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जयंती विशेषः इस डेढ़ शताब्दी के बीच कैलाश वाजपेयी और उनकी कविताएं

भारत या विश्व के स्तर पर इन दिनों जो घट रहा था, वह कैलाश वाजपेयी की कविताओं में छन कर आ रहा था.

कवि कैलाश वाजपेयी [फाइल फोटो] कवि कैलाश वाजपेयी [फाइल फोटो]

हिंदी में सूफी चेतना के बड़े कवि और वाग्‍गेयकार कैलाश वाजपेयी की आज जयंती है. 11 नवंबर, 1936 को हमीरपुर में वह पैदा हुए और जब से कविता की शै लगी, इस संसार से विदा लेने की तारीख 01 अप्रैल, 2015 तक यह लौ उनमें जलती रही. उनका लेखन जितना विशद है, उतना ही भारतीय व पाश्‍चात्‍य चिंतन से अनुप्राणित भी है. हम कह सकते हैं कि उनकी कविताएं विश्‍व-युगीन यथार्थ से परिचालित हैं. साहित्य आजतक के लिए बीती बीसवीं शताब्‍दी और इस सदी के बौद्धिक चिंतन व काव्‍य पर कैलाश वाजपेयी की छाप का अनुशीलन कर रहे हैं वाजपेयी पर विनिबंध के रचयिता डॉ ओम निश्‍चल.
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कवियों के निर्माण में समय का बहुत महत्त्व होता है. इसीलिए आधुनिक आलोचना में कवि काल को 'कवि-समय' कहे जाने की परंपरा है. कवियों को उनके देश-काल से पहचाना जाता है. हर कवि अपने देश-काल की उपज होता है. इसीलिए कहा जाता है कि उस काल के समाज का अध्ययन करना है तो फलां कवि को पढ़ो. कई गद्यकृतियों के बारे में यह कहा जाता है वह अपने समय का समाज शास्त्र  है या हमारे समय की राजनीति का दर्पण है. उदाहरणत: रागदरबारी को लें तो यह कहा जा सकता है कि वह अपने समय की प्रशासनिक मशीनरी और कस्बाई समाज का बेहतरीन दस्तावेज है. पर जिस तरह गल्प के नैरेटिव में यह सहज ही संभव है कि हम आसानी से उसके भीतर किसी बड़ी घटना, इतिहास के किसी कालखंड अथवा समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था की एक सांकेतिक झांकी पा सकें, उस तरह कविता में संभव नहीं है. बहुत अखबारी यथार्थ या समसामयिकता को आधार बना कर लिखी कविताओं में यह सुविधा होती है कि हम आसानी से उसका देशकाल निर्धारित कर सकें या उसकी विषय-वस्तु के आधार पर किसी सामाजिक प्रवृत्ति, या ऐतिहासिक परिवृत्ति की झलक पा सकें. किन्तु एक अच्छा कवि कविता में देश-दुनिया के अनुभवों को संवेदना में संजो कर प्रस्तुत करता है.
इस आधार पर कुछ कवि चुनौती की तरह होते हैं. उनकी कविताएं सूक्ष्म होती हैं. जैसे केदारनाथ सिंह, कुंवर नारायण, विनोद कुमार शुक्ल, मंगलेश डबराल, अशोक वाजपेयी, अरुण कमल, हेमंत शेष, ऋतुराज, सविता सिंह, अनीता वर्मा, गगन गिल, आशुतोष दुबे, प्रेमरंजन अनिमेष ऐसे कवियों में हैं जिनकी कविताओं की अंतर्वस्तु को जतन से खोलना पड़ता है. मुक्तिबोध, धूमिल, आलोक धन्वा, ज्ञानेन्द्रपति,  देवीप्रसाद मिश्र, राजेश जोशी, कुमार अम्बुज, कुबेरदत्त जैसे कवियों के यहां कविताएं बता देती हैं कि इसका कथ्य, क्या है, उनका वैश्विक संदर्भ क्या है, उनकी कविताओं में शताब्दी की छाया कैसी पड़ रही है. शुद्ध कविता के हामी कवियों की कविताओं का स्थापत्‍य कुछ अलग होता है जैसे शिरीष ढोबले, प्रेमशंकर शुक्ल और तेजी ग्रोवर- वहां रुप, रस, गंध, ध्वनि, व्यंजना और रीति की अनेकार्थी भंगिमाएं मिलती हैं.
