scorecardresearch
 

संस्मरणः मेरे अनन्य सहचर हरिपाल त्यागी

हरिपाल त्यागी जिंदगी, जिंदादिली और उम्मीदों से भरे शख्स थे, जिनसे मिलने पर दुख की परछाईं तक आपके पास नहीं फटक सकती थी. मन में आस्था की एक लौ सी जागती थी.

X
रचनाकार, कलाकार हरिपाल त्यागीः यारों के यार रचनाकार, कलाकार हरिपाल त्यागीः यारों के यार

हरिपाल त्यागी को गुजरे पूरे तीन बरस हो गए. ब्लड कैंसर से लड़ते हुए 1 मई, 2019 को उन्होंने जीवन की आखिरी सांसें लीं. जिसे दुख, दुर्दिनों के लाख थपेड़े नहीं हरा सके, एक कड़ियल इनसान और बहादुर योद्धा की तरह कैंसर से लड़ते-लड़ते वे गए. उन्हें गए हुए इतना वक्त बीत गया, और अब तक मैं खुद को यकीन नहीं दिला सका हूं कि वे चले गए. 
पर खुद मेरी जिंदगी में दूर-दूर तक बजता सन्नाटा बताता है कि कुछ अघट घट गया है. जो नहीं होना चाहिए था, वह हो गया. 
त्यागी जी अब नहीं रहे. या शायद हैं तो, पर अब नजर नहीं आते. शायद वे अपनी स्मृतियों के परदे में छिप गए हैं और सारी चीजों से ओट हो गए हैं.
त्यागी जी सबके थे. सबके अपने. हर किसी से बड़ी प्रफुल्लता से, बल्कि दोनों बांहें खोले खूब धधाकर मिलने और प्यार बांटने वाले. उनकी शानदार दाढ़ी के बीच से झांकती सदाबहार मुसकान तब और चौड़ी और स्नेहिल हो जाती. लिहाजा हर किसी को लगता था, मेरे वे अपने हैं. सबसे अपने, सबसे करीब.
खुद मुझे यह गलतफहमी थी, और इसे वे खुद पोसते रहते थे. इस प्यार से गले लगाते और पीठ ठोंकते थे कि मेरा कोई प्यारा से प्यारा आत्मीय सुहृदजन भी इतनी शिद्दत से न मिलता होगा. बड़े भाई या पिता की तरह मेरी निजी जिंदगी और घर-परिवार की छोटी से छोटी बातों की चिंता करते और दुख-परेशानियों में बड़ी हिम्मत बंधाते.
वे जिंदगी, जिंदादिली और उम्मीदों से भरे शख्स थे, जिनसे मिलने पर दुख की परछाईं तक आपके पास नहीं फटक सकती थी. मन में आस्था की एक लौ सी जागती थी. लगता था, परेशानियां हैं तो क्या हुआ? मुश्किलें हैं तो घबराना कैसा. कुछ न कुछ होगा. कुछ न कुछ जरूर हो जाएगा.
और यही अफाट आस्था, यही गहरा-गहरा सा आत्मविश्वास उनके मन में खुद को लेकर था. कोई बड़ी से बड़ी बीमारी उन्हें हिला नहीं सकती- यह पक्का यकीन, बल्कि अदम्य विश्वास. मिलने पर हमेशा कहते थे, "अभी तो मैं बिल्कुल ठीक हूं....अभी मेरी उम्र ही कितनी है. मैं कम से कम बीस साल और जिऊंगा."
पर वे गए. चले गए. और बहुत कुछ रीता करके गए.
उनके जाने से मैंने क्या खो दिया, शायद मैं कभी बता नहीं पाऊंगा. शायद शब्दों में उसे बताया भी नहीं जा सकता. शायद कुछ हों, जो उसे महसूस कर सकते हों. शायद न हों.
अब किसे अपने भीतर का खालीपन दिखा पाऊंगा? दूर-दूर तक पसरा उजाड़ और निरंतर किसी शोकधुन की तरह बजता सन्नाटा!...ऐसे में किसे कंपकंपाती जबान से बता पाऊंगा कि वे मेरे लिए क्या थे! मेरे दोस्त भी, पिता भी, प्यारे भाई भी, मेरी जिंदगी के प्रेरक और मार्गदर्शक भी. वे मेरी दुनिया के हीरो भी थे, और गाइड भी.
उनके बिना जिंदगी जीने की बात शायद मैं सोच भी नहीं सकता था.
मेरे पास जो कुछ भी था, उनके भरपूर स्नेह और आत्मीयता से आवृत्त था. अब भी है. पर...?
पर कुछ ऐसा घट गया है, जिसने मेरे अंदर बहुत कुछ तोड़ दिया है. उसे मैं कुछ-कुछ समझ पा रहा हूं, कुछ नहीं.
तुलसीदास जी ने कहा है, जो आपके सबसे अधिक प्रिय होते हैं, वे ही सबसे अधिक मर्मांतक कष्ट देते हैं. उनसे बिछुड़ना आपके प्राण हर लेता है. हरिपाल त्यागी भी मेरे लिए ऐसे ही थे. मुझे बनाने वाले, एक-एक ईंट करके मुझे गढ़ने वाले, और सच बताऊं तो आज जो कुछ भी मैं हूं, उसका पूरा नक्शा ही नहीं, नींव तक तैयार करने वाले. इसीलिए लगता है, वे जैसे मुझे बिल्कुल अकिंचन बनाकर चले गए हों.
माँ और पिता जी के जाने के बरसों बाद त्यागी जी के जाने से मैंने खुद को इतना अकेला, बल्कि अनाथ महसूस किया.
लगता है, अभी उन्हें जाना नहीं था, कहीं कुछ गलत हो गया. कुछ नहीं, बहुत कुछ गलत हो गया.
पर इसे कहूं कैसे, किस भाषा में? मैं नहीं जानता.
**
अपने जाने के कोई ढाई महीने पहले ही वे हमारे यहां आए थे. शायद फरवरी का महीना रहा होगा. तारीख तो अब याद नहीं, पर लगता है, फरवरी के दूसरे सप्ताह की वह बात होगी. और उस समय वे किस कदर उत्साह और जिंदगी से लबालब थे. मैं बताऊं तो शायद किसी को यकीन नहीं आएगा. बल्कि शायद हमीं कुछ डरे हुए थे. इसलिए कि उससे कोई दस-बारह दिन दिन पहले ही तो हम द्वारका के एक बड़े अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में उन्हें देखकर आए थे. और थोड़े अरसे बाद ही- हमें चकित करते हुए, अब वे खुद इतनी दूर से चलकर हमारे घर आ रहे थे.
'ईश्वर सब ठीक करे...!' अंदर एक प्रार्थना की सी लय.
अकेले में मेरे हाथ जैसे खुद-ब-खुद जुड़ गए.
मुझे अच्छी तरह याद है, वह खूब झमाझम बारिश वाला दिन था. सर्दियों की बारिश. खूब ठिठुरा देने वाली. हड्डियों के अंदर तक धंसती ठंड....लिहाजा जब त्यागी जी का फोन आया कि वे बदरपुर पहुंच चुके हैं और अभी थोड़ी ही देर में फरीदाबाद, सेक्टर 28 के मेट्रो स्टेशन पर पहुंचने वाले हैं, तो मैं अंदर से कांप उठा था. मैंने सुनीता को बताया तो उसके चेहरे पर भी चिंता की लकीरें गहरी हो गईं.
मौसम इस कदर खराब था कि अगर इस हाल में उन्हें कुछ हो जाता, तो हम खुद को जिंदगी भर माफ न कर पाते.
अभी थोड़े ही दिन पहले मैं और सुनीता उन्हें देखने अस्पताल गए थे, तब उन्हें काफी कमजोरी थी. साथ ही एसिडिटी और पाचन की भारी समस्या थी, पेट फूलता सा था और काफी बेचैनी हो जाती थी. पर असल बीमारी क्या है, इसका दूर-दूर तक कुछ अता-पता न था. एक के बाद एक निरंतर टेस्ट हो रहे थे. दवाओं पर दवाएं...! और त्यागी जी बगैर आह-ऊह किए, शांत भाव से यह सब झेल रहे थे. इस अदम्य विश्वास से भरे कि जल्दी ही सब ठीक हो जाएगा और फिर मैं घर जाकर खूब काम करूंगा.
