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जन्मदिन विशेषः दिविक की कविताई से मेरी दोस्ती पुरानी है

दिविक रमेश आज पचहत्तर बरस पूरे कर रहे. उनकी कविताओं से मुलाकात के बरसों बाद जब दिल्ली आने पर वह मिले तो कुछ इस तरह कि जैसे अनादिकाल से हम एक-दूसरे को जानते रहे हों...वरिष्ठ लेखक प्रकाश मनु का आलेख

लेखक, अध्यापक, कवि दिविक रमेशः अपनी एक किताब के साथ लेखक, अध्यापक, कवि दिविक रमेशः अपनी एक किताब के साथ

दिविक रमेश का आज जन्मदिन है. आज वे पचहत्तर बरस पूरे कर रहे. इस अवसर के लिए वरिष्ठ कथाकार प्रकाश मनु काफी दिनों से दिविक रमेश की कविताओं पर सर्जनात्मक किस्म का यह लेख लिखने में जुटे थे, ताकि साहित्य आजतक की मार्फत उनके जन्मदिन पर प्रकाशित हो सके. पर इसी बीच मनु जी के बड़े भाईसाहब का देहांत हो गया. उन्होंने अपने पारिवारिक निजी गम से गुजरते हुए भी उसी के बीच इस अधूरे लेख को पूरा किया है. - संपादक.
                                                                                       ***

दिविक रमेश और उनकी कविताओं से मेरी दोस्ती कोई पैंतालीस बरस पुरानी है. और सच पूछिए तो दिविक रमेश से मुझे मिलवाने का काम उनके पहले कविता-संकलन 'रास्ते के बीच' ने किया था, जो आज भी मुझे उतना ही प्रिय लगता है.
उन दिनों मैं कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में शोध कर रहा था. उसी शोध के सिलसिले में बहुत कविता संकलन पढ़े गए. खुद मेरे जीवन का यह बड़ा ऊहापोह भरा समय था. समय बड़ी विचित्र गति से चल रहा था, जिसे ठीक-ठीक समझ पाना खुद मेरे बस की बात नहीं थी. इस उथल-पुथल और वात्याचक्र में बाकी संकलन पीछे छूटते गए. वे शोध के लिए पढ़े गए थे, और शोध तक ही रह गए. पर एक संकलन सतह से ऊपर उठा और मेरे जीवन में भी दाखिल हो गया. यह दिविक रमेश जो अब मेरे लिए दिविक भाई का 'रास्ते के बीच' था. मेरे जीवन में उसकी जगह लगातार बड़ी होती और प्रमुख होती जा रही थी. मुझे यकीनन धुंधली ही सही, पर उससे रोशनी मिली थी. अपने आप को और अपना रास्ता पहचानने में भी संकलन की कविताओं से मुझे मदद मिली.
उन दिनों 'रास्ते के बीच' मेरे लिए सिर्फ एक कविता-संकलन या सिर्फ एक पुस्तक नहीं, बल्कि एक जिंदा शख्सियत थी, जो मुझमें सांस लेती थी, और जिसका होना मुझे बल देता था. तभी एकाएक महसूस हुआ, दिविक रमेश से मेरी दोस्ती दिनोंदिन पक्की होती जा रही है. और अकेले दिविक से ही नहीं, उनके 'रास्ते के बीच' से भी. तब तक मैं दिविक को नहीं जानता था, पर 'रास्ते के बीच' को तो जानता ही था, जिसकी कविताएं मेरे भीतर उतरतीं तो लगता, जैसे ये मेरी ही चिंताओं को आवाज दे रही हैं. मेरा ही भीतर-भीतर उबलता हुआ गुस्सा उनमें प्रकट हो रहा है, मेरे ही स्वर में स्वर मिलाकर ये व्यवस्था के आगे तीखे सवालों की बौछार कर रही हैं और मेरी ही तरह ये टुच्चे समझौतों को परे झटककर, अपना एक अकेला, बेचैनी भरा रास्ता तय कर रही हैं.
बरसों बाद दिल्ली आने पर दिविक मिले तो कुछ इस तरह कि जैसे अनादिकाल से हम एक-दूसरे को जानते रहे हों. फिर उनके और संकलन पढ़े और उनकी कविताओं के साथ-साथ बहने का सुख मिला. आज भी उनकी कविताएं पढ़ना मेरे लिए एक गहरे सुकून की तरह है.
असल में दिविक भाई की कविताओं में कुछ है जो मुझे मोहता है और बिल्कुल अपना सा लगता है. वह 'रास्ते के बीच' की कविताओं में था, उनके बाद के संकलनों 'खुली आंखों में आकाश', 'हल्दी-चावल और अन्य कविताएं', 'छोटा-सा हस्तक्षेप', 'फूल तब भी खिला होता', 'गेहूं घर आया है', 'वह भी आदमी तो होता है', 'बांचो लिखी इबारत', 'मां गांव में है', 'वहां पानी नहीं है', काव्य-नाटक 'खंड-खंड अग्नि' और आखिरी संकलन 'जब घुटती है सांस आदमी की' में भी.
यह बड़े सुखद आश्चर्य की बात है कि दिविक के पहले संकलन 'रास्ते के बीच' से मेरा उनसे और उनकी कविताओं से जो प्रीतिकर रिश्ता बना, वह आगे और भी प्रगाढ़ होता चला गया. इस बीच दिविक की कविताओं की बुनावट, उनका काव्य मुहावरा और अंदाज बहुत कुछ बदला है, पर उनकी कविता हर रूप में मुझे अपने निकट जान पड़ी. उनकी कविता के बदलते हुए तेवरों के साथ ही मैं सहज रिश्ता साध सका. यों दिविक की कविता बराबर मेरे मन के करीब बनी हुई है, बल्कि उससे प्रेम कहीं ज्यादा गहरा हुआ है. कुछ इस कदर कि उनकी कविता का घर मुझे अपना घर लगता है. इस पर मैंने एक कविता भी लिखी थी, जिसकी कुछ पंक्तियां उद्धृत करने का लोभ मैं संवरण नहीं कर पा रहा हूं-
दिविक का घर है कुछ-कुछ मेरा तुम्हारा
और हम सबका भी घर
उस घर में ढूंढ़ो तो नजर आ जाता है
फटे आसमानों में अस्तित्व ढूंढ़ता एक आदमी
जो शायद दिविक हैं
पर शायद कुछ मैं भी हूं