कैलाश वाजपेयी की कविता का एजेंडा भले ही दार्शनिक आध्यात्मि्क या सूफियाना किस्म का हो, उसमें वैश्विक संदर्भ छिपे नहीं रहते. उनमें देश-काल की प्रतिच्छाया नजर आती है. भारत या विश्व के स्तर पर इन दिनों जो घट रहा था, वह उनकी कविताओं में छन कर आ रहा था. वाजपेयी के यहां भी जो निराशा, हताशा, ग्लानि, निषेध, प्रतिरोध और विचार की प्रतिच्छाया मिलती है, वह हमारे देश और काल की देन है. इसे ही विष्णु खरे काल और अवधि के दरमियान होना कहते थे. कैलाश जी ने भले ही कुछ दिनों अकविता की राह अपनाई हो किन्तु वे कविता को अंतत: सामाजिक उपयोगिता की चीज मानते थे. अकविता के साथ ऐसे उद्देश्य न थे. एकाधिक कवियों को छोड़ कर अधिकतर जुगुप्साधायक बिम्बों की रचना कर कविता को संकीर्णताओं और आत्मरति के घेरे में डाल कर खुश थे. कविता के इस अराजक उल्लास के समय श्रीकांत वर्मा, कैलाश वाजपेयी, रघुवीर सहाय जैसे अनेक कवि थे जो राजनीतिक सरोकारों के कवि थे. श्रीकांत वर्मा का मिजाज प्रारंभिक दौर यानी भटका मेघ, जलसाघर, दिनारंभ में कैलाश से मिलता है, जब वे नकली कवियों की वसुंधरा पर क्षोभ से भरे होते थे:
'बरस रहा है अंधकार!
मगर उल्लू के पट्ठे!
स्त्रियाँ-रिझाऊ कविताएँ
लिख रहे हैं
भेड़ियों के कोरस की तमाच्छन्न
अंध-रात्रि!
मनुष्य के अंदर
मनुष्य,
सदी के अंदर
एक सदी खो रही है.
पर 'मगध' के बाद उनका कवि अलग सरणि अपना लेती है जो 'गरुड़ किसने देखा है' तक अपने चरम परिपाक पर होती है. रघुवीर सहाय लोहियावादी समाजवादी विचारधारा से संपृक्त थे तो उनकी कविताओं में भी साठोत्तर मोहभंग की छाया मिलती है. धूमिल में निषेध, प्रतिरोध तथा लोकतांत्रिक सामाजिक विचार की एक गहरी कौंध मिलती है. बल्कि कहा जाए कि धूमिल अपने समय की कविता की एक सशक्त आवाज बन कर उभरे अन्यथा अकविता अपना जाल समेट कर कविता चर्या के इतिहास से बाहर नहीं होती.
