनका उपन्यास 'दूसरी एक दुनिया' काफी हाउस की संस्कृति और बैठकी व गुफ्तगू की जीवंत गाथा है. तुलसी के मानस के प्रति प्रीति के कारण ही उन्होंने 'रामचरित मानस संदर्भ समग्र कोश' की रचना की तथा अवधी के शिखर कवि जायसी के पदमावत पर 'पदमावत संदर्भ कोश' तैयार किया. रिपोर्ताज की कमी आज भी हिंदी साहित्य में महसूस की जाती है. ललित शुक्ल की रिपोर्ताजों में गति थी. 'सोजालोबो' व 'पार्वती के कंगन' में शामिल उनके रिपोर्ताजों में यायावरी व संस्मरण दोनों विधाओं की गमक घुली मिली है.

साहित्य समाज कभी-कभी अपने युग की प्रतिभाओं के साथ न्याय नहीं करता. इतना प्रभूत और वैविध्यपूर्ण लेखन के बावजूद ललित शुक्ल की चर्चा साहित्य में उतनी नहीं हुई, जितनी होनी चाहिए थी. यद्यपि उन पर अनेक सुधी लेखकों गुरचरण सिंह, रामदरश मिश्र, वेदप्रकाश अमिताभ, अशोक तिवारी, मीना सिंह, अरुण कुमार सोनी, अमरेंद्रनाथ त्रिपाठी ने लेख लिखे हैं, उनकी कृतियों पर अनेक शोधप्रबंध एवं लघु शोधप्रबंध भी लिखे गए हैं. उन्‍हें साहित्‍यिक अवदान के लिए हरजीमल डालमिया पुरस्‍कार से नवाजा गया था. वे अपने समय के लोकप्रिय अध्यापकों में थे. याद आता है एक बार प्रो. सुधीश पचौरी ने 'जनसत्‍ता' शिक्षक दिवस पर अपने किसी आलेख में ऐसे चुनिंदा वरेण्य अध्यापकों की सूची में ललित शुक्ल के कुशल अध्यापन की चर्चा की थी. उनका शिक्षण, लेखन, सान्निध्य, आतिथ्य सब कुछ आह्लाद से भर देता था. उनकी हस्‍तलिपि बहुत उम्‍दा थी. छापे के अक्षर सरीखे उनके शब्‍द होते थे. उनकी चिट्ठियों में रिपोर्ताज की आभा नजर आती थी. उनका आवास- आर 4 वाणी विहार वास्तव में वाणी-विहार था जहां तब अनेक लेखकों कवियों के आवास हुआ करते थे तथा गोष्‍ठियों में गिरिजाकुमार माथुर व पं विद्यानिवास मिश्र आदि अनेक विद्वान समय-समय पर आते रहे हैं. वे यात्राओं के बहुत शौकीन थे. अहिंदी भाषी क्षेत्रों के तमाम शहरों में उनकी यात्राएं हुई हैं. नवलेखक शिविरों में उनकी भागीदारी रचनात्‍मक हुआ करती थी. केंद्रीय हिंदी निदेशालय के नवलेखक शिविरों में अनेक में वे मार्गदर्शक लेखकों में शामिल रहे हैं. अंतिम दिनों में कुछ समय तक बीमार रहे तथा 27 अप्रैल, 2015 को उनका देहावसान हुआ. आखिरी दिनों में वे अपनी आत्‍मकथा पर काम कर रहे थे. अवध तथा अवधी मुहावरा उनके लेखन में बोलता था. भाषा की बारीकियों के वे परम जानकार थे. 2015 से 2019 तक हिंदी के अनेक सुधी लेखक कवि विदा हुए. ललित शुक्ल इनमें एक थे जिनकी अनुपस्‍थिति आज तक महसूस की जाती है. लेखक अंतत: अपनी कृतियों में ही जीवित रहता है, पार्थिवता में नहीं. ललित शुक्ल भी अपने कृतित्व में सदैव जिंदा रहेंगे.
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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. आपकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. आप हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, मेल dromnishchal@gmail.com

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