उसी घर में मेरी मुलाकात हुई चेहरे पर मीठी सलवटें लिए
शमशेर और त्रिलोचन
और नाजिम हिकमत के उस मासूम बच्चे से भी
जो था दुनिया का सब से खूबसूरत बच्चा
जिसे बड़े होकर बदलनी थी यह सारी दुनिया
और जीतनी थीं सब हारी हुई लड़ाइयां

दिविक का घर है दिविक की कविताई का घर
दिविक का घर कुछ मेरा घर भी है
रोज वहां जाकर दिन में एक बार तो जरूर ही
थप-थप करना मुझे अच्छा लगता है.
कहना न होगा कि दिविक के घर जाकर वहां रोज थप-थप करना ही उनकी कविताई से वह दिल का रिश्ता है, एकदम करीबी रिश्ता, जिसे शायद मैं शब्दों में ठीक से बांध नहीं सकता.
अब दिविक रमेश की आगे की कविताओं पर थोड़ी बात की जाए. पर मेरा खयाल है, पहले कविता को लेकर लिखी गई उनकी एक कविता पर नजर डाल लेना कहीं बेहतर होगा. जरा देखें तो इस कविता का तेवर और साथ ही कविता और दिविक के बीच एक बड़ी अनौपचारिक बतकही भी, जिससे उनकी कविता का थोड़ा हालचाल भी पता चलता है-
माना कि जोर बहुत है तुझमें
पर आज मुझे झोंकनी है ताकत
देखता हूं कैसे रचवाती हो खुद को!
मृत घोषित होकर भी हो जीवित
पढ़ता ही कौन है तुम्हें
फंस चुकी हो पुरस्कार-फुरस्कार की दलदल में
पाठ्यक्रमों तक में सरेआम भोग लेती हो बलात्कार
कैसे रह लेती हो शांत तब भी!
कविता की आखिरी पंक्तियां थोड़ी प्रीतिकर मगर शरारती भी हैं, और कहीं न कहीं समकालीन कविता का होना और उसका असली मिजाज इससे समझ में आ जाता है-
इसी अशोक सी हो
हो पीपल सी
अध्यात्म भी, विज्ञान भी
कैसी हो तुम, पृथ्वी सी
रहस्य भी, अनिवार्य भी.
कितनी सहज हो तुम
दिखती न दिखती लहर सी.
पर बदमाश भी, थोड़ी चुलबुली
रचवा ही लिया न खुद को.
'गुलाम देश का मजदूर' दिविक रमेश की बहुत मशहूर कविता है. उनके शुरुआती दौर की बहुत चर्चित कविता. मुझे याद है, जब इसे पहली बार मैंने पढ़ा था तो मजदूरों की बेबस जिंदगी के बहुतेरे चित्र हमेशा के लिए मेरी आंखों में अटके रह गए थे. जैसे फ्रीज हो गए हों. शायद आपके साथ भी ऐसा ही हो. लीजिए, पढ़ते हैं कविता की तकलीफ भरी पंक्तियां, जो अंदर एक सर्द सन्नाटे की तरह जम जाती हैं-
एक और दिन बीता
बीता क्या
जीता है पहाड़-सा
अब
सो जाएंगे
थककर.
टूटी देह की
यह फूटी बीन-सी
कोई और बजाए
तो बजा ले
हम क्या गाएं?
हम तो
सो जाएंगे
थककर.
कल फिर चढ़ना है
कल फिर जीना है
जाने कैसा हो पहाड़?
लेकिन मजदूर की जिंदगी का पहाड़ वह पहाड़ नहीं है, जहां सैलानी बनकर आप घूमने जाते हैं. आगे की पंक्तियों में पहाड़ के असली मानी भी खुलते हैं, जिसे ढोने में उसकी पूरी जिंदगी बीत जाती है-
सच में तो
जिंदगी भर हम
अपना या औरों का
पहाड़ ही ढोते हैं.
बस
ढोते
रहते हैं.
सुना है
हमारी मेहनत के गीत
कुछ निठल्ले तक गाते हैं.
दिविक रमेश की यह कविता केवल कविता ही नहीं हैं, बल्कि उनकी कविता के सरोकार क्या हैं और लड़ाइयां भी, एक मानी में यह उसका घोषणा-पत्र भी है. और शायद यही वजह है, जिसने उनकी कविता को जिद्दी बनाया है. वह बहुत से महानगरीय कवियों की तरह न चिकनी-चुपड़ी है, न गोलमोल और न अनावश्यक रूप से वाचाल. पर जरूरत पड़ने पर जहां हस्तक्षेप करने की जरूरत है, वहां वह औरों से आगे खड़ी होती है. बात को दाएं-बाएं करने के बजाय सच्चाई को परत-दर-परत खोलना उसे जरूरी लगता है, क्योंकि दिविक की नजरों में कविता होने की यह सबसे जरूरी शर्त है.