'काम करूंगा...!' उनका सबसे प्रिय वाक्य था, जिससे उन्हें ताकत मिलती थी.
अभी उन्हें बहुत काम करने थे. बहुत काम. खूब ढेर सारी पेंटिंग्स बनानी थीं, स्केचेज और पोर्ट्रेट भी. और साथ ही बहुत सी अलग अंदाज की कहानियां लिखनी थीं, कविताएं, लेख, संस्मरण और तीखी व्यंग्यात्मक चोट करने वाली कुछ लघुकथाएं भी, जिनकी ओर इधर उनका रुझान बढ़ रहा था.
कम से कम बीस साल आगे तक की योजनाएं उनके पास थीं.
काम किए बिना कैसे रहा जाता है, उन्हें शायद पता नहीं था. और बहुत से काम तो- अगर बस चलता तो वे अस्पताल में ही कर लेना चाहते थे. कर नहीं पा रहे थे, पर मन में वही सब चलता था, बीमारी नहीं. इसलिए कि बीमारी तो आनी-जानी है. उसकी भला क्या चिंता की जाए! 
हमें देखकर वे बहुत खुश हुए. थोड़ी इधर-उधर की बात करने के बाद, यहां अस्पताल में किन-किन लोगों ने फोन करके हाल-चाल जाना चाहा या उनले मिलने की इच्छा प्रकट की- और कुछ लोग तो अस्पताल में मिलने आए भी, इस सबका बड़े विस्तार से वर्णन वे कर रहे थे. खासे संतुष्ट भाव से.
जब बीमारी के बारे में मैंने जानना चाहा तो उन्होंने बताया, "पता नहीं क्यों मनु जी, इधर भूख नहीं लगती. पेट हमेशा फूला सा रहता है. शायद पाचन की समस्या है, एसिडिटी...! डाक्टरों का कहना है कि लीवर में इनफेक्शन है....पर हो जाएगा सब ठीक. इधर बहुत सारे टेस्ट हुए हैं. उनकी रिपोर्ट भी आ जाएगी आज शाम तक...."
फिर जैसे मुझे तसल्ली देते हुए बोले, "बीमारी कुछ इतनी बड़ी भी नहीं है. पर घर पर तबीयत संभल नहीं रही थी. कभी-कभी तो इतनी कमजोरी आ जाती कि खड़ा रहना भी मुश्किल हो जाता....तो विशाल ने यहां अस्पताल में दिखाया. इन लोगों ने आई.सी.यू. में दाखिल कर लिया...."
बताते समय चेहरे पर भाव यह कि बीमारी-शीमारी तो चलती ही रहती है. अब उसकी क्या परवाह की जाए...? बीमारी अपना काम करे, हम अपना काम.
और फिर उन्होंने हमें वह पैड दिखाया, जिस पर क्लिप में बाकायदा कुछ कागज नत्थी किए हुए थे, और पास ही पेन भी रखा था. बोले, "मनु जी, आप पर लेख की शुरुआत तो मैंने कुछ दिन पहले ही कर ली थी. लेकिन सादतपुर में जो कुछ आप पर लिखा था, वह तो वहीं रह गया. साथ लाना याद नहीं रहा. इसलिए यहां अभी लिखने का तारतम्य तो नहीं बना, पर थोड़ा-बहुत कुछ लिखा है. हालांकि मन में तो सब कुछ है, बस कागज पर उतारना बाकी है...." 
कहकर वे खिक्क से हंसे. फिर पैड से निकालकर एक कागज दिखाया. उस पर बेहद सुथरी लिखाई में थोड़ा सा लिखा हुआ था, और आगे कुछ नोट्स...!
मेरे सत्तरवें जन्मदिन पर अनामीशरण बबल 'सृजन मूल्यांकन' पत्रिका का एक विशेषांक मुझ पर केंद्रित करना चाहते थे. कोई दस-पंद्रह दिन पहले उसी के लिए कुछ लिखने का आग्रह मैंने त्यागी जी से किया था. सुनते ही त्यागी जी उत्साह में आ गए थे, "जरूर लिखूंगा मनु जी. आप पर विशेषांक आ रहा है, तो मुझे तो लिखना ही चाहिए. वैसे भी बहुत सी बातें लिखने का मन था, जो इस बहाने लिखी जाएंगी."
और उसी दिन से जो कुछ लिखना है, उसका खयाल उनके भीतर चल पड़ा था. कोई डेढ़-दो पन्ने लिखे भी गए, पर फिर तबीयत खराब रहने लगी. बीमारी बढ़ी तो यहां अस्पताल में आकर दाखिल होना पड़ा. और फिर यहां ग्लुकोज ड्रिप के साथ-साथ बहुत सारी दवाएं, इंजेक्शन, टेस्ट पर टेस्ट...और फिर उनकी रिपोर्ट का इंतजार.
एक बहुत व्यस्त सिलसिला. पर उनके मन में तो वह लेख ही टिक-टिक-टिक कर रहा था, जो उन्हें मुझ पर लिखना था, और वह जो अनलिखा था, हर पल उनके भीतर चक्कर पर चक्कर काट रहा था.
"अब घर जाते ही सबसे पहला काम यही करना है कि आप पर संस्मरण पूरा करना है...!" त्यागी जी मुसकराते हुए कह रहे थे.
कुछ देर और उनसे बातें होती रहीं. फिर मैं और सुनीता उनसे विदा लेकर, घर आ गए. 
त्यागी जी को हमने खुद अपनी आंखों से देख लिया था. बीमारी की हालत में भी उनका आत्मविश्वास किस कदर दृढ़ और प्रबल था. यह देख कुछ-कुछ यकीन सा हो गया कि उन्हें जल्दी ही अस्पताल से छुट्टी मिल जाएगी.
**
और वाकई हम लोगों के आने के कोई चार-पांच दिन बाद त्यागी जी को अस्पताल से छुट्टी मिल गई. डॉक्टर ने कहा, "अब आपकी हालत ठीक है. मैं कुछ दवाएं लिख रहा हूं, जो आप घर पर खाते रह सकते हैं. इससे काफी आराम आ जाएगा. कोई हफ्ते भर बाद आकर आप फिर से दिखा दें. या फिर बीच में ही कोई परेशानी महसूस  हो, तो आप दिखाने आ जाएं."
त्यागी जी उसी तरह व्यग्रता से घर आए, जैसे कोई कैदी पैरोल पर छूटा हो, और अब अधूरे काम पूरा करने का मौका उसके हाथ में आ गया हो.
और उसके कोई हफ्ते भर बाद ही उनका फोन आ गया. मेरे 'हलो' कहते ही उनका उत्कंठित स्वर, "मनु जी, आप पर जो संस्मरण लिखना था, वह पूरा हो गया. मैं आ रहा हूं आपको सुनाने."
"अभी आप कहां हैं?" मैंने कुछ चिंतित होकर पूछा.
"मेट्रो में...! बस पहुंचता हूं, कोई दस-पंद्रह मिनट में." त्यागी जी का निश्चिंतता भरा जवाब.
"पर अब आपकी हालत...! डॉक्टर ने इजाजत दे दी...?"
"उसने दवाएं लिख दीं और कहा कि अब आपको यहां दाखिल होने की जरूरत नहीं है. घर पर लेते रहें, हफ्ते भर बाद फिर से आकर दिखाना...!"
"तो अब सादतपुर से आ रहे हैं या...?"
"नहीं, द्वारका से...! यहां अस्पताल में कुछ टेस्ट होने थे. करवाकर सीधा आपके यहां आ रहा हूं....असल में जैसे ही संस्मरण पूरा हुआ, मन हुआ कि मनु जी को पढ़कर सुनाऊं!" फोन पर ही उनकी हर्षित आवाज का प्रकंप मैं महसूस कर सकता था.
"त्यागी जी, आप स्टेशन पर ही इंतजार करें. मैं आपको लेने आ रहा हूं." कहते हुए मेरी आवाज में उत्तेजना थी.