जैसा कि एक कविता में श्रीकांत वर्मा ने लिखा है, 'संभव नहीं है कविता में वह सब कह पाना जो घटा है बीसवीं शताब्दी के साथ.' हालांकि एक जगह श्रीकांत वर्मा ने इशारे से ही कहा है कि मैं 'गलत समय की कविताएं लिखता हुआ नकली सिगरेट पी रहा हूं' पर इस कहने के पीछे एक आशय है. यानी कविता में समय महत्त्वपूर्ण है. देश यानी स्थान महत्त्वपूर्ण है. बिना ऐसा किए जैसे नकली सिगरेट पीना हो या नकली कविताएं लिखनी हों. प्रश्न यह है कि क्या कवियों में उनका समय और उनका स्थान प्रतिबिम्बित होता है? होता है या नहीं? कैलाश वाजपेयी में उनका देश-काल व्यंजित होता है. बीसवी सदी का समय तो व्यंजित होता ही है, इक्कीसवी सदी के डेढ़ दशक भी प्रतिबिम्बित होते हैं. उस दौर की सबसे बड़ी आवाज मुक्तिबोध की थी गो कि तब तक वह पहचानी न गयी थी किन्तु वे अपनी कुछ फुटकर कविताओं अँधेरे, ब्रह्मराक्षस आदि से व अपने निबंधों से चर्चा में आ चुके थे. वे अपने वक्त के मोहभंग व पूंजीवादी साम्राज्यवादी शक्तियों के जबर्दस्त आलोचक कवि थे. 64 में अनेक प्रयत्नों से उनका संग्रह 'चांद का मुँह टेढ़ा है' आ सका, जबकि श्रीकांत वर्मा व कैलाश वाजपेयी के एक-एक संग्रह प्रकाशित हो चुके थे. रघुवीर सहाय का संग्रह सीढ़ियों पर धूप में भी '60 में प्रकाशित हो चुका था. धूमिल की 'पटकथा' मुक्तिबोध के 'अँधेरे में' के ही समानांतर साठोत्तर मोहभंग की कविता है, जो उनकी कुछ महत्त्वपूर्ण कविताओं में गिनी जाती है. नेहरूवियन मॉडल की तीखी आलोचना धूमिल ने की. मोहभंग की यह आंच लगभग अनेक समकालीनों में प्रतिबिम्बित हुई. कैलाश वाजपेयी इसके अगुआ थे.
बीसवीं शताब्दी अनेक घटनाओं और परिणतियों की साक्षी रही है. एक तरफ देश गुलाम था. आजादी की सुगबुगाहट यों तो 1857 से ही शुरू हो चुकी थी किन्तु बीसवी शताब्दी के पहले दशक के बाद यह लड़ाई आगे बढ़ी और अनेक पड़ावों से होती हुई 1947 तक पहुंची. किन्तु इससे पहले 1917 में हुई बोल्शेविक क्रांति ने रुसी साम्यवाद को परचम फहराने का अवसर दिया. एक विचारधारा के रूप में वह उसकी असाधारण विजय थी. किन्तु दो-दो विश्वयुद्धों ने बीसवीं शताब्दी को हिला दिया. पहला विश्वयुद्ध 1914 से 1918 तक यूरोप, एशिया व अफ़्रीका तीन महाद्वीपों और समुद्र, धरती और आकाश में लड़ा गया. इस युद्ध के कारण हुई जन, धन व भौगोलिक क्षति के अभूतपूर्व आंकड़ों के कारण ही इसे विश्व युद्ध कहते हैं. कहा जाता है, ''पहला विश्व युद्ध लगभग 52 माह तक चला और उस समय की पीढ़ी के लिए यह जीवन की दृष्टि बदल देने वाला अनुभव था. क़रीब आधी दुनिया हिंसा की चपेट में चली गई और इस दौरान अंदाज़न एक करोड़ लोगों की जान गई और इससे दोगुने घायल हो गए. इसके अलावा बीमारियों और कुपोषण जैसी घटनाओं से भी लाखों लोग मरे. विश्व युद्ध ख़त्म होते-होते चार बड़े साम्राज्य रूस, जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी (हैप्सबर्ग) और उस्मानिया ढह गए. यूरोप की सीमाएं फिर से निर्धारित हुई और अमेरिका निश्चित तौर पर एक 'महाशक्ति बन कर उभरा.' भारत से ब्रिटेन की ओर से युद्ध करने गए 10 लाख से ज्यादा सैनिकों में 60 हजार से ज्यादा शव बन कर लौटे. 70 हजार से ज्यादा जख्मी हालत में आए. किसी का हाथ नहीं रहा तो किसी का पैर नहीं था, किसी की आंख नहीं थी तो कोई किसी काम के लायक ही नहीं बचा था. इसके अलावा हजारों जवान इस युद्ध में लापता भी हुए जिनके बारे में कुछ पता नहीं चल सका.