2.
सन् 2000 में दिविक की कविताओं का एक बड़ा महत्त्पूर्ण संकलन आया, 'छोटा सा हस्तक्षेप', जिसकी कविताओं का चयन सुप्रसिद्ध कवि विष्णु खरे ने किया था. यह दिविक की कविताओं का एक विशिष्ट संकलन ही नहीं, बल्कि उनकी कविता यात्रा को सार्थक मोड़ देने वाला एक प्रस्थान-बिंदु भी है.
'छोटा सा हस्तक्षेप' में दिविक का बेहद सधा हुआ मुहावरा और कवि के रूप में उनका आत्मविश्वास बहुतेरी कविताओं से झांकता देखा जा सकता है. संकलन की एक कविता है, 'उसके पास'. इस छोटी सी कविता के जरिए दिविक बहुत कुछ कह जाते हैं-
जिस आदमी के पास कुछ भी नहीं था
उसके पास था एक थैला
थैले में थी कलम
थे कुछ कागज
और कागज पर लिखी जाने वाली अनंत संभावनाएं
आशाएं
कुछ मंसूबे
और ठहरे हुए रक्त में
पैदा करने को प्रवाही प्रेरणाएं

मैं देखता रह गया
कि जिस आदमी के पास कुछ भी नहीं था
उसके पास आखिर क्या नहीं था
समाज की प्रचलित भाषा में जिसे अकिंचन कहा जाता है, उसकी आभ्यंतरिक शक्ति को दिविक यहां कुछ ही पंक्तियों में बड़े अनूठे ढंग से कह जाते हैं. जो कुछ नहीं हैं, उसकी ताकत का अंदाजा शक्ति मद में मदमाते लोग नहीं कर सकते. बहुतेरे कवि भी यहां चूक जाते हैं, पर दिविक जिस आत्मविश्वास से अकिंचन की ताकत का बखान करते हैं, वह गौर करने लायक है.
इसी संकलन की एक और कविता है, 'सोया हुआ आदमी'. कविता को ऊपर-ऊपर से देखने पर यह एक सोए हुए आदमी को जगाने की बात लगती है. बहुत छोटी और साधारण सी बात. पर कविता इस ऊपरी खोल के अंदर छिपी है और बड़े बेमालूम ढंग से सुर भरते हुए, अपने होने का अहसास कराती है. कविता की आखिरी सतरों में दिविक सोए हुए आदमी की बात करते-करते बहुत कुछ ऐसा कह जाते हैं, जो आज के सोए हुए समाज को जगाने के लिए बेहद जरूरी है-
आसान भी नहीं होता जगाना
सोए हुए आदमी को
तो भी
जगाना तो चाहिए न सोए हुए आदमी को
जगाना तो चाहिए न
नींद जब आदत हो चले नशे सी
जगाना तो चाहिए न
जब सोता ही रहे आदमी
आपने गौर किया होगा कि ऊपर के उद्धरण में हर बार पंक्तियां थोड़ी बदल-बदलकर आती हैं, और हर बार दिविक का आशय कुछ अधिक स्पष्ट और गहरा होता चला जाता है. शब्दों की आवृत्ति कविता को ऐसा गूंजदार बना देती है कि कविता पूरी पढ़ लेने पर भी अंदर उसकी गूंजें-अनुगूंजें सुनाई देती हैं. और आखिरी पंक्तियों 'जगाना तो चाहिए न, जब सोता ही रहे आदमी' तक आते-आते कविता अनायास ही एक व्यापक पृष्ठभूमि पर पहुंच जाती है और वह कहती है, जो उसे हर हाल में कहना ही है.
'छोटा सा हस्तक्षेप' की एक और कविता ने मेरा ध्यान खींचा. यह कविता है, 'नई सदी की दस्तक'. यहां याद दिला दूं कि यह कविता बीसवीं और इक्कीसवीं सदी के संधिकाल की कविता है. यानी एक सदी खत्म हो रही है और एक नई सदी जन्म लेने के लिए आकुल है. ऐसे में स्वाभाविक रूप से मन में तमाम संदेह और आशंकाएं पैदा होती हैं कि आने वाली सदी कैसी होगी? हम कैसे उसका सामना करेंगे और कैसे जी पाएंगे? दिविक भी नई सदी के आने पर खासे आशंकित हैं और खुद को बदल लेना चाहते हैं, ताकि नई सदी के बदले हुए माहौल में कहीं वे अनफिट न रह जाएं. वे अभी से लोगों को बदला हुआ देख रहे हैं और खुद भी बदलने की तैयारी कर रहे हैं-
कुछ तैयारियां कर ही लेनी चाहिए मुझे भी
बीतते न बीतते इस सदी को
समय रहते खोल देने चाहिए दरवाजे
ताकि प्रवेश पा सकें कुछ चतुराइयां
महाजनों की
झाड़ लेनी चाहिए
नैतिकताओं की कुछ निकम्मी धूल भी
चला ही लेना चाहिए रंदा
कुछ ज्यादा ही खुरदुरे हो चुके स्वाभिमान पर
अब सीख ही लेनी चाहिए कला
और अदा भी
गलत करके मुकर जाने की.
जो लोग कविता को सरसरी तौर से पढ़ेंगे, उन्हें लगेगा कि यह कवि के मन में जन्म ले रहे समझौतापरस्त इनसान की कविता है. पर असल में है बिल्कुल उलटी ही बात. न कवि बदल रहा है और न समझौते करने के लिए ललक रहा है. वह असल में नई सदी की चुनौतियों की बात कर रहा है, जिससे हर आदमी को टकराना ही पड़ेगा. और ऐसे में वजूद बचाने की चिंता कितनी उग्र हो चुकी होगी, कविता बड़े मर्मांतक ढंग से इस ओर इशारा करती है. जो नहीं बदलेंगे उनका आने वाली सदी में जीना कितना मुश्किल होगा, कविता बड़े पैने ढंग से इस ओर इशारा करती है.
संकलन की 'पांडुलिपियां', 'हाथ पकड़ो', 'नन्ही खुली बाँहें', 'कोश से बाहर: सुबह', 'भूत', 'मौसम', 'निर्णय एक निर्णय', 'जब भी लौटूँगा', 'रूस में ऐसे भारत के खिलाफ' समेत बहुत सी कविताएं हैं, जो ध्यान आकर्षित करती हैं और उन पर जमकर बात की जा सकती है. पर फिलवक्त इतना कहना काफी है कि यहां दिविक एक कवि और मनुष्य के रूप में एकदम सहज हैं. न तो वे अपने होने का अनावश्यक दिखावा करते हैं और न जहां प्रतिकार करने की जरूरत हो, वहां पीठ मोड़कर बैठ जाने की कायर चुप्पी उनमें है. जो वे महसूस करते हैं, उसे कहते हैं, और जिस जोर के साथ बात कही जानी चाहिए, वह हर हाल में उनकी कविता में दिखाई पड़ जाता है.
यह दीगर बात है कि बड़ी से बड़ी बात को शालीनता से कहना दिविक को आता है. उनकी एक अलग सी कविता 'रूस में ऐसे भारत के खिलाफ' पढ़कर यह बात बहुत अच्छी तरह समझ में आ जाती है.