उस दिन बेटी ऋचा घर पर ही थी. मैंने उसे बताया, त्यागी जी आ रहे हैं....
उसे उनकी बीमारी का पता था.
"अरे, इस बारिश में आ रहे हैं त्यागी जी? मौसम बहुत खराब है, फिर उनकी तबीयत...!" वह भी चिंतित हो उठी.
फौरन उसने गाड़ी निकाली. झटपट हम सेक्टर 28 के मेट्रो स्टेशन पहुंचे. वहां त्यागी जी बाहर की सीढ़ियों पर अपनी चिर-परिचित मुसकान के साथ हमारा इंतजार कर रहे थे.
मैं घर से छाता लेकर गया था, ताकि त्यागी जी भीगें नहीं. उस छाते की मदद से उन्हें गाड़ी तक लेकर आए. और फिर गाड़ी घर की ओर...!
घर पर सुनीता ने चाय और परांठे बना लिए थे. साथ ही आलू-गोभी की सब्जी और आम का अचार, जो त्यागी जी को खासा पसंद था.
त्यागी जी ने पूरी तृप्ति और आनंद से भरकर परांठे खाए. फिर खुश होकर बोले, "पता नहीं क्यों, वैसे तो ज्यादा भूख लगती नहीं है. पर जाने कैसे आपके यहां आकर भूख खुल गई....!"
हमारे लिए यह बड़े आनंद की बात थी. 
त्यागी जी पूरे जोश में थे. वे काफी दिनों बाद हमारे घर आए थे, यह खुशी उनके चेहरे क्या, पूरे वजूद से प्रकट हो रही थी. उन्होंने उत्साहपूर्वक पूरे घर के हालचाल लिए.
मैं भी विस्तार से त्यागी जी के हालचाल पूछना चाहता था. इस बीमारी का थोड़ा सा इतिहास भी, कि कब से वे परेशानी महसूस कर रहे हैं. पर त्यागी जी ने मेरी बातों को फूंक मारकर उड़ा दिया. अब वे दूसरी ही धुन में आ चुके थे. बोले, "आप दोनों लोग बैठिए. अब मैं सुनाऊंगा वह संस्मरण. बताइए कि कैसा लिखा गया है."
और फिर सचमुच उनके थैले के अंदर से निकलकर आए संस्मरण के पन्ने खुल गए. बड़ी सुथरी लिखाई में मोती जैसे घने-घने अक्षर....उन्होंने एक नजर उस पर डाली, थोड़ा हंसे, और फिर 'चलिए, अब सुन लीजिए', कहते ही त्यागी जी की वाग्धारा भी बह चली.
अब त्यागी जी सुना रहे थे, मैं और सुनीता सुन रहे थे. और क्या अंदाज था त्यागी जी के सुनाने का! अगर आपने उन्हें सुना नहीं, तो कभी समझ नहीं पाएंगे वे किस आनंद से ऊभ-चूभ होकर, बड़ी ही अद्भुत लय में पढ़ते हैं अपनी लिखी चीजों को. शब्दों पर पूरा जोर देते हुए, और ठहर-ठहरकर अभिव्यंजना की पूरी गूंज को फैलने का अवकाश देते हुए...!
मुझ पर बेतरह प्यार और आत्मीयता निछावर करते हुए उन्होंने यह संस्मरण लिखा था. पर बीच-बीच में व्यंग्य-विनोद के तीर न चलाएं तो भला त्यागी जी की कला का आनंद कैसे आएगा...?
तो जो बात जिस भाव से कही गई है, सामने वाले पर वही प्रभाव छोड़ पा रही है या नहीं, और जो छिपा हुआ इशारा उसमें है, वह सामने वाले के जेहन में ठीक-ठीक खुल पा रहा है या नहीं- यह जानने की बेहद उत्सुकता उन्हें रहती है. इसीलिए हर दूसरे-तीसरे वाक्य के बाद उनकी पैनी निगाहें आपके चेहरे पर जम जाती हैं. और जब वे कोई गहरी चोट करने वाला, बेधक और फड़कता हुआ वाक्य पढ़ते हैं, तो उसे पढ़ने के बाद किस तरह शरारती अंदाज में खिक-खिक करके हंसते हैं, वह कहकर समझाने की नहीं, खुद समझने की बात है.
उस समय क्या चमक होती है उनकी आंखों में, और कैसा आनंदोल्लास—यह शायद शब्दों में बयान किया ही नहीं जा सकता....
**
त्यागी जी से पहली मुलाकात- बल्कि इससे भी बहुत पहले मैं उनके सम्मोहन की लपेट में आ चुका था. और मिलते ही लगा, वे पूरी तरह मुझ पर छा गए हैं. हम दोनों की दोस्ती तो थी ही- एक अथाह गहरी दोस्ती. पर जरा दिल का मामला भी था. वे मेरे दिल में बस गए थे, और जाने-अनजाने मैं बहुत सी चीजें ठीक उसी तरह करने लगा था, जैसे वे चाहते थे. हमारे सुख-दुख साझे हो चुके थे.
पर कई दफा मुझे लगता था, कहीं यह इकहरा मामला तो नहीं? शायद इसलिए कि उनके आगे अपना दिल खोलने के लिए मैं जिस कदर बेसबरा रहता था, वैसी अकुलाहट शायद उनमें न थी. थी तो, पर काफी कम. मैं बेसबरा था, वे काफी गंभीर. दिल खोलते थे, पर वह भी काफी संयत तरीके थे. तो मुझे कई बार लगता था, शायद 'दिल दा मामला' बस मेरे साथ ही है.
पर त्यागी जी ने मुझ पर जो संस्मरण लिखा, उसमें वह सब भी लिखा, जो शायद पहले उन्होंने कभी दिल खोलकर कहा नहीं. इस संस्मरण की शुरुआत ही मुझे बावरा बना देने के लिए काफी थी. इसमें उन्होंने बड़ी शिद्दत से अपने दिल की बात कही. वह दिल जो उनके सीने से फिसलकर, मेरे भीतर दाखिल हो चुका है. और अब एक अजब सी सिचुएशन है. आप भी सुनिए त्यागी जी के शब्द-
"क्या जीवन में कभी यह मुमकिन है कि किसी का दिल उसके सीने से फिसलकर किसी और की जेब में पहुंच जाए...और यह क्रिया इतनी बेआवाज, ऐसे जादुई अंदाज में हो कि किसी को इसकी भनक तक न लग पाए? अगर यह मुमकिन है तो यह डर हमेशा बना रहेगा कि न जाने वह 'कोई और' उसके दिल से कैसा व्यवहार करे. तब इसके अलावा दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है कि उसकी हथेली खुद-ब-खुद अपने सीने पर चली जाए, फिर भी उसे लगे कि सीने को सहलाने वाली हथेली भी उसकी नहीं, 'किसी और' की है!"
त्यागी जी भले ही जीवन के कठोर यथार्थ के चितेरे हों, पर वे जानते हैं कि हमारी जिंदगी में बहुत कुछ ऐसा भी है, जो जादुई है. यह न होता तो शायद हमारा जीवन बेमजा हो जाता. मेरे साथ अपनी दोस्ती को भी त्यागी जी कुछ ऐसी ही जादुई शै मानते हैं-
"दोस्तो, जीवन के कठिन-कठोर यथार्थ में बहुत कुछ जादुई भी शामिल है, जो जीवन को जीने लायक बनाने में मनुष्य की मदद करता है. इसी संदर्भ में एक खास चेहरा मेरे सामने अकसर प्रकट होता है, हालांकि उसी से जुड़े कई और चेहरे भी हैं... इनमें से कइयों से परिचय काफी पुराना है. लेकिन यहां जिस नए चेहरे का जिक्र मैं कर रहा हूं, वह सिर्फ प्रकाश मनु का ही है. यों बाकी और व्यक्तियों की तरह प्रकाश मनु स्वयं भी 'हिंदुस्तान टाइम्स' समूह की बाल-पत्रिका 'नंदन' के स्टाफ-सदस्य ही हैं, लेकिन यही एक वह शख्स है जो सभी औपचारिकताएं दरकिनार करके खुले दिल, मुक्त कंठ और बेबनाव ढंग अपनाते हुए अचानक इस तरह प्रकट हो गया कि कब, क्या-क्या होता गया, कुछ भी तो समझ में नहीं आया....