पहले विश्वयुद्ध में रूस की बहुत क्षति हुई. 6 लाख से अधिक रूसी सैनिकों की मौत हो गई और रूस में धन का अभाव पैदा हो गया. लोगों को खाने के लिये रोटी का भी मिलना मुश्किल हो गया. मार्च 1917 आते-आते जनता की दशा अत्यंत ही दयनीय हो गई थी. भूमि सुधारों की विफलता, श्रमिकों की चिंताजनक स्थिति और जनता की आवाजों के दमन की कठोर नीतियों के कारण भूखी जनता अपने आपको नियंत्रण में नहीं रख सकी. उसने बाज़ार में लूट-मार करनी आरंभ कर दी. जारशाही से मुक्ति का एक बड़ा अभियान शुरू हुआ. सन 1917 की रूस की क्रांति विश्व इतिहास की सबसे महत्त्वपूर्ण घटनाओं में से एक है. इसके परिणामस्वरूप रूस से ज़ार के स्वेच्छाचारी शासन का अन्त हुआ तथा रूसी सोवियत संघात्मक समाजवादी गणराज्य की स्थापना हुई. सात नवंबर, 1917 को बोल्शेविक पार्टी के नेता ब्लादिमीर इल्यीच लेनिन के नेतृत्व में वामपंथी क्रांतिकारियों ने ड्यूमा की सरकार के खिलाफ रक्तहीन क्रांति के ज़रिये सत्ता पर दबदबा कायम कर लिया. लेनिन ने एक ऐसी सरकार बनाई, जिसमें किसानों और कामगारों को प्रतिनिधि नियुक्त किया गया. इस प्रकार लेनिन के नेतृत्व में रूस के औधोगिक मज़दूरों की एक राजनीतिक पार्टी बोल्शेविक ने 1917 में रूस में क्रांति को सफल बनाया.
दुनिया के इतिहास ने इस काल में अनेक तानाशाह देखे हैं. जर्मनी की सत्ता में 1933 में आए अडोल्फ़ हिटलर ने एक नस्लवादी साम्राज्य की स्थापना की, जिसमें यहूदियों को हेय करार दिया गया और उन्हें इनसानी नस्ल का हिस्सा नहीं माना गया. 1939 में जर्मनी द्वारा विश्व युद्ध भड़काने के बाद हिटलर ने यहूदियों को जड़ से मिटाने का संकल्प ले लिया. उन्हें एक जगह इकट्ठा करने और मार डालने के लिए यातना शिविरों में  ठूंस-ठूंस कर लाया जाता और वहां बंद कमरों में जहरीली गैस छोड़कर मार डाला जाता. जो काम नहीं कर पाते उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाता, जबकि बाकी बचे यहूदियों में से ज्यादातर भूख और बीमारी से दम तोड़ देते. युद्ध के छह साल के दौरान नाजियों ने तकरीबन 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी, जिनमें 15 लाख बच्चे थे. यहूदियों को जड़ से मिटाने के अपने मकसद को हिटलर ने इतने क्रूर ढंग से अंजाम दिया कि दुनिया की एक तिहाई यहूदी आबादी खत्म हो गई.
द्वितीय विश्वयुद्ध 1939 से 1945 तक चला. लगभग 70 देशों की थल-जल-वायु सेनाएं इस युद्ध में सम्मलित थीं. इस युद्ध के दौरान विश्व दो भागों मे बंटा हुआ था- मित्र राष्ट्र और धुरी राष्ट्र. सभी महाशक्तियों ने अपनी आर्थिक, औद्योगिक तथा वैज्ञानिक क्षमता इस युद्ध में झोंक दी थी. इस युद्ध में विभिन्न राष्ट्रों के लगभग 10 करोड़ सैनिकों ने हिस्सा लिया, तथा यह मानव इतिहास का सबसे ज़्यादा घातक युद्ध साबित हुआ. इस महायुद्ध में 5 से 7 करोड़ व्यक्तियों की जानें गईं क्योंकि इसके महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम में असैनिक नागरिकों का नरसंहार- यानी होलोकॉस्ट- तथा परमाणु हथियारों का एकमात्र इस्तेमाल भी शामिल है, जिसकी वजह से युद्ध के अंत मे मित्र राष्ट्रों की जीत हुई. इसी कारण इसे मानव इतिहास का सबसे भयंकर युद्ध मानते हैं, जिसमें सन् 1944 और 1945 के दौरान अमेरिका ने कई जगहों पर जापानी नौसेना को शिकस्त दी और पश्चिमी प्रशान्त के कई द्वीपों में अपना क़ब्ज़ा बना लिया. जब तक जापानी द्वीप समूह अपने ऊपर इन खतरनाक आक्रमणों का घातक उत्तर देता अमेरिका ने जापान में दो परमाणु बम गिरा दिये, नतीजतन जापानी साम्राज्य को आत्मसमर्पण करना पड़ा. 15 अगस्त, 1945 को दूसरा विश्वयुद्ध समाप्त हो गया.