3.
'छोटा सा हस्तक्षेप' के कोई नौ बरसों बाद आया दिविक का संग्रह 'गेहूं घर आया है' भी काफी ध्यान आकर्षित करने वाला संकलन है. 'गेहूं घर आया है' की कविताओं का बेहद सुरुचिपूर्ण चयन महत्त्वपूर्ण कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी ने किया है.
संकलन की शुरुआती कविताओं में ही एक कविता 'शक्ति भी है अकेला आदमी' पर मेरा ध्यान अटकता है. और मैं पाता हूं कि यह एक बड़ी कविता है. बहुत सादा ढंग से बतकही के अंदाज में कही गई ऐसी कविता, जिसके भीतर बहुत शक्ति, बहुत ऊर्जा है. मनुष्य की विपरीत स्थितियों में, यह कविता उसे एक सबल हथियार थमा देती है, निराशा के कुहासे को बेधने का हथियार, जो उसमें जबरदस्त जीवनी शक्ति भर देता है-
बहुत भयभीत कर सकता है
एक अकेला सा शब्द
अकेला.
शक्ति का जर्रा-जर्रा निकालकर तन से
झुका सकता है कितनी ही शक्तियों के सामने
घेर सकता है कितनी ही भयों से घिरी घटनाओं से
जिन्हें अभी होना था
लेकिन एक बार अकेलेपन की ताकत को हम समझ लेते हैं, तो चीजें खुद-ब-खुद बदलने लगती हैं. और अकेला आदमी कुछ इस तरह से तनकर खड़ा हो जाता है, जैसे कोई अकेला आदमी ही हो सकता है. जरा पढ़ें दिविक की कविता की ये पंक्तियां, जो किसी व्यक्ति को एक नई शक्ति के अहसास के साथ मानो थरथरा सा देती हैं-
बहुत कुछ हो सकता है अकेले आदमी के पास
हो सकते हैं कुछ चित्र
जिन्हें वह चाहता रहा है देखना
हो सकते हैं कुछ अनुभव
जिन्हें वह चाहता रहा है जीना
कुछ रंग भी हो सकते हैं
जिन्हें वह चाहता रहा है भरना
बाँस-बुरास में उगती हरी पत्तियों से
अहसास भी हो सकते हैं तनिक
जिनसे वह चाहता रहा है चौंकना
क्या नहीं हो सकता अकेले आदमी के पास
बहुत कुछ हो सकता है बहुत कुछ ऐसा
जैसा सोच भी नहीं सकता
अकेला होने से पहले अकेला आदमी.
'राहों के बाहर कविता' भी एक अलग तरह की कविता है, जो बताती है कि राहों से जुड़ी उलझनें, आशा और निराशाएं असल में हमारे मन में होती हैं, राहों में नहीं. और सच पूछिए तो दुनिया की सब राहें मन से होकर निकलती हैं. बहुत से लोग हैं, जो अकसर बनी-बनाई राहों पर ही चलते हैं. पर कुछ ही लोग हैं, जो बनी-बनाई राहों पर चलने से इनकार कर देते हैं, और उन्हें वहां भी राहें नजर आती हैं, जहां दूसरों को दिखाई नहीं देतीं. दिविक की कविता बड़े सुथरे ढंग से यह बात कहती है-
बहुत आसान होता है
चलना राहगीरों की राह पर
पर राहें वहां भी होती हैं
जहां वे नहीं दिखतीं
चलने से पहले.
इसी तरह दिविक की एक और महत्त्वपूर्ण कविता है, 'बचूँ तो लिखूँ'. बहुत कम शब्दों से बनी यह कविता इशारों में बहुत कुछ कहती है. कवि लिखना चाहता है, मगर कुछ ऐसा जो लिखने जैसा लिखना हो. साथ ही उस लिखने के कुछ मानी हों, उससे चीजें बदलें और एक नया इतिहास जन्म ले—
लिख सकूं तो लिखूं
जैसे पाणिनि का हस्तक्षेप
भाषा की दुनिया में.
लिख सकूं तो लिखूं
जैसे जन्म बुद्ध का
काल की छाती पर.
लेकिन ऐसा कुछ लिखने के लिए, जीवन में जो बड़ी तकलीफें और चुनौतियां सामने आएंगी, क्या उनका सामना करते हुए हम बच पाएंगे? और बचेंगे नहीं तो भला लिखेंगे कैसे? यह एक चक्करदार घेरा है, जो हर लेखक के चारों ओर तना हुआ है. दिविक न सिर्फ उसे महसूस करते हैं, बल्कि वह तकलीफ बड़े साफ लफ्जों में सामने रखते भी हैं-
बच सकूं तो बचूं
जैसे बचाया जाना चाहिए आदमी को
जमीन से ज्यादा
सोच पर वार कर रहे हमलावरों से.
कविता की आखिरी पंक्तियां बहुत ज्यादा मुखर हुए बगैर, उस खतरे की ओर इशारा कर रही हैं, जिसे अगर नहीं पहचाना गया, तो शायद कविता लिखना ही संभव न हो पाएगा और साहित्य के कुछ मानी भी न बचेंगे. खासकर 'सोच पर वार कर रहे हमलावरों से' पंक्ति में निशाना इतना सीधा है कि हमारी दुनिया को अपनी ताकत के डंडे से हांकना चाह रहे तानाशाहों का चेहरा छिपता नहीं है.
संकलन की शीर्षक कविता 'गेहूं घर आया है' भी एक अविस्मरणीय और बेहद करुण कविता है. मैं जब-जब इस कविता को पढ़ता हूं, आंखें नम हो जाती हैं और छाती के भीतर उठता-गिरता एक आवेग इस कदर बेचैन कर देता है कि अपने आप को सँभालना मुश्किल हो जाता है. मानो दिविक की कविता बिना नाम लिए गोदान के होरी और धनिया को हमारी आंखों के आगे ले आती हो. भले ही उनकी शक्लें बदल गई हों, पर दर्द वही पुराना है. एकदम सच्चा और खरा—
कर्ज का ही सही
घर आया तो है गेहूं
गृहिणी खुश है
आज लीपा है पूरे उछाह से आंगन.