"प्रकाश मनु के व्यक्तित्व और कृतित्व को लेकर अनेक तरह के विचार मेरे मन में आते हैं, जिनमें एक बड़े भाई की अधिकार भावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता....और बात केवल मेरे और मनु के बीच तक सीमित नहीं है, पारिवारिक सौहार्द भी हमें प्राप्त है. इसलिए भी अधिकार भाव स्वत: स्फूर्त रूप से है...."
ये बातें पहली बार इतनी शिद्दत से मेरे सामने आ रही थीं कि मैं अवाक्. एक अजब सी भावाकुल दशा थी मेरी.
मैंने कृतज्ञ आंखों से उनकी ओर देखा.
मेरी आंखें गीली थीं. और उनकी आंखें ही नहीं, पूरा चेहरा मानो स्नेह से छल-छल कर रहा था.
**
खैर, उनका वह संस्मरणात्मक लेख पूरा हुआ तो जो सुख, जो तृप्ति उनके चेहरे पर थी, और वहां से उड़ती-उड़ती मेरे दिल में भी उतरती जा रही थी, वह क्या कभी जिंदगी भर भूल पाऊंगा?
कुछ देर बाद फिर बातों का सिलसिला चल पड़ा. मैंने उनका मन बदलने के लिए उनकी नई पेंटिंग्स की चर्चा शुरू कर दी. इस पर त्यागी जी ने गूगल में सेव की गई अपनी कुछ पेंटिंग्स और रेखाकृतियां दिखानी शुरू कीं. इनमें जो पेंटिंग्स मुझे पसंद आईं, मैंने उनके बारे में बताया. उनकी जो खासियतें मुझे जान पड़ीं, उन पर भी चर्चा हुई. और उनकी रेखाकृतियों का तो मैं हमेशा ही दीवाना रहा हूं. सो उन पर जमकर बात हुई.
त्यागी जी के चेहरे पर जैसे आनंद बरस रहा है. अपनी नई पेंटिंग्स और रेखाकृतियों पर मेरी टीप को उन्होंने काफी पसंद किया.
पर तभी उन्हें अपनी लिखी हई लघुकथाओं का ध्यान हो आया. उन दिनों त्यागी जी ऐसी छोटी-छोटी और बेधक किस्म की लघुकथाएं लिखने में लीन थे, जिनमें सामाजिक विदूप पर तीखा व्यंग्य था- और अकसर यह व्यंग्य हलके विनोद भाव के साथ प्रकट होता था. हर लघुकथा जैसे जीवन की किसी मार्मिक सच्चाई का बयान कर रही हो.
अपनी कोई दस-बारह लघुकथाएं उन्होंने सुनाईं. इनमें से कुछ लघुकथाएं एक शृंखला का सा भान देती थीं. उदाहरण के लिए अस्पताल में रहते हुए, जो कुछ उन्होंने देखा या झेला, उसे भी उन्होंने कुछ बड़ी सुंदर लालित्यपूर्ण लघुकथाओं में ढाल लिया था. इनमें साथी मरीजों का हाल था तो एक-दो नर्सों और डाक्टरों के चिकने चेहरे भी थे. मरीज उनके लिए केवल कमाई की चीज थे, और कोई संवेदना उनकी मरीजों के साथ न थी.
त्यागी जी ने बड़े कलात्मक लाघव के साथ, कम से कम शब्दों में ये चित्र प्रस्तुत किए थे. बीमारी की हालत में भी उनके कलाकार की सूक्ष्म दृष्टि चकित करती थी.
तभी अचानक सुनीता ने पूछ लिया, "त्यागी जी, अस्पताल से आने के बाद अब आप कैसा महसूस कर रहे हैं? अपने सारे काम-काज तो आप खुद कर लेते हैं न. या फिर...?"
इस पर त्यागी जी ने बड़ी निश्चिंतता से कहा, "अरे, अभी मुझे हुआ क्या है? मैं बिल्कुल ठीक हूं. बस, थोड़ी डाइजेशन की समस्या है, वह भी हो जाएगी ठीक...." फिर हमेशा की तरह अपना सदाबहार वाक्य उन्होंने दोहराया, "अभी तो मैं बीस साल और जिऊंगा...!" और हंसे, खूब खुलकर हंसे.
सुनकर मैंने और सुनीता ने उनकी हिम्मत और हौसले की दाद दी.
त्यागी जी की बातें सुनकर अब तक मेरे अंदर भी थोड़ी हिम्मत सी आने लगी थी. पता नहीं, क्या चक्कर है कि पिछले दो-एक सालों से मेरे अंदर यह विचार लगातार खलबली सी मचाए है कि प्रकाश मनु, जल्दी से सब कुछ समेटो. अब चला-चली की वेला है....थोड़ा अंदर झांको तो बहुत कुछ कांपता-थरथराता हुआ सा लगता था. जैसे कि अब गया, तब गया...! मगर त्यागी जी की बात से अंदर कुछ हिम्मत सी बंध रही थी, थोड़ी सी आशा, थोड़ी उम्मीद...!
"और त्यागी जी मैं...?" थोड़ा डरते-डरते मैंने पूछा, "अभी मुझे काफी काम करना है, जिसे पूरा होते-होते शायद दो-तीन साल लग जाएं. आपको क्या लगता है कि मैं जी लूंगा इतना...?"
"अरे लो, आपको तो अभी हुआ ही क्या है...?" त्यागी जी बिल्कुल मेरे बड़े भाई की तरह बड़े प्यार से थपकी लगाते हुए कह रहे हैं, "अभी तो हम बैठे हैं आपसे बड़े. तो अभी बीस साल तो आपको कोई हिला नहीं सकता."
मुझे लगा, जैसे मुझे अभय मिल गया हो. पर मन में कहीं डर और संदेह की थरथरी भी थी. सो मैंने बात को पक्का करने के लिए कहा, "त्यागी जी, सच्ची आपको लगता है न...?"
"हां-हां, अभी आपको हुआ ही क्या है! बीस साल तो आप मजे में जोड़ ही लो." त्यागी जी बड़े बेफिक्र अंदाज में कह रहे हैं, "कहो तो लिखकर दे दूँ...!"
"नहीं त्यागी जी, आपने कहा तो अंदर बड़ी हिम्मत आ गई...!" मेरी आवाज में प्रसन्नता छल-छल कर रही है.
इस पर त्यागी जी के चेहरे पर ऐसी पवित्र और निश्छल मुसकान दिखाई दी, जैसी शायद सृष्टि की रचना करते समय ईश्वर के चेहरे पर रहती होगी.
दूसरों को खुशी देकर हमें कैसी खुशी मिलती है, और उस समय हमारा हिया कैसे आनंद से भरकर नाचता है, यह उस समय त्यागी जी को देखकर समझा जा सकता था. 
त्यागी जी हमारे यहां दो दिन रुके, और वे दो दिन हमारे लिए किस कदर आनंद और प्रफुल्लता से भरे दिन थे, यह मैं बता नहीं सकता. जब तक त्यागी जी रहे, हमारा घर, हमारा नहीं, त्यागी जी का घर था. वे घर के बड़े-बुजुर्ग की तरह एक-एक चीज की जानकारी ले रहे थे, और साथ-साथ जरूरी हिदायतें भी देते जा रहे थे.
सुबह उठकर हमारी तरह ही शहद मिले नीबू पानी का सेवन. फिर हमारे साथ ही घूमने जाना. लौटकर नहाने-धोने के बाद नाश्ता, भोजन, साहित्यिक चर्चा, और बीच-बीच में चाय के दौर. इस बीच वे अपनी साहित्यिक योजनाएं भी बताते जाते. साथ ही मित्रों का स्मरण. खासकर वाचस्पति जी को तो उन्होंने बार-बार याद किया.
और फिर उन्हें सादतपुर की याद आई तो मेट्रो तक छोड़ने मैं गया. बहुत प्यार से मुसकराते हुए उन्होंने विदा ली.