बीसवीं शताब्दी की इन दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के साथ भारत का विभाजन भी एक दंश की तरह सामने आया, जो आज भी हमारे जेहन में मौजूद है. आजादी के उत्सव के पीछे विभाजन की पीड़ा और चीख दब कर रह गयी किन्तु एक ऐतिहासिक तारीख के पीछे बंटवारे ने हिंदू व मुसलमानों के दिलों पर जो निशान छोड़े वे आज भी याद आते हैं. अनेक उपन्यास इस बारे में लिखे गए- झूठा सच, आधा गांव, तमस व जिन्दगीनामा आदि इनमें प्रमुख हैं. उस दौरान कवियों ने भी विभाजन की पीड़ा व्यक्त की.
सन 80 के दशक में सोवियत संघ के विघटन के बाद विश्व में पूंजीवादी शक्तियों का अभ्युदय हुआ है.  पूंजीवादी शक्तियों ने मार्क्सवाद की प्रासंगिकता पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है. पूंजी व कॉरपोरेट घरानों ने फिर एकाधिकारवादी रवैया स्थापित करना शुरू कर दिया है. मुक्त बाजार से देशों की सीमाएं खुलने के कारण पूंजी व विदेशी सामानों को तीसरी दुनिया के देशों में खपाने की युक्तियां शुरू हो गयीं. पूंजी व सत्ता के गठजोड़ से 90 के बाद आर्थिक उदारतावाद ने एकाधिकारवाद का एक नया रास्ता प्रशस्त किया है. इस बीच सूचना संजाल, इंटरनेट, सोशल मीडिया, इलेक्ट्रानिक चैनलों के साथ एक नया विश्व बाजार उभर रहा है. पर इसका सबसे बड़ा नुकसान विश्व पर्यावरण, गांव, गरीब और पारिस्थितिकी का हुआ है. कोरोना की मार ऐसे ही नहीं आ गई है. आसमान में धूल और गुबार, असमय तूफान, ओलावृष्टि और सूखा यों ही नहीं है. जलवायु परिवर्तन के कारण आज सम्पूर्ण मानव जाति का अस्तित्व खतरे में है. ऐसे हालात में मार्क्सवाद, समाजवाद या गांधी का ग्राम स्वराज ही इन समस्याओं का समाधान प्रस्तुत कर सकता है और एक टिकाऊ मानवीय व्यवस्था के निर्माण का ज़रिया बन सकता है. जल जंगल और जमीन पर काबिज होने की कॉरपेारेट घरानों की महत्त्वाकांक्षा के चलते आज जंगल उजड़ रहे हैं, हरापन खत्म  हो रहा है, आदिवासियों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है.
व्यापार ही आज सब कुछ है, जबकि तथ्य यह है कि कच्चे माल के दोहन के लिए अंग्रेजों और यूरोपियों ने अनेक देशों को उपनिवेश बनाया. दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला के नेतृत्व में रंगभेद से उबरने के लिए लंबा संघर्ष चला. रंगभेद विरोधी संघर्ष के कारण उन्होंने 27 वर्ष रॉबेन द्वीप के कारागार में बिताये जहां उन्हें कोयला खनिक का काम करना पड़ा था. 1990 में श्वेत सरकार से हुए एक समझौते के बाद उन्होंने नये दक्षिण अफ्रीका का निर्माण किया. वे दक्षिण अफ्रीका एवं समूचे विश्व में रंगभेद का विरोध करने के प्रतीक बन गये. अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के इस संघर्ष को भारत ने भी समर्थन दिया. अफ्रीका के कवियों की कविताएं भारत के कवियों की भी प्रेरणास्रोत बनीं. अश्वेत चेतना के कवियों में क्वेसी ब्रेव, गैब्रियल ओकारा, वोल सोयिंका, बर्नाद बी दादेय, रैफेल आरमेटो की कविताओं में रंगभेद के जो त्रासद व सूक्ष्म ब्यौरे मिलते हैं उनसे साठ के दौर के भारतीय कवियों ने प्रेरणा हासिल की.