पंख से गार रहे हैं
चकला-बेलन
गृहिणी खुश है.

न सही साग-पात
गेहूं तो आया है घर में
गृहिणी खुश है.
संकलन की एक और बड़ी दिलचस्प कविता है, 'स्मृति'. बिल्कुल शमशेर की तरह थोड़े से लफ्जों में बहुत कुछ गूंथकर उकेरा गया प्रकृति-चित्र, जो हमेशा-हमेशा के लिए हमारे मन और आंखों में गहरे बस जाता है और अकसर किसी एकांत बांसुरी की तरह उसकी गूंज सुनाई देती है-
मौसम को भी
जाने क्या सूझता है कभी-कभी
जा लटकता है
शहद के छत्ते सा आकाश में
टपका
कि अब टपका.
इसी संकलन की 'सलमा चाची', 'पुन्न के काम आए हैं', 'चिड़िया का ब्याह', 'जल ही जल', 'स्मारक—एक यह भी', 'बूआ', 'अपने साथ के लिए', 'तीसरा हाथ', 'आप?', 'एक भारतीय हँसी' समेत कई कविताएं न सिर्फ दिविक की चर्चित कविताएं हैं, बल्कि उनमें भाषा और कथ्य के लिहाज से बहुत आश्चर्यजनक विविधता भी है. इन कविताओं को पढ़कर समझा जा सकता है कि दिविक अनायास ही कितनी युक्तियों से कविताएं बुनते हैं और उन्हें अपनी इसी दुनिया से जुड़े कितने अलग-अलग रूपों में ढाल देते हैं. खासकर उनकी ऐसी कविताएं जिनमें हमारे आसपास की दुनिया के किस्म-किस्म के चरित्र अपनी पूरी जिंदादिली के साथ उभरते हैं, मन में कहीं गहरे नक्श हो जाती हैं, और हम उन्हें भूलना भी चाहें, तो भुला नहीं पाते.
दिविक की कविताओं में उभरने वाले छोटे से छोटे और मामूली लोगों से लेकर माननीयों तक ऐसे तमाम चरित्र कविता में किस्सागोई का सा सुख देते हैं और एक बार पढ़ने के बाद वे हमेशा हमारी स्मृतियों में थाप लगाते रहते हैं. यह बात भी गौर करने लायक हैं कि दिविक रमेश की कविताओं में अनगिनत शेड्स हैं, जो उन्हें एकरसता से बचाते हुए, एक तरह की ताजगी और जीवंतता से भर देते हैं. प्रेम, करुणा और पारिवारिकता की तो एक से एक आत्मीय छवियां उनमें है ही, पर इसके अलावा कहीं-कहीं हास-परिहास, व्यंग्य और कटाक्ष की भी ऐसी तीखी बौछारें वहां नजर आती हैं कि पढ़ते हुए हम एकाएक ठिठक से जाते हैं. साथ ही इस बात की दाद दिए बगैर भी नहीं रह पाते कि दिविक की काव्य-यात्रा हमें एक साथ इतने गहन अनुभवों से जोड़ देती है कि हम केवल कविता ही नहीं, बल्कि कविताओं में समूचा जीवन पढ़ रहे होते हैं, जिसमें गरीबी की मार और तलछट की करुण सच्चाइयों से लेकर चमकते हुए अभिमानी कंगूरों की अंतर्कथा तक शामिल है.