दो-तीन रोज बाद शीला जी का फोन, "सुनीता जी, आपने ऐसा क्या खिला दिया इन्हें कि रात-दिन बस आपका ही गुणगान...कि बहुत स्वादिष्ट खाना बनाया था सुनीता जी ने, मेरी तो भूख खुल गई! और कोई टेबलेट भी बता रहे थे कि आपने दी, तो एसिडिटी से बहुत आराम...!"
मैंने बताया, "जिंटेक 150 एम.जी. मैंने दी थी. आम गोली है, किसी भी कैमिस्ट से मिल जाएगी...."
फिर और कुछ घरेलू बातें. पता चला, त्यागी जी अब अपेक्षाकृत ठीक हैं. जानकर जान में जान आई.
**
पर यह आश्वस्ति बहुत समय तक रही नहीं. कोई पंद्रह दिन बाद ही पता चला कि वे फिर से आई.सी.यू. में दाखिल हैं.
मैंने उन्हें फोन किया तो उसे शीला जी ने उठाया. और उन्होंने जो खौफनाक खबर दी, उससे मैं अंदर तक दिल हिल गया. पता चला कि त्यागी जी को कैंसर है. रक्त और हडियों का कैंसर. सुनते ही मेरी सारी शक्ति जैसे निचुड़ गई हो, "क्या...? कैसर...!"
डरकर पूछा, "क्या अभी शुरुआती स्टेज है...?"
"नहीं मनु जी, काफी आगे बढ़ गई है बीमारी...! असल में पता ही देर से चला. तो अब.....!" शीला जी की आवाज कुछ कंपकंपा सी गई.
यानी डॉक्टर जब पाचन और एसिडिटी की दवाएं दे रहा था, लीवर इनफेक्शन और पेट की समस्या समझकर टेस्ट पर टेस्ट करा रहा था, तो असली कारण दूर -बहुत दूर बैठा मुंह चिढ़ा रहा था.
असल कारण तो कैंसर ही था, जिसके कारण त्यागी जी का पाचन-तंत्र बहुत कमजोर हो गया था. कुछ भी पच नहीं पा रहा था, और इस कदर कमजोरी...!
सुनकर मैं कांप सा गया. दोनों हाथ जुड़ गए, "हे भगवान...!"
खबर सुनते ही दूसरे-तीसरे दिन मैं और सुनीता फिर से अस्पताल पहुंचे. पर इस समय त्यागी जी की हालत काफी खराब थी. वे भीषण कष्ट में लगे. हालांकि पहले की तरह उन्होंने उत्साह से स्वागत किया. चेहरे पर हिम्मत और धैर्य दरशाने की कोशिश. लेकिन...! 
उन्हें कमजोरी इस कदर आ गई थी कि थोड़ी-थोड़ी देर बाद शरीर में बुरी तरह कंपकंपी होने लगती थी. उस समय एक के ऊपर एक चार-पाँच कंबल ओढ़ाने पर भी कंपकंपी थी कि थमने का नाम ही नहीं लेती थी.
दारुण स्थिति, जिसे देखकर ही मुझे झुरझुरी हो रही थी. और त्यागी जी तो इसे सह रहे थे. 
कुछ ही देर में नर्स ने आकर इंजेक्शन लगाया. फिर कहा, "अभी पंद्रह मिनट बाद आराम आ जाएगा."
शीला जी बहुत हिम्मत और धीरज से उन्हें संभाल रही थीं और पल-पल उनकी सेवा में लगी थीं, यह मैंने देखा और अभिभूत होकर देखा.
"हे भगवान, इस बहादुर स्त्री की तपस्या को अकारथ न जाने देना!" मेरे हाथ खुद-ब-खुद प्रार्थना की लय में जुड़ गए हैं.
लेकिन, फिर कुछ दिनों बाद ही...हुआ वही जो नहीं होना था. 
त्यागी जी नहीं रहे...! यहां से, वहां से, वहां-वहां से एक ही मनहूस खबर. खबर पर खबर- त्यागी जी नहीं रहे.
वो त्यागी जी, जो इस कदर कड़ियल थे कि दुनिया का हर दुख और निराशा उनसे दूर भागती थी. उनका उम्मीदों से भरा दृढ़ चेहरा हमारे लिए जिंदगी और आस्था का चेहरा बन गया था. वो त्यागी जी नहीं रहे...!
और फिर निगम बोध घाट...! विद्युत शवदाहगृह. पुराने से पुराने मित्रों, आत्मीयों, परिजनों और सहयात्री कामरेडों की शोकाकुल उपस्थिति.
'हरिपाल त्यागी, लाल सलाम...! लाल सलाम!!' की आवाजें हवा में गूंज रही थीं, और हमारा वह कड़ियल दोस्त, प्यारा साथी- सबसे बांहें खोल, धधाकर मिलने वाला जन कलाकार अपनी अंतिम विदाई लेकर, प्रयाण कर रहा था.
**
 

हरिपाल त्यागी की एक पेंटिंग, लेखक और साहित्यप्रेमी प्रशंसक


त्यागी जी से जुड़े इतने किस्से, इतनी बातें, इतने अजब-गजब वृत्तांत याद आ रहे हैं कि उन्हें कहने बैठा, तो शायद पूरा एक पोथा तैयार हो जाए. पर इस संस्मरण की एक सीमा तो है...!
तो चलिए, सीधे त्यागी जी की चित्रकला से ही शुरू करते हैं. अगर अपने इस किस्म के अनुभवों को किसी शीर्षक में बांधना हो, तो मैं उसे नाम देना चाहूंगा, 'हरिपाल त्यागी की चित्रकला और मेरे कुछ अचरज'. मेरे पहले अचरज की शुरुआत मेरे 'नंदन' पत्रिका से जुड़ने के साथ ही हो गई थी. मुझे बीमारी थी, 'नंदन' की पुरानी फाइलें पलटने की. 
सन् 64 का 'नंदन', 65 का 'नंदन'...जब वह निकला-निकला ही था. उसमें हरिपाल त्यागी थे और इतनी भव्यता के साथ कि मैं हैरान. खासकर रंगीन चित्र इतने अद्भुत कटावदार और आमने-सामने के दो पेजों में फैले हुए कि देखकर हैरान. बल्कि हक्का-बक्का! 
वह जमाना अर्ध-आफसेट का था. उस समय ब्रोमाइड पेपर चिपकाकर छपाई होती थी और पूरा दिन निकल जाता था ऐसे पेजों की सेटिंग में. पर त्यागी जी ने तो इन बेहद सुंदर, बेहद भावपूर्ण और सचमुच दर्शनीय...ऐसे कलात्मक चित्रों को उस जमाने में बनाया था, जब मोनो टाइपसेट से छपाई होती थी. और 'नंदन' को एकदम प्रारंभ में ही उन्होंने ऐसी प्यारी छवि दी थी कि वह आज भी मेरी आंखों में बसी हुई है.
उसी दिन मैंने मन ही मन त्यागी जी को अपना गुरु मान लिया. कला की दुनिया में रास्ता दिखाने वाला गुरु. बगैर उन्हें देखे ही- और मैं उनके बारे में इस तरह दीवानगी से अपने साथियों से बात करता, जैसे वे इतनी बड़ी महाकाय शख्सियत हों, कि मैं एक लघु-लघु प्राणी उन्हें कभी अपने हाथों से नहीं टोह पाऊंगा.
मित्रों ने मेरी बेसब्री और विकलता देखी तो हंसकर बोले, "अरे मनु जी, चिंता न करें. त्यागी जी तो बड़े प्यारे और दोस्त मिजाज के आदमी हैं. बड़ी ही अद्भुत चित्रकार. कभी आएंगे तो हम आपको मिलवा देंगे." 
और त्यागी जी एक दिन ऐसे ही घूमते-टहलते आए तो मेरी बेसब्री का पता चलने पर बांहों में भर लिया. फिर बड़े ही जिज्ञासु भाव से मेरे पूछने पर कि ऐसे एकदम बोलते हुए से चित्र वे बनाते कैसे हैं, उन्होंने कई-कई घंटों तक चलने वाली अपनी कला-समाधि का ऐसा गजब का वर्णन किया कि अब मेरी समाधि लगने की हालत थी. 