विश्व की इन घटनाओं ने कवियों लेखकों पर प्रभाव डाला है. कैलाश वाजपेयी की कविताएं एक तरफ भारत के सत्तावर्ग की विफलताओं से उपजे मोहभंग व हताशा की देन हैं दूसरी ओर विश्व के स्तर पर पूंजी के बढ़ते दबदबे व मनुष्य के अकेले होते जाने की पीड़ा का इज़हार हैं. वे मुंबई में लिख रहे थे:
यह अधनंगी सी शाम और यह भटका हुआ अकेलापन
मैंने फिर घबरा कर अपना शीशा तोड़ दिया.
पूंजी उस दौर में जो विकृतियां पैदा कर रही थी, कैलाश वाजपेयी का कवि उस पर ऐसी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए बाध्य था:  
मैं इन सस्ते और ऐयाश लोगों के बीच
जो सिक्के चबाते हैं और केकड़े की तरह चिपक जाते हैं
रहते रहते सोचता हूं-
क्या पड़ी थी ईश्वर को
जो बैठे बिठाए मांस के वृक्ष उगाए. (संक्रांत, पृष्ठं 23)
इसी मानसिक हालात में उनका विक्षुब्ध कवि कह रहा था:  
मैं इस व्यस्त अनिश्चित नंगी दुनिया में
कुछ यों हूं
जैसे- निर्वासित हूं
भीतर जिंदा हूं लेकिन भूकंप धँसा......
अब मेरा अस्तित्व यहां कुछ ऐसा है
जैसे ताजा कमल खौलते पानी में
मैं... दुनिया में. (संक्रांत, निशब्द गूँज, पृष्ठ 36)

वे विश्व में होती हिंसा पर यों पाश्चाताप करते हैं-

इस क्रमिक हत्या का साक्षी
सामूहिक हत्या का साक्षी
लगता है जैसे कुतुब की ऊंचाई पर खड़ा हूं मैं
मेरे सर पर मंडराती है
मरे हुए भाइयों की भूखी प्रेतात्मा़ और
भीतर सिसकता है कुचला हुआ बच्चा... (संक्रांत, राजधानी, पृष्ठ 45)
इस तरह बीसवीं शताब्दी युद्ध, हिंसा, बर्बरता, नस्लभेद व नरसंहारों के जिस क्रूर समय से गुजरी है एक बुद्धिजीवी या तो शीशे के बंद महल में इन चीखों को अनसुना कर रह सकता था या यही कह सकता है जो कैलाश वाजपेयी कह रहे हैं-
कांच के घर में दीवाली मनाकर
अब पिघली आग में दबे दबे
पागल की तरह हंसूं- या
खुशहाल दुनिया की मृत्यु पर शोकगीत गाऊं
सुनने वाला कोई नहीं. (संक्रांत, कोई नहीं, पृष्ठ 108)
कैलाश वाजपेयी की कविता जब मैं कहता हूं अन्य समकालीनों से जुदा थी, तो इस मायने में कि जिस बीसवीं शताब्दी में इतना कुछ पृथ्वी के साथ घटा हो, उसे सोच कर कोई कवि सहम जाए. तभी श्रीकांत वर्मा कहते हैं: जो कुछ घटा है इस शताब्दी के साथ उसे कह पाना संभव नहीं. जबकि कैलाश वाजपेयी यह जानते थे कि उनके प्रतिरोध को एक बीमार आदमी के हैल्यूीसिनेशन के रूप में लिया जा सकता है. इसीलिए वे कहते थेः
'ओ तमाम समझदार लोगों!
मैं तुम्हारी मन:स्थि‍ति के ठीक विपरीत हूं
मुझे माफ करो.'