4.
इसी तरह स्त्रियों पर लिखी गई दिविक रमेश की कविताएं बहुत संवेदी और गौर करने लायक हैं, जिनमें उनके नए उगते पंखों और नए आकाश की पहचान है. खासकर अफगान महिलाओं की स्वतंत्रता और मुक्ति की उड़ान पर लिखी गई कविता 'तुम्हारा आकाश' इस लिहाज से जरूर पढ़ी जानी चाहिए कि यह कविता हर स्त्री के मन में अपने सपनों को पूरा करने का हौसला पैदा करती है. कविता की ये प्रारंभिक पंक्तियां जरा पढ़िए तो—
उड़ो कि इतना उड़ो
आदत हो जाए तुम्हारी आकाश
फूल-फूल जाए छाती जमीन की
तुम्हारी कामयाब उड़ानों पर
कि दौड़ पड़े स्वागत में
चूल्हों की गंध और
आकाशी सुगंध साथ-साथ.
ऐसे ही उनकी 'बेटी ब्याही गई है' कविता बहुत मार्मिक है और भीतर एक गहरी हलचल सी मचा देती है. असल में यह कविता सहज शब्दों में पूछा गया एक तीखा सवाल भी है. बेटी ब्याही गई तो जैसे माता-पिता गंगा नहा लिए हों. पूरे घर भर के चेहरे पर आश्वस्ति का भाव है. लेकिन अचरज है, उसके अगले दिन से ही इस घर में उसकी जगह छिन जाती है. जिस घर में उसका बचपन बीता और जिससे जुड़ी सुख-दुख की हजारों स्मृतियां उसके मन में हैं, अब वहां से धीरे-धीरे जाने-अनजाने उसे बेदखल किया जाने लगता है. और वह सच ही उस घर में मेहमान बन जाती है, जो कभी उसका घर था.
यह कविता परत-दर-परत इस सच्चाई को समाने लाती है कि जिस घर के चप्पे-चप्पे को उसने बड़े प्यार से संवारा, वहां से अब धीरे-धीरे उसकी निशानियां मिटने लगी हैं. इसीलिए जब वह ससुराल से घर आती है, अपना घर ही उसे बेगाना लगने लगता है. वह अपनी परिचित महक को फिर से पाना चाहती है, मगर चीजें अब बदल चुकी हैं-
मां जानती है
कि उसी की तरह
बेटी भी शुरू-शरू में
पालतू गाय-सी
जाना चाहेगी
अब तक रह चुके अपने कमरे.
जानना चाहेगी
कहां गया उसका बिस्तर.
कहां गई उसकी जगह....
पर धीरे-धीरे पूरा घर बिना कुछ कहे ही, उसे यह समझा देता है कि अब वह इस घऱ में महज एक मेहमान है, और बेटी सब कुछ जानते हुए भी कोई सवाल नहीं पूछ पाती.
मां पर लिखी गई दिविक रमेश की एक कविता भी बहुत चर्चित हुई थी. इसमें बचपन की एक कचोटने वाली स्मृति है, जिसमें कुछ ही पंक्तियों में मां के जीवन की पूरी करुणा उभर आती है. बचपन में वे रोज सुबह, मुंह-अंधेरे मां को चक्की पीसते देखते थे और खुद आराम से सोते थे. लेकिन बाद में बड़े होने पर यह दृश्य उनके मन में बार-बार रिवाइंड होता है, तो अचानक चीजों के सही अर्थ समझ में आने लगते हैं. और तब पूरी कविता एक करुण सवाल में बदल जाती है-
आज
जवान होने पर
एक प्रश्न घुमड़ आया है-
पिसती
चक्की थी
या मां?

ऐसे ही दिविक रमेश की एक बड़ी संवेदनात्मक कविता है, 'मां गांव में है' जो हमारे समय की एक बड़ी त्रासदी को सामने रखती है, जिसमें बच्चे पढ़-लिखकर शहरी बन जाते हैं, पर मां-बाप जो गांव की जमीन और संस्कृति से जुड़े हैं, उसे छोड़ना नहीं चाहते. लिहाजा शहर और गांव दो अलग किनारे बन जाते हैं. उनके बीच के फासले इस कदर बढ़ गए हैं कि न गांव शहर को अपना पाता है और न शहर गांव को. नतीजा यह होता है कि मां बेटे से दूर, लगातार दूर होती जाती है और बेटा चाहकर भी कुछ नहीं कर पाता-
चाहता था आ बसे मां भी
यहां, इस शहर में.
पर मां चाहती थी
आए गांव भी थोड़ा साथ में
जो न शहर को मंजूर था न मुझे ही.
न आ सका गांव
न आ सकी मां ही
शहर में. और गांव
मैं क्या करता जाकर!
यों अकसर मां थोड़े समय के लिए आतीं तो उनके साथ चुपचाप थोड़ा सा गांव भी आ जाता था. पर वह थोड़ा ही रहा- इधर-उधर छिटका, थोड़ा-थोड़ा चिपका. लेकिन असली मुसीबत तो यह थी कि गांव का बहुत कुछ था, जो शहर में आ ही नहीं सकता था-
पर कैसे आता वह खुला-खुला दालान, आंगन
जहां बैठ चारपाई पर मां बतियाती है
भीत के उस ओर खड़ी चाची से, बहुओं से.
करवाती है मालिश पड़ोस की रामवती से.
सुस्ता लेती है जहां
धूप का सबसे खूबसूरत रूप ओढ़कर
किसी लोकगीत की ओट में.
मां पर लिखी गई दिविक रमेश की एक और कविता 'मां के पंख नहीं होते' बेहद करुण अहसास की कविता है, जो अपने में एक पूरी त्रासदी को छिपाए हुए है. इसीलिए पढ़ते हुए आंखें भीगती हैं, दिल फफकने लगता है-
मां के पंख नहीं होते
कुतर देते हैं उन्हें
होते ही पैदा
खुद उसी के बच्चे
मां के पंख नही होते.
लगभग गाती और रोती थी मां
ऐसा ही कुछ
भले ही शब्द न रहे हों हूबहू
न रहा हो लहजा भले ही हूबहू
पर
जब-जब पिटती थी मां
मां गाती थी और रोती थी
चिपका लेती थी हमें
और रोती थी
स्त्रियों पर लिखी गई दिविक की कुछ यादगार कविताओं में 'सलमा चाची' का भी नाम लिया जाना चाहिए, जिसकी शख्सियत दिविक के यहां बड़े जोरदार ढंग से उभरती है. जिंदगी की तलछट में रहकर बड़ी हिम्मत से अपने अस्तित्व को बचाए रखने की लड़ाइयां लड़ती हुई सलमा चाची अपने मोहल्ले की झाँसी की रानी ही तो है, जिससे टकराने की कोई हिम्मत नहीं कर सकता. उसमें भरपूर जिंदादिली है, तो अपने बूते जिंदगी की कठिनतम लड़ाइयां लड़ पाने का हौसला भी-
पड़ोस में ही रहती हैं सलमा चाची और
चाची की जुबान में
तीन-तीन साँड़नी सी बेटियां
सलमा चाची
हमने तो सुना नहीं-
कभी याद भी करती हों अपने खसम को
या मुंहजली सौत को
दूसरी ओर दिविक के यहां पारिवारिकता की आत्मीय सुवास से भरी, कोमल अहसास की कविताएं भी कम नहीं हैं. ऐसी कविताएं जो जीवन को एक रचाव देती हैं और जीवन राग से छलछला रही हैं. 'समुद्र मेघों के' दिविक की ऐसी ही अंतरंग अनुभूतियों की बड़ी प्रेमल कविता है, जिसमें मन का गहरा लगाव है तो एक अव्यक्त राग भी, जो अनायास ही छलक जाता है-
क्या हो गया है सबको
लटका हुआ है मुंह घर का.
भूलकर बक-बक
कितना चुप है रेडियो!
दरवाजे और खिड़कियां
बंद किए बैठी हैं पुस्तकें.
बर्तनों से आवाज गायब है
रसोई में.
कलम ने सुखा ली है स्याही
कागज ने चुरा लिया है मुंह
डायरी भी जा छिपी है कहीं.
मैं क्या करूं?
क्या करूं
कान सुनना चाहते हैं एक दस्तक
बहुत अपनी.
यह मन में कहीं गहरे छिपे हुए प्रेम की कविता है, मानो आज की भागमभाग वाली दुनिया में बस इतने ही प्रेम की गुंजाइश हो. और केवल प्रेम ही क्यों, जिंदगी की व्यस्तता और भाग-दौड़ में किताबें और पत्रिकाएं भी, जिन्हें कभी जी-जान से चाहा और सहेजकर रखा था, कहीं पीछे छूट रही हैं-
मोह तो त्यागना पड़ता है
पुरानी से पुरानी
पुस्तकों-पत्रिकाओं का भी
एक उम्र होने पर!
काश
पुस्तकें-पत्रिकाएं भी
जायदाद हुई होतीं
हुई होतीं जेवरात जरूरी.
होतीं बैंक बैलेंस ही आकर्षक!
तो मशक्कत तो न करनी पड़ती इतनी
खोजने में इनके
उत्तराधिकारी
यादव जी!
यों आज की बदली हुई दुनिया और बदला हुआ वक्त इतने विविध बिंबों में दिविक की कविता में आता है कि लगता है, वे बिन कहे हमारी आधुनिक दुनिया का एक समाजशास्त्रीय खाका पेश कर रहे हों, जिसका कोई पहलू उनसे छूटता नहीं है.