बिल्कुल घुग्घू की तरह मैं उन्हें बिटर-बिटर देख रहा था.
हरिपाल त्यागी जब चित्र बनाते हैं तो क्या-क्या होता है? कैसा मूड...कैसी दीवानगी...कैसी मदुलता...कैसी अक्खड़ता...कैसा रहस्य, कैसा स्वप्नलोक...! कितनी धरती और कितना आकाश...! कितना यथार्थ, कितना जादू...!! 
सुनकर मैं अवाक्. बल्कि सच्ची-मुच्ची किसी और ही दुनिया में जा पहुंचा. लगा, त्यागी जी को चित्र बनाते देखना चाहिए. और अगर नहीं देख पाया तो यह जिंदगी बेकार. एकदम छूछी और निरर्थक...!
मुझे भला ऐसी छूछी और निरर्थक जिंदगी का क्या करना था. अगर उसी से संतोष होता तो किशोर काल से ही तमाम झंझट और मुश्किलों के बावजूद साहित्य-कला के जंजाल में फंसता ही क्यों? अच्छा-खासा साइंस का विद्यार्थी था. किसी तरह जिंदगी ठेल ही लेता. मगर...!
मैंने तो अपने गले में कालिदास की परंपरा का पट्टा ही लटका लिया.
वहां साहित्य था, वाङ्मय था, तो क्या कला न थी?
सो मैं बड़ी ही ललचाई नजरों से त्यागी जी की ओर देख रहा था, कि प्यारे भाई, अब आप ही कोई रास्ता निकालो, ताकि मैं किसी चित्रकार को पूरी तरह समाधि-लीन देखूं और अपना जनम सार्थक कर लूं.
त्यागी जी ने मेरी बेसबरी को शायद कुछ-कुछ समझ लिया. सो उसी समय दावत दे डाली कि "ठीक है मनु जी, आप कभी सादतपुर आइए. बल्कि ऐसा करें कि दफ्तर से सीधे वहीं आ जाइए."... 
"मगर सादतपुर गया तो फरीदाबाद का क्या होगा? घर कब लौट पाऊंगा?" इस पर त्यागी जी का जवाब हाजिर था, "अरे, फरीदाबाद जाने की क्या जरूरत है...? घर पर सूचना दे दो...और चलो मेरे साथ. वह भी तो आपका घर ही है...."
मैंने बड़े अचरज से उनकी ओर देखा. दिल्ली में पहला बंदा मिला था जो कह रहा था, "अरे मनु जी, चिंता किस बात की? वह भी तो आपका ही घर है...!" 
यूपी में तो बहुतेरे थे. पर दिल्ली में कोई पहला बंदा ऐसा मिला था. बड़ा अचरज....अचरज पर अचरज.
मगर उस अचरज से भी बड़ा अचरज तो मेरी प्रतीक्षा में था, जब एक दफा रात को कोई दस-साढ़े दस बजे मैं उनके साथ सादतपुर पहुंच गया. मुझे अच्छी तरह याद है, भारती जी की बेटी रचना का विवाह था, जिसमें त्यागी जी भी शामिल हुए थे, और मुझे तो होना ही था. मगर रात दस-साढ़े दस बजे जब सारी दुनिया में अंधेरा हो चुका था, तो कला की दुनिया एकाएक जगमग-जगमग हो उठी. 
उस दिन एक साथ तमाम करिश्मे हुए थे. और मैंने -आपसे सच्ची कहता हूं, जीवन में पहला ऐसा घर देखा था, जिसकी सब दीवारें...फर्श...कोने-वोने भी कलाकृतियों से अंटे पड़े थे. मेरे सब ओर 'कला...कला...कला' की पुकार. भू से लेकर दिग-दिगंत तक सब कला से मंडित. कला का एक आह्लादित संसार, आपके भीतर-बाहर रचनात्मक तोष भरता हुआ. कोई अनहद नाद सा उससे फूटा पड़ रहा था. और धीरे-धीरे त्यागी जी के चित्रों की दुनिया...जो बड़ी, बहुत बड़ी थी, परत-दर-परत मेरे आगे उद्घाटित होती गई....
एक दुनिया के भीतर बहुत सारी दुनियाएं थीं. सो एक के बाद एक वे सारी दुनियाएं खुलीं, और फिर खुलती ही चली गईं...!
हजारोंहजार गलियारों वाला एक महा गलियारा मेरे सामने था. कला का गलियारा....
उसमें आगे-पीछे चाहे जहां भ्रमण किया जा सकता था.
और वह साहित्य-कला नगरी सादतपुर में बने त्यागी जी के घर में बड़े विचित्र ढंग से खुलता चला जा रहा था. और वहां रंग और रेखाएं और आकृतियां...सबकी एक आदिम पुकार, जिसे अनसुना नहीं किया जा सकता था.
लगता था, जैसे किसी ने मुझे दोनों हाथों से उछालकर कला की दुनिया में फेंक दिया है, और मैं हक्का-बक्का सा हूं. वहां रंग थे, रेखाएं, आकृतियां...कुछ साफ, कुछ धुँधली, कुछ अमूर्त...और वे सब एक-दूसरे में गड्ड-मड्ड थीं! और लाल टोपी वाले सांताक्लाज सरीखा कोई जादूगर था, जो उन्हें हाथों से नहीं, बल्कि आंखों के इशारे से नचा रहा था.
आंखों में स्नेह और मन में करुणा का समंदर. अथाह!
मैंने उस विराट जादूगर को पहली बार देखा...और देखा कि वह त्यागी जी की महीन सी मुसकान से निकला और अब, अपने सारे करतब दिखाने के बाद...खुद त्यागी जी के अंदर सिमटता जा रहा था.
और त्यागी जी थे कि मजे-मजे में हंस रहे थे. साथ ही उनकी लेनिन-कट खूबसूरत दाढ़ी हंस रही थी, और वह पूरी की पूरी कला की विचित्र सम्मोहनमयी रंगदार दुनिया हंस रही थी, जिसकी पहली झलक ने ही मुझे पागल बना दिया था. और अभी तो होने थे जिंदगी के इम्तिहां और भी...!
इसलिए कि त्यागी जी अब मेरे दोस्त बन चुके थे. हमेशा-हमेशा के लिए. और दोस्त चित्रकार हरिपाल त्यागी- उनका यह नया नामकरण हो चुका था मेरे अंतःप्रदेश, या कहें, आभ्यंतरिक दुनिया में.
सो अब हादसों पर हादसे होने ही थे...!
**
माफ कीजिए, कितनी भी कोशिश करूं, अपने उस अनुभव का वर्णन मैं नहीं कर पाऊंगा. पर कुछ कलाकृतियों की बात तो करूंगा ही, जो आज भी मेरे भीतर दस्तकों पर दस्तकें देती हैं. इनमें बहुत अच्छी तरह याद है, एक थी 'दो बहनें'. ये दो बहनें दोस्तो, दो मजदूरिनें थीं. इनके चेहरे, शख्सियत, देहभाषा...सब कुछ मेरे भीतर दर्ज है. पर मैं सिर्फ एक बात की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं, उन दो मजदूरिन औरतों की एक-एक आंख तो अलहदा थी, मगर एक-दूसरे से सटकर खड़ी उन दो मजदूरिनों की एक आंख साझी थी. वह इस मजदूरिन की भी थी, उस मजदूरिन की भी थी. दोनों की बस एक आंख....एक साझी आंख.
आह, आज भी मैं हैरान हूं, उन दो मजदूरिनों का साझा दर्द और बहनापा कैसे त्यागी जी ने बड़े अद्भुत ढंग से और कलात्मक अंदाज में पेश किया. चित्रकला यह भी हो सकती है—बल्कि यही होती है, मैंने अपने आपको ठकठकाया.