इसी तरह 'देहांत से हट कर' में वे कह रहे थे:
कहीं भी गए बिना
कहे बिना कुछ भी
लगातार- मैं मर रहा हूं
मर रहा है एक-संसार
और यह भी कि इन तमाम शव-भोगी लोगों के बीचः
ओ मेरे मरे हुए देश
आंसू आ जाते हैं सोचकर
कल सुबह तेरी
लाश तक पहिचानी न जाएगी. (देहांत से हटकर, देश- एक शोकगीत, पृष्ठ 36).
यही कारण है कि उन्होंने मुक्‍तिबोध और धूमिल की तरह हिंदी की दुनिया के सुविधावादी बुद्धिजीवियों को अच्छी तरह पहचान लिया था कि वे सब एक कवि के शब्दों में पूंजी के ही दुभाषिए हैं और तब जिस हताशा में उन्हें कहना पड़ा कि-
'गाली देना, हम पर थूकना कि पशु परिस्थितियों के बीच भी
हमने उम्र काट दी हत्या किए बिना
.....कि हम सब उच्छिष्ट थे मज्झिम निकाय के!
और अपने बहाने उन्होंने बुद्धिजीवियों के छद्म आचरण पर तंज करते हुए कहा कि-
दरअसल हम बहुत बड़े ढोंगी थे
अपने जमाने के
नफरत भी करते थे सत्ता से का़यल थे
पूँछ भी हिलाने के
यों बुद्धिजीवी थे, घायल थे.  
और यह पृथ्वी जिस पर बीसवीं सदी में इतने अत्याचार हुए उसे औरत के रूपक में ढालते हुए कवि कहता है-
'एक औरत जो जन चुकी है कई अरब बच्चे,
कई सौ सालों से, बीमार लेटी है.
और पुन: उसकी यथास्थितिशीलता पर निष्कर्ष जड़ते हुए कवि कहता है:
औरत बड़ी ढीठ है-
हजार दुखों से चिथड़ा चिथड़ा
चिल्लाती भी जाती है
और बेतहाशा बच्चे भी दिए जाती है.' (तीसरा अंधेरा, मानुषी, पृष्ठ 88 )
कहने के लिए 'पृथ्वी का कृष्ण पक्ष' परीक्षित के असमय अवसान की पीड़ा का गान है. पर यह कवि के ही शब्दों में मृत्यु के बहाने जीवन और प्रेम का उद्घोष है. इस काव्य में अंतत: वे कृष्ण़मयता में प्रमत्त हो उठते हैं. क्योंकि कृष्ण के जीवन में उन्हें असाधारण मनुष्य के संघर्ष की छवि दिखती है: दुसह दुखपूर्वक जन्म, जीवन चर्या, बाल लीलाएं, दायित्वबोध, धर्मसंस्थापनार्थ युद्ध, विपत्तियों का सामना व अंत में जंगल में देहत्याग- क्या नहीं है जो मनुष्य के कार्यभार से उन्हें न जोड़ते हों. पर इस काव्य में भी वे अपने समकाल को नहीं भूलते. इस काव्य की 'निष्कर्ष' कविता में वे कहते हैं-
ज्यादातर लोग जीते हैं परजीवी जिन्द्गी
प्रेम नहीं कहीं
होता तो क्यों इतना दुख अशांति
हाय हाय होती संसार में. (पृथ्वी का कृष्ण पक्ष, पृष्ठ 122)
वे कविता की कोख की पीड़ा को भी कसौटी की तराजू पर तोलते हैं:
प्रसव से दारुण कोई पीड़ा नहीं
                               कविता
वह कविता केवल नारी को लिखनी आती है
भरा पड़ा संसार - कवियों कुकवियों के गिरोह से
कहीं छल छंद कहीं बंध निर्बंध
कहीं ललित स्खलित निबंधकार
                             आतुर कवि कहलाने को.
मामूली कवि तक को खलती है
                           कृति की अवमानना
तब उस मां को क्या कहें
                           जिसकी नियति रही कराहना. (पृथ्वी का कृष्ण पक्ष, कोख, पृष्ठ 82)
बीसवी शताब्दी की व्याधि केवल यह नहीं कि यह युद्धों और नरसंहारों का समय है. यह दरअसल करुणा, मानवता, क्षमा, दया, त्याग के लोप का कभी समय है. यह बर्बर महत्त्वाकांक्षाओं का समय है. यह ऐसा समय है जब नैतिकता और सत्य कितनी भी गवाहियां दे लें, लोगों का लोगों पर से भरोसा उठ गया है. ऐसे समय में एक सच्चा इस निर्मम सत्य को कैसे झुठला सकता है कि-
जंगल में जंगल नहीं बचे
        नदियों में परनाले बह रहे
एक पिता वक्तव्य दे रहे
         सो बेटी जितनों के साथ सो सके -सो
गर्भ न हो ध्यान रहे!
कन्याएं मंच पर
गुप्त न कुछ
    कहें किसको गुप्तांग
वेश्याएं सन्न कैसे क्या हो उनकी पहचान
छ: अरब लोग चढ़े चूस रहे पृथ्वी को
प्राण छटपटाते प्राणवायु के. (वही, परीक्षित का दु:स्वप्न, पृष्ठ, 112)
कवि केवल द्रष्टा ही नहीं, भोक्ता भी होता है. वह भी संसार का प्राणी होता है. वह रच रहा होता है तो प्रजापति की भूमिका में होता है. वह जानता है कि यह संसार जरा, रोग, मृत्यु, हिंसा और अवसान का संसार है. जैसे नित्य प्रति होने वाली गतिविधियां भी कोई अदृश्य बागडोर संचालित कर रही हो. परीक्षित को संबोधित करते हुए कवि कहता है:
परीक्षित!
गिरने के लिए
    पकना जरूरी है
प्रेम के लिए जैसे पिघलना
बरसने के वास्ते भाप बनकर
अपने आप फटना.
यदि परदुख कातरता कवि का वैशिष्ट्य माना जाए तो शायद यह गांधी के प्रिय भजन 'जे पीर पड़ाई जाने रे' का ही अंतर्भाव कहा जा सकता है. बुद्ध की पीड़ा, गांधी की छटपटाहट, जे कृष्णमूर्ति की उदास और तेजस्वी आंखें, कबीर की निष्पृहता सब मिला कर जिस भावानुभाव का निर्माण करती है वह कैलाश-भाव है. ऊपर से पलायनवादी, निराशावादी, युयुत्सावादी, विक्षुब्धतावादी-सी लगने वाली कविताओं के बावजूद उसका भीतरी सत्व कवि की करुण वेदना से सिंचित है, तभी तो वह 'पृथ्वी का कृष्ण पक्ष' में कहता है:
किसी दूसरे के न रहने में
अपना न रहना भी दीख जाए
        भूखे की भूख में
दीनों की आह में अपनी संपन्नता
        अश्लील लगे
तब उस फंदे की कुछ झलक शायद मिल पाएं. (वही, समाधान, पृष्ठ 59)
बीसवीं शताब्दी को ध्यान में रखें तो कैलाश वाजपेयी की कविता का शीर्षक 'भविष्य घट रहा है' जैसे इस सदी की प्रतिश्रुति हो. जहां से मासूम बच्चों और मांओं की बेकल चीख सुन पड़ती हो, जहां बड़े से बड़े नाम डूब रहे हों, कपिल के सांख्य का आखिरी भोजपत्र फंसा फड़फड़ा रहा हो, जहां अस्ति से परास्त  विभवग्रस्त आदमी हो, दुख इतना संगीन कि ध्रुव एकांत में चुपचाप चले जाने का मन करे. वहां हजारों में कोई एक कवि होता है जो बहती गंगा में हाथ धोने के बजाय सच कहने पर आमादा होता है. यों तो सारे कवि अपने समय के समकालीनता के कवि होते हैं किन्तु जिससे यह शताब्दी यह पृथ्वी अपने दुख का हाल बताती है वह कोई कैलाश वाजपेयी जैसा अनूठा कवि होता है.
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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. आपकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. आप हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, मेल dromnishchal@gmail.com

 

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