5.
दिविक रमेश इस मामले में सौभाग्यशाली हैं कि उन्हें केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर, त्रिलोचन और बाबा नागार्जुन सरीखे बड़े कवियों की आत्मीयता और सान्निध्य मिला. उन्होंने बहुत निकट से इन्हें देखा और जाना भी. शायद यही कारण है कि इन बड़े कवियों की स्मृतियां और अक्स उनकी कविताओं में बार-बार आते हैं. शमशेर की कविताएं पढ़ते हुए मन में बने बिंबों को भी दिविक ने एक कविता में सहेजा है. यह बड़ी स्निग्ध, कोमल और यादगार कविता है, जो संकेतों में बहुत कुछ कह जाती है-
छुइए
मगर हौले से
कि यह कविता
शमशेर की है.
और यह जो
एक-आध पाँखुरी
बिखरी
सी
पड़ी
है
न?
इसे भी
न हिलाना.
बहुत मुमकिन है
किसी मूड में
शमशेर ने ही
इसे ऐसे रक्खा हो.
कहना न होगा कि शमशेर की कविता की जो नाजुकी है, उसे दिविक ने अच्छे से पकड़ा है और बहुत करीने से अपने शब्दों में सहेजा भी है. मानो शमशेर की कविता की नाजुकी से खुद दिविक की कविता भी शिरीष वृक्ष की किसी नाजुक शाख की तरह झुकती चली जा रही हो.
किसी कवि की अदा को इतने करीब से देखना और इतने करीने से कह पाना सचमुच एक विरल उपलब्धि ही है.
ऐसे ही दिविक की कई कविताओं में हमारे साहित्य और साहित्यिक बिरादरी के हालचाल और असली सूरत भी नजर आ जाती है, जिनमें खुद उनकी अपनी उपस्थिति भी है. यहां दिविक कुछ छिपाते नहीं हैं और अपने भीतर का पूरा एक्सरे कुछ शब्दों में उतार देते हैं. यों तो किसी सभा में पीछे बैठना उन्हें अच्छा लगता है, क्योंकि इससे चीजें कहीं ज्यादा साफ-साफ नजर आती हैं और अगली पंक्तियों की हरकतें भी कहीं ज्यादा अच्छी तरह से पढ़ी जा सकती हैं. मगर फिर भी कुछ तो ऐसा है, जो पीछे बैठने पर उनके भीतर एक जंग सी छेड़ देता है. इससे जहां आगे की पंक्तियों में बैठे महाजनों का रहस्य खुलता है, वैसे ही अपना भी रहस्य खुलता है. कविता की ये पंक्तियां गौर करने लायक हैं-
रहस्य अपना भी खुलता है
तन मन इतना भी नहीं रह पाते निस्पृह
जितना चाहते हैं दिखाना पीछे बैठकर
आंखें ढूँढ़ती पाई जाती हैं खाली जगहें अग्रिम पंक्तियों में
मन पकड़ा जाता है चाहते हुए
खुद को आगे बैठाने की फिराक में
दिमाग से चू-चू जाती है लालसा
अग्रिम पंक्ति के श्रेष्ठ जनों से फेंके
अपनी पहचान के टुकड़े की..
मुझे याद नहीं पड़ता कि इस तरह के अनुभव पर किसी और ने भी कविता लिखी हो. असल में बहुत से क्षेत्र जो कविता के लिए निषिद्ध समझ लिए गए हैं, दिविक का कवि वहां भी धँसता है और कुछ ऐसा कह जाता है, जो कहीं मन के भीतर गड़ जाता है. शायद कविता का होना यही है.
दिविक रमेश की 'व्यक्तिगत' कविता भी मुझे एकदम लीक से हटकर लिखी गई, अलहदा सी कविता लगती है. कविता में बड़ी मुश्किलों से अपना घर बनवाकर उसमें रह रहा कवि उन सबसे मुखातिब है, जिन्हें उसका यह थोड़ा सा आराम भी नहीं सुहाता. जैसे अपना घर बनवाकर उसमें रहना कोई बहुत बड़ा अपराध हो. तब क्षुब्ध कवि को अनचाहे ही अपने को खोल-खोलकर दिखाना पड़ता है-
अगर मान भी लूं महल है यह
तो भी खुद चिना है मैंने इसे.
गवाह है मेरा यह सिर
जिसने ढोई हैं ईंटें,
ये पांव
धंस रहे हैं जो गारे में
ये आंखें
तराई की है जिन्होंने रात-दिन.
समूचा शरीर
जो आज दिन नजर आता है तुम्हें
खुद को कुछ आराम पहुंचाता
कुछ प्रकोपों से खुद को बचाता
इसे देखा नहीं तुमने
ईंट पर ईंट
संभालकर रखते...
असल में दिविक की यही अनौपचारिकता उन्हें एक ऐसे कवि के रूप में पहचान दिलाती है, जिसमें अपनी लड़ाइयां खुद लड़ी हैं और अपनी कविता की राह भी खुद निर्मित की है. इसीलिए वे समकालीन कवियों से इतने भिन्न और मौलिक भी लगते हैं. आज के वक्त में जब बहुतों की कविताएं एक-दूसरे के अनुकरण में कभी-कभी तो कार्बन कॉपियों सरीखी लगती हैं, वहां दिविक अपने काव्य मुहावरे और मिजाज में बहुतों से अलग हैं, और अपनी राह पर चुपचाप आगे बढ़ते जा रहे हैं, यह कम आश्वस्ति और प्रसन्नता की बात नहीं है.
यहां यह उल्लेख जरूरी है कि दिविक रमेश ने केवल कविताएं ही नहीं लिखीं, बड़ी सुंदर और स्मरणीय कहानियां भी लिखी हैं, जिन्हें खासा सराहा गया है. इसी तरह बच्चों के लिए उन्होंने बहुत लिखा है, और बहुत मन से लिखा है. उनके आत्मीयता भरे संस्मरण भी मैंने पढ़े हैं, गंभीर आलोचनात्मक लेख भी. पर मुझे लगता है, दिविक रमेश सबसे पहले कवि हैं, फिर कुछ और. उनका कवि होना ही उनके समूचे साहित्य में अलग-अलग रंग-रूपों में प्रतिबिंबित होता है. जैसे उनकी कविता ही अलग-अलग मोहक रूपों और भंगिमाओं में सामने आ रही हो. मुझे लगता है, दिविक कवि होने के लिए ही बने थे और कविता अपनी बहुतेरी सुंदर छटाओं, प्रतिरोधी तेवरों और अभिव्यंजना के लिए उनकी प्रतीक्षा कर रही थी, जो उनकी कलम से ही निकलने थे. और वे समय-समय पर अपनी पूरी शक्ति के साथ सामने आए भी.
मुझे याद आता है, दिविक रमेश से उनकी कविताओं के जरिए जब मेरी मुलाकात हुई थी, तब वे युवा ही थे. तब से उनकी कविता के साथ मेरा रागात्मक नाता जुड़ा रहा है. आज अपने उसी प्रिय कवि को पचहत्तर का होते देख रहा हूं. अपने इस अहसास को मैं उनके लिए अनायास ही लिखी गई कविता की इन सतरों के जरिए ही कहना चाहूंगा-
याद मुझे रह-रह आती हैं, दिविक, आपकी बातें,
अनायास दिल छू जाती हैं, दिविक, आपकी बातें.
गुनसुन-गुनसुन खोला करता हूं जब मन की परतें,
तभी अचानक छिड़ जाती हैं, दिविक, आपकी बातें.

बहुत पुरानी चिट्ठी सी वे, दिविक, आपकी बातें,
कुछ भूली, अनभूली सी वे, दिविक, आपकी बातें,
यहां डोलतीं, वहां डोलतीं, दिविक, आपकी बातें,
कोई मीठा रंग घोलतीं, दिविक, आपकी बातें.

जिनमें कोई दुख बह आया, कुछ ऐसी वे बातें,
जिनमें था बचपन मुसकाया, कुछ ऐसी वे बातें,
सुन करके बस, चुप हो आया, कुछ ऐसी वे बातें,
लगा, किसी ने गले लगाया, कुछ ऐसी वे बातें.

गीत दोस्ती का लिख जातीं, बड़ी पुरानी बातें,
होंठों में ही फिर दोहरातीं प्रेम दिवानी बातें,
बाद हमारे भी रह जाएंगी शायद ये बातें,
दिल में कोई हूक जगाएंगी शायद ये बातें.

बरसों बाद पढ़ेगा कोई अपनी चिट्ठी-पाती,
तो समझेगा इन सतरों में है करुणा गुहराती,
इक सपना शायद इन लफ्जों संग लिपटा आएगा,
हम न रहेंगे, पर शायद वह सपना रह जाएगा.
अलबत्ता, हम सबके प्यारे दिविक रमेश इसी तरह बिन थके एक से एक अमूल्य कृतियां देते रहें, इसी तरह स्वस्थ और चुस्त-दुरुस्त बने रहें और खूब लिखें, मेरी, उनके पाठकों और हिंदी साहित्य जगत की असीम शुभकामनाएं उनके साथ हैं.
***
संपर्कः प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008, मो. 09810602327, ईमेल- prakashmanu333@gmail.com
 

 

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