ऐसे ही एक और चित्र जो नहीं भूलता, वह है 'ए कप ऑफ टी विद द बास'. अपने अफसर के साथ चाय पीती एक युवती. पता नहीं, आप लोगों में से कितने लोगों ने वह चित्र देखा है...पर एक भेड़िए, बल्कि साफ-साफ कहूं तो एक मोटे जंगली सूअर सरीखे अफसर के आगे बैठकर अनिच्छा से चाय पीती इस युवती के चेहरे पर जैसी ठंडी घृणा मैंने देखी, मैं दस पन्ने लिखकर भी उसका वर्णन नहीं कर सकता.
यों और भी चित्र थे....एक त्यागी जी का आत्मचित्र, जिसका शीर्षक मैंने मजाक में 'नाकें' रख दिया, उसकी खास किस्म की दैहिक संरचना की वजह से. एक चित्र मुक्तिबोध का बीड़ी पीते हुए. पहले मैं किताब के कवर पर देख चुका था, पर पहली बार उसके पूरे विस्तार को देखा. और एक भेंगी आंखों वाली नूरजहां...उसके हाथों में एक लिफाफा...प्रेमपत्र...!
किस दुनिया में ले आए थे त्यागी जी मुझे, जहां एक के बाद एक नए पट खुलते जाते थे और मैं उड़ रहा था. रात पता नहीं कब त्यागी जी से बातें करते-करते सोया, मगर जिन चित्रों को देखा था, क्या वे इतनी आसानी से मेरा पिंड छोड़ देते?...
रात को त्यागी जी के घर की सारी खिड़कियां-दरवाजे मानो किसी जादू के जोर से खुल गए और मैं उन चित्रों के साथ एक खुले अनंत आकाश में घूमता रहा...महसूस करता हुआ कि अच्छा जी, मन्नू भाई, अब समझ गए न, कला तो ये होती है!
**
सुबह हुई तो चाय के साथ ही त्यागी जी का नया अवतार मेरे सामने था. मुझे 'सारिका' में छपी उनकी कहानी 'डाइनिंग टेबल' याद थी. जिक्र किया तो त्यागी, 'सारिका' का वही अंक ढूंढ़ लाए...एक बहुत-बहुत संवेदनशील चित्रकार की बड़ी आर्द्र कर देने वाली मनःस्थिति. फिर 'खुशी'...एक और कहानी. वह भी चित्रकार की एक और मनोदशा....
होते-होते ग्यारह बज गए और मुझे दफ्तर याद आ गया. नहा-धोकर और नाश्ता करके मैं कनाटप्लेस वाली बस बैठा. पर वह यात्रा कैसे पूरी हुई, मैं आपको बता नहीं सकता. लोग बस में बैठे-बैठे यात्रा कर रहे थे, पर मैं बस में उड़ रहा था. मुझे नशा हो गया था -कला का नशा.
सच्ची कहता हूं दोस्तो, मैंने अपनी जिंदगी में कभी एक बूंद भी शराब नहीं चखी. मगर शायद आठ-दस बोतलें हलक में उड़ेल लेता, तब भी वह नशा न होता, जो उस दिन त्यागी जी की कला और कलाकृतियों ने किया था. और शराब का नशा तो कितना ही तेज हो, पर कुछ समय बाद उतरता है, मगर कला का नशा एक बार चढ़ जाए तो फिर कभी नहीं उतरता- यह मैं उस दिन के अनुभव से बता रहा हूं.
फिर त्यागी जी की एक प्रदर्शनी श्याम-शवेत रंगों की. भूकंप...पहाड़ पर भीषण भूकंप आया था, तब त्यागी जी वहीं थे -शायद हलद्वानी- और फिर अपने प्रशंसकों और कलाप्रेमियों को यह नायाब उपहार उन्होंने दिया. 
उस प्रदर्शनी के बारे में बहुत कुछ कहा जा सकता है पर मैं सिर्फ एक चित्र के बारे में कहूंगा. वह भूकंप की आपदा के बीच दो भूंकते हुए कुत्तों का है....वे कुत्ते वहां क्या कर रहे थे? वे भौंक रहे थे...भूकंप की आपदा को वे खत्म नहीं कर सकते थे, पर वे दो दोस्त कुत्ते थे, जो साथ-साथ भौंक रहे थे. 
देखकर मैं अवाक. चित्र-वित्र तो जो है, सो है ही. मगर सुनो, मन्नू भाई—मैंने खुद को टहोका दिया, जब आपदा आए और कुछ न कर सको तो भौंको...! मिलकर इन दो दोस्त कुत्तों की तरह भौंको, भले ही भौंकते-भौंकते तुम भी मर जाओ. मगर अंत तक भौंकना न छोड़ो. साथ-साथ भौंको! 'पार्टनर, तुम्हारी पालिटिक्स क्या है?' का एक चित्रकार द्वारा एक बिल्कुल नया रूपांतरण.
और फिर त्यागी जी द्वारा बनाई गई चित्र-शृखंला -सादतपुर की स्त्रियां, जिसमें सादतपुर के हाट-बाजार और गलियों में बड़े घरेलू लहजे में बतियाती स्त्रियों के चित्र हैं. मैंने बड़े से बड़े चित्रकारों द्वारा निर्मित वीनस...और न जाने कौन-कौन सी जमाने भर की सुंदरियों के बनाए एक से एक कलात्मक चित्र देखे हैं. वसनाएं भी, निर्वसनाएं भी....पर आपसे सच्ची कहता हूं, जो सुंदरता मुझे त्यागी जी की सादतपुर सीरीज की स्त्रियों में नजर आई, वह कहीं नहीं थी. 
वे दुनिया की सबसे सुंदर स्त्रियां थीं, पर उन्हें देखने के लिए तो आपको त्यागी जी के पास ही आना होगा. थोड़ा त्यागी जी के दिल और आंखों में झांकना होगा. और सिर्फ झांकना ही नहीं, थोड़ा उनके धड़कते दिल के साथ लय-सुर बनाकर 'फील' करना होगा. वह सब जो आपके अंदर-बाहर है....
और वे कैसी स्त्रियां हैं? शरीर कई बार एकदम बेअनुपाती. कपड़े सादा और असावधानी से पहने हुए...और कभी-कभी तो शरीर के अंग यहां-वहां ढलकते हुए. पर वे कर्मलीन स्त्रियां हैं, जिन्हें जीवन के बीचोंबीच उकेरा गया है. और इसीलिए मैं दरख्वास्त करूंगा कि अगर आपने वे चित्र नहीं देखे तो जरूर देख लें, वरना शायद आप बहुत कुछ खो देंगे.
इसलिए कि जीवन के बीचोबीच से निकलकर आई उन सुंदर और कर्मलीन स्त्रियों के इतने सुंदर चित्र हरिपाल त्यागी जी के सिवा कोई और बना नहीं सकता था. ठीक वैसे ही, जैसे जिंदगी के घाट पर अपने-अपने असली रूप और देसी ठसक के साथ मौजूद स्त्री-पुरुषों पर बाबा नागार्जुन से सुंदर कविताएं किसी ने लिखी नहीं. कोई लिख भी नहीं सकता था.
**
कुछ बरस पहले त्यागी जी की नई चित्रकला पदर्शनी लगी थी, रवींद्र भवन में. जिसने भी वह देखी हो, उसके लिए यह जानना कतई मुश्किल न होगा कि हरिपाल त्यागी उस समय बड़ी उदग्र तेजी और व्याकुलता से किस तरफ बढ़ रहे थे. 
सच कहूं तो त्यागी जी उस समय इतनी तेजी से बह रहे थे कि उनके सारे रूपाकार...रेखाओं का जादू...सब उनके साथ बहता जा रहा है. और वे मानो रूप से अरूप की ओर बढ़े जा रहे थे, जिसमें एक विराट सिंधु के विस्तार में सारे रंग-रूप रेखाएं डुब-डुब-डुब-डुब...! मानो एक नदी अब समंदर हो जाना चाहती है. 
देखकर मुझे कुछ कुछ भय सा लगा. मैं भीतर ही भीतर जैसे चिल्ला उठता हूं, 'अरे, त्यागी जी...सुनिए, त्यागी जी, आप कहां जा रहे हैं? देखिए, आपका एक यह चित्र था, एक वह चित्र...क्या अद्भुत आकार, कैसी रेखाएं, कैसे जैस्चर्स...! आप वह सब छोड़कर अब कहां की ओर निकल गए?' 
पर त्यागी जी हंसते हैं, 'कला कहां नहीं है?...रास्ते में पड़े मिट्टी के एक लौंदे में भी और समंदर के ज्वार भाटा और लहरों की पढ़ाड़ में भी...!' और मैं देखता हूं, सब कुछ छोड़कर रंगों का महा समंदर है, त्यागी जी मानो उसी में ऊभ-चूभ हो रहे हैं. 'शायद हर नदी समंदर होना ही चाहती है.' मैं त्यागी जी के पुराने चित्रों को याद करता हुआ कहता हूं. हालांकि जानता हूं कि अब त्यागी जी उधर नहीं लौटेंगे. वे अब अपरिमित हो चुके हैं...दिक्काल को भी अतिक्रमित करते हुए.
जब त्यागी जी की कला-यात्रा के साथ-साथ चलना शुरू किया था, तो याद पड़ता है, मेरे सारे बाल काले थे, सफेद कोई-कोई ढूंढ़ना पड़ता है. आज पूरा सफेद हो चुका हूं, काला बाल एक भी नहीं....पर मुझे खुशी है कि मैंने अपनी जिंदगी त्यागी जी और उनकी चित्रकला के साथ चलते बिताई है...और शायद इसीलिए जीवन एकदम अकारथ तो नहीं गया.... 
**
एक मैं ही नहीं, बहुत हैं, हरिपाल त्यागी, जिनके मन-प्राणों में बस गए हैं. वे मेरी तरह हजारों के दोस्त थे- दोस्त चित्रकार.
वे प्यारे और अलबेले दोस्त चित्रकार हरिपाल त्यागी आज देह से उपस्थित भले ही न हों, पर सदा-सदा के लिए हमारी स्मृतियों में बस गए हैं, और उनकी जगह कोई नहीं ले सकता.
बार-बार हमें याद आएगा उनका जुझारूपन और सदाबहार हंसी, जो हरिपाल को हरिपाल बनाती थी. और यह जुझारूपन -मगर साथ ही एक खास तरह का खिलंदड़ापन भी, हरिपाल त्यागी की शख्सियत और चित्रों दोनों में अंत तक रहा, और खूब रहा. सच पूछिए, तो वही उनकी पहचान भी है. और इसीलिए मैं उनका मुरीद भी था.
यही बात उन्हें उनके समकालीन चित्रकारों से अलग और मजबूत आधार देती है. बल्कि मैं कहना तो यह चाहूंगा कि उनका सारा संघर्ष एक मार्क्सवादी चित्रकार का संघर्ष है और यह बात उनके चित्रों में बहुत बारीकी से देखी जा सकती है.
खुशी की बात यह है कि अंत तक आते-आते त्यागी जी ने अपने सिर पर से व्यावसायिक काम का दबाव एकदम हटा लिया था, और अपने तईं एक रास्ता भी तय किया था. 'हादसा' के श्वेत-श्याम चित्रों की शृंखला के बाद उनका बहुत कोमल कल्पनाशीलता से भरा काम निश्चय ही इसी का नतीजा था, जिसमें त्यागी जी की सारी शक्तियां जैसे फिर से एकाग्र हुई हों. 
इसी तरह सांप्रदायिकता के कठोर यथार्थ को उन्होंने अपनी बेचैन, मगर बहुत कुछ बोलती हुई सर्जनात्मक रेखाओं के जरिए उभारा है, और इसमें उन्हें हद दर्जे की कामयाबी मिली है. आखिर रेखाओं के तो वे बादशाह ही ठहरे!
मुझे शुरू से यह पक्का यकीन रहा है कि त्यागी जी की कला वह कला है जो 'बाजारवादी' आंधियों के गुजर जाने पर भी टिकती है, देर तक टिकी रहती है क्योंकि वह समय के पार देखना जानती है और अपने समय के ओछे और टुच्चे स्वार्थों तथा दुष्ट ताकतों से समझौता नहीं करती. खुद त्यागी जी ने अपनी एक खूबसूरत कविता में इसे बेहतर ढंग से कहा है. 
'प्लास्टिक का रथ उठाए जा रही कायर सफलता' वाले इस दौर में पार्थिव रूप से मौजूद न होकर भी, त्यागी जी के चित्रकार का होना क्या है, और उसकी निरंतर दस्तकें हमें किस रूप में महसूस होती हैं, इसे उनकी कविता की इन सतरों से समझा जा सकता है—
एक तो अपना यह रथ ही बहुत भारी है,
और फिर दलदल में धँसा हुआ पहिया!
अपने हिस्से की जमीन है ऊबड़-खाबड़,
सुविधाओं की सड़क यहां कहां, भइया!
छूटते जाते हैं दिल, मास और वर्ष,
सफल होने की यहां किसे फुरसत?
तो भी हमने बहुत पाया है यहां खोकर,
चंद तीरों का जहर, चंद फूलों की महक.
त्यागी जी की कविता की इन पंक्तियों में उनके जिद्दी और स्वाभिमानी कलाकार चरित्र की कई 'बांकी अदाएं' हैं, जिनमें फाकाकशी के बीच भी उनका फक्कड़पन बरकरार रहा. 
मेरे लिए यह खुशी की बात है कि हरिपाल त्यागी कभी कला की तिजारत करने वाले 'कीर्ति-व्यवसाइयों' के झांसे में नहीं आए- अंत तक. मुझे खूब अच्छी तरह याद है कि एक बार कला-चर्चा के बीच त्यागी जी ने कहा था, "यह कैसी दिलचस्प बात है कि जो तबका कलाकृतियों को खरीदता है, मैं और मेरे चित्र उससे भयानक घृणा करते हैं—और फिर भी मैं जीना चाहता हूं, एक चित्रकार के रूप में जीना चाहता हूं, भरपूर जीना चाहता हूं." 
कहते-कहते उनके चेहरे पर वह दृढ़ताभरी लौ दिप-दिप कर रही थी, जिसे मैंने तभी देखा और कविता की पंक्तियों में उतार लिया था, "कला तुम्हारी विरूप जिंदगी पर रंगों की चोट पर चोट पर चोट...!" और इसीलिए-
तुम चित्रकार नहीं लड़ाका हो हरिपाल
तुम चित्रकार से ज्यादा लड़ाका हो हरिपाल
नहीं-नहीं, तुम तो हो लड़ाका चित्रकार
रंग तुम्हारे दोस्त हैं
बड़े ही जिद्दी अभिमानी मित्र. लकीरें-
लड़ाई के नक्शे...!
दिल्ली में जब से आया हूं, हरिपाल त्यागी के अलावा शायद ही कोई हो, जिसके आगे मैंने अपने दुखते हुए घाव खोले हैं. और त्यागी जी इतने आत्मीय हैं कि आपका कोई दुख सुना नहीं कि झट 'बड़े भाई' की सी सहानुभूति से भरकर आपके लिए कुछ करने को बेचैन हो जाते हैं. शायद इसीलिए ये पंक्तियां सिर्फ त्यागी जी के लिए ही लिखी जा सकती थीं-
और मैं खुश हूं
कम से कम एक है इस महानगर में
जिसके आगे किसी भी कमजोर क्षण में
कपड़े उतारकर
दिखा सकता हूं घाव
और मुझे शर्म नहीं आएगी.
**
अंत में एक फालतू टीप और!
बहुत समय से लिखा जा रहा यह संस्मरण आज पूरा हुआ तो सुनीता चुपके से पास आकर बैठ गई है. मुझे अपनी ओर देखते पाकर उसने कहा है- इस संस्मरण का शीर्षक क्या कुछ ऐसा नहीं हो सकता कि 'वे जब भी हमारे घर आए हैं, उनका चेहरा हमारे लिए आस्था का चेहरा बन गया है!'
इतना लंबा शीर्षक मैं डाल तो नहीं सका, पर संस्मरण के अंत में इसे दर्ज कर ही दूं तो हर्ज क्या है!
***
प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008, ईमेलः prakashmanu333@gmail.com
 

 